आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (२.)

मैं पहले ही दो दिन पुस्तक मेला घूम आयी थी, इसलिए फिर जाने का कोई इरादा नहीं था. लेकिन बीस फरवरी को जब पुस्तक मेले में थी, तभी अनु का मेसेज आया कि वह कल अपने बच्चों को लेकर आ रही है, मैं आ सकती हूँ क्या? मेरा बहुत दिनों से उसके बच्चों आदित और आद्या से मिलने का मन था, तो मैंने झट से हाँ का मेसेज कर दिया. उसके बाद शाम को फेसबुक पर आशुतोष के यह जिक्र करने पर कि उसने आराधना दी से पैसे लेकर पार्टी दी, उसकी मंडली ने उसको घेर लिया कि हमें भी पार्टी चाहिए. तय हुआ कि नेहा और प्रोमिला जी पार्टी देंगी. मज़े की बात तब तक मैं प्रोमिला जी को जानती तो थी, लेकिन फेसबुक पर दोस्त नहीं थी… 🙂

दूसरे दिन पहले तो अनु से मिलना था, फिर नेहा और आशुतोष एंड कम्पनी के साथ पार्टी करनी थी. मेसेज के माध्यम से पता चला कि अनु फूड कोर्ट में है. मैं वहीं पहुँची. अनु ने अपने बच्चों से मेरा परिचय करवाया, फिर हम हॉल न. 12 के अंदर हिंदयुग्म के स्टाल पर आ गए. उसके पहले हमने एकलव्य प्रकाशन के स्टाल पर बच्चों के लिए कुछ किताबें लीं. आदित और आद्या बड़े ही प्यारे बच्चे हैं. अपनी उम्र के और बच्चों से कहीं अधिक समझदार और मम्मा का कहना मानने वाले. हिन्दयुग्म के स्टाल पर कई लोगों से मिलना हुआ. मैंने अनु की कहानी-संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ लेकर उससे हस्ताक्षरित करवाई. फिर हमने साथ तस्वीरें खिंचवाई. फेसबुक मित्र सोनारुपा विशाल से भी मिलना हुआ. रमा भारती जी भी बहुत ही गर्मजोशी से मिलीं. वे तब तक फेसबुक पर मेरी मित्र नहीं थीं, लेकिन हम एक-दूसरे को जानते थे.

अनु को अपने घर जाना था, लेकिन चलते-चलते वे सत्यानन्द निरुपम जी से मिलना चाहती थीं, तो हम राजकमल प्रकाशन की ओर बढ़े. वहाँ बहुत अधिक भीड़ थी. पता चला कि रवीश कुमार अपनी पुस्तक “इश्क में शहर होना” पर आटोग्राफ दे रहे हैं. पाठकगण पुस्तक खरीदकर पंक्तिबद्ध होकर अपनी प्रति हस्ताक्षरित करवा रहे थे. यह भी खबर मिली कि थोड़ी देर में जावेद अख्तर भी आने वाले हैं. पहले ही स्टाल पूरा भरा हुआ था और भीड़ देखकर मुझे घबराहट हो रही थी. मैं यह सोच रही थी कि जावेद जी के आने पर क्या लोग डबल स्टोरी बनाकर खड़े होंगे 😛 अनु रवीश जी के साथ काम कर चुकी है, इसलिए आद्या और आदित उनको व्यक्तिगत रूप से जानते हैं. आदित ने पूछा “ममा, रवीश अंकल के पास इतनी भीड़ क्यों है?” तो अनु ने जवाब दिया, “बेटा, रवीश अंकल सुपरस्टार हो गए हैं.” 🙂

हम वहीं खड़े थे, तब तक विभावरी और प्रियंवद आते हुए दिखे. विभावरी ने बताया कि ‘विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि आप पुस्तक मेले आयी हुयी हैं’ विश्वस्त सूत्र फेसबुक पर उपलब्ध होते हैं 🙂 एक संक्षिप्त मुलाक़ात के बाद वे वाणी प्रकाशन की ओर बढ़ गए. वे प्रियदर्शन के किसी कार्यक्रम में शिरकत करने जा रहे थे. मैं थोड़ी देर अनु के साथ घूमती रही, फिर उससे विदा लेकर दखल प्रकाशन की ओर बढ़ गयी. इस बीच नेहा से मेसेज पर बात हो रही थी. उससे मैंने कहा था कि हॉल न. 12 में आ जाये. लेकिन आशुतोष के मिलने की पूरी संभावना दखल प्रकाशन के स्टाल पर ही थी. और वही हुआ 🙂

