आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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बाऊजी की बातें

मेरे बाऊजी बहुत दिलचस्प इंसान थे. चीज़ों को देखने का उनका खुद का नजरिया होता था और वो बड़ा अलग और अनोखा था. किसी भी विषय में मेरी उत्सुकता का उत्तर वे बहुत तार्किक ढंग से देते थे. ऐसे कि बात समझ में आ जाती थी और मनोरंजक भी लगती थी.

बुद्ध की ज्ञानप्राप्ति के विषय में मेरी जिज्ञासा के समाधान में उनका एक बड़ा मजेदार किस्सा याद आता है. सातवीं-आठवीं कक्षा में कुछ धर्मों के विषय में पढ़ाया गया. बुद्ध के बारे में मैंने पढ़ा कि सालों साल तपस्या करने के बाद एक दिन बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ. मेरे मन में एक प्रश्न उठा और सारा ध्यान उसी पर अटक गया. प्रश्न यह था कि ज्ञान कोई एक दिन में अर्जित करने वाली चीज़ तो है नहीं, तो बुद्ध को एक दिन में ज्ञान कैसे प्राप्त हो गया? मैंने बाऊ से पूछा कि बुद्ध ने जो शिक्षाएं दी थीं, वे या तो उन्हें पहले से मालूम रही होंगी या बाद में दिमाग में आयी होंगी. ज्ञान तो अध्ययन-चिंतन और मनन से ही होता है. तपस्या करने से ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है? और वो भी एक दिन में. बाऊजी  जल्दी जवाब भी नहीं देते थे, पहले तो टालते रहे. आखिर मेरे बार-बार पूछने पर कि “बुद्ध को एक दिन में ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ?” बाऊ ने कुछ इस तरह समझाया.

सिद्धार्थ बचपन से बड़े संवेदनशील थे. जीवन की हर घटना-दुर्घटना उनके मन पर प्रभाव डालती थी. राजभवन में रहकर भी वे सन्यासियों की तरह विरक्त थे. आखिर एक दिन उन्होंने घर छोड़ दिया और ज्ञान की तलाश में भटकने लगे. अपनी जिज्ञासा के समाधान के लिए वे जगह-जगह भटके. कई विद्वानों से मिले. फिर कठोर तपस्या आरम्भ की. कई वर्ष बीत गए, सिद्धार्थ तप से कृशकाय हो गए, पर कोई लाभ नहीं हुआ. एक दिन बुद्ध को समझ में आया कि “हिंसा बहुत बुरी चीज़ है और अपने शरीर के साथ भी हिंसा नहीं करनी चाहिए. इसलिए ये तपस्या वगैरह बेकार है. ढोंग है. ईश्वर यदि कहीं होता तो इतनी कठोर तपस्या के बाद अवश्य प्रकट होता. इसलिए ईश्वर का भी अस्तित्व नहीं है.” दिमाग में ये बात आने के बाद उनके सामने सारी बातें स्पष्ट होती चली गयीं. इसे ही ‘ज्ञान-प्राप्ति’ कहा गया.

जो भी है बस यही जीवन है. इसमें बहुत दुःख और कष्ट हैं, लेकिन उन्हें कुछ बातों का ध्यान रखते हुए सहन किया जा सकता है. यदि हम भोगों में पूर्णतः आसक्त ना हों, तो उनकी कमी से होने वाला कष्ट नहीं होगा. इसी तरह कठोर तप भी कष्ट का कारण होता है. इसलिए उन्होंने सीधे-सादे मध्यममार्गी जीवन की शिक्षा दी, जो ना अधिक कठोर हो और ना ही असंयमित.

बाऊजी की बातें सुनकर मेरी समझ में बहुत कुछ आया, थोड़ा-बहुत नहीं भी. वो जो कि बहुत गूढ़ दार्शनिक विषय था और उस उम्र में समझ में नहीं आ सकता था. लेकिन मेरे बार-बार जिद करने पर बाऊजी ने मुझसे कहा था कि ‘क्या नचिकेता की तरह पीछे पड़ गई हो?’ अब एक नया प्रश्न मेरे सामने था  ‘नचिकेता कौन है?’ 🙂

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छूटा हुआ कुछ

पिछले कुछ दिनों से मुझे मेरा घर बहुत याद आ रहा है. बाऊ के रहते डेढ़-दो महीने भी जिससे दूर नहीं रह पाती थी, आज उसे छूटे हुए पाँच साल से ज्यादा हो रहे हैं. कितना सोचा कि अब उस घर में लौटकर कभी नहीं जाऊँगी. पर क्या करूँ? इतनी बड़ी दुनिया में उस घर के सिवा और कहीं कोई ठिकाना भी तो नहीं.

