आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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फेसबुक, ज़िंदगी, अवसाद और आत्महत्या

पिछले एक महीने में फेसबुक की दो महिला मित्रों की आत्महत्या की खबर ने अंदर तक हिलाकर रख दिया है. समझ में नहीं आता कि ज़िंदगी से भरी, नियमित फेसबुक अपडेट्स करने वाली लड़कियों को आखिर किस दुःख ने ज़िंदगी खत्म करने को मजबूर किया होगा? वो बात इतनी मामूली तो नहीं ही हो सकती कि ज़िंदगी उसके सामने हल्की पड़ जाय. कुछ भी हो इस बात को किसी के व्यक्तित्व की कमजोरी मानकर खारिज नहीं किया जा सकता.

इस तरह की आत्महत्या की घटनाओं के पीछे अक्सर अवसाद ही उत्तरदायी होता है. और अन्य मानसिक स्थितियों की तरह ही अवसाद को लेकर हमारे समाज में तरह-तरह की भ्रान्तियाँ हैं. बहुत से लोग तो यह मान बैठते हैं कि अवसाद कोई ऐसी भयानक बीमारी है, जिससे पीड़ित व्यक्ति अजीब सी हरकतें करता है और इससे पता चल जाता है कि अवसादग्रस्त है. जबकि एक बेहद सामान्य सा लगने वाला इंसान भी अवसादग्रस्त हो सकता है. लक्षण इतने सूक्ष्म होते हैं कि उसके व्यक्तित्व में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आता. अक्सर हमारे बीच बैठा हँसता-बोलता, चुटकुले सुनाता इंसान भी अवसादग्रस्त होता है और उसके करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों को भी यह बात पता नहीं होती. कई बार तो खुद रोगी को ही यह पता नहीं होता कि वह डिप्रेशन में है.

हम अक्सर डिप्रेशन को कमजोरी की निशानी मानकर उस पर बात नहीं करना चाहते. लेकिन मुझे लगता है कि अपना अनुभव साझा करने से कुछ लोगों को मदद मिल सकती है, खासकर उनलोगों को, जो खुद यह नहीं समझ पाते या समझकर भी मानने को तैयार नहीं होते कि वे अवसादग्रस्त हैं. मैं यहाँ इस विषय में अपना अनुभव साझा करना चाहूँगी. स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जब मैंने एम.ए. में प्रवेश लिया था, उस समय मेरे जीवन में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ आयीं कि मैं अवसादग्रस्त हो गयी. कारण बहुत से थे- आर्थिक संकट, दीदी, जिसने मुझे माँ की तरह पाला और जो मेरी सबसे अच्छी सहेली हैं, उनकी शादी हो जाना और पेट की लंबी बीमारी. मेस के खाने से मुझे amoebiasis नामक बीमारी हो गयी थी. उसके कारण लगभग दो-तीन साल तक लगातार पेट दर्द रहा. इलाज के बाद पेट तो ठीक हो गया, लेकिन दर्द नहीं गया. आखिर में मेरी एक मित्र मुझे एक न्यूरोलॉजिस्ट के पास ले गयीं. डॉक्टर ने कहा कि इसे डिप्रेशन है, तो मेरी मित्र आश्चर्य में पड़ गयीं. उन्होंने कहा “इतनी बैलेंस्ड लड़की डिप्रेस्ड कैसे हो सकती है?” तो डॉक्टर ने कहा कि “अक्सर बैलेंस बनाने के चक्कर में लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं”

उस समय मुझे नहीं बताया गया था कि मुझे ऐसी कोई समस्या है. मेरे दो मित्र मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रहे थे. उनमें से एक समर ने मेरी दवाइयों का प्रेसक्रिप्शन देखकर मुझे बताया कि ये दवाईयाँ तो डिप्रेशन की हैं. दूसरी मित्र ने बताया कि तुम्हें साइकोफिज़िकल प्रॉब्लम है. मैं यह सोचकर हैरान थी कि दिमागी परेशानी शरीर पर इतना बुरा प्रभाव डाल सकती है. मैं एक खिलाड़ी रही थी और उस बीमारी के पहले मैं कभी इतनी बीमार नहीं पड़ी थी. खैर, मुझे तभी पता चला कि मानसिक बीमारी कभी भी किसी को भी हो सकती है.

मेरे दोस्तों ने मेरा उस समय बहुत साथ दिया. मुझे कभी-कभी आत्महत्या का ख़याल भी आता था, लेकिन खुद को सँभाल लेती थी, ये सोचकर कि ये सब डिप्रेशन के कारण है और मुझे इस बीमारी से हार नहीं माननी है.. मेरे साइकोलॉजी वाले दोनों दोस्तों ने हॉस्टल की सहेलियों से कह रखा था कि मुझे एक मिनट के लिए भी अकेला न छोड़ें. ये बात मुझे बाद में पता चली. समर अक्सर मेरी काउंसलिंग के लिए बाहर मिलता था और ये बात समझने की कोशिश करता कि आखिर मुझे सबसे ज़्यादा कौन सी बात सता रही है. मेरी पेट की बीमारी के समय मेरी दो सबसे करीबी सहेलियों पूजा और चैंडी ने मेरा बहुत ध्यान रखा. उस समय दोस्तों के साथ ने धीरे-धीरे मुझे गहरे अवसाद से बाहर निकाल लिया. हालांकि दवाएँ नहीं छूटीं. मैं अब भी दवाएँ ले रही हूँ. पर उन्हें खुद ही रिड्यूस कर रही हूँ और धीरे-धीरे एक दिन ये दवाएँ भी छोड़ दूँगी.

अलग-अलग व्यक्ति के डिप्रेशन में जाने के कारण बिल्कुल भिन्न होते हैं, लेकिन सबसे प्रमुख कारण जो मुझे समझ में आता है, वह है अकेलापन. कभी-कभी दोस्तों से घिरे होते हुए भी हम बिल्कुल अकेले हो जाते हैं क्योंकि कोई भी दोस्त हमें इतना अपना नहीं लगता, जिससे अपनी बेहद व्यक्तिगत या बचकानी समस्या साझी की जा सके. कभी-कभी सारे दोस्त छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं या अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं. कई बार तो पति-पत्नी भी एक-दूसरे से हर बात शेयर नहीं कर पाते.

हज़ार कारण है डिप्रेशन में जाने के, लेकिन किसी को गहरे अवसाद में जाने से रोकने का एक ही उपाय है- अपने दिल की बात साझा करना. जिन्हें लगने लगा है कि वो ज़िंदगी को लेकर निगेटिव होने लगे हैं, उन्हें दोस्तों से और परिवार वालों से बात करना चाहिए और अगर कोई नहीं है तो लिखना चाहिए-डायरी में, ब्लॉग पर फेसबुक पर या कहीं भी.