दखल प्रकाशन के स्टाल पर एक साथ नेहा, आशुतोष, अदनान, नैयर, रितेश मिश्र और अभिनव सव्यसाँची मिल गए. आशुतोष और नेहा को छोड़कर बाकी सबसे मैं पहली बार मिल रही थी. नेहा के काम के सिलसिले में मैंने उसे अशोक भाई से भी मिलवाया. रितेश इलाहाबादी मित्र हैं और समर की वजह से उनसे फेसबुक पर परिचय हुआ था. आशुतोष ने मुझे सुघोष मिश्र से भी मिलवाया, जो रितेश के अनुज हैं और इलाहाबाद के मेधावी स्कॉलर. वे पूरा एक ट्राली बैग भर किताबें खरीदकर जाने कहाँ ले जा रहे थे 🙂

हमलोग वहाँ से ‘पार्टी करने’ बाहर की ओर जा ही रहे थे कि नेहा लेखक मंच की ओर मुड गयी. हमलोग वहीं खड़े होकर उसका इंतज़ार करने लगे. तभी दूर से कोई इशारे करता दिखाई दिया. ध्यान से देखा तो फेसबुक मित्र ‘महाकवि और फोटोग्राफर’ शायक आलोक महोदय खड़े हुए थे. उनका नाम इतने सम्मान से इसलिए ले रही हूँ कि ऐसा नहीं करूँगी तो जनाब बुरा मान जायेंगे 🙂 मैं उनके पास पहुँची तो इतनी गर्मजोशी से मिले मानो स्कूल टाइम के ‘चढी-बडी’ हों. साथ में संजय शेफर्ड और रचना आभा भी थे. फिर नेहा भी आ गयी. हमने आपसे में एक-दूसरे का परिचय करवाया और खूब फोटो खिंचाई हुयी.

नेहा फिर कहीं चली गयी. तब तक ब्लॉगर मित्र इंदु सिंह मिल गयीं. उनसे भी मैं दिल से मिलना चाहती थी क्योंकि फेसबुक ने मुझे बताया था कि वे मेरे बचपन के शहर उन्नाव की हैं. इंदु के साथ फेसबुक के युवा साथी सुशील कृष्णेत से भी पहली बार मुलाक़ात हुयी. सुशील से इसके पहले फेसबुक पर कई बार बातें हो चुकी थीं, लेकिन मेरे घर के बिल्कुल पास नेहरु विहार में रहते हुए कभी मुलाकात नहीं हुयी. उनके साथ रमा भारती जी भी थीं. हमने थोड़ी देर बातें कीं. फिर मैं सबसे विदा लेकर आशुतोष, अदनान और नैयर के पास आ गयी, जो बडी देर से भूखे पेट हमारा इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन नेहा जी गायब थीं. उनको बुलाया गया. तब तक हम वहीं ज़मीन पर बैठकर पेट में कूद रहे चूहों को शांत करने की कोशिश कर रहे थे और फोटो खींचकर दिल बहला रहे थे 😛

वहाँ बैठे-बैठे अनेक महान विभूतियों के दर्शन हुए. महान पत्रकार/संपादक ओम थान्वी जी और महान साहित्यकार/आलोचक नामवर सिंह जी. लेकिन हमलोग इन सबसे बेखबर फोटो खिंचाई  में व्यस्त थे 🙂 नेहा आयी तो उसने कहा कि किसी काम से उसे वाणी प्रकाशन जाना है. शायद वर्तिका नंदा की पुस्तक का विमोचन होना था. स्टाल पर पता चला कि विमोचन वहाँ न होकर लाल चौक पर है. तो नेहा ने तय किया कि वह लाल चौक जायेगी, लेकिन हम क्या करते? भूख के मारे बुरा हाल था 😛 आखिर नेहा को हमारी हालत पर दया आयी और उसने आशुतोष को खाने-पीने के लिए धन पकड़ाया. हम अकेले खाना तो नहीं चाहते थे, लेकिन भूख के हाथों मजबूर थे 😦