कौन कहता है कि बिना घरवालों के घर, घर नहीं मकान होता है. मुझे लगता है कि घर की भी आत्मा होती है, ऐसा लगता है कि वो भी इस समय बहुत अकेला है और मुझे पुकार रहा है. कितना कुछ तो छूटा हुआ है मेरा उस घर में. उसी घर में हमने पहली बार महसूस किया कि अपना घर कैसा होता है? इससे पहले की ज़िंदगी तो हमने रेलवे क्वार्टरों में बिताई थी. उस घर में हम तीनों-भाई बहनों की हँसी छूटी हुयी है. दीदी की शादी के बाद अकेले अपने कमरे में बहाए हुए मेरे आँसू छूटे हुए हैं, हज़ारों ख्याल, सैकड़ों विचार जो दिमाग में उठे और कागज़ पर नहीं उतरे, उस घर के किसी कोने में ही छूट गए हैं. और इन सबसे भी बढ़कर उस घर में बाऊ की आत्मा बसी हुयी है, जिसने चाहे शरीर के.जी.एम्.सी. के ट्रामा सेंटर में छोड़ा हो, पर घूम-फिरकर उसी घर में आ गयी होगी, जिसे बाऊ ने अपनी तैंतीस साल की सर्विस से रिटायरमेंट के बाद ग्रेच्युटी और फंड के पैसों से बनवाया था. कौन जाने बाऊ की आत्मा ही खींच रही हो मुझे वहाँ? उन्हें मालूम था कि तीनों भाई-बहनों में मुझे ही सबसे ज्यादा उस घर से लगाव है.

हाँ, मुझे उस घर से बेहद लगाव है क्योंकि मेरा कोई और घर नहीं है, क्योंकि वो घर मेरे पिताजी की आकांक्षाओं का मूर्त रूप है, उस घर के नक़्शे से लेकर आतंरिक सज्जा तक में सबसे ज्यादा हाथ मेरा ही था और वहाँ मैंने अपनी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन और सबसे अवसाद भरे दिन बिताए हैं. दीदी की शादी के बाद मैं बहुत अकेली हो गयी थी और तब मुझे वहीं पनाह मिलती थी, अपने उस कमरे में, जिसकी खिड़की से दूर-दूर तक फैले धान के खेत दिखते थे, बारिश में नाचते मोर दिखते थे और ठंडी-ठंडी हवा आकर मेरे गालों को सहलाकर मानो सांत्वना देती थी.

मेरे लिए वो घर ही नहीं उसके आस-पास के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी मेरे अस्तित्व का हिस्सा थे. घर के अहाते में लगे सागौन पर बया घोंसले बनाया करती थी और बँसवारी में महोख और गौरय्या अपना ठिकाना बनाये हुए थे. बरामदे में लगी बोगनबेलिया और मालती के बेलों को जब बाऊ छाँटते थे, तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता था. मुझे लगता था कि उन्हें दर्द होता है. दक्खिन ओर की बँसवारी भी मैंने लड़-झगड़कर काटने से रोकी थी. बाऊ उसे काटना चाहते थे क्योंकि वहाँ एक धामिन ने अपना घर बना रखा था. पर मुझे ज्यादा चिंता उस पर बसने वाले पंछियों की थी. बाऊ ने सामने की ओर दुआर पर तरह-तरह के आम के पेड़ लगाए थे. जाने कहाँ से आम्रपाली ढूँढकर लाये थे, जिसमें बाऊ के जाने के साल खूब फल लगे थे और बाऊ रोज सुबह उठकर उसके फलों को गिनते थे कि कहीं चाचा की बदमाश पोती ने कुछ टिकोरे तोड़ तो नहीं लिए. अब तो वो पेड़ खूब बड़ा हो गया होगा.