लेकिन इतना भी काफी नहीं है. ज़्यादा सावधान तो परिवारवालों और दोस्तों को होना चाहिए. डिप्रेशन के कोई प्रकट लक्षण नहीं होते, एक सायकायट्रिस्ट ही पता कर सकता है कि कोई डिप्रेशन में है या नहीं. आप सिर्फ इतना कर सकते हैं कि अपने किसी दोस्त को एकदम से अकेला न छोड़ें. खासकर उन दोस्तों को जो बहुत अधिक संवेदनशील हैं और अकेले रहते हैं. आप ये सोचकर मत बैठिये कि वे डिस्टर्ब होंगे. अगर लगता है कि कोई डिप्रेशन में जा सकता है तो उससे बार-बार बात कीजिये. भले ही वह मना करे. उसकी परेशानी का कारण मत पूछिए, बस इधर-उधर की हल्की-फुल्की बात कीजिये. उसे यह एहसास दिलाइये कि आप उसके साथ हैं.

सबसे ज़रूरी बात – अगर आपको लगता है कि आप अपनी ज़िंदगी में खुश हैं, संतुष्ट हैं, तो खुशियाँ बाँटिए. हो सकता है कि आपका कुछ समय का साथ या थोड़ी सी हल्की-फुल्की बातें किसी का बड़ा सा दुःख दूर कर दें. अपने में सीमित मत रहिये. खुद को खोलिए, इतना कि दूसरा भी आपके सामने खुद को खोलने पर मजबूर हो जाय.

पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (२.)

मैं पहले ही दो दिन पुस्तक मेला घूम आयी थी, इसलिए फिर जाने का कोई इरादा नहीं था. लेकिन बीस फरवरी को जब पुस्तक मेले में थी, तभी अनु का मेसेज आया कि वह कल अपने बच्चों को लेकर आ रही है, मैं आ सकती हूँ क्या? मेरा बहुत दिनों से उसके बच्चों आदित और आद्या से मिलने का मन था, तो मैंने झट से हाँ का मेसेज कर दिया. उसके बाद शाम को फेसबुक पर आशुतोष के यह जिक्र करने पर कि उसने आराधना दी से पैसे लेकर पार्टी दी, उसकी मंडली ने उसको घेर लिया कि हमें भी पार्टी चाहिए. तय हुआ कि नेहा और प्रोमिला जी पार्टी देंगी. मज़े की बात तब तक मैं प्रोमिला जी को जानती तो थी, लेकिन फेसबुक पर दोस्त नहीं थी… 🙂

दूसरे दिन पहले तो अनु से मिलना था, फिर नेहा और आशुतोष एंड कम्पनी के साथ पार्टी करनी थी. मेसेज के माध्यम से पता चला कि अनु फूड कोर्ट में है. मैं वहीं पहुँची. अनु ने अपने बच्चों से मेरा परिचय करवाया, फिर हम हॉल न. 12 के अंदर हिंदयुग्म के स्टाल पर आ गए. उसके पहले हमने एकलव्य प्रकाशन के स्टाल पर बच्चों के लिए कुछ किताबें लीं. आदित और आद्या बड़े ही प्यारे बच्चे हैं. अपनी उम्र के और बच्चों से कहीं अधिक समझदार और मम्मा का कहना मानने वाले. हिन्दयुग्म के स्टाल पर कई लोगों से मिलना हुआ. मैंने अनु की कहानी-संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ लेकर उससे हस्ताक्षरित करवाई. फिर हमने साथ तस्वीरें खिंचवाई. फेसबुक मित्र सोनारुपा विशाल से भी मिलना हुआ. रमा भारती जी भी बहुत ही गर्मजोशी से मिलीं. वे तब तक फेसबुक पर मेरी मित्र नहीं थीं, लेकिन हम एक-दूसरे को जानते थे.

अनु को अपने घर जाना था, लेकिन चलते-चलते वे सत्यानन्द निरुपम जी से मिलना चाहती थीं, तो हम राजकमल प्रकाशन की ओर बढ़े. वहाँ बहुत अधिक भीड़ थी. पता चला कि रवीश कुमार अपनी पुस्तक “इश्क में शहर होना” पर आटोग्राफ दे रहे हैं. पाठकगण पुस्तक खरीदकर पंक्तिबद्ध होकर अपनी प्रति हस्ताक्षरित करवा रहे थे. यह भी खबर मिली कि थोड़ी देर में जावेद अख्तर भी आने वाले हैं. पहले ही स्टाल पूरा भरा हुआ था और भीड़ देखकर मुझे घबराहट हो रही थी. मैं यह सोच रही थी कि जावेद जी के आने पर क्या लोग डबल स्टोरी बनाकर खड़े होंगे 😛 अनु रवीश जी के साथ काम कर चुकी है, इसलिए आद्या और आदित उनको व्यक्तिगत रूप से जानते हैं. आदित ने पूछा “ममा, रवीश अंकल के पास इतनी भीड़ क्यों है?” तो अनु ने जवाब दिया, “बेटा, रवीश अंकल सुपरस्टार हो गए हैं.” 🙂

हम वहीं खड़े थे, तब तक विभावरी और प्रियंवद आते हुए दिखे. विभावरी ने बताया कि ‘विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि आप पुस्तक मेले आयी हुयी हैं’ विश्वस्त सूत्र फेसबुक पर उपलब्ध होते हैं 🙂 एक संक्षिप्त मुलाक़ात के बाद वे वाणी प्रकाशन की ओर बढ़ गए. वे प्रियदर्शन के किसी कार्यक्रम में शिरकत करने जा रहे थे. मैं थोड़ी देर अनु के साथ घूमती रही, फिर उससे विदा लेकर दखल प्रकाशन की ओर बढ़ गयी. इस बीच नेहा से मेसेज पर बात हो रही थी. उससे मैंने कहा था कि हॉल न. 12 में आ जाये. लेकिन आशुतोष के मिलने की पूरी संभावना दखल प्रकाशन के स्टाल पर ही थी. और वही हुआ 🙂

दखल प्रकाशन के स्टाल पर एक साथ नेहा, आशुतोष, अदनान, नैयर, रितेश मिश्र और अभिनव सव्यसाँची मिल गए. आशुतोष और नेहा को छोड़कर बाकी सबसे मैं पहली बार मिल रही थी. नेहा के काम के सिलसिले में मैंने उसे अशोक भाई से भी मिलवाया. रितेश इलाहाबादी मित्र हैं और समर की वजह से उनसे फेसबुक पर परिचय हुआ था. आशुतोष ने मुझे सुघोष मिश्र से भी मिलवाया, जो रितेश के अनुज हैं और इलाहाबाद के मेधावी स्कॉलर. वे पूरा एक ट्राली बैग भर किताबें खरीदकर जाने कहाँ ले जा रहे थे 🙂

हमलोग वहाँ से ‘पार्टी करने’ बाहर की ओर जा ही रहे थे कि नेहा लेखक मंच की ओर मुड गयी. हमलोग वहीं खड़े होकर उसका इंतज़ार करने लगे. तभी दूर से कोई इशारे करता दिखाई दिया. ध्यान से देखा तो फेसबुक मित्र ‘महाकवि और फोटोग्राफर’ शायक आलोक महोदय खड़े हुए थे. उनका नाम इतने सम्मान से इसलिए ले रही हूँ कि ऐसा नहीं करूँगी तो जनाब बुरा मान जायेंगे 🙂 मैं उनके पास पहुँची तो इतनी गर्मजोशी से मिले मानो स्कूल टाइम के ‘चढी-बडी’ हों. साथ में संजय शेफर्ड और रचना आभा भी थे. फिर नेहा भी आ गयी. हमने आपसे में एक-दूसरे का परिचय करवाया और खूब फोटो खिंचाई हुयी.