फिर हम मतलब मैं, आशुतोष, नैयर, अदनान और अभिनव फूडकोर्ट पहुँचे. बहुत देर विचार-विमर्श करके खाने के लिए मँगवाया गया. प्रोमिला जी तब तक आयी नहीं थीं. आतीं भी तो मिलतीं कैसे क्योंकि किसी के पास एक-दूसरे का फोन नम्बर ही नहीं था. आखिर में, आशुतोष ने ‘विश्वस्त सूत्रों’ से फोन नंबर लेकर उन्हें फोन किया तो पता चला कि वे पुस्तक मेले में ही थीं. तब तक हमलोग मज़ाक कर रहे थे कि खाने वाले हाज़िर और मेजबान गुम 🙂 थोड़ी देर में प्रोमिला जी आ गयीं. और उसके बाद नेहा. हम खाते-पीते और बातें करते रहे. थोड़ी देर की मुलाक़ात में ही लग रहा था कि हम वर्षों पुराने मित्र हैं और कई सालों के बाद दोबारा मिल रहे हैं.

खाने-पीने के बाद सबलोग विदा लेकर इधर-उधर हो लिए. मैंने फूडकोर्ट के बाहर के घास के मैदान (अंग्रेजी में लॉन) में महाकवि और फोटोग्राफर शायक आलोक महोदय को अकेले बैठे देखा तो उनसे बातचीत करने के मौके को गँवाना उचित नहीं समझा. मेरे साथ अदनान, नैयर और आशुतोष भी चल दिए. अक्षय भी वहीं बैठे थे. थोड़ी देर बाद अभिनव भी आ गए. फिर थोड़ी देर बाद आशु और अभिनव अपने फेफड़े फूँकने कहीं चले गए और बाकी लोग बैठे रहे. महाकवि शायक हमलोगों से बातें करते हुए एक के बाद एक समकालीन कवियों और साहित्यकारों की ‘खबर’ लेते रहे, जैसा कि वे फेसबुक पर भी करते हैं. उनका कहना है कि वे दिन में एक बार झगड़ न लें, तो उन्हें “जाने कैसा-कैसा” महसूस होता है 🙂

महाकवि शायक थोड़ी देर के लिए पेटपूजा करने के लिए गए तो मैंने नैयर से बात की. नैयर ने अपने द्वारा खरीदी हुयी 40 किताबों की फोटो दिखाई, जिनमें हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की किताबें सम्मिलित थीं. मैंने सोचा कि जनाब किसी साहित्य के विद्यार्थी होंगे, लेकिन पूछने पर पता चला कि वे “अर्थ साइंसेज” में आर.ए. यानि रिसर्च असिस्टेंट हैं. इन्हें कहते हैं असली पाठक 🙂 महाकवि खाने-पीने का सामान लेकर लौटे और शिकायत करने लगे कि यहाँ खाना बहुत महँगा है. ये बात तो मैंने भी गौर की है कि प्रगति मैदान में हर जगह खाना ज़रूरत से ज़्यादा महँगा है. उसी समय महाकवि के पीछे कोई पहचाना सा चेहरा दिखा. मैंने महाकवि से पूछा, “उन्हें देख रहे हो. अज़दक वाले प्रमोद जी हैं न?” उन्हें भी ऐसा ही कुछ लगा था लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी. वो तो जब उन्होंने सिगरेट सुलगाई, तो तुरंत दिमाग की बत्ती जल गयी क्योंकि मैंने सबसे पहले उनकी ऐसी ही फोटो देखी थी ब्लॉग पर.