मुझे आज भी याद है कि काँच की एक बोतल में लगाया मनीप्लांट टाँड़ पर से बढ़कर रोशनदान के पास पहुँच जाता था और मैं बार-बार उसे खींचकर नीचे कर देती थी. ऐसा लगता था मानो वो अपनी बाहें फैलाकर रोशनी को अपने अंदर भर लेना चाहता हो. मुझे लगा उसे खुली हवा में साँस लेना है. मैंने उस पौधे को बोतल से निकालकर मिट्टी में लगा दिया और वो थोड़ा बड़ा हुआ तो खिड़की के रास्ते अंदर कमरे की ओर बढ़ने लगा. बिलकुल कुछ ऐसे ही, मैं भी घर लौटना चाहती हूँ.

वो ऐसे ही थे (2.)

मेरे बाऊजी मार्क्स के विचारों से बहुत प्रभावित थे. लेकिन वे जितने बड़े प्रशंसक मार्क्सवाद के थे, उतना ही उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता से लगाव था. ये दोनों ही परस्पर विरोधी विचार मझे विरासत में मिले हैं. जब हम बहुत छोटे थे और शीतयुद्ध का मतलब भी नहीं जानते थे, तब बाऊ हमें अमेरिका और रूस की परस्पर शत्रुता के किस्से सुनाया करते थे. और बेहद रोचक कहानियों से दोनों की राजनीतिक व्यवस्था के अंतर को समझाते थे. वो अस्सी का दशक था. शीतयुद्ध का आख़िरी दशक.

ऐसा ही एक किस्सा मुझे याद आ रहा है, जो शीतयुद्ध के शुरुआती दिनों के माहौल के बारे में संकेत देता है, जब रूस कई मामलों में अमेरिका से बहुत आगे था. उसके नागरिकों का जीवनस्तर अन्य विकसित देशों की अपेक्षा कहीं अधिक ऊँचा था. ये किस्सा है- दो कुत्तों का किस्सा. एक अमेरिका का कुत्ता था और एक रूस का, जो तब सोवियत संघ हुआ करता था. रूस के कुत्ते को सारी सहूलियतें मिली हुयी थीं. उसे समय-समय पर अच्छा खाना दिया जाता था. उसके रहने के लिए शानदार केज था. उसे सुन्दर सा चमड़े का पट्टा पहनाया गया था. वहीं अमेरिका का कुत्ता टपोरियों की तरह घूमा करता था. भूख लगती थी तो किसी के भी घर से रोटी माँगकर खा लेता था. और नींद लगने पर कहीं भी सो जाता था. अपने मालिक के पास भी ज्यादा देर नहीं ठहरता था.

पर एक बात अटपटी सी थी. सारी सुविधाओं के बीच रहते हुए भी सोवियत संघ का कुत्ता दुबला-पतला था और सूखी रोटी खाकर भी अमेरिका का कुत्ता तंदरुस्त था. सोवियत संघ के कुत्ते को जब सुबह घुमाने ले जाया जाता तो उसे इधर-उधर घूमते अमेरिकी कुत्ते को देखकर बहुत आश्चर्य होता. एक दिन उसने अमेरिकी कुत्ते से पूछा, “यार, एक बात बता, तुझे सूखी रोटी भी माँगकर खानी पड़ती है. सोने के लिए ठीक-ठाक बिस्तर भी नहीं है. फिर भी तू इतना मोटा-ताजा क्यों है और मैं इतना दुबला कैसे हूँ?” अमेरिका का कुत्ता मुस्कुराया और उससे बोला, “इसका कारण वो एक चीज़ है, जो मुझे मिलती है, तुझे नहीं मिलती.” “क्या?” सोवियत संघ के कुत्ते ने पूछा. ” मुझे भौंकने को मिलता है.” कहकर अमेरिका का कुत्ता पूँछ उठाकर पार्क के दूसरी ओर चल दिया.

मैं अक्सर आज भी ये किस्सा याद करती हूँ और सोचती हूँ कि बाऊ जी ने हमें बचपन से ही कई आयामों से चीज़ों को देखना सिखाया. वो अक्सर कहा करते थे कि ये तुम्हारे ऊपर है कि तुम रोटी के लिए अपनी स्वतंत्रता की कीमत अदा करते हो या स्वतंत्रता के लिए रोटी की. उन्होंने कभी नहीं कहा कि तुम ये राह चुनो या वो. ये हम पर ही छोड़ दिया. मुझे मालूम है कि आज के युग में रोटी की जद्दोजहद बहुत मुश्किल है और अच्छे-अच्छों के हौसले पस्त कर देती है, लेकिन मैंने हमेशा आज़ादी चुनी है.