नेहा फिर कहीं चली गयी. तब तक ब्लॉगर मित्र इंदु सिंह मिल गयीं. उनसे भी मैं दिल से मिलना चाहती थी क्योंकि फेसबुक ने मुझे बताया था कि वे मेरे बचपन के शहर उन्नाव की हैं. इंदु के साथ फेसबुक के युवा साथी सुशील कृष्णेत से भी पहली बार मुलाक़ात हुयी. सुशील से इसके पहले फेसबुक पर कई बार बातें हो चुकी थीं, लेकिन मेरे घर के बिल्कुल पास नेहरु विहार में रहते हुए कभी मुलाकात नहीं हुयी. उनके साथ रमा भारती जी भी थीं. हमने थोड़ी देर बातें कीं. फिर मैं सबसे विदा लेकर आशुतोष, अदनान और नैयर के पास आ गयी, जो बडी देर से भूखे पेट हमारा इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन नेहा जी गायब थीं. उनको बुलाया गया. तब तक हम वहीं ज़मीन पर बैठकर पेट में कूद रहे चूहों को शांत करने की कोशिश कर रहे थे और फोटो खींचकर दिल बहला रहे थे 😛

वहाँ बैठे-बैठे अनेक महान विभूतियों के दर्शन हुए. महान पत्रकार/संपादक ओम थान्वी जी और महान साहित्यकार/आलोचक नामवर सिंह जी. लेकिन हमलोग इन सबसे बेखबर फोटो खिंचाई  में व्यस्त थे 🙂 नेहा आयी तो उसने कहा कि किसी काम से उसे वाणी प्रकाशन जाना है. शायद वर्तिका नंदा की पुस्तक का विमोचन होना था. स्टाल पर पता चला कि विमोचन वहाँ न होकर लाल चौक पर है. तो नेहा ने तय किया कि वह लाल चौक जायेगी, लेकिन हम क्या करते? भूख के मारे बुरा हाल था 😛 आखिर नेहा को हमारी हालत पर दया आयी और उसने आशुतोष को खाने-पीने के लिए धन पकड़ाया. हम अकेले खाना तो नहीं चाहते थे, लेकिन भूख के हाथों मजबूर थे 😦

फिर हम मतलब मैं, आशुतोष, नैयर, अदनान और अभिनव फूडकोर्ट पहुँचे. बहुत देर विचार-विमर्श करके खाने के लिए मँगवाया गया. प्रोमिला जी तब तक आयी नहीं थीं. आतीं भी तो मिलतीं कैसे क्योंकि किसी के पास एक-दूसरे का फोन नम्बर ही नहीं था. आखिर में, आशुतोष ने ‘विश्वस्त सूत्रों’ से फोन नंबर लेकर उन्हें फोन किया तो पता चला कि वे पुस्तक मेले में ही थीं. तब तक हमलोग मज़ाक कर रहे थे कि खाने वाले हाज़िर और मेजबान गुम 🙂 थोड़ी देर में प्रोमिला जी आ गयीं. और उसके बाद नेहा. हम खाते-पीते और बातें करते रहे. थोड़ी देर की मुलाक़ात में ही लग रहा था कि हम वर्षों पुराने मित्र हैं और कई सालों के बाद दोबारा मिल रहे हैं.

खाने-पीने के बाद सबलोग विदा लेकर इधर-उधर हो लिए. मैंने फूडकोर्ट के बाहर के घास के मैदान (अंग्रेजी में लॉन) में महाकवि और फोटोग्राफर शायक आलोक महोदय को अकेले बैठे देखा तो उनसे बातचीत करने के मौके को गँवाना उचित नहीं समझा. मेरे साथ अदनान, नैयर और आशुतोष भी चल दिए. अक्षय भी वहीं बैठे थे. थोड़ी देर बाद अभिनव भी आ गए. फिर थोड़ी देर बाद आशु और अभिनव अपने फेफड़े फूँकने कहीं चले गए और बाकी लोग बैठे रहे. महाकवि शायक हमलोगों से बातें करते हुए एक के बाद एक समकालीन कवियों और साहित्यकारों की ‘खबर’ लेते रहे, जैसा कि वे फेसबुक पर भी करते हैं. उनका कहना है कि वे दिन में एक बार झगड़ न लें, तो उन्हें “जाने कैसा-कैसा” महसूस होता है 🙂

महाकवि शायक थोड़ी देर के लिए पेटपूजा करने के लिए गए तो मैंने नैयर से बात की. नैयर ने अपने द्वारा खरीदी हुयी 40 किताबों की फोटो दिखाई, जिनमें हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की किताबें सम्मिलित थीं. मैंने सोचा कि जनाब किसी साहित्य के विद्यार्थी होंगे, लेकिन पूछने पर पता चला कि वे “अर्थ साइंसेज” में आर.ए. यानि रिसर्च असिस्टेंट हैं. इन्हें कहते हैं असली पाठक 🙂 महाकवि खाने-पीने का सामान लेकर लौटे और शिकायत करने लगे कि यहाँ खाना बहुत महँगा है. ये बात तो मैंने भी गौर की है कि प्रगति मैदान में हर जगह खाना ज़रूरत से ज़्यादा महँगा है. उसी समय महाकवि के पीछे कोई पहचाना सा चेहरा दिखा. मैंने महाकवि से पूछा, “उन्हें देख रहे हो. अज़दक वाले प्रमोद जी हैं न?” उन्हें भी ऐसा ही कुछ लगा था लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी. वो तो जब उन्होंने सिगरेट सुलगाई, तो तुरंत दिमाग की बत्ती जल गयी क्योंकि मैंने सबसे पहले उनकी ऐसी ही फोटो देखी थी ब्लॉग पर.