मैं झट से उनके पास पहुँची और उन्हें अपना परिचय देकर बात करना शुरू कर दिया. प्रमोद जी कई बार मुझे उनके ब्लॉग पर की गयी टिप्पणी का जवाब दे चुके हैं, लेकिन उन्होंने मुझे पहचाना नहीं. मुझे अपना पूरा परिचय उन्हें देना पड़ा. वे थोड़ी देर तक टीचर की तरह मुझसे सवाल करते रहे और मैं आदर्श विद्यार्थी की तरह जवाब देती रही 😦 फिर महाकवि भी आ गए. प्रमोद जी ने झट से उन्हें पहचान लिया. महाकवि से मुझे थोड़ी जलन भी हुयी इस बात को लेकर 🙂 प्रमोद जी के पूछने पर ही महाकवि ने वह स्टेटमेंट दिया था कि जब तक वे झगड़ा न करें, उन्हें डिप्रेशन सा फील होता है 🙂 और तभी हमें भी यह ज्ञान प्राप्त हुआ. थोड़ी देर बाद प्रत्यक्षा और वंदना राग जी भी आयीं और उनसे हेलो-हाय हुयी.

कुछ घटनाएँ बडी मज़ेदार हुईं पुस्तक मेले में. मैं कभी किसी सम्मलेन/काव्य पाठ/ साहित्य चर्चा आदि में नहीं जाती, इसलिए मुझे लगता था कि कोई मुझे पहचानेगा नहीं. लेकिन नूतन यादव जी मिलीं और झट से उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें पहचान लिया. पाँच-सात मिनट बात हुयी उनसे. उन्होंने मुझे बताया कि उनके किसी दोस्त ने कहा है कि ‘मुक्ति आपकी मित्र हैं और नारीवादी हैं, तो आप उनसे क्यों नहीं पूछतीं कि वे लड़कों को “बाबू” कहकर क्यों बुलाती हैं’ 🙂 मुझे इस बात से यह महसूस हुआ कि लोग कितनी गंभीरता से लेते हैं मेरी बातों को. मैंने नूतन जी से कहा कि मैं बाबू सिर्फ उन लड़कों को कहती हूँ, जिन्हें छोटा भाई मानती हूँ, बाकी सबको नहीं कहती.

दूसरी घटना, जिस दिन शिखा जी से मिली थी, लालित्य ललित जी भी मिले और उन्होंने पूछा “कैसी हो आराधना?” मैंने कहा “मैंने तो सोचा कि आप पहचानेंगे ही नहीं” तो वे बोले “नहीं, मेरी मैगी ड्यू है न आपके यहाँ” एक बार फेसबुक पर ये बात हुयी थी कि वे मेरे घर पर मैगी पार्टी के लिए आयेंगे 🙂 ये बात लगभग दो साल पुरानी है, लेकिन उन्हें याद है. तीसरी बात, सुघोष ने मुझे बताया कि उन्हें मेरा उपनाम ‘मुक्ति’ इतना अच्छा लगा कि उन्होंने अपनी किसी परिचित का उपनाम भी मुक्ति रख दिया है.

कुल मिलाकर इस खुशफहमी के साथ कि मुझे बहुत से लोग पढते हैं, पसंद करते हैं और प्यार करते हैं, मैं मेले से लौट आयी. मैं कभी प्रोफाइल देखकर दोस्ती नहीं करती और न दोस्ती होने के बाद हिसाब लगाती हूँ कि अगले से मुझे क्या और कितना फ़ायदा होने वाला है? मेरे इस “इम्प्रैक्टिकल एप्रोच” के कारण मेरे करीबी दोस्त बहुत कम हैं. लेकिन पुस्तक मेले में बहुत से लोगों से मिलकर ऐसा लगा कि नए दोस्त बनाए जा सकते हैं. हम नए-नए लोगों से मिलकर खुद को और समझ पाते हैं, खुद की कमियों को ढूँढ़ पाते हैं और खुद के थोड़ा और करीब आ जाते हैं.

पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (१)

बहुत दिनों से खुद को एक अदृश्य खोल में बंद कर रखा था. पता नहीं सभी को ऐसा लगता है या सिर्फ मेरे साथ ऐसा होता है कि कभी-कभी किसी से भी मिलने का मन नहीं होता, बात करने का मन नहीं होता. बस अकेले में खुद के साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है- किताबों, फिल्मों, रंग-ब्रश, कैनवस और अपने पालतू पिल्ले के साथ. पता नहीं इंसानों के साथ से क्यों डर लगता है? जाने ये अवसाद का कोई लक्षण है या स्वाभाविक मनःस्थिति, लेकिन लोगों से मिलने-जुलने, घुलने-मिलने में एक संकोच और हिचक का भाव तो हमेशा ही दिल में रहता है.

