आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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साइकिल वाली लड़की

साइकिल चलाये ज़माना बीत गया. अब सोचते हैं कि चला कि पायेंगे या नहीं? पता नहीं. लेकिन फिर से एक बार साइकिल पर बैठकर दूर-दराज के गाँवों में निकल जाने का मन करता है, जैसे बचपन में करते थे. बाऊ  के ड्यूटी से वापस लौटते ही मेरे और भाई के बीच होड़ लग जाती थी कि पहले कब्ज़ा कौन जमाता है साइकिल पर. भाई लम्बाई में मात खा जाता था मुझसे. एक साल छोटा था तो लम्बाई भी उतनी ही कम थी. वैसे भी लड़कियाँ जल्दी लंबी हो जाती हैं. उसे साइकिल सीखनी होती थी और मुझे चलानी होती थी. अपनी लम्बाई के चलते वो चढ़ नहीं पाता था और मैं साइकिल पाते ही ये जा और वो जा 🙂

ये जो आलिया भट्ट हैं न, आज स्कूटी पे बैठकर पूछती हैं “Why should boys have all the fun?” हम आज से चौबीस-पच्चीस साल पहले कहते थे, साइकिल पे बैठकर. स्कूटी तो हम निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों के लिए तब भी एक सपना था और अब भी सपना ही है. जो थी, वो हमारी साइकिल और उससे जुड़े हमारे सुख-दुःख. साइकिल मिलते ही मानो पंख मिल जाते थे. घुमक्कड़ और आवारा मन, शरीर को अपने काबू में ले लेता था और फिर जहाँ-जहाँ मन कहे, वहाँ-वहाँ हम.एक अद्भुत आज़ादी का अनुभव.

लड़कों से साइकिल रेस लगाते थे. रेलवे कॉलोनी से मीलों दूर के गाँव चले जाते थे. कभी-कभी टक्कर मारकर किसी बदमाश लड़के को गिराकर सबक सिखा देते थे और कभी खुद ही गिर जाते थे. कई बार ऐसे ही गिरे तो घुटने छिल जाते थे बुरी तरह से. भलभल खून बहने लगता. हमें लगता कि अब तो हुयी अम्मा के हाथों कुटाई गुड्डू तुम्हारी. फिर तय करते कि जब तक खून बंद नहीं होगा घर ही नहीं जायेंगे. हैंडपंप पे जाकर चोट धोते. उसमें गड़ी हुयी एक-एक रोड़ी निकालते. घाव को ठीक से साफ़ करते और फूँक-फूँककर सुखाते. दर्द तो खूब होता, लेकिन वो अम्मा की कुटाई और डाँट से कम दर्दीला दर्द था 🙂

घर जाते तो बेहद दर्द के बावजूद लंगड़ाकर नहीं चलते थे. धीरे-धीरे सीधा चलने की कोशिश करते. मालूम था हमको कि अम्मा को पता चला तो फिर वही उपदेश शुरू कर देंगी और साईकिल न चलाने के लिए दस-दस कारण गिनवायेंगी. “कहते हैं तुमसे कि अभी पैडल तक पूरा पैर नहीं पहुँचता है, इतनी ऊँची साइकिल मत चलाओ,”  “यहाँ के लड़के बहुत उजड्ड हैं. उनमें से किसी ने टक्कर मारी होगी. कहते हैं कि इन लड़कों के साथ साइकिल मत चलाओ,” “ज़मीन अच्छी नहीं है यहाँ की. रेह और रोड़ी भरी पड़ी है मिट्टी में. ऐसी मिट्टी में साईकिल मत चलाओ” वगैरह-वगैरह. मेरे साइकिल चलाने से मेरे गिरने को जोड़कर वो अपनी बात सिद्ध कर देंगी कि हमें किन-किन कारणों से साइकिल नहीं चलानी चाहिए.शुक्र है कि चोट लगने पर “लड़की हो, लड़की की तरह रहा करो” नहीं सुनने को मिलता. नहीं तो ये तो उनका फेवरेट डायलॉग था 🙂

हम चुपचाप धीरे से डिटॉल की शीशी उठाते थे और टायलेट में घुस जाते था. पता था कि अम्मा की नज़र पड़े न पड़े, दीदी की ज़रूर पड़ जायेगी. तो सयाने हम अपने चोट को डिटॉल से अच्छी तरह धोकर-सुखाकर शीशी वापस उसकी जगह पर रख देते थे और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती.

रात के समय दर्द उभरता. सोते समय पैर छूता चारपाई की पाटी से और मुँह से हल्की सी चीख निकल जाती. अम्मा लोग के तो जैसे चार कान होते हैं. बच्चों की चुन्नी सी भी आवाज़ सुनायी पड़ जाती  है. पूछतीं “का हुआ रे.” कुछ नहीं अम्मा कहते-कहते गला भर आता था. अम्मा को तुरंत शक हो जाता था. उठतीं और टॉर्च जलाकर देखतीं फ्रॉक़ थोड़ी ऊपर उठ जाने से घुटने की चोट दिख जाती थी, जिसमें पाटी से दुखकर खून रिस आया होता था. अम्मा बोलीं “ये चोट कैसे लगी रे?” “गिर गए थे” हम भर्राई आवाज़ में रुलाई रोकते-रोकते कहते. “साइकिल से गिर गए थे बोल” मैं हाँ में सर हिलाती और सर झुकाकर, आँख बंद करके उनकी मार का इंतज़ार करने लगती थी. लेकिन अम्मा तो अम्मा होती है. पट्टी ले आती थीं. अक्सर दिन की चोट पर अम्मा रात में पट्टी बाँधती. ये बात अलग है कि सबलोग सो रहे होते इसलिए चिल्लाकर तो नहीं, धीरे-धीरे बड़बड़ाती जातीं. वही बातें, जो ऊपर लिखी हैं 🙂

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कहा जा सकता था, लेकिन…

मैंने कई बार सोचा कि इस घटना के बारे में लिखूँ या ना लिखूँ. जब लिख लिया तो इस कश्मकश में पड़ गयी कि इसे ब्लॉग पर पोस्ट करूँ या नहीं. मैं ऐसा इसलिए सोच रही थी कि इसे सार्वजनिक करने के बाद बहुत से रिश्ते प्रश्नों के दायरे में आ सकते हैं और कुछ लोगों के अजीब से सवालों का जवाब भी देना पड़ सकता है. लेकिन फिर ये सोचा कि ऐसी घटनाओं को सामने आना ही चाहिए, जो अक्सर किसी एक की ज़िंदगी पर बहुत बुरा प्रभाव डालने के बावजूद, परिवार की बदनामी और रिश्ते बिगड़ने के डर से दबा दी जाती हैं. मैं इसे ज्यों का त्यों लिख रही हूँ, हालांकि नाम नहीं दे रही हूँ.

बात उन दिनों की है, जब मेरे बाऊ जी उन्नाव जिले के मगरवारा रेलवे स्टेशन पर पोस्टेड थे. हमलोग रोज़ ट्रेन से मगरवारा से उन्नाव पढ़ने के लिए आते-जाते थे. एक दिन सुबह-सुबह हम घर से निकले तो दरवाजे पर गाँव का एक चचेरा भाई खड़ा था. हमलोग गाँव कम जाते थे, इसलिए उसे पहचान नहीं पाये, लेकिन दीदी पहचान गयी. गाँव से किसी के आने पर हम भाई-बहन बहुत खुश होते थे. उसके आने के कुछ दिन बाद ही होली की छुट्टियाँ हो गयीं, तो हमें अपने कज़िन के साथ वक्त बिताने का मौक़ा मिल गया. मेरी और छोटे भाई की उससे खूब जमती थी. हमारा कोई बड़ा भाई नहीं था, इसलिए एक ‘बड़ा भाई’ मिलने की ज़्यादा खुशी थी. हमने सोचा था कि वह हमसे मिलने इतनी दूर आया है, लेकिन बाद में पता चला था कि वह हाईस्कूल का इम्तहान देने के डर से घर से भागकर आया था. अम्मा ने समझाया कि वह छुट्टियों के बाद घर चला जाय, तो वो मान गया.