मैं झट से उनके पास पहुँची और उन्हें अपना परिचय देकर बात करना शुरू कर दिया. प्रमोद जी कई बार मुझे उनके ब्लॉग पर की गयी टिप्पणी का जवाब दे चुके हैं, लेकिन उन्होंने मुझे पहचाना नहीं. मुझे अपना पूरा परिचय उन्हें देना पड़ा. वे थोड़ी देर तक टीचर की तरह मुझसे सवाल करते रहे और मैं आदर्श विद्यार्थी की तरह जवाब देती रही 😦 फिर महाकवि भी आ गए. प्रमोद जी ने झट से उन्हें पहचान लिया. महाकवि से मुझे थोड़ी जलन भी हुयी इस बात को लेकर 🙂 प्रमोद जी के पूछने पर ही महाकवि ने वह स्टेटमेंट दिया था कि जब तक वे झगड़ा न करें, उन्हें डिप्रेशन सा फील होता है 🙂 और तभी हमें भी यह ज्ञान प्राप्त हुआ. थोड़ी देर बाद प्रत्यक्षा और वंदना राग जी भी आयीं और उनसे हेलो-हाय हुयी.

कुछ घटनाएँ बडी मज़ेदार हुईं पुस्तक मेले में. मैं कभी किसी सम्मलेन/काव्य पाठ/ साहित्य चर्चा आदि में नहीं जाती, इसलिए मुझे लगता था कि कोई मुझे पहचानेगा नहीं. लेकिन नूतन यादव जी मिलीं और झट से उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें पहचान लिया. पाँच-सात मिनट बात हुयी उनसे. उन्होंने मुझे बताया कि उनके किसी दोस्त ने कहा है कि ‘मुक्ति आपकी मित्र हैं और नारीवादी हैं, तो आप उनसे क्यों नहीं पूछतीं कि वे लड़कों को “बाबू” कहकर क्यों बुलाती हैं’ 🙂 मुझे इस बात से यह महसूस हुआ कि लोग कितनी गंभीरता से लेते हैं मेरी बातों को. मैंने नूतन जी से कहा कि मैं बाबू सिर्फ उन लड़कों को कहती हूँ, जिन्हें छोटा भाई मानती हूँ, बाकी सबको नहीं कहती.

दूसरी घटना, जिस दिन शिखा जी से मिली थी, लालित्य ललित जी भी मिले और उन्होंने पूछा “कैसी हो आराधना?” मैंने कहा “मैंने तो सोचा कि आप पहचानेंगे ही नहीं” तो वे बोले “नहीं, मेरी मैगी ड्यू है न आपके यहाँ” एक बार फेसबुक पर ये बात हुयी थी कि वे मेरे घर पर मैगी पार्टी के लिए आयेंगे 🙂 ये बात लगभग दो साल पुरानी है, लेकिन उन्हें याद है. तीसरी बात, सुघोष ने मुझे बताया कि उन्हें मेरा उपनाम ‘मुक्ति’ इतना अच्छा लगा कि उन्होंने अपनी किसी परिचित का उपनाम भी मुक्ति रख दिया है.

कुल मिलाकर इस खुशफहमी के साथ कि मुझे बहुत से लोग पढते हैं, पसंद करते हैं और प्यार करते हैं, मैं मेले से लौट आयी. मैं कभी प्रोफाइल देखकर दोस्ती नहीं करती और न दोस्ती होने के बाद हिसाब लगाती हूँ कि अगले से मुझे क्या और कितना फ़ायदा होने वाला है? मेरे इस “इम्प्रैक्टिकल एप्रोच” के कारण मेरे करीबी दोस्त बहुत कम हैं. लेकिन पुस्तक मेले में बहुत से लोगों से मिलकर ऐसा लगा कि नए दोस्त बनाए जा सकते हैं. हम नए-नए लोगों से मिलकर खुद को और समझ पाते हैं, खुद की कमियों को ढूँढ़ पाते हैं और खुद के थोड़ा और करीब आ जाते हैं.

पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (१)

बहुत दिनों से खुद को एक अदृश्य खोल में बंद कर रखा था. पता नहीं सभी को ऐसा लगता है या सिर्फ मेरे साथ ऐसा होता है कि कभी-कभी किसी से भी मिलने का मन नहीं होता, बात करने का मन नहीं होता. बस अकेले में खुद के साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है- किताबों, फिल्मों, रंग-ब्रश, कैनवस और अपने पालतू पिल्ले के साथ. पता नहीं इंसानों के साथ से क्यों डर लगता है? जाने ये अवसाद का कोई लक्षण है या स्वाभाविक मनःस्थिति, लेकिन लोगों से मिलने-जुलने, घुलने-मिलने में एक संकोच और हिचक का भाव तो हमेशा ही दिल में रहता है.

पुस्तक मेला एक बहुत अच्छा मौका होता है, अपने आभासी दुनिया के दोस्तों से मिलने का. लेकिन जाने क्यों पिछली बार किसी से मिलने का मन ही नहीं हुआ. बस एक दिन जाकर अपने शोध से सम्बन्धित पुस्तकें ले आयी. इतनी तेजी से घूमकर वापस आ गयी कि कहीं कोई टकरा न जाय. जानबूझकर उन स्टालों पर नहीं गयी, जहाँ किसी परिचित के मिल जाने की संभावना थी. जब हम पहले से डरे होते हैं, तो और भी ज़्यादा डर लगता है ठोकरें लगने से. इस बात से डर लगता है कि कहीं ऐसा न हों कि जो व्यक्ति आभासी दुनिया में इतना अच्छा दोस्त है, वास्तविकता में वैसा न हो? मैं ऐसी बातों से बहुत डरती हूँ.

लेकिन, आखिर कब तक खुद को एक दायरे में बाँधकर रखती. तो इस साल अपनी इन सारी आशंकाओं को एक किनारे करके पहुँच ही गयी पुस्तक मेले में और यह मेरे जीवन का यादगार पुस्तक मेला हो गया. वैसे तो इससे पहले भी पुस्तक मेले में अपने ब्लॉगर मित्रों से मिली हूँ, लेकिन ब्लॉगर मित्र तो विचारों से इतने निकट आ जाते हैं कि उनसे वास्तविक दुनिया में मिलना बिल्कुल भी अचंभित नहीं करता. फिर वैसे भी ब्लॉगिंग के मित्र कम से कम चार-पाँच साल से मित्र तो हैं ही. इस बार नया यह रहा कि बहुत से फेसबुक के मित्र भी मिले, जिनसे मेरा परिचय एक साल से भी कम का है.