पुस्तक मेला एक बहुत अच्छा मौका होता है, अपने आभासी दुनिया के दोस्तों से मिलने का. लेकिन जाने क्यों पिछली बार किसी से मिलने का मन ही नहीं हुआ. बस एक दिन जाकर अपने शोध से सम्बन्धित पुस्तकें ले आयी. इतनी तेजी से घूमकर वापस आ गयी कि कहीं कोई टकरा न जाय. जानबूझकर उन स्टालों पर नहीं गयी, जहाँ किसी परिचित के मिल जाने की संभावना थी. जब हम पहले से डरे होते हैं, तो और भी ज़्यादा डर लगता है ठोकरें लगने से. इस बात से डर लगता है कि कहीं ऐसा न हों कि जो व्यक्ति आभासी दुनिया में इतना अच्छा दोस्त है, वास्तविकता में वैसा न हो? मैं ऐसी बातों से बहुत डरती हूँ.

लेकिन, आखिर कब तक खुद को एक दायरे में बाँधकर रखती. तो इस साल अपनी इन सारी आशंकाओं को एक किनारे करके पहुँच ही गयी पुस्तक मेले में और यह मेरे जीवन का यादगार पुस्तक मेला हो गया. वैसे तो इससे पहले भी पुस्तक मेले में अपने ब्लॉगर मित्रों से मिली हूँ, लेकिन ब्लॉगर मित्र तो विचारों से इतने निकट आ जाते हैं कि उनसे वास्तविक दुनिया में मिलना बिल्कुल भी अचंभित नहीं करता. फिर वैसे भी ब्लॉगिंग के मित्र कम से कम चार-पाँच साल से मित्र तो हैं ही. इस बार नया यह रहा कि बहुत से फेसबुक के मित्र भी मिले, जिनसे मेरा परिचय एक साल से भी कम का है.

18 फरवरी को ज्यों हाल न. 12 में पहुँची त्यों आशीष राय जी से मुलाक़ात हो गयी. वैसे हम पहले से तय करके गए थे कि पुस्तक मेले में मिलेंगे. कहाँ मिलेंगे यह तय नहीं था और फोन से तय करना था, लेकिन हिंद युग्म के स्टाल पर पहुँचते ही वे मिल गए. उनसे बात ही कर रही थी कि रंजू भाटिया जी, अंजू जी और सुनीता जी भी आ गयीं. शैलेश भारतवासी जी ने हम सब लोगों की फोटो ली. मुकेश कुमार सिन्हा जी भी मिले. मृदुला शुक्ला जी भी आयीं हिन्दयुग्म के स्टाल पर उन्होंने सबसे पहले मेरे गर्दन दर्द के बारे में पूछा और कहा कि उन्हें भी ये समस्या हो गयी. लगा कि फेसबुक मित्र कितना ध्यान देते हैं हमारे स्वास्थ्य की तरफ 🙂 शैलेश जी, मुकेश जी और अंजू जी से मैं पहले भी मिल चुकी हूँ, लेकिन बाकी सबसे पहली बार मिलना हुआ. आशीष जी से तो खूब गप्पें मारीं. जूनियर होने का फ़ायदा भी उठाया और फूड कोर्ट जाकर चाय-नाश्ता किया 🙂

उसके बाद मैं हिंद युग्म प्रकाशन से दखल प्रकाशन के बीच चक्कर लगाती रही. दखल प्रकाशन पर अशोक भाई और किरण से बातें कीं थोड़ी देर. उसके बाद फेसबुक मित्र तारा शंकर, रिफाह खान, इलाहाबादी मित्र सूचित कपूर और उनकी पत्नी श्रुति से भी मुलाक़ात हुयी. संज्ञा जी से भी भेंट और संक्षिप्त बातचीत हुयी. इन सबसे भी पहली बार ही मिलना हुआ, लेकिन सभी इतनी गर्मजोशी से मिले कि जैसे बरसों से जानते हों.