हालांकि उसकी कुछ बातें मुझे अच्छी नहीं लगती थीं. मैंने उन दिनों सातवीं का इम्तहान दिया था, लेकिन मेरी ड्राइंग अच्छी होने के कारण कालोनी के हाईस्कूल में पढ़ने वाले लड़के अपनी साइंस की फ़ाइल के चित्र मुझसे बनवाते थे. ऐसे ही एक लड़के ने मुझे फ़ाइल दी, तो मेरे उस कज़िन ने उसका एक-एक पन्ना पलटकर चेक करना शुरू कर दिया. मुझे बहुत बुरा लगा. मैंने सोचा कि मेरा दोस्त क्या सोचेगा ? कि इसका ‘भाई’ जासूसी कर रहा है. मैंने घर वापस आकर अम्मा से शिकायत भी की. पर अम्मा ने समझाया कि ‘जाने दो, बड़ा भाई है. उसे तुम्हारी चिन्ता होती होगी.’ इसके अलावा उसने कई बार कालोनी के लड़कों के साथ मेरे बात करने और खेलने के बारे में भी टोका. मुझे इन बातों पर गुस्सा आता था, लेकिन अम्मा की वजह से मैं कुछ नहीं कहती. कुछ दिन बाद वो वापस गाँव लौट गया.

उसी साल गर्मियों की छुट्टी में गाँव में एक चचेरी बहन की शादी पड़ी. अम्मा घर की देखभाल के लिए रुक गयीं और घर के बाकी सदस्य- मैं, छोटा भाई, दीदी और बाऊ चारों लोग गाँव गए. हमलोग लगभग पाँच साल बाद गाँव गए थे, मैं और मेरा भाई किसी और को तो पहचानते नहीं थे, तो उसी कज़िन से बातें करते थे.

पहले दिन तो सब ठीकठाक था, लेकिन दूसरे दिन से कज़िन ने अजीब सी हरकतें शुरू कर दीं. गाँव का घर बहुत बड़ा था, बिजली तब थी नहीं, तो अधिकतर जगहों पर अँधेरा रहता था. वो जब अँधेरे में मेरे पास से गुजरता तो हाथ छूते हुए निकलता. पहले तो मैंने सोचा कि गलती से हाथ लग गया होगा, लेकिन जब कई बार यही हरकत दोहराई तो मेरा दिमाग ठनका. वैसे भी लड़कियों की सिक्स्थ सेन्स इतनी प्रबल होती है कि उन्हें ‘स्पर्श-स्पर्श’ में अंतर पता चला जाता है. मैंने उससे बचना शुरू कर दिया. मैं या फिर बाऊ के पास बाहर बैठी रहती या दीदी और बुआ लोगों के साथ घर के भीतर.

लेकिन उसने परेशान करने की नयी तरकीब निकाली. उसने एक छोटे भतीजे को भेजकर मुझे हाते में बुलवाया. अब जब सबके सामने आकर कोई कह रहा है कि ‘फलाने चाचा’ बुला रहे हैं और मैं न जाती, तो लोगों को शक होता कि बात क्या है? मेरी समझ में कुछ नहीं आया. मैं गयी तो लेकिन एक छड़ी लेकर. मैं दूर खड़ी हो गयी, और धमकी दी कि ‘अगर आपने मुझे हाथ लगाने की कोशिश की तो मैं खींचकर छड़ी मार दूँगी.’ मेरे पीछे-पीछे भतीजी-भांजियों की फौज भी आ गयी थी, इसलिए उसे कुछ कहने का मौका नहीं मिला.

मैं रात में चाचा की छत पर सोती थी दीदी, बुआ, कुछ भतीजे-भतीजियों और बड़े भईया के साथ. उस दिन मुझे बहुत नींद आ रही थी, तो दीदी से पहले ही मैं छत पर चली गयी. सोचा बड़े भईया तो हैं ही. गाँव में शादी-ब्याह में कई दिन तक गवनई चलती है, तो दीदी और बुआ उसी में व्यस्त थीं. मुझे पहली ही झपकी आयी थी कि अचानक लगा कि कोई मेरी चादर खींच रहा है. मेरी नींद बहुत कच्ची है, इसलिए तुरंत उठ गयी. सामने देखा तो वही कज़िन था. मैंने ज़ोर से पूछा “क्या है?” तो वो डर गया और तेजी से नीचे भाग गया. मैंने बगल में देखा कि भतीजे वगैरह तो गहरी नींद में सो रहे थे और भईया नहीं थे. शायद भाभी के पास चले गए थे. मुझे उसके बाद नींद नहीं आयी. मैं उकडूँ बैठी रही, जब तक दीदी और बुआ नहीं आ गयीं.

उस दिन के बाद से मैं बेहद डर गयी. मुझे रात होते ही डर लगने लगता. मैं उस समय सिर्फ बारह साल की थी और एकाकी परिवार में पली-बढ़ी. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था कि ‘भईया ऐसा कर क्यों रहे हैं?’ दीदी मुझे अकेली मिल ही नहीं रही थीं. हर समय उनके साथ या तो बुआ होतीं, या भाभी या कोई बहन. दूसरे दिन मैंने बाऊ से वापस चलने की रट लगा दी. और कुछ तो कह नहीं सकती थी. बस बार-बार यही कह रही थी कि “अम्मा की याद आ रही है” एक-दो बार तो आँसू भी छलछला आये. मुझे सच में अम्मा की बहुत याद आ रही थी. अम्मा सच कहती हैं, ‘जब कोई आदमी ज़्यादा प्यार से बोलने लगे, तो समझो कि कुछ गडबड है. ऐसे लोग लड़कियों को उठा ले जाते हैं और उनसे खूब काम कराते हैं.’ पर ऐसा तो अम्मा ने ‘आदमियों’ के लिए कहा था ‘भाइयों’ के लिए तो नहीं. मेरा मन इससे अधिक कुछ नहीं सोच पा रहा था. मैं उस समय कैसा महसूस कर रही थी, इस समय नहीं बताया जा सकता.

हमारे गाँव के घर का आहाता बहुत बड़ा था. उसमें उस समय कुछ सब्जियाँ उगाई जाती थीं. उस दिन शाम के समय भाभी के कहने पर मैं हाते से कुछ सब्ज़ी तोड़ने गयी थी कि उसने मुझे रोक लिया. मैं बेहद डर गयी कि अभी तक तो इसकी हरकतें रात में शुरू होती थीं. अब दिन में भी? मैं रो पड़ी. मैंने पूछा, “आप मुझे क्यों परेशान कर रहे हैं?” उसने जवाब दिया, “हम तुम्हें पसंद करते हैं. जो कह रहे हैं वो मानो और किसी से कुछ कहना मत, नहीं तो हम तुमको पूरे गाँव में बदनाम कर देंगे.” मुझे “बदनाम” शब्द का मतलब मालूम था. ऐसी लड़कियाँ जो गंदी होती हैं, उन्हें बदनाम कहा जाता है. मैं और डर गयी और वहाँ से तेजी से भाग आयी.

अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था ये सब. मेरे दिमाग में उसके कहे शब्द गूंज रहे थे. लेकिन करती भी तो क्या? संयोग से रात को गाँव के ही एक नातेदार के यहाँ घरभोज में जाने को मिला. दीदी हमेशा बुआ से बातें किया करती थीं. वो बतियाते हुए ही जा रही थीं कि मैंने उन्हें रोका कि कुछ बात कहनी है. दीदी ज्यों रुकीं, मैंने त्यों रोना शुरू कर दिया. रो-रोकर मैंने सारी बात बतायी और ये भी कहा कि ‘वो मुझे बदनाम कर देगा.’ दीदी भी अवाक् रह गयीं. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई भाई ऐसा कर सकता है. उन्होंने मुझसे कहा, ‘वो उससे और उसकी माँ से बात करेंगी.’

दूसरे दिन दीदी ने मुझसे कहा कि ‘उन्होंने चाची से सारी बात बताई, और कज़िन को भी डाँट पिलाई. लेकिन चाची ने अपने लड़के की गलती नहीं मानी. उन्होंने कहा कि कोई गलतफहमी हुयी होगी.’ चाहे जो भी हुआ हो, उस दिन के बाद से कज़िन ने ऐसी-वैसी कोई हरकत नहीं की. दो दिन के बाद हम वापस घर आ गए. बात आयी-गयी हो गयी. दीदी ने न ये बात अम्मा को बतायी और न बाऊ को. दीदी भी छोटी ही थीं, वो इस बात का निर्णय नहीं ले पाईं कि अम्मा-बाऊ को बताकर बात बढ़ानी चाहिए या नहीं.

लेकिन जब हम किसी सड़ांध को ढककर छिपाना चाहते हैं, तो उसकी दुर्गन्ध फैलती ही है. किसी की एक गलती पर यदि उसे रोक न दिया जाय, या सज़ा न दी जाय, तो वो दूसरी गलती करेगा ही.

इन घटनाओं के चार-पाँच साल बाद बाऊ के रिटायरमेंट के बाद जब हम गाँव शिफ्ट हुए, तो मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए. उस कज़िन से बात करनी चाहिए या नहीं. दिन में लगभग तीन-चार बार उससे सामना होता, लेकिन मैं बात नहीं करती थी. एक दिन भाभी ने मुझसे कहा कि ‘फलाने’ को खाने के लिए बुला दो. मैंने कहा कि मैं उससे बात नहीं करती. भाभी ने जब कई बार मुझसे कारण पूछा तो मैंने पूरी बात बता दी. इसके बाद उन्होंने जो बात बतायी, तो मैं दंग रह गयी. उन्होंने कहा कि “उसने मेरे साथ भी ऐसी हरकत करने की कोशिश की थी. और तो और एक बार अपनी सगी बहन के साथ भी ज़बरदस्ती करने की कोशिश की. इसके बाद उसकी उसके पिताजी ने जमकर पिटाई की.” ये बात सुनकर मेरे पैरों के तले से तो ज़मीन ही निकल गयी. मैं तो उससे सिर्फ दो-तीन साल छोटी थी, लेकिन उसकी छोटी बहन तो बहुत छोटी थी. मैंने कहा, ‘”भाभी, अगर उसको तभी रोक दिया गया होता, जब उसने मेरे साथ बदतमीजी की थी, तो कम से कम उस छोटी लड़की को और आपको तो ये सब न झेलना पड़ता.”

हाँ, ये सच है कि उसे उसी समय रोक देना चाहिए था. उसे सबके सामने शर्मिंदा करना चाहिए था, ‘घर-खानदान की बदनामी’ के डर से डरे बगैर…लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मैं बहुत छोटी थी और दीदी बहुत सीधी. हम साहस ही नहीं कर पाये उसके खिलाफ ‘ज़ोर से’ अपनी बात कहने का. और शायद कहते भी तो दोनों परिवार में झगड़े और मनमुटाव के अतिरिक्त और कुछ न होता.

मुझे ये लगा था कि ये मेरे जीवन की ऐसी घटना है, जिसके बारे में मैं किसी से कभी नहीं कह पाऊँगी. लगता था कि मैं ही ऐसी अभागी हूँ, जिसे ये सब झेलना पड़ा है. लेकिन जब हॉस्टल में और लड़कियों से इस पर खुलकर बातचीत होने लगी, तो पता चला कि लगभग सत्तर प्रतिशत लड़कियाँ बचपन या टीनेज में अपने किसी न किसी नातेदार-रिश्तेदार के द्वारा ‘सेक्सुअल अब्यूज़’ झेल चुकी हैं.

इसका कारण क्या है, इसके लिए लंबे-चौड़े तर्क दिए जा सकते हैं, शोध किये जा सकते हैं, लेकिन एक बड़ा कारण यह भी है कि ऐसी घटनाएँ बाहर नहीं आ पातीं, इसलिए इस तरह की हरकतें करने वालों की हिम्मत बढ़ती जाती है. उन्हें पता होता है कि एक छोटी लड़की ऐसी घटना का जिक्र किसी से नहीं कर पायेगी. इसलिए वो बड़ी बेशर्मी से लड़कियों और छोटे लड़कों के साथ यौन-दुर्व्यवहार करते हैं. ज़रूरत है कि इस पर खुलकर बात हो. कानूनी कार्रवाई के अतिरिक्त ऐसे लोगों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जाय. उन्हें समाज से बहिष्कृत किया जाय, तो शायद ऐसी घटनाओं पर कुछ हद तक रोक लग पाये.

जंगल जलेबी, स्लेटी रुमाल, नकचढ़ी लड़की और पहाड़ी लड़का

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बचपन की कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनका मतलब उस समय समझ में नहीं आता है. जब हम बड़े हो जाते हैं, तब समझ में आता है कि अमुक काम को करने से, किसी विशेष व्यक्ति से मिलने से या किसी जगह जाने से क्यों रोका गया था? समझ ही कितनी होती है तब? ऐसे ही कुछ दोस्त होते हैं, जो उस समय हमारे दुश्मन लगते हैं, जबकि बाद में पता चलता है कि अगर वो न होते, तो कुछ घटनाओं का मतलब ही बदल जाता. और हमारे बचपन की यादें इतनी खुशनुमा न होतीं.

मैंने जब होश संभाला था, तो खुद को उन्नाव जिले की बाबूगंज रेलवे कालोनी में पाया था. उसके पहले की सारी यादें इतनी धुँधली हैं कि उन्हें मिलाकर एक अब्स्ट्रेक्ट ही बन पाता है. अम्मा-बाऊ की बतायी गयी बातों से ही उन्हें आपस में जोड़ पाती थी. तो अब वे भी नहीं हैं. उस कालोनी में जब हम आये तो मेरी उम्र लगभग पाँच साल रही होगी. और कालोनी में जो सबसे पहला दोस्त बना, वो मुझसे तीन-चार साल बड़ा था. यूँ तो उसका नाम राघवेन्द्र सिंह जलाल था, लेकिन उसके घर में सब उसे राकेश बुलाते थे. चार भाइयों और एक बहन में सबसे छोटा लड़का. उसके पिताजी आर.पी.एफ. में थे. कुमाउँनी थे वे लोग. पता नहीं कब उसके घर से मेरे घर का नाता बन गया और अम्मा उन सभी भाइयों को अपने बेटों जैसे मानने लगीं.