18 फरवरी को ज्यों हाल न. 12 में पहुँची त्यों आशीष राय जी से मुलाक़ात हो गयी. वैसे हम पहले से तय करके गए थे कि पुस्तक मेले में मिलेंगे. कहाँ मिलेंगे यह तय नहीं था और फोन से तय करना था, लेकिन हिंद युग्म के स्टाल पर पहुँचते ही वे मिल गए. उनसे बात ही कर रही थी कि रंजू भाटिया जी, अंजू जी और सुनीता जी भी आ गयीं. शैलेश भारतवासी जी ने हम सब लोगों की फोटो ली. मुकेश कुमार सिन्हा जी भी मिले. मृदुला शुक्ला जी भी आयीं हिन्दयुग्म के स्टाल पर उन्होंने सबसे पहले मेरे गर्दन दर्द के बारे में पूछा और कहा कि उन्हें भी ये समस्या हो गयी. लगा कि फेसबुक मित्र कितना ध्यान देते हैं हमारे स्वास्थ्य की तरफ 🙂 शैलेश जी, मुकेश जी और अंजू जी से मैं पहले भी मिल चुकी हूँ, लेकिन बाकी सबसे पहली बार मिलना हुआ. आशीष जी से तो खूब गप्पें मारीं. जूनियर होने का फ़ायदा भी उठाया और फूड कोर्ट जाकर चाय-नाश्ता किया 🙂

उसके बाद मैं हिंद युग्म प्रकाशन से दखल प्रकाशन के बीच चक्कर लगाती रही. दखल प्रकाशन पर अशोक भाई और किरण से बातें कीं थोड़ी देर. उसके बाद फेसबुक मित्र तारा शंकर, रिफाह खान, इलाहाबादी मित्र सूचित कपूर और उनकी पत्नी श्रुति से भी मुलाक़ात हुयी. संज्ञा जी से भी भेंट और संक्षिप्त बातचीत हुयी. इन सबसे भी पहली बार ही मिलना हुआ, लेकिन सभी इतनी गर्मजोशी से मिले कि जैसे बरसों से जानते हों.

वापस हिन्दयुग्म के स्टाल पर आयी, तो आशीष जी से बात करने के दौरान ही स्टाल के अंदर से किसी ने ज़ोर-ज़ोर से ‘आराधना-आराधना’ पुकारना शुरू किया. चौंककर उधर देखा तो पूजा और अनु खड़ी थीं. उनके पास पहुँची तो पूजा ने पूछा “पहचाना?” उनका दावा था कि पूरे पुस्तक मेले में उन्हें कोई नहीं पहचान पाया 🙂 मैंने कहा कि “तुम्हें कौन पहचान पायेगा?” आखिर में यह सिद्ध करने के लिए कि मैंने उन्हें पहचान लिया है, मुझे पूजा और अनु का नाम लेना पड़ा 😛 थोड़ी देर हम गपियाये. फिर वो लोग चले गए. पता चला कि किशोर चौधरी भी स्टाल पर आने वाले हैं, तो मैं वहीं बैठकर इंतज़ार करने लगी. इसी बीच आशीष जी चले गए. वहाँ अनिमेष से मुलाक़ात हुयी. शैलेश जी ने कोई परचा पकड़ाया था मुझे जिसमें वास्तु “विज्ञान” लिखा हुआ था. मैंने उस पर आपत्ति की कि वास्तु कोई विज्ञान थोड़े ही है. इसी बात पर अनिमेष से बातचीत होने लगी. बाद में उनसे फेसबुक पर मित्रता हो गयी 🙂 दोस्त ऐसे भी बनते हैं 🙂 किशोर चौधरी आये तो उनसे मिलकर और किताब भेंट लेकर मैं दखल प्रकाशन वापस चली गयी.

दखल प्रकाशन के स्टाल पर फेसबुक मित्र और छोटे भाई आशुतोष मिले, जिन्होंने ‘और लोगों’ को जलाने के ;लिए मेरे साथ एक फोटो ली. वहीं पर फेसबुक मित्र अभिनव सब्यसाची से भी मुलाक़ात हुयी. नीलिमा जी को ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों से ही उनके ब्लॉग ‘चोखेर बाली’ के कारण जानती हूँ, उनसे भी पहली बार वहीं मिली, लेकिन समयाभाव के कारण बात नहीं हुयी. अपनी पुरानी साथी रूपाली दी और उनकी बिटिया से मिलना भी सुखद रहा.

20 फरवरी का पूरा दिन शिखा वार्ष्णेय जी, सोनल और अभिषेक के नाम था. शिखा जी और सोनल से मिलना कई सालों से स्थगित हो जाता है किसी न किसी कारणवश. कभी मेरी तबीयत खराब होती है, कभी कोई आवश्यक कार्य पड़ जाता है. इस बार उनसे मिलना फेसबुक पर तय हुआ. अभिषेक के माध्यम से पता चलता रहा कि वे कहाँ हैं. जब मैं मेला पहुँची तो शिखा जी हॉल न. 12 के लेखक मंच पर अप्रवासी भारतीय साहित्यकारों के कार्यक्रम में लगभग ऊँघ सी रही थीं. अभिषेक ने बताया कि वे बारह बजे से ही आकर एक के बाद एक अप्वाइंटमेंट और कार्यक्रम निपटा रही थीं. सोनल कहीं गयी हुयी थी कि पीछे से आकर उसने मुझे चौंका सा दिया. इसी बीच नीतीश मुझे देखकर आ गया और मुझे लगभग घुमाकर अपनी ओर करके शिकायत करना शुरू किया कि आप मेले में आयीं तो मुझे क्यों नहीं बताया. सच में मैं उसकी इस प्यार भरी शिकायत पर झेंप गयी क्योंकि मैंने उससे वादा किया था कि जब भी बुक फेयर जाऊँगी, उसे बता दूँगी. उसके दोस्तों की मंडली बाहर थी. वो मुझसे मिलने का वादा लेकर चला गया.

कार्यक्रम खत्म होने पर शिखा जी भी नीचे आयीं और गले लगाकर मिलीं. सोनल और शिखा जी से मैं पहली बार मिली, लेकिन इतनी गर्मजोशी से कि जैसे बरसों की बिछड़ी सहेलियाँ हों. वहाँ कोई न कोई शिखा जी को रोककर मिलना चाह रहा था और मैं, सोनल और अभिषेक उनको सेलिब्रिटी कहकर चुटकी ले रहे थे. शिखा जी भीड़ से बचने के लिए हमलोगों को लेकर बाहर फूडकोर्ट के सामने वाले लॉन में गयीं. हमने साथ में छोले-भटूरे खाए. सोनल को मेरे स्वास्थ्य की इतनी चिंता थी कि उसने मुझे पहले एक सेब खाने को दिया, जिससे मेरे पेट पर छोले-भटूरे का दुष्प्रभाव न पड़े 🙂 बहुत करीबी दोस्तों को ही मालूम है कि मुझे पेट-सम्बन्धी समस्या है. सोनल से मैं कभी नहीं मिली, लेकिन उसे ये पता है :). फिर काफी देर तक हम वहीं बैठकर गपियाते रहे. मित्र राकेश कुमार सिंह जी ने आकर खुद अपना परिचय दिया और बहुत ही गर्मजोशी से मिले. मित्रों की सदाशयता कभी-कभी दिल को छू जाती है.