वापस हिन्दयुग्म के स्टाल पर आयी, तो आशीष जी से बात करने के दौरान ही स्टाल के अंदर से किसी ने ज़ोर-ज़ोर से ‘आराधना-आराधना’ पुकारना शुरू किया. चौंककर उधर देखा तो पूजा और अनु खड़ी थीं. उनके पास पहुँची तो पूजा ने पूछा “पहचाना?” उनका दावा था कि पूरे पुस्तक मेले में उन्हें कोई नहीं पहचान पाया 🙂 मैंने कहा कि “तुम्हें कौन पहचान पायेगा?” आखिर में यह सिद्ध करने के लिए कि मैंने उन्हें पहचान लिया है, मुझे पूजा और अनु का नाम लेना पड़ा 😛 थोड़ी देर हम गपियाये. फिर वो लोग चले गए. पता चला कि किशोर चौधरी भी स्टाल पर आने वाले हैं, तो मैं वहीं बैठकर इंतज़ार करने लगी. इसी बीच आशीष जी चले गए. वहाँ अनिमेष से मुलाक़ात हुयी. शैलेश जी ने कोई परचा पकड़ाया था मुझे जिसमें वास्तु “विज्ञान” लिखा हुआ था. मैंने उस पर आपत्ति की कि वास्तु कोई विज्ञान थोड़े ही है. इसी बात पर अनिमेष से बातचीत होने लगी. बाद में उनसे फेसबुक पर मित्रता हो गयी 🙂 दोस्त ऐसे भी बनते हैं 🙂 किशोर चौधरी आये तो उनसे मिलकर और किताब भेंट लेकर मैं दखल प्रकाशन वापस चली गयी.

दखल प्रकाशन के स्टाल पर फेसबुक मित्र और छोटे भाई आशुतोष मिले, जिन्होंने ‘और लोगों’ को जलाने के ;लिए मेरे साथ एक फोटो ली. वहीं पर फेसबुक मित्र अभिनव सब्यसाची से भी मुलाक़ात हुयी. नीलिमा जी को ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों से ही उनके ब्लॉग ‘चोखेर बाली’ के कारण जानती हूँ, उनसे भी पहली बार वहीं मिली, लेकिन समयाभाव के कारण बात नहीं हुयी. अपनी पुरानी साथी रूपाली दी और उनकी बिटिया से मिलना भी सुखद रहा.

20 फरवरी का पूरा दिन शिखा वार्ष्णेय जी, सोनल और अभिषेक के नाम था. शिखा जी और सोनल से मिलना कई सालों से स्थगित हो जाता है किसी न किसी कारणवश. कभी मेरी तबीयत खराब होती है, कभी कोई आवश्यक कार्य पड़ जाता है. इस बार उनसे मिलना फेसबुक पर तय हुआ. अभिषेक के माध्यम से पता चलता रहा कि वे कहाँ हैं. जब मैं मेला पहुँची तो शिखा जी हॉल न. 12 के लेखक मंच पर अप्रवासी भारतीय साहित्यकारों के कार्यक्रम में लगभग ऊँघ सी रही थीं. अभिषेक ने बताया कि वे बारह बजे से ही आकर एक के बाद एक अप्वाइंटमेंट और कार्यक्रम निपटा रही थीं. सोनल कहीं गयी हुयी थी कि पीछे से आकर उसने मुझे चौंका सा दिया. इसी बीच नीतीश मुझे देखकर आ गया और मुझे लगभग घुमाकर अपनी ओर करके शिकायत करना शुरू किया कि आप मेले में आयीं तो मुझे क्यों नहीं बताया. सच में मैं उसकी इस प्यार भरी शिकायत पर झेंप गयी क्योंकि मैंने उससे वादा किया था कि जब भी बुक फेयर जाऊँगी, उसे बता दूँगी. उसके दोस्तों की मंडली बाहर थी. वो मुझसे मिलने का वादा लेकर चला गया.

