आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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एक सुबह, एक शाम, एक रात

एक सुबह,
बांस की पत्ती के कोने पर अटकी
ओस की बूँद
कैद कर ली थी
आँखों के कैमरे में
आज भी कभी-कभी वो
बंद पलकों में
उतरती है,
… …
एक शाम,
पक्षियों के कलरव को
सुना था बैठकर
छत की मुंडेर पर,
जिसकी धुन
मन में अब भी
जलतरंग सी
बजती है,
… …
एक रात
तुम्हारी तपती हथेलियों का स्पर्श
महसूस किया था
अपने गालों पर,
कानों के नीचे वो छुअन
आज भी
धधकती है,
… …
नहीं सही आज
वो सुबह, वो शाम, वो रात,
वो ओस,वो पंछी,
वो तुम्हारी छुअन
पर उनकी यादें अब भी
सीने में
करकती है.

(photo by fotosearch.com)

बया का घोंसला

कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है, पर मेरा खाली दिमाग तो रचनात्मक ऊर्जा से भर जाता है. कभी किसी गम्भीर विषय पर चिन्तन करने लगता है, तो कभी यादों के गलियारों में भटकने लगता है. कल रात को ही लीजिये, मुझे एक छोटी सी घटना याद आयी और चेहरे पर मुस्कान बिखेर गयी.

कुछ साल पहले की बात है. छुट्टियों में घर गयी तो देखा कि छत की मुंडेर पर चढ़ी बोगनबेलिया की झाड़ पर बया का एक घोंसला लटका हुआ है. मैंने सुना था कि बया बड़ी इन्जीनियर टाइप की चिड़िया होती है, सो उसका घोंसला देखने छत पर चढ़ गयी. वैसे तो उस समय बया आस-पास दिखी नहीं. पर मैं जानती थी कि पक्षियों को अपने घर से छेड़छाड़ पसंद नहीं होती, इसलिये दूर से ही देखने की कोशिश करने लगी. झाड़-झंखाड़ के कारण कुछ दिखाई नहीं दिया.

थोड़ी देर बाद बया वापस आयी. उसे शायद मेरी हरकत पता चल गयी थी. वह नाराज़ होकर थोड़ी देर तक चिल्लाती रही, बड़बड़ाती रही. पता नहीं कितनी गालियाँ दी होंगी. अब मैं पक्षियों की भाषा तो जानती नहीं. मैंने भी कहा कर लो जितनी चाहो उतनी चिक-चिक. इससे ज़्यादा तो तुम कुछ कर नहीं सकती. लेकिन, बया को मेरी हरकत इतनी नागवार गुज़री कि उसने अपना स्थानान्तरण कर लिया.

दो-तीन दिन बाद मैंने देखा कि हमारे लगभग २५-३० फीट ऊँचे एक सागौन के पेड़ की लगभग फुनगी के पास एक बया का घोंसला लटका है. बया रानी उसके अंदर-बाहर फुदक रही थी. मानो मुझे चिढ़ा रही हो “आओ, अब करो मेरे घर में झाँका-ताकी.” बया बड़ी समझदार होती है, ये तो सुना था, पर इतनी समझदार होती है, ये नहीं मालूम था.

अवसाद-1 (अकेलापन)

अखरने लगता है अकेलापन
शाम को…
जब चिड़ियाँ लौटती हैं
अपने घोसलों की ओर,
और सूरज छिप जाता है
पेड़ों की आड़ में,
मैं हो जाती हूँ
और भी अकेली.
… …
मैं अकेली हूँ…
सामने पेड़ की डाल पर बैठे
उस घायल पक्षी की तरह,
जो फड़फड़ाता है पंख
उड़ने के लिये
पर… उड़ नहीं पाता,
और हताश होकर
बैठ जाता है शांत,
… …
अचानक कोई आहट हुई
मैं उठ बैठी,
शायद… दरवाजे पर कोई है
नहीं…वहाँ कोई नहीं…
कोई भी नहीं,
… …
मैं लेट जाती हूँ वापस
बिस्तर पर,
और फिर देखने लगती हूँ
खिड़की के बाहर
उस पक्षी को,
जो उसी डाल पर बैठा
सूनी नज़रों से
ताक रहा है आकाश को…
(photo by fotosearch.com)

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