इसी बीच एक और फेसबुक मित्र अभिलाषा, जो कि बिना मिले ही छोटी बहन बन गयी है, मुझसे मिलने वहाँ आ गयी. उसके साथ आशुतोष भी था. थोड़ी देर में शिखा जी अपने अगले कार्यक्रम के लिए चली गयीं. अभिषेक और सोनल भी उनके साथ ही चले गए. बीच में नितीश अपने दोस्तों की मंडली के साथ मुझसे मिलकर चला गया था. उसकी दोस्त शिवा और अनमोल जो कि फेसबुक पर मेरी भी दोस्त है, से भी पहली बार मिलना हुआ. आशुतोष ने हमको खाते हुए देखा तो कुछ खिलाने के लिए कहने लगा. इलाहाबादी जूनियर होने का पूरा फ़ायदा उठाया उसने 🙂

फूडकोर्ट में बैठकर बच्चों (मेरे लिए तो ये बच्चे ही हैं) ने थोड़ा-बहुत खाना खाया और फिर कुछ देर तक बातें करते रहे. अभिलाषा और उसके दोस्त चले गए. आशुतोष का दोस्त अक्षय, जो देखने में बहुत अंतर्मुखी सा लग रहा था, बाद में पता चला कि फेसबुक पर बहुत अच्छे विचार व्यक्त करता है. हम किसी को देखकर कैसे अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वह कितना चिंतनशील है? अक्षय को मैंने उसी रात फेसबुक पर मैत्री प्रस्ताव भेजकर मित्र मंडली में सम्मिलित कर लिया 🙂

इसके बाद हम दखल के स्टाल पर गए. किरण और वेरा मुझे रास्ते में मिल गयीं. किरण ने कहा कि कल हमारी कोई फोटो नहीं खींची गयी तो आज एक लेते हैं यादगार के लिए. वेरा ने हमारी फोटो ली. बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व है अशोक भाई और किरण की इस बिटिया का. दखल के स्टाल पर पंकज श्रीवास्तव जी मिले. अशोक भाई से मिलकर और एक पुस्तक लेकर मैं शिखा जी और अभिषेक के साथ मेट्रो स्टेशन आ गयी. वहाँ से हम अपने-अपने रास्ते हो लिए.

तो 18 और 20 फरवरी दोनों ही दिन कुछ आभासी मित्र वास्तविक दुनिया में मिले और कुछ अचानक मिले और बाद में आभासी दुनिया के मित्र बने. मित्रों के मिलने और बनने का यह सिलसिला ज़िंदगी भर चलता है, लेकिन यह बहुत ही नया अनुभव है कि आप जिससे कभी भी न मिलें हों और न उनके विचारों से बहुत परिचित हों, वे अचानक से मिलें और इतने अपने से लगें.

क्रमशः

ब्लू

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ज़िंदगी, एक कैनवस पर बनी इन्द्रधनुषी तस्वीर है, जिसमें बैंगनी और हरे के बीच नीला रंग आता है। वही नीला रंग जो आकाश, समुद्र और पहाड़ों को अपने रंग में रंग लेता है। मेरा मनपसंद उदासी का गहरा नीला रंग, जितना उदास, उतना ही सुकून देने वाला भी।

वैसे  तो और भी बहुत से रंग हैं ज़िंदगी में, लेकिन ब्लू इतना ज्यादा है कि सबको अपने प्रभाव में ले लेता है। हर ओर नीला, नीला और नीला। कल कई बार इस रंग ने पूरी तरह भिगोकर रख दिया। ऐसा लग रहा था कि होली आ गयी। पर होली में नीला रंग कौन खेलता है भला…?

एक दोस्त है। बहुत परेशान है। दूर विदेश में अकेला और बीमार। रात में फोन किया उसने। अक्सर करता है। मैं उसकी बात सुनती हूँ क्योंकि उसको बहुत मानती हूँ। वो कहता जाता है अपनी बातें। कई बार रोता है। मैं बस सुनती हूँ।  इसलिए कि वो अकेला है। मैं खुद परेशान हूँ, लेकिन वो मुझे खुद से ज़्यादा परेशान लगता है। उसके दिमाग में खून के थक्के हैं। कई आपरेशन हो चुके हैं और भी कई होने हैं। हमारे देश में इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज नहीं है शायद और अगर होगा भी तो बहुत मँहगा।

वो फोन करता है और मुझसे कुछ पूछता है। एक ऐसी बात, जो मैं उसे बता नहीं सकती। वो मुझे वास्ता देता है अपनी अपनी ज़िंदगी का, जो कि बिल्कुल अनिश्चित है…मैं तब भी नहीं बता सकती। मैं कुछ नहीं कर सकती। उदासी का गहरा रंग घेर लेता है मुझको। वो उधर रोता है, मैं इधर रोती हूँ। वो बार-बार पूछता है, पर मैं नहीं बताती। छः बार फोन करने पर भी नहीं। आखिर मैं फोन काटकर ऑफ कर देती हूँ…और सारी रात गहरे नीले रंग में डूबी रहती हूँ…

एक बहन है। गाँव में रहती है। उसकी कहानी लिखी थी मैंने अपनी पोस्ट पर। वो वहाँ घुट-घुटकर जीती है और उसकी घुटन मैं यहाँ महसूस करती हूँ। वो निकलने की कोशिश कर रही है एक अंधे कुँए से। छटपटाती है, कुछ ऊपर चढ़ती है और फिर फिसलकर वापस कुँए में गिर जाती है। कल एक फोन आया। शायद फिर वो बाहर निकलने की सोच रही है। एक सीढ़ी लगाने की कोशिश की है, देखो क्या होता है? मैं बस इतना कर सकती हूँ। मैंने परसों अपने एक दोस्त से कहा था कि मैं दूसरों की चिन्ता ज़्यादा करती हूँ। इसलिए दुखी रहती हूँ। सिर्फ अपने बारे में सोचने वाले लोग खुश रहते हैं या नहीं… पता नहीं…