कार्यक्रम खत्म होने पर शिखा जी भी नीचे आयीं और गले लगाकर मिलीं. सोनल और शिखा जी से मैं पहली बार मिली, लेकिन इतनी गर्मजोशी से कि जैसे बरसों की बिछड़ी सहेलियाँ हों. वहाँ कोई न कोई शिखा जी को रोककर मिलना चाह रहा था और मैं, सोनल और अभिषेक उनको सेलिब्रिटी कहकर चुटकी ले रहे थे. शिखा जी भीड़ से बचने के लिए हमलोगों को लेकर बाहर फूडकोर्ट के सामने वाले लॉन में गयीं. हमने साथ में छोले-भटूरे खाए. सोनल को मेरे स्वास्थ्य की इतनी चिंता थी कि उसने मुझे पहले एक सेब खाने को दिया, जिससे मेरे पेट पर छोले-भटूरे का दुष्प्रभाव न पड़े 🙂 बहुत करीबी दोस्तों को ही मालूम है कि मुझे पेट-सम्बन्धी समस्या है. सोनल से मैं कभी नहीं मिली, लेकिन उसे ये पता है :). फिर काफी देर तक हम वहीं बैठकर गपियाते रहे. मित्र राकेश कुमार सिंह जी ने आकर खुद अपना परिचय दिया और बहुत ही गर्मजोशी से मिले. मित्रों की सदाशयता कभी-कभी दिल को छू जाती है.

इसी बीच एक और फेसबुक मित्र अभिलाषा, जो कि बिना मिले ही छोटी बहन बन गयी है, मुझसे मिलने वहाँ आ गयी. उसके साथ आशुतोष भी था. थोड़ी देर में शिखा जी अपने अगले कार्यक्रम के लिए चली गयीं. अभिषेक और सोनल भी उनके साथ ही चले गए. बीच में नितीश अपने दोस्तों की मंडली के साथ मुझसे मिलकर चला गया था. उसकी दोस्त शिवा और अनमोल जो कि फेसबुक पर मेरी भी दोस्त है, से भी पहली बार मिलना हुआ. आशुतोष ने हमको खाते हुए देखा तो कुछ खिलाने के लिए कहने लगा. इलाहाबादी जूनियर होने का पूरा फ़ायदा उठाया उसने 🙂

फूडकोर्ट में बैठकर बच्चों (मेरे लिए तो ये बच्चे ही हैं) ने थोड़ा-बहुत खाना खाया और फिर कुछ देर तक बातें करते रहे. अभिलाषा और उसके दोस्त चले गए. आशुतोष का दोस्त अक्षय, जो देखने में बहुत अंतर्मुखी सा लग रहा था, बाद में पता चला कि फेसबुक पर बहुत अच्छे विचार व्यक्त करता है. हम किसी को देखकर कैसे अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वह कितना चिंतनशील है? अक्षय को मैंने उसी रात फेसबुक पर मैत्री प्रस्ताव भेजकर मित्र मंडली में सम्मिलित कर लिया 🙂

इसके बाद हम दखल के स्टाल पर गए. किरण और वेरा मुझे रास्ते में मिल गयीं. किरण ने कहा कि कल हमारी कोई फोटो नहीं खींची गयी तो आज एक लेते हैं यादगार के लिए. वेरा ने हमारी फोटो ली. बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व है अशोक भाई और किरण की इस बिटिया का. दखल के स्टाल पर पंकज श्रीवास्तव जी मिले. अशोक भाई से मिलकर और एक पुस्तक लेकर मैं शिखा जी और अभिषेक के साथ मेट्रो स्टेशन आ गयी. वहाँ से हम अपने-अपने रास्ते हो लिए.

तो 18 और 20 फरवरी दोनों ही दिन कुछ आभासी मित्र वास्तविक दुनिया में मिले और कुछ अचानक मिले और बाद में आभासी दुनिया के मित्र बने. मित्रों के मिलने और बनने का यह सिलसिला ज़िंदगी भर चलता है, लेकिन यह बहुत ही नया अनुभव है कि आप जिससे कभी भी न मिलें हों और न उनके विचारों से बहुत परिचित हों, वे अचानक से मिलें और इतने अपने से लगें.

क्रमशः

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