लेकिन, मुझे ये भी मालूम है कि ये आज़ादी भी अधूरी है क्योंकि ये किसी की दी हुयी आज़ादी है. मैं तब भी ये सोचती थी कि अगर रूस के कुत्ते को भौंकने का भी अधिकार मिलता तो वो सबसे ज्यादा अच्छी स्थिति होती. पर ऐसी स्थिति सिर्फ़ एक सपना है आज भी. किसी को भी पूरे अधिकार नहीं मिले हैं. भौंकने का अधिकार देकर हमें अपनी आज़ादी के भ्रम में छोड़ दिया जाता है. हम छोटे से छोटे कारण के लिए अपनी झूठी आज़ादी छोड़ने को तैयार नहीं होते. हमारे मन में व्यवस्था की खामियों को लेकर भरा हुआ गुबार निकालने के लिए ये झूठी आज़ादी ‘सेफ्टी वाल्व’ का काम करती है और हम सच्ची आज़ादी से वंचित रह जाते हैं.

आज जब विश्व के कुछ देशों में जनता सड़कों पर निकल आयी है, तो सोचना यह है कि वो किस आज़ादी की तलाश में है – भौंकने की आज़ादी या रोटी की. निस्संदेह वो देश ऐसे हैं, जहाँ रोटी की इतनी कमी नहीं. उन्हें भौंकने का अधिकार चाहिए, लेकिन वो भी शर्तहीन. ऐसी नहीं जैसी हमारे देश में मिली हुयी है, जहाँ भौंकने का अधिकार तो मिला हुआ है, लेकिन उसे अलग-अलग राजनीतिक दल खरीद लेते हैं. मेरे ख्याल से सच्ची आज़ादी वही होगी, जिसमें हमें भौंकने के अधिकार के साथ रोटी का भी अधिकार मिले, खाली पेट कोई कितना भौंक सकता है?

हम बाऊ जी से लगभग सभी अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बात करते थे. जब भी किसी देश में कोई हलचल होती थी, तो वहाँ का इतिहास खंगालने के लिए हमें किताबों का सहारा नहीं लेना पड़ता, बाऊ उसे जबानी बता देते. और ये तो सभी को मालूम है कि किसी भी क्रान्ति की जड़ें इतिहास में होती हैं. मैं आज भी जब ऐसी खबरें सुनती हूँ या किसी अटपटे से प्रश्न पर अटकती हूँ, तो बाऊ की याद बेतरह आती है.

इससे मिलती कड़ी-

वे ऐसे ही थे (1.)

वो ऐसे ही थे (1.)

इस ३० जून को उनको गए पूरे चार साल हो गए… इन सालों में एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरा, जब मैंने उन्हें याद ना किया हो… आखिर अम्मा के बाद वही तो मेरे माँ-बाप दोनों थे. परसों उनकी पुण्यतिथि थी और मज़े की बात ये कि मैं उदास नहीं थी. मुझे उनके कुछ बड़े ही मजेदार किस्से याद आ रहे थे… कुछ ऐसी बातें, जो उन्हें एक अनोखा व्यक्तित्व बनाती थीं… ऐसे व्यक्ति, जिनके बारे में लोग कहते थे कि वह अपने समय से पचास साल से भी आगे की सोच रखने वाले थे.

वे बहुत मस्तमौला थे,ये तो मैं पहले भी बता चुकी हूँ… बेहद निश्चिन्त, फक्कड़, दूरदर्शी, पर भविष्य की चिंता ना करने वाले . मेरी और उनकी उम्र में लगभग बयालीस-तैंतालीस साल का अंतर था. कहते हैं कि एक पीढ़ी के बाद ‘जेनरेशन गैप’ मिट सा जाता है, इसीलिये बाबा-दादी की पोते-पोतियों से ज्यादा पटती है. हमारी भी बाऊ से खूब जमती थी. हम उनसे इतने घुले-मिले थे कि उन्हें ‘तुम’ कहकर ही संबोधित करते थे. आमतौर पर बच्चे माँ को तुम और पिता को आप कहते हैं.  इसका एक कारण यह भी था कि उन्हें अम्मा की भूमिका भी निभानी पड़ रही थी और उन्होंने हमें अम्मा से कम प्यार नहीं दिया.