एक सहली है। ज़िंदगी के दोराहे पर भ्रमित। दो रास्तों से एक रास्ता चुनना था उसे। अक्सर लड़कियों के पास विकल्प बहुत कम होते हैं और जो विकल्प होते भी हैं, उनमें से किसी एक को चुनना बहुत कठिन होता है। लड़कियाँ निश्चित दायरों में पाली-पोसी जाती हैं। उन्हें बहुत सीमित आज़ादी मिली होती है। बस ये समझ लो कि एक छोटे पिंजरे से निकालकर बड़े पिंजरे में डाल दिया जाता है। इस पिंजरे में वो थोड़े बड़े दायरे में उड़ान भरती हैं। ज़्यादा उड़ने की कोशिश करती हैं, तो पिंजरे की दीवारों से टकराकर खुद ही गिर जाती हैं। पर दरवाजे नहीं खुलते। उन्हें उसी दायरे में अपनी दुनिया बनानी होती है। जो लड़कियाँ खुला आकाश देखकर आहें भरती है, वो खुद को परेशान करती हैं। कुछ मिलने वाला नहीं होता इस चाहत से। एक और चिड़िया पिंजरे की दीवार से टकराकर गिर पड़ी और हार मान ली। शायद उसे लगा हो कि पिंजरे की गुलामी से कहीं ज़्यादा खतरनाक नीले आकाश की आज़ादी है…या शायद कुछ और…

एक दोस्त ने लंबे समय बाद फोन किया। वो बड़ा अफसर बन गया है और तबसे उसकी दुनिया दिन पर दिन चमकीली होती जा रही है। उसकी ज़िंदगी में उदासी के गाढ़े नीले रंग की कोई जगह नहीं। उसे मेरा एक काम करना था। चार महीने हो गए, काम नहीं हुआ। वो मुझे बता रहा था कि वो कितना व्यस्त है। मैं बेमन से सुन रही थी अपने नीले वालपेपर को देखते हुए….मेरे साथ बहुत बड़ी दिक्कत ये है कि जब कोई दोस्त सिर्फ अपनी खुशी के लिए मुझसे बात करता है, तो मुझे लगता है कि वो मतलबी है और जब सिर्फ मेरी हालचाल लेने के लिए फोन करता है, तो लगता है कि मेरे ऊपर एहसान कर रहा है। खासकर ऐसे बड़े अफसर बन गए दोस्तों के बारे में न चाहते हुए भी ऐसा सोचने लगती हूँ। दोस्त ऐसे हैं नहीं, मुझे ऐसा लगता है, ये मेरी प्रॉब्लम है। मुझे ये लगता है कि इस ‘सिर्फ’ को दोस्ती के बीच में नहीं होना चाहिए। खैर…

कल फिर देर रात तक नींद नहीं आयी। एक कोरे हैंडमेड कागज़ पर एक लैंडस्केप बनाया, और अधूरा छोड़ दिया। फिर कभी शायद उसे पूरा कर सकूँ…और फिर रंग भर सकूँ…अपना मनपसंद नीला रंग…

सुनहरी धूप

मुझे नहीं पता कि मैं कैसे उससे इतनी बातें कह गयी. माना कि मेरा बहुत अच्छा दोस्त है, पर मैं जल्दी किसी के आगे भावुक नहीं होती. बहुत दुखी होती हूँ, तो भी नहीं. मैं कहती ज़रूर हूँ अपनी बातें, पर सामान्य होकर. फिर क्या हुआ? …कभी-कभी हो जाता है. अक्सर भावुक होकर इंसान अपना आपा खो बैठता है…पर मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने कहा क्या था?

शायद ये कि ‘मेरे होने ना होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. ना मेरे ऊपर किसी की जिम्मेदारी है और ना मैं किसी की जिम्मेदारी हूँ. तो अगर कल को मैं न होऊं, मतलब मर जाऊँ, तो क्या फर्क पड़ता है किसी को? किसी को भी.’ मैं एक सांस में बोलती गयी और वो एकटक मुझे देखता रहा. शायद ये कि क्या ये वही लड़की है, जो बड़ी-बड़ी परेशानियों से नहीं डरती. तो आज इसको क्या हो गया? फिर वो कुछ सोचने लगा. हो सकता है कि ये सोच रहा हो कि सभी कभी न कभी कमज़ोर हो जाते हैं, टूट जाने की हद तक. उसने कुछ कहना चाहा, पर उठकर चला गया.

ठीक उसके जाने के बाद मुझे लगा कि मैंने कुछ गलत कर दिया. मुझे इतना कमज़ोर नहीं होना चाहिए था. हाँ, मेरे अन्दर ये खास बात है कि मुझे अपनी गलती बहुत जल्दी पता चल जाती है और उसे स्वीकार करके मैं जल्द से जल्द सुधार कर लेती हू, कुछ भी बिगड़कर न सुधरने से बहुत पहले. लेकिन आज ये मौका मेरे हाथ से जा चुका था. वो चला गया था और उसने वो सबकुछ सुना था जो मैंने अपनी बेवकूफी में उसके सामने बक दिया था. उफ़, कितनी बड़ी गलती की थी मैंने. अपने करीबी दोस्तों से भी अपनी परेशानियां जल्दी ना कहने वाली मैं ये क्या कर गयी और क्यों ?

उसी समय मेरे पास उसका मेसेज आया. ‘आपने पूछा था ना कि आपके जाने से किसको फर्क पड़ता है, तो सुन लीजिए ‘दुनिया को फर्क पड़ता है’ आप इतनी स्वार्थी कैसे हो गयीं कि ये भूल जाएँ कि आप सबसे अलग हैं. कुछ लोग सिर्फ अपने लिए नहीं होते’ और मैं बहुत देर तक उस मेसेज को बार-बार पढ़ती रही. मेरे आँखों में आंसू ज़रूर थे, पर होठों पर मुस्कान भी थी. कोई ऐसा, जो मुझे सिर्फ दो सालों से जानता है, मेरे ऊपर इतना विश्वास कर सकता है, तो मैं आत्मविश्वास कैसे खो सकती हूँ? मैं खुद उससे कई बार ये बात कह चुकी हूँ कि अपने लिए सभी जीते हैं, पर मेरा प्रण है कि मैं दूसरों के लिए कुछ करूँ. उसे ये बात याद रही, तो मुझे भूल कैसे गयी?

नहीं, मुझे भी नहीं भूली थी वो बात. बस कहीं से कुछ बादल आ गए थे. थोड़ी धुंध छा गयी थी. पर ये धुंध हट चुकी थी, सुनहरी धूप निकल आयी और सब कुछ साफ था. आप कैसे टूट सकते हैं, कैसे कमज़ोर हो सकते हैं, जब कोई ऐसा दोस्त है आपके पास, जो आपमें इतना विश्वास करता हो? आपसे भी ज्यादा.