मेरी माता जी की एक विशेषता थी कि जब उनकी किरपा किसी पर बरसती थी, तो उसकी सीमा नहीं होती थी. राकेश पर अम्मा की विशेष कृपा थी. वो हम-दोनों भाई-बहनों से बड़ा और अम्मा की नज़रों में बहुत समझदार था, तो अम्मा ने उसे हमारा अभिभावक नियुक्त कर दिया. क्योंकि उन्हें लगता था कि कालोनी के और सारे लड़के एक नम्बर के गुंडे हैं और उनसे हमारी रक्षा उनके द्वारा नियुक्त सेनापति ही कर सकता था 🙂 वो हमदोनों की हर बदमाशी की खबर अम्मा तक पहुँचाता, अम्मा हमें डाँटती और मैं मन ही मन कुढ़ती रहती थी. अम्मा को पता था कि मैं एक नम्बर की ढीठ और नकचढी लड़की थी, इसलिए मेरे मामले में तो अम्मा मेरा पक्ष भी नहीं सुनती थीं. राकेश ने शिकायत की नहीं कि सीधे डाँट पड़ती (और कभी-कभी मार भी 😦 )

जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जा रही थी, राकेश की रोक-टोक और अम्मा की डाँट भी. उस कालोनी में दो फील्ड थीं, एक छोटी, जो रेलवे की सम्पत्ति थी और एक ठीक उसके बगल में खाली फील्ड, जो उस समय उन्नाव के सबसे बड़े मुहल्लों में से एक मोतीनगर से रेलवे कालोनी को अलग करती थी. राकेश मुझे बड़ी फील्ड में अकेले जाने से रोकता. हम आइस-पाइस खेलते, तो दो-तीन साल बड़े लड़कों के साथ छिपने से रोकता. एक बार जब मैंने उसकी बात नहीं मानीं, तो गुस्से में जाकर अम्मा से शिकायत कर दी. पता नहीं अम्मा के पास जाकर क्या खुसुर-फुसुर की कि अम्मा की बमबारी-गोलाबारी शुरू हो गयी- “कहा था तुमसे कि राकेश की बात माना करो, फिर क्यों उसके मना करने के बाद भी “उस लड़के” के साथ झाड़ी में छिपने गयी.” “तो क्या हुआ? ये कौन होता है मुझे मना करने वाला?” मेरे इतना कहने के साथ दो चांटे पड़े ‘तड़-तड़.’ मैंने रोना शुरू कर दिया. राकेश को भी मेरा मार खाना बुरा लगा. उसने कहा “जाने दो चाची, आगे से नहीं करेगी ऐसा” पर इससे क्या? वो मेरा पक्का दुश्मन बन गया.

इस सबके बावजूद राकेश के साथ रहना मजबूरी थी क्योंकि हमदोनों “बिगड़े हुए” भाई-बहन को बिना उसके साथ के, न खेलने की इजाज़त थी और न कहीं आने-जाने की. दीदी का स्कूल सुबह से शाम तक का होता था और अम्मा को घर के सारे काम करने होते थे. हमारा स्कूल ‘विवेकानंद’ रेलवे कालोनी के पीछे ही था और ग्यारह बजे हम प्राइमरी के बच्चे फ्री हो जाते. हम सारा दिन खेलते रहते. अम्मा हम पर नज़र नहीं रख सकती थीं, इसीलिये राकेश को कह रखा था इस काम के लिए और वो पूरी ईमानदारी से ये ज़िम्मेदारी निभाता था 🙂

मैं उससे कभी सीधे मुँह बात नहीं करती थी, उस समय के अलावा, जब वो हमारे लिए बाऊ की बनायी हुयी लग्गी से बड़ी फील्ड में लगे जंगल जलेबी और खजूर के पेड़ से फल तोड़ता था. जंगल जलेबी के विशालकाय पेड़ की निचली डालियों तक तो लग्गी पहुँच जाती थी, लेकिन ऊपर की डालों पर नहीं. एक दिन एक भी जंगल जलेबी न पाने से मेरा मुँह बन गया, तो राकेश पेड़ पर ही चढ़ गया. मुझे ये घटना पूरी तरह से याद नहीं क्योंकि उस समय मैं सिर्फ आठ या नौ साल की थी, लेकिन इतना याद है कि वो अपनी गंदी सी स्लेटी रुमाल में ऊपर से जंगल जलेबी के फल बाँधकर ले आया था. हम होली जलाने के लिए सूखी लकडियाँ काटकर ले आते, कभी-कभी उपले चुराते 🙂 वो एक काम और मेरी पसन्द का करता था. गर्मी की छुट्टियों में कैरम, लूडो और शतरंज खेलने के अलावा हमें कॉमिक्स पढ़ने का शौक चर्राया. वो पता नहीं कहाँ-कहाँ से प्रति चवन्नी एक दिन के किराए पर कॉमिक्स लेकर आता था और वापस भी वही करता था 🙂

एक-दो साल बाद बाऊ का ट्रांसफर उन्नाव के बगल में स्थित एक छोटे से स्टेशन मगरवारा हो गया. ट्रक में हमारे साथ चन्दन भैय्या भी गए हमें पहुँचाने. बाद में राकेश वहाँ भी आता था और कई बार ‘जंगल जलेबी’ भी लाता था क्योंकि मगरवारा में वो पेड़ नहीं था. कभी-कभी खुमानी वगैरह भी ले आता था, जो उसके गाँव से कोई लाया होता था. पर मुझे वो अच्छी नहीं लगती थी.

मैं बचपन में उससे इतना चिढ़ती थी कि कालोनी के कल्चर के विरुद्ध मैंने उसे राखी कभी नहीं बाँधी. जबकि उसके चन्दन भैया को बांधती थी. मुझसे चार साल बड़ा था, लेकिन मैंने उसे कभी ‘भैय्या’ नहीं कहा. मैं थोड़ी लंबी हो गयी तो वही मुझे चिढ़ाता था “गुड्डू, अब तो तू मुझसे बड़ी हो गयी. अब मैं तुझे ‘दीदी’ कहूँगा- गुड्डू दीदी” तब भी मैं बहुत गुस्सा होती थी- “तुम हमें दीदी कहोगे, तो सबलोग हमें तुमसे बड़ा समझने लगेंगे” और कौन लड़की बड़ी दिखना चाहती है भला 🙂

जब मैंने मगरवारा से उन्नाव ट्रेन से पढ़ने आना-जाना शुरू किया और भीड़ में अनचाहे स्पर्शों का सामना करना पड़ा, तब समझ में आया कि क्यों अम्मा और राकेश मुझे किशोरावस्था के लड़कों के साथ सुनसान जगहों पर जाने से मना करते थे? क्यों कुछ लड़कों के साथ खेलने पर इसलिए पाबंदी थी कि वे “गंदे लड़के” थे और ये बात राकेश अम्मा को बताता रहता था. तब ये भी समझ में आया कि क्यों एक बार एक लड़के के साथ घनी झाडियों में छिपने के कारण राकेश की शिकायत पर अम्मा से दो चांटे खाने पड़े थे और ये भी कि उसने अम्मा के पास जाकर खुसुर-फुसुर करके क्या बताया होगा?