बाऊ 2005 (दीदी के यहाँ भरूच में ली गयी आख़िरी फोटोग्राफ)

हमें बचपन से ही उन्होंने तर्क करना सिखाया था और उनसे सबसे ज्यादा बहस मैं ही करती थी. उनकी हर वो बात, जो मुझे सही नहीं लगती, मैं काट देती थी, उसका विरोध करती थी, उन्होंने भी तो यही किया था… बस कोई बात इसलिए ना मान लेना कि उसे बड़े हमेशा से मानते आये हैं. मेरे तर्क करने पर वो खुश होते थे. मुझे लेकर बहुत निश्चिन्त भी थे. अक्सर कहते थे कि बाकी दो बच्चों की शादी-ब्याह की चिंता है, इसके लिए वर ढूँढना मेरे बस की बात नहीं… मेरे कॅरियर को लेकर भी उन्हें अधिक चिंता नहीं थी. ना जाने क्यों इतनी आश्वस्ति थी मेरे बारे में???

उनके मस्तमौलापन का एक किस्सा है. बाऊ ने अपनी पेंशन उन्नाव से आज़मगढ़ ट्रांसफर करवाई थी. डाक की लापरवाही से कागज़ कहीं खो गया और फिर से कागज़ बनवाने की औपचारिकता में पूरे एक साल उन्हें पेंशन नहीं मिली. अपनी जमा-पूँजी तो दीदी की शादी में लगा दी थी. पेंशन से ही घर चल रहा था. मैं पहले ही दीदी की शादी के बाद अकेली पड़ गयी थी. इस फाइनेंसियल क्राइसिस की वजह से भयंकर डिप्रेशन में चली गयी. अक्सर मैं ‘सुसाइडल’ हो जाती थी, हालांकि कभी सीरियस अटेम्प्ट नहीं किया… गेहूं में रखने के लिए लाई गयी सल्फास की गोलियों के पास जा-जाकर लौट आती थी. एक दिन बाऊ से पुछा कि “बाऊ, कितनी सल्फास की गोलियाँ खाने पर तुरंत मौत आ जायेगी.” उन्होंने अखबार पढ़ते-पढ़ते ही जवाब दिया, “बड़ों के लिए चार-पाँच काफी हैं, छोटे दो-तीन में ही भगवान को प्यारे हो जाते हैं. तुम चाहो तो दसों खा लो, जिससे कोई कमी ना रह जाए.” वे ऐसे बोल रहे थे, जैसे आत्महत्या विज्ञान में पीएच.डी. कर रखी हो… फिर अखबार हटाकर कहने लगे, “वैसे सल्फास खाकर मरना बहुत तकलीफ देता है. तुम ऐसा करो फाँसी लगा लो. वो जो तुम्हारे कमरे में पंखा है ना, उसी से लटक जाओ.” … बताओ, अपने बच्चों से कोई ऐसे कहता है… और मेरा क्या हाल हुआ होगा???… मैंने इतनी सीरियसली पूछा था. सोचा था कि दौड़े चले आयेंगे और कहेंगे “क्यों गुड्डू बेटा, तुम मरना क्यों चाहती हो” पर सब कचरा करके रख दिया… मुझे तब बड़ा गुस्सा आ रहा था, अब हँसी आती है.

मैं थोड़ी देर तक वहीं खड़ी रही. वो वापस अखबार पढ़ने लगे और थोड़ी देर बाद बोले, “तुम्हारे मरने से सारी समस्याएँ हल नहीं हो जायेंगी और ना दुनिया रुक जायेगी, बस तुम्हारा नुक्सान होगा. इतनी प्यारी चीज़ तुमसे छिन जायेगी और दोबारा कभी नहीं मिलेगी … तुम्हारी ज़िंदगी.” उसके बाद मैंने आत्महत्या के बारे में कभी नहीं सोचा… वो ऐसे ही थे.

जारी…


यादों के फ्रेम में जड़ी तस्वीरें…

(जुलाई १९९९ का कोई दिन)

दीदी की शादी के बाद दो महीने तो मैं घर पर ही रही. गर्मी की छुट्टियाँ थीं. पर जुलाई में यूनिवर्सिटी जाना ही पड़ा. बाऊ जी बिल्कुल अकेले पड़ गए. दशहरे की छुट्टियों में जब घर गयी तो देखा रसोई में बैठकर बर्तन माँज रहे हैं. जाने उस दिन मुझे कैसा लगा? मैं एक पल के लिए भी वहाँ रुक नहीं सकी और हमेशा की तरह उनके पैर छूने के बजाय सीधे कमरे में चली गयी.