क्योंकि हर एक दोस्त – – – होता है

दो-तीन दिन पहले फेसबुक पर एक मजेदार चीज़ देखी. उसमें लिखा था कि कुछ रिश्ते ‘टॉम एंड जेरी’ जैसे होते हैं. एक-दूसरे को चिढ़ाते हैं, तंग करते हैं, खिंचाई करते हैं, शिकायत करते हैं, लेकिन एक-दूजे के बगैर रह भी नहीं पाते. मुझे लगता है भाई-बहन के अलावा ऐसा रिश्ता सिर्फ़ दोस्तों में होता है. फिर एक चीज़ लहरें वाली पूजा ने शेयर की कि ‘दोस्त कितना भी रूठें, उन्हें मना लेना चाहिए क्योंकि वे कमीने हमारे सारे राज़ जानते हैं.’ 🙂

मेरे दोस्तों ने मेरी समस्याओं में हमेशा मेरा साथ दिया है और मुझे विश्वास है कि आगे भी देते रहेंगे 🙂 वैसे तो मैं समस्याओं से भरसक दूर रहने की कोशिश करती हूँ, पर गाहे-बगाहे वो मुझे ढूँढ ही लेती हैं. पता नहीं उनको मुझसे इतना लगाव क्यों है, जबकि वो जानती हैं कि मुझे दुखी रहना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता. शायद वो भी यही चाहती हैं कि मेरे दोस्त मेरे आस-पास रहें 🙂 दोस्तों का आस-पास रहना किसे खराब लगता है, पर जब दोस्त ऐसे हों तो…???

एक दिन मैं एक एक्शन फिल्म देख रही थी. बड़ा ही इंट्रेस्टिंग सीन चल रहा था. प्लेन में कुछ खराबी आ गयी थी. पायलट मर गया था. हीरो, जो कि प्लेन उड़ाना नहीं जानता था, हिरोइन की मदद से प्लेन को क्रैश होने से बचाने की कोशिश में लगा था. प्लेन कभी दायें मुड़ता, कभी बाएं. मैं सांस रोककर मूवी देख रही थी…तभी मेरा दोस्त मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया. थोड़ी देर तक देखता रहा. फिर  बोला “तुम इतने ध्यान से क्या देख रही हो? ये सब सच का थोड़े ही है. स्टूडियो में सेट लगाकर पीछे स्क्रीन भगाकर बेवकूफ बनाते हैं हालीवुड वाले” कर दिया कचरा पूरी फिल्म का. और जब मैंने घूरकर देखा, तो कंधा उचकाकर, मुँह बिचकाकर बोला “हमें क्या? देखो फिल्म . करो अपना समय बर्बाद.” अब ज्ञान चक्षु खोलने वाली इतनी महत्त्वपूर्ण जानकारी के बाद कोई फिल्म देखने की ज़हमत उठा सकता था क्या? और तो और, तबसे मैं जब भी फिल्म में ऐसे सीन देखती हूँ, उसकी बात याद आ जाती है और फिल्म देखने का मज़ा किरकिरा हो जाता है.

दोस्त ऐसे ही होते हैं. थोड़े समय के लिए आते हैं और लंबा असर देकर जाते हैं. माँगो या ना माँगो, सलाह ज़रूर देने लग जाते हैं. याद दिलाते रहते हैं कि उन्होंने सलाह देकर हमारे ऊपर कितना बड़ा एहसान कर दिया है. और अगर उनकी सलाह ना मानो (जैसा कि सौ में से निन्यानवे बार होता है) तो काम बिगड़ने पर इतना सुनाते हैं कि पूछो मत “देखा मेरा कहा नहीं माना ना तुमने, लो भुगतो”

मुझे पता है मेरे दोस्त मेरे फिल्मप्रेम और कुत्ताप्रेम से कितना परेशान रहते हैं (वैसे मेरे ऊपर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता)  मेरा एक दोस्त जब मेरे घर आने वाला होता है, तो पहले पूछता है “तुम्हारी कुतिया होगी ना” अब बताओ मैं उसे कहाँ भेज दूँ? पर इमेजिन, कैसा लगता होगा जब आपके प्यारे-दुलारे, क्यूटी पाई, कुच्चू-मुच्चू पिल्ले को कोई ‘कुतिया’ कहे  😦 पर कहता है ना. कोई बात नहीं. दोस्ती में ये सब चलता है. लेकिन फिल्म के बीच-बीच में कमेंट्री 😦 किसी को बर्दाश्त हो सकती है क्या? पर एक दोस्त ये भी करता है. मुझे वो दिन याद आ जाते हैं, जब हमलोग हॉस्टल के टी.वी. हाल में कमेंट्री कर-करके दूसरों का फिल्म देखना मुश्किल कर देते थे. ऊपर वाला सब देखता है. मुझे ज़रूर उन्हीं कर्मों की सज़ा मिल रही है 😦

एक और मित्र हैं. इस समय सरकार की बड़ी अफसरी की ट्रेनिंग कर रहे हैं. मिजाज़ से साहब बहादुर हैं. सर्दी-गर्मी उन्हें बर्दाश्त नहीं होती और बरसात में गल जाने के डर से बाहर नहीं निकलते 🙂 पर बेचारे दिल से एकदम बच्चे हैं. कुछ साल पहले मैं एक कांफ्रेंस में बनारस गयी हुयी थी. वहाँ गुजरात की प्रोफेसर्स के साथ कमरा शेयर करना पड़ रहा था. वैसे तो वो मैडम लोग बड़ी मजाकिया थीं, लेकिन उम्र का फासला होने के कारण मुझे थोड़ा अटपटा लगता था. उस पर भी मेरे इन दोस्त ने मुझे रात में एक बजे फोन किया. कमरे में मौजूद और लोगों की नींद ना खराब हो, इसलिए मैं रजाई के अंदर मुँह करके बात करने लगी. सोचा था कि जनाब को कोई ज़रूरी काम होगा, लेकिन पता चला कि साहब बहादुर की ड्यूटी चुनाव के चक्कर में फतेहपुर जिले के किसी इंटीरियर में लग गयी थी. वहाँ ना बिजली थी और ना मनोरंजन का और कोई साधन. साहब बहादुर बोर हो रह थे, इसलिए मेरी नींद खराब कर रहे थे. आखिर में समझा-बुझाकर फोन रखवाया कि देखो मेरे साथ के और लोगों को समस्या होगी. दूसरे दिन सुबह मैडम लोग मुस्कुराकर पूछने लगीं ‘किसका फोन था?’ जब मैंने कहा ‘दोस्त का’ तो बोलीं ‘चल हट! बेवकूफ बनाती है. दोस्त से कोई रजाई में छिपकर बात करता है क्या?’ मैंने अपना सर पीट लिया. मेरी अच्छी-खासी सीरियस इमेज का बंटाधार हो गया. साहब बहादुर को फोन करके हड़काया, तो बच्चों की तरह ही-ही करने लगे.

तो ऐसे हैं हमारे दोस्त लोग. और भी कई किस्से हैं, पर और कभी. इन सारे दोस्तों की सारी बदमाशियाँ, ज्यादतियाँ सह लेती हूँ. डाँटती हूँ, फिर मना लेती हूँ. करना ही पड़ता है. वो हमारे सारे राज़ जो जानते हैं 🙂

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