आज मुझे लगता है कि दस-ग्यारह साल की उम्र तक मेरे साथ कोई अप्रिय घटना न होने का सबसे बड़ा कारण अम्मा की सतर्कता के साथ ही राकेश का होना भी था. मैं सोच नहीं सकती कि उसके बगैर मेरा बचपन कैसा होता? यूँ तो नकचढ़ी और ढीठ, लेकिन दुनियादारी की बातों से अनजान मैं निश्चिन्त होकर इसलिए खेल पायी क्योंकि राकेश मेरे साथ होता था. शायद वो नहीं होता, तो अम्मा मुझे बाहर खेलने ही न भेजतीं. डेली पैसेंजरी शुरू करते ही मैं इतनी समझदार हो गयी कि अपनी देखभाल खुद कर सकती थी. अम्मा वैसे भी बहुत सतर्क रहती थीं और मगरवारा की कालोनी भी बहुत छोटी थी. मैं खूब ऊधम मचाती लड़कों के साथ क्योंकि मुझे कभी उनके साथ असहज नहीं लगा. शायद एक अप्रिय घटना मेरी ये सहजता मुझसे छीन लेती.

राकेश और उसके घरवालों से हमारा सम्बन्ध बहुत बाद तक बना रहा. जब बाऊ के रिटायरमेंट के बाद हम गाँव शिफ्ट हुए, तब भी चन्दन भइय्या पहुँचाने गए थे और बाद में अक्सर हमारे गाँव आते रहते थे. हमलोग भी जब उन्नाव जाते थे, तो उनलोगों से मिलते थे. बाद में वो लोग भी नैनीताल शिफ्ट हो गए. केन्द्र सरकार की नौकरी करने वाले लोग जाने कहाँ-कहाँ से आकर मिलते हैं और फिर अपने-अपने देस चले जाते हैं. मेरे बचपन के साथी जाने कहाँ हैं? कुछ की तो बिल्कुल कोई खबर नहीं.

मैं लगभग ग्यारह-बारह साल से राकेश से नहीं मिली हूँ. अभी कुछ दिन पहले चन्दन भइय्या का फोन आया. शायद दीदी से मेरा फोन नम्बर लिया था. उन्होंने बताया कि उनकी अम्मा गुजर गयी हैं. उन्होंने शादी बना ली है (वो लोग ऐसे ही बोलते थे) और टीचर लग गए हैं नैनीताल जिले में ही. राकेश भी वहीं कहीं पढ़ा रहा है. मुझसे भईया ने पूछा “दीदी ने बताया तूने शादी नहीं बनायी. तुम्हारे लोगों को हुआ क्या है? कोई शादी ही नहीं बनाना चाहता. राकेश ने भी नहीं बनायी अब तक.”

काठगोदाम एक्सप्रेस से हल्द्वानी जाते वक्त रास्ते में लालकुआँ पड़ता है. वहीं के एक गाँव में मेरे दोस्त का घर है. उन लोगों ने पता भी दिया था, लेकिन वो घर पर छूटा है और सालों से घर ही नहीं गई. सोच रही हूँ, फिर से पता पूछकर कभी हो ही आऊँ.

बीते हुए दिन… फिर से नॉस्टेल्जिया

नॉस्टेल्जिया बड़ी अजीब सी चीज़ होती है। पता नहीं ये एक मानसिक स्थिति है या मानसिक विकार या बीमारी, लेकिन है अजीब। मुझे लगता है कि कुछ लोग प्रवृत्ति से ही अतीतजीवी होते हैं और ये उनकी बीमारी नहीं होती। या तो शौक होता है या फिर आदत या खुशफहमी कि वो दिन लौटकर आयेंगे, कभी न कभी। ये अलग बात है कि विस्मृति प्रकृति का वरदान है। यदि हमारे अन्दर भूलने की शक्ति न होती, तो हम अपनी ही यादों के बोझ तले घुट-घुटकर दम तोड़ देते या पागल हो जाते। भूलना ज़रूरी है, नई चीज़ें सीखने के लिए, लेकिन स्मृतियाँ भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होतीं।

कुछ लोगों के लिए यादों का अलग ही मतलब होता है। वे अतीतमोही होते हैं और यादों में ही खुशी ढूँढ़ते रहते हैं। कुछ लोगों को यादें आ-आकर सताती हैं, लेकिन अतीतजीवी लोग तो यादों में ही चले जाते हैं। उनकी ज़िंदगी में अतीत घुस जाता है, वे अतीत में ही रहना पसंद करते हैं। ये सब उलट-पुलट तब चलती है, जब आप खाली बैठे हों और उससे भी अधिक तब, जब आप बेहद उदास अकेले लेटे हों अपने कमरे में और आपके पास परिवार के नाम पर एक कुत्ते के सिवा कोई भी पास न हो…यूँ तो बहुत लोग साथ होने का दावा करते हैं। और जबकि आपका अतीत, वर्तमान से कहीं अधिक हरा-भरा, चहल-पहल वाला और सुनहरा हो। तब यादें बहुत कीमती लगती हैं और आप अक्सर किसी अपने की याद में डूबे रहना चाहते हैं।

दो-तीन दिन से मुझे भी किसी की बहुत याद आ रही है। अम्मा-बाऊ की याद तो साथ रहती ही है, लेकिन इस मौसम में बसंत चाचा की बहुत याद आती है। बसंत पंचमी को उनका जन्मदिन होता है, जैसे बाऊ का कृष्ण जन्माष्टमी को। बाऊ के दोस्त थे बसंत चाचा। हालांकि बाऊ से सात-आठ साल छोटे होने के कारण उनको दद्दू कहते थे, लेकिन दोस्ती बराबर की थी। अम्मा को अपनी माँ मानते थे और अक्सर बाऊ की शिकायत अम्मा से करके बाऊ को डँटवाया करते थे। उनकी बदमाशियों के बारे में मैंने एक पोस्ट भी लिखी थी।

हमलोगों के लिए वो किसी भी तरह अम्मा-बाऊ से कम नहीं थे। जब हम भाई-बहनों से सम्बन्धित किसी निर्णय में अम्मा-बाऊ का एक-एक वोट होता, तो हम चाचा का इंतज़ार करते और अक्सर उनका वोट हमारे पक्ष में होता। मुझे याद है, जब हमारा स्कूल टेबल टेनिस की जिला प्रतियोगिता में जीता था। मैं टी.टी. टीम की मुख्य खिलाड़ी थी और मुझे डिस्ट्रिक्ट की ओर से मंडलीय प्रतियोगिता में लखनऊ जाना था। मैं पहली बार मंडलीय प्रतियोगिता में भाग लेने की कल्पना मात्र से बहुत उत्साहित और प्रसन्न थी। फॉर्म पर अभिभावक के हस्ताक्षर चाहिए थे। अम्मा मुझे बाहर भेजने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थी। उनके अनुसार एक तेरह साल की लड़की को बिना माँ-बाप के कहीं नहीं जाना चाहिए। बाऊ की हाँ थी, लेकिन वो अम्मा के खिलाफ कभी नहीं जाते थे। उन्हें लगता था कि अम्मा उनसे ज्यादा समझती हैं, घर-परिवार के बारे में। मैं भी एक नंबर की ज़िद्दी। मेरा रोना-धोना चालू था कि दीदी ने इशारा किया चाचा को बुलाने का। मैं झट से स्टेशन गयी और रेलवे के फोन से चाचा को सन्देश भिजवा दिया। उन दिनों छोटे शहरों में घरों में फोन नहीं हुआ करते थे। रेलवे वाले स्टेशन के फोन से काम चला लिया करते थे। चाचा बगल के स्टेशन गंगाघाट में पोस्टेड थे और सन्देश मिलते ही ड्यूटी खत्म करके अगली गाड़ी से मगरवारा आ गए। उन्होंने अम्मा को बहुत समझाया कि ‘बिटिया अकेली नहीं होगी, तीन टीचर्स साथ जा रही हैं और दो चपरासी। फिर साथ में और लड़कियाँ भी तो होंगी।’ चाचा के आने से दीदी को भी साहस हुआ मेरी ओर से बोलने का और मुझे लखनऊ जाने की अनुमति मिल गयी।