मेरे आने की खबर तो उनको थी ही. आहट से समझ गए कि मैं ही हूँ. बर्तन धोते हुए पूछा, “गुड्डू, क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है?”मैं अपना रोता हुआ चेहरा उन्हें नहीं दिखा सकती थी… बोली “ज़रा पीठ में दर्द हो गया है … बस में बैठे-बैठे” मैं अपने आप को कोस रही थी. क्या पढ़ाई कर रही हूँ मैं? ये कैसी पढ़ाई है? उसका क्या फायदा जब अपने बाऊ को आराम न दे पाऊँ?… वो भी कितने बदकिस्मत हैं, तीन-तीन बच्चों के होते हुए बुढ़ापे में अपने हाथ से खाना बनाना पड़ रहा है… जिस व्यक्ति ने कभी एक कप चाय तक न बनाई हो अपनी शादी के बाद से, उसे आज घर का सारा काम करना पड़ रहा है और वो भी उम्र के छठे दशक में… पर वो तो एक नंबर के स्वाभिमानी… चाचा-चाची ने कितना कहा पर उन्होंने उनके घर खाने के बजाय खुद बनाने का निर्णय लिया… अजीब आदमी हैं.

“चाय बनाएँ ?” वो सामने दरवाजे पर थे. शुक्र है कि अन्धेरा गहरा हो चला है, नहीं तो मेरे आँसू देखकर एक लंबा-चौड़ा लेक्चर पिलाते.  “नहीं बाऊ, हम बना लेंगे” फिर चाय पीते-पीते उन्होंने गाँव-जवार की सब ख़बरें सुना डालीं. माहौल हल्का करना चाहते थे शायद. घर कितना सूना-सूना लग रहा था… दीदी के बिना पहली बार इस घर में… कितना अजीब सा माहौल था… बहुत अजीब. मैं कमरे की चीज़ों को देख रही थी. सब पर धूल की एक मोटी परत जमी थी. बाऊ ताड़ गए कि अति सफाई पसंद इस लड़की को चिढ़ हो रही होगी, गुस्सा रही होगी, जैसा कि हमेशा करती थी … धूल का एक कतरा देखा नहीं कि जुट गयी सफाई में… “परसों आँधी आयी थी ना…” उन्होंने सफाई दी, पर मुझे गुस्सा नहीं, रोना आ रहा था और ठीक सामने बैठे बाऊ से छिपाना भी था, “लगता है कि आँख में कुछ पड़ गया है” … बाऊ कितने बूढ़े लगने लगे हैं इन दो महीनों में. लगता है अकेलापन साल रहा है. उम्र के इस पड़ाव पर जीवन संगिनी की कमी सबसे अधिक खलती है… काश अम्मा होतीं!

सोचा था कि ढेर सारी बातें करूँगी, पर कुछ बोलने की इच्छा नहीं हो रही थी. खाना बनाते समय भी बोले, “लाओ सब्जी काट दूँ.” मुझे अच्छा नहीं लगा… बिल्कुल नहीं. मुझे घर ही अच्छा नहीं लग रहा था. मन कर रहा था कि कहीं दूर भाग जाऊँ या कुछ ऐसा करूँ कि बीते दिन लौट आयें, जब छुट्टियों में मैं और मेरा भाई घर आते थे और दीदी से हॉस्टल की बातें शेयर करते थे. या उससे भी बहुत पहले, जब हम रेलवे कालोनी में रहते थे. औरतें बरामदों में बैठकर बातें करती थीं और बच्चे सामने की खाली जगह में खेला करते थे. पर कहाँ लौट सकता है वो सब? और लौटा भी नहीं… खोता गया एक-एक करके.