ऐसे और ना जाने कितने ही किस्से हैं। जब उन्होंने अपना वोट हमलोगों के पक्ष में देकर हमारा हौसला बढ़ाया था। बाऊ के रिटायरमेंट के बाद हमलोग उन्हीं के क्वार्टर में एक साथ रहे। उनके तीन बेटे थे, जिनमें से एक गाँव में रहते थे और दो चाचा के साथ। चाचा के घर में बिताए दिन हमलोगों के लिए यादगार हैं। वैसे तो भईया लोगों का बचपन से हमारे घर में  आना-जाना लगा ही रहता था, लेकिन साथ रहने का अलग ही मज़ा था। पूरे घर में चार लड़के- दो चाचा के, एक हमारा भाई और एक हमारे चचेरे भाई, दो लड़कियाँ- मैं और दीदी और दो बाप- बाऊ और चाचा और माँ एक भी नहीं। पूरा हॉस्टल के जैसा माहौल होता था। भैय्या के दोस्त, दीदी के दोस्त और मेरी सहेलियाँ- दिन में कोई न कोई जमा ही रहता था। खूब पढ़ते थे। खूब टी.वी. देखते थे और ग्यारह बजे रात तक गप्पें भी मारते थे।

सबसे बड़ी बात, जो उस घर में थी वो ये थी कि दोनों बुजुर्गों को छोड़कर काम करने की ज़िम्मेदारी सभी पर बराबर थी। बुजुर्ग लोग बेचारे रात-दिन की ड्यूटी से ही हलकान रहते थे। मैं सफाई करती, दीदी खाने में सब्ज़ी बनातीं, तो भईया लोग बर्तन धोते और आटा गूँथते और रोटी सिंकवाते। एक दिन मेरे कज़िन और चाचा के मझले बेटे राजन भैया शायद आपस में बातें कर रहे थे या मैच देख रहे थे, याद नहीं, लेकिन दीदी बर्तन धो रही थीं। अचानक चाचा ड्यूटी से वापस घर आये। बिटिया को झौव्वा भर बर्तन माँजते देख आग-बबूला हो गए। भैय्या लोगों से बोले, “मुस्टंडों, तुम हट्टे-कट्टे बइठ के गप्पें मारि रह्यो और हमार बिटिया अकेले बर्तन मांज रही है। यही मारे तुम पंचन क खवा-पिया के इत्ता बड़ा कीन्हेंन  है।” भइय्या लोगन की तो सिट्टी-पिट्टी गुम। हडबड़ाकर उठे और “अरे दीदी बताईन ही नहीं” कहते हुए, दीदी को उठाकर झट से बर्तन धोने में जुट गए।

तो ऐसे थे हमारे बसंत चाचा। अभी अच्छी-अच्छी बातें लिख लीं, तो आगे लिखने का मन नहीं हो रहा है। आगे सारी दुःख भरी बातें हैं। हमारे उन्नाव छोड़कर आजमगढ़ अपने गाँव शिफ्ट होने की। इस बात से चाचा के डिप्रेशन में जाने की और फिर हमसे सदा के लिए बिछड़ जाने की। मुझसे नहीं कही जायेंगी वो बातें अभी। 2003 में चाचा भी हमें छोड़कर चले गए। उन्हें माउथ कैंसर हो गया था। इस गर्मी में उन्हें गए दस साल हो जायेंगे।

और अंत में ‘देवर’ फिल्म का ये गीत, जो मुझे उन दिनों की याद दिलाता है। रुलाता है, तड़पाता है, बेचैन करता है,  फिर भी बार-बार सुनती हूँ। कहा ना, किसी-किसी को अतीत में जीने की आदत होती है।

अँगीठी पर भुने भुट्टे और स्टीम इंजन के दिन

बचपन अलग-अलग मौसमों में अलग खुशबुओं और रंगों के साथ याद आता है। डॉ॰ अनुराग के एक अपडेट ने यादों को क्या छेड़ा, परत दर परत यादें उधड़ती गयीं, जिंदगी के पन्ने दर पन्ने पलटते गए। जैसे बातों से बातें निकलती हैं, वैसे ही यादों से यादें। अब बरसात का मौसम है, तो भुट्टे याद आये, भुट्टे याद आये तो अँगीठी याद आयी, फिर कोयला याद आया, फिर स्टीम इंजन और दिल बचपन की यादों में डुबकियाँ लगाने लगा। बहुत से छूटे हुए शब्द याद आये। बचपन के रहन-सहन का तरीका याद आया। तब की बातें सोचती हूँ और आज को देखती हूँ, तो लगता ही नहीं है कि ये वही दुनिया है… वो दुनिया सपने सी लगती है।

तब छोटे शहरों में खाना मिट्टी के तेल के स्टोव पर या अँगीठी पर बनता था। तब तक वहाँ तक गैस सिलेंडर नहीं पहुँचा था। रेलवे कालोनी के तो सारे घरों में कोयले की अँगीठी पर ही खाना बनता था क्योंकि स्टीम इंजन की वजह से कोयला आराम से मिल जाता था। कच्चा कोयला भी और पक्का कोयला भी।पक्का कोयला आता कहाँ से था, ये शायद नए ज़माने के लोग नहीं जानते होंगे। स्टीम इंजन में इस्तेमाल हुआ कोयला भी आधा जलने पर उसी तरह खाली किया जाता था, जैसे अंगीठी को खोदनी से खोदकर नीचे से खाली करते थे, जिससे राख और अधजला कोयला झड़ जाय और आक्सीजन ऊपर के कोयले तक पहुँचकर उसे ठीक से जला सके।.. इंजन के झड़े कोयले को बीनकर बेचने के लिए रेल विभाग ठेके देता था। बड़े रेलवे स्टेशनों का तो नहीं मालूम, पर छोटे स्टेशनों पर किसी एक ठेकेदार की मोनोपली चलती थी। उस ‘पक्के कोयले’ का इस्तेमाल अँगीठी को तेज करने में होता था और सबकी तरह हमलोग भी किलो के भाव से इसे ठेकेदार से खरीदते थे। बाऊ प्लास्टिक के बोरे में साइकिल के पीछे लादकर इसे घर लाते थे… … आजकल की पीढ़ी ने अपने पापा को साइकिल चलाते देखा है क्या?

बरसात में ये कोयला बड़े काम आता था क्योंकि अक्सर लकड़ी सीली होने के कारण कच्चा कोयला मुश्किल से जलता था। लकड़ी ? अँगीठी सुलगाने के लिए उसके अन्दर पहले लकड़ी अच्छे से जला ली जाती थी, उसके बाद कोयला डाला जाता था।  रेलवे ट्रैक के बीच में पहले पहाड़ की लकड़ी के स्लीपर बिछाये जाते थे, वही खराब होने पर जब निकलते थे, तो रेलवे कर्मचारी सस्ते दामों पर अँगीठी के लिए खरीद लेते थे। ये लकड़ी अच्छी जलती थी और जलते समय उसमें से एक तारपीन के तेल जैसी गंध आती थी। अम्मा या दीदी कुल्हाड़ी से काटकर उसके छोटे-छोटे टुकड़े करती थीं। कितनी मेहनत लगती रही होगी उसमें, मैं नहीं जानती। मैं बहुत छोटी थी, केवल देखती थी। कोयला और लकड़ी आँगन में रखे जाते थे और बरसात में भीग जाते थे। इसलिए बरसात में अँगीठी सुलगाने में बहुत मुश्किल होती थी। जब अँगीठी काम लायक सुलग जाती थी, तो उसे अँगीठी आना कहते थे। तब उसे उठाकर बरामदे में रखा जाता था और उस पर अम्मा भुट्टे भूनती थीं। जब आँगन में झमाझम बारिश होती थी, तब हमलोग बरामदे में अम्मा के चारों ओर बैठकर अपने भुट्टे के भुनने का इंतज़ार करते थे…अभी तो न जाने कितने सालों से आँगन नहीं देखा और ना ही अम्मा के हाथ से ज्यादा अच्छा भुना भुट्टा खाया है… …!

मेरे बाऊ रेलवे क्वार्टर के सामने की जगह को तार से घेरकर क्यारी बना देते थे और उसमें हर साल भुट्टा बोते थे। कभी-कभी तो इतना भुट्टा हो जाता था कि उसे सुखाकर बाँधकर छत पर लगी रॉड में बाँधकर लटका दिया जाता था। फिर हमलोग कभी-कभी उसके दाने छीलकर अम्मा को देते थे और वो लोहे की कड़ाही में बालू डालकर लावा भूनती थीं। एक भी दाना बिना फूटे नहीं रहता था। भुट्टे के खेतों में तोते बहुत नुक्सान करते थे जिस दिन हमारी छुट्टी होती थी, हम सारा दिन तोते भगाते रहते थे 🙂

आज की पीढ़ी ने स्टीम इंजन चलते नहीं देखा। उसके शोर को नहीं सुना। उसके धुएँ से काले हो जाते आसमान को नहीं देखा। बहुत सी और यादें हैं, और भूले हुए शब्द। अनेक लोहे के औजार बाऊ अपने हाथों से बनाते थे और उस पर ‘टेम्पर’ भी खुद ही देते थे। संडसी, बंसुली, खुरपी, कुदाल, फावड़ा, नहन्न्नी, पेंचकस, कतरनी, गँड़ासी, आरी, रेती ... इनके नाम सुने हैं क्या? या सुने भी हैं तो याद हैं क्या?

दिए के जलने से पीछे का अँधेरा और गहरा हो जाता है…

मैं शायद कोई किताब पढ़ रही थी या टी.वी. देख रही थी, नहीं मैं एल्बम देख रही थी, बचपन की फोटो वाली. अधखुली खिड़की से धुंधली सी धूप अंदर आ रही थी. अचानक डोरबेल बजती है. मैं दरवाजा खोलती हूँ, कूरियर वाला हाथ में एक पैकेट थमाकर चला जाता है. मैं वापस मुडती हूँ, तो खुद को एक प्लेटफॉर्म पर पाती हूँ.

मैं अचकचा जाती हूँ. नंगे पैर प्लेटफॉर्म पर. कपडे भी घरवाले पहने हैं. अजीब सा लग रहा है. मेरे हाथ में एक टिकट है. शायद कूरियर वाले ने दिया है. अचानक एक ट्रेन आकर रुकती है और कोई अदृश्य शक्ति मुझे उसमें धकेल देती है. मैं ट्रेन में चढ़ती हूँ और एक रेलवे स्टेशन पर उतर जाती हूँ. ये कुछ जान जानी-पहचानी सी जगह है. हाँ, शायद ये उन्नाव है. मेरे बचपन का शहर. लेकिन कुछ बदला-बदला सा.

मुझे याद नहीं कि मैं इसके पहले मैं यहाँ कब आयी थी. स्टेशन के प्लेटफॉर्म साफ-सुथरे दिख रहे हैं. मैं स्वतः बढ़ चलती हूँ. यहाँ स्टेशन मास्टर का ऑफिस था, फिर टी.सी. ऑफिस, फिर बाहर जाने के लिए गेट. मैं कैलाश चाचा का बुकस्टाल ढूँढ रही हूँ, पर कहीं नहीं मिला… ये प्लेटफॉर्म भी बहुत लंबा है. लगता है खत्म ही नहीं होगा. मैं बाहर निकलती हूँ और खुद को एक वीरान सी जगह पर पाती हूँ. यहाँ से तो एक सड़क जाती थी, जिसके दाहिने कोने पर गोलगप्पे वाला ठेला लगाता था और बाईं ओर ‘संडीले के लड्डू’ वाले की दूकान थी… कुछ पेड़ भी थे, लेकिन अब यहाँ रेगिस्तान है और आँधी सी चल रही है. मैं आगे बढ़ चलती हूँ, शायद कचौड़ी गली मिल जाय.

अचानक देखती हूँ कि अम्मा मेरा हाथ पकड़कर खींच रही हैं ‘चलतू काहे ना’ अम्मा ने अपनी मनपसंद सफ़ेद ज़मीन पर नीले बूटे वाली उली साड़ी पहनी हुयी है, हमेशा की तरह पल्लू सर पर लिया हुआ है और तेज हवा से बचने के लिए उसका एक कोना मुँह में दबाये हुए हैं. मै लगभग घिसटते हुए अम्मा के साथ चल पड़ती हूँ. मैं एक छोटी सी बच्ची हूँ और मैंने लाल छींट वाली फ्राक पहनी है. हम कचौड़ी गली में हैं . खूब सारी दुकाने हैं– खील, बताशे, लइय्या, चूड़ा, चीनी वाले खिलौने. अम्मा एक-एककर सब सामान तुलवाकर अपनी कंडिया और झोले में रख रही है. मेरी नज़र प्रेम भईया की दूकान पर है, जहाँ रंग-बिरंगे टाफी-कम्पट-लेमनचूस अलग-अलग जारों में रखे हैं.

मेरा हाथ अम्मा के हाथ से छूट गया. वो पता नहीं कहाँ चली गयी? मैं गली में अकेली खड़ी हूँ. यहाँ तो कोई दूकान नहीं है या शायद बाज़ार बंद है. इसी मोहल्ले में बुकस्टाल वाले चाचा का घर था. घर के सामने एक बड़ा सा कुआँ, जिसके आस-पास हम बच्चों का जाना मना था. पर मैंने कई बार उसके अंदर झाँका था. कितना गहरा था वो और कितना अन्धेरा था उसके अंदर!…पर, वो गली ही नहीं मिल रही. मैं बहुत परेशान हूँ. नंगे पाँव हूँ. घर के कुचड़े-मुचड़े कपडे पहन रखे हैं. मौसम भी पता नहीं कैसा है. हर तरफ धूल ही धूल. धुंधलका सा छाया हुआ है. दूर तक कोई भी इंसान नहीं दिख रहा है.

मैं कचौड़ी गली से निकलकर बड़े चौराहे पहुँचती हूँ, पर ये वैसा नहीं है, जैसा मेरे बचपन में हुआ करता था. ये तो बहुत छोटा है. शायद बचपन में चीज़ें ज्यादा बड़ी दिखती हैं. मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है. रोना आ रहा है. यहाँ कितनी भीड़ है. मैं घबराकर बेतहाशा भागने लगती हूँ. ऐसा लगता है सारी भीड़ मेरे पीछे दौड रही है. सब तेजी से पीछे छूट रहा है, मेडिकल रोड, अमर बुक डिपो, प्रकाश मेडिकल स्टोर…स्टेशन रोड, जनता फुटवियर, गुप्ता चाचा की दूकान.

मैं हाँफते-हाँफते स्टेशन पर पहुँचती हूँ. इलेक्ट्रानिक्स बोर्ड पर गाड़ियों के बारे में सूचना चल रही है. सन 2000 में जाने वाली गाड़ी प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर आयेगी, सन 1995 में जाने वाली गाड़ी प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर आ रही है… सन 1980 में जाने वाली गाड़ी प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर आ रही है… … गाडियाँ इतनी तेजी से आ-जा रही हैं कि पता नहीं चल पा रहा है कि कब रुकी, कब चली, पर कोई भी आने-जाने वाला नहीं दिख रहा है. ये कौन सी जगह है और कोई यात्री क्यों नहीं है? तभी कोई मेरे कान में बुदबुदा गया “कोई नहीं दिखेगा. इन गाड़ियों से जिसको जाना होता है, सिर्फ़ वही चढ़ पाता है. यहाँ बहुत से लोग हैं, पर कोई किसी को नहीं देख पाता.” मैंने आस-पास देखा तो कोई नहीं था. मैं बुरी तरह डर गयी. मुझे नहीं रहना यहाँ. मुझे वापस जाना है.

लेकिन ये सारी गाडियाँ तो अतीत में जा रही हैं. मैं हूँ कहाँ? कहीं मैं मैट्रिक्स के नियो की तरह दो दुनियाओं के बीच तो नहीं…

मैंने बहुत इंतज़ार किया. अभी तक मेरी गाड़ी नहीं आयी. शायद मैं अतीत में फँस गयी हूँ.

(त्योहारों पर ऐसे सपने ज्यादा आते हैं. प्रस्तुत पोस्ट परसों देखे गए एक सपने पर आधारित है.)

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (3.)

कुछ महीने पहले एक कोशिश की थी, अठारह साल पहले इस दुनिया से रूठ गयी अपनी माँ से अपने रिश्ते को समझने की, उसे शब्दों में बाँधने की. सोचा था तीन कड़ियों में कुछ समेट पाऊँगी. वैसे तो माँ की यादों को कुछ शब्दों में नहीं समाया जा सकता, पर ये कोशिश, कुछ लिखने के बहाने इस अनोखे रिश्ते को समझने की थी- माँ-बेटी का रिश्ता, एक अनुशासनप्रिय माँ और एक उद्दंड बेटी का.

पर लिखने का ये सिलसिला साहस की कमी के कारण रुक गया, इस बात के डर से कि अम्मा के इस दुनिया से जाने के बारे में कैसे लिखूँगी? फिर सोचा कि जब खुद ही ये मानती हूँ कि वो हमेशा एक साये की तरह मेरे साथ हैं, तो फिर ये डर कैसा? इसलिए हिम्मत कर पायी कि ये पोस्ट लिखूँ. ये मेरा कन्फेशन होगा … जो शायद मेरे इस अपराधबोध को दूर कर सके कि मैंने उनके जीते जी कभी उन्हें समझने की कोशिश नहीं की, मेरी इस आत्मग्लानि को मिटा सके कि मैं कभी उनकी कोई सेवा नहीं कर सकी. हो सकता है कि इस बहाने मैं अपने आप को माफ़ कर पाऊँ या किसी तरह खुद को समझा पाऊँ.

किसी अपने के चले जाने पर हमें ना सिर्फ़ उसके ना होने का दुःख होता है, बल्कि उन तमाम बातों का भी दुःख होता है, जो उसके होने पर होतीं या जो हमने उससे कही होतीं. अम्मा का जाना अचानक नहीं हुआ. वो अक्सर बीमार रहती थीं. उन्हें आँतों की टी.बी. थी और मारे जिद के कभी ठीक से दवा नहीं कराती थीं. इस कारण बहुत अधिक दुबली हो गयीं और एक दिल के दौरे ने उनकी जान ले ली. पर उनके जाने के ठीक एक दिन पहले तक नहीं मालूम था कि कल वो नहीं होंगी. नहीं तो मैं वो सारी बात कह देती, जो उनके ना होने पर सोच-सोचकर रोती रहती.

मैं उनसे कहती कि मैं पूरी कोशिश करूँगी एक अच्छी लड़की बनने की, मन लगाकर पढूँगी, घर के काम में दीदी का हाथ बटाऊँगी, हमेशा दीदी का कहना मानूँगी, छोटे भाई से लड़ाई नहीं करूँगी, किसी को पलटकर जवाब नहीं दूँगी, लड़कों के साथ नहीं खेलूँगी, ज़ोर-ज़ोर से हँसूँगी नहीं और ऊँची आवाज़ में गाना भी नहीं गाऊँगी और… और भी बहुत कुछ. मैं उनसे बताती कि मैं उनकी बात का जवाब इसलिए देती हूँ कि वो डाँटकर बात करती हैं, अगर वो प्यार से कहें तो मैं हर काम कर दूँगी… अगर मुझे ज़रा सा भी पता होता कि कल वो हमारे बीच नहीं होंगी तो मैं अपने स्वभाव के विपरीत उनके गले लग जाती और कहती कि “अम्मा, तुम हमें सबसे प्यारी हो. हमें छोड़कर मत जाओ. तुम भले ही बिस्तर पर पड़ी रहो. हम तुम्हारी पूरी सेवा करेंगे, पर तुम रहो. तुम्हारा होना ही सब कुछ है.” पर, मैं नहीं कह पायी, कुछ नहीं कह पायी और एक पल में ही मेरे देखते-देखते वो विदा हो गयीं. मुझे लगा मानो वो मेरे ही व्यवहार से रूठकर इस दुनिया से चली गयीं.

किसी के जाने के ठीक पहले तक हमें नहीं पता होता कि कल वो हमारे बीच नहीं रहेगा. किसी के रहने ना रहने की बात छोड़ भी दें, तो भी हमें अपने अगले पलों के बारे में कुछ नहीं पता होता. आज जो हमारे साथ चल रहे हैं, कल रहें ना रहें. हम ही आज जैसे हैं, वैसे कल हों कि नहीं. पता नहीं आज जो हैं, कल वो परिस्थितियाँ रहें ना रहें. पता नहीं कल आज के जैसा हो कि नहीं… तो जब हमें कल का पता नहीं तो आज को क्यों गवाएँ? हमें आज को जीना चाहिए, उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए. हमें जिसके लिए जो महसूस होता है कह देना चाहिए, किसी के दिल को दुखाये बिना…कोई काम ऐसा नहीं छोड़ना चाहिए, जिसके ना करने के कारण कल पछताना पड़े…

आज रुककर सोचती हूँ कि ये बातें तब समझ में आ गयी होतीं, तो शायद मुझे इस तरह पछताना नहीं पड़ता. हाँ, मैं छोटी थी, पर इतनी ज्यादा छोटी भी नहीं थी कि ये बातें ना समझ सकती. ये अपराधबोध मुझे अब भी सताता है कि मैंने अम्मा को कभी वो सम्मान नहीं दिया, जिसकी वो हकदार थीं. मैं हमेशा अपने में ही रहती थी. अम्मा के पास जाने से कतराती थी. उनके आख़िरी दिनों में मैंने कभी उनके पास बैठने की ज़रूरत नहीं समझी, कभी नहीं पूछा कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं, कि वो कुछ कहना तो नहीं चाहती हैं, और अब ये अपराधबोध मुझे सताता रहता है, ये ग्लानि मुझे परेशान करती रहती है. शायद मेरी ये सज़ा है कि मैं ज़िंदगी भर इस पछतावे में जीती रहूँ.

पिछली कड़ियाँ

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

भागना परछाइयों के पीछे-पीछे

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