सबका जाना और हमदोनों का रह जाना, सब बर्दाश्त कर लिया. पर सच, अपने पिता को बुढाते देखना ज़िंदगी का सबसे बुरा अनुभव होता है. जिन उँगलियों ने आपको पकडकर चलना सिखाया वो अब अखबार पढते हुए कांपती हैं… जिन हाथों ने हमें सहारा दिया, अब उनमे एक सोंटा होता है… छह फिट लंबा भारी-भरकम शरीर सिकुड़कर आधा हो गया है… गोरे-चिट्टे लाल चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गयी हैं…

वो दिन अटक सा गया है… आँखों में… करक उठता है रह-रहकर. लोग कैसे छोड़ देते हैं अपने माँ-बाप को? मुझसे तो उनके जाने के सालों बाद भी यादें नहीं छूटतीं, पल-पल गहरी होती जाती हैं, साफ होती जाती हैं… मैं अपने अम्मा-बाऊ की फोटो मेज पर कभी नहीं लगाती, फोटो में वो लोग पराये से लगते हैं और तस्वीर पर धूल की परत जम जाती है. यादों के फ्रेम में जड़ी तस्वीरें कभी धुँधली नहीं पड़तीं… आज शायद फादर्स डे है, पर मेरे लिए रोज ही होता है क्योंकि कोई ऐसा दिन नहीं होता, जब उन्हें याद ना करूँ.

रिटायरमेंट के समय (१९९४) का एक चित्र

उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (3.)

मेरी अम्मा अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी. सिर्फ़ पाँचवाँ पास थीं. पहले लोग अपनी लड़कियों को अक्षरज्ञान करा देते थे, जिससे कि वे चिट्ठी लिख सकें. अम्मा को भी चिट्ठी लिखने भर की शिक्षा मिली थी. पिताजी जब उन्हें साथ लेकर आये तो पढ़ाना शुरू कर दिया. अम्मा का जी नहीं लगता था पढ़ने में, तो पहले उन्हें मनोरमा, गृहशोभा जैसी किताबें लाकर दीं. जब धीरे-धीरे उनका मन लगने लगा तो पिताजी ने किताबों का स्तर थोड़ा बढ़ा दिया. अब वे उन्हें सरिता और कादम्बिनी पढ़ाने लगे. उन्नाव स्टेशन पर एक जो सबसे पुराना बुकस्टाल है, उसे हमारे एक चाचा चलाते थे (हमलोग पिताजी के दोस्तों को चाचा ही कहते थे, अंकल नहीं) पिताजी उन्हीं से अपनी पसन्द की किताबें मँगा लिया करते थे. मेरी अम्मा को पढ़ने का उन्होंने जो चस्का लगाया कि वे अखबार भी पढ़ने लगीं, जो कि आमतौर पर तब औरतें पढ़ना नहीं पसन्द करती थीं. फिर तो माया, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी किताबें अम्मा की पहली पसन्द बन गयीं. अम्मा ने ही हमलोगों को बताया था कि किस प्रकार पिताजी ने उनकी रुचि परिष्कृत की. नहीं तो गाँव-देहात में पली-बढ़ी अम्मा बेचारी क्या जानती थी इन किताबों के बारे में.

उस ज़माने में टी.वी. तो होती नहीं थी. टेप रिकार्डर बहुत ऊँची चीज़ थी. ले देकर एक रेडियो था, जिस पर विविध भारती से निश्चित समय पर प्रोग्राम आते थे. इसलिये पिताजी जब ड्यूटी पर होते थे तो अम्मा इन्हीं किताबों के सहारे अपना समय बिताती थीं. इन सबका अम्मा के व्यक्तित्त्व पर बड़ा ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा. हमने होश सँभाला तो हमें मालूम था कि अम्मा अधिक पढ़ी-लिखी नहीं हैं, पर बाहर वाला कोई भी इस बात पर विश्वास नहीं करता था. इसका कारण यह था कि वो धड़ल्ले से किसी भी विषय में बहस कर लेती थीं. हमलोगों को हिन्दी और अन्य विषय वही पढ़ाती थीं, बस अंग्रेजी उन्हें नहीं आती थी और उन्होंने कभी कोशिश भी नहीं की सीखने की.

अम्मा को सिलाई सीखने का शौक था, तो पिताजी ने उस ज़माने में उन्हें उस सिलाई स्कूल में भर्ती करवाया, जहाँ पुरुष टीचर सिखाते थे. घरवालों ने इस बात का बुरा भी माना, पर पिताजी ने किसी की एक न सुनी. ये बात अलग थी कि अम्मा माथा ढककर ही जाती थीं स्कूल.

हमलोग जब छोटे थे, तो अम्मा अपने हाथ से सिलकर कपड़े पहनाती थीं हमें. रंग-बिरंगे, छींटदार, फूल वाले हर तरह के कपड़े, खुद ही खरीदकर लाती थीं और बड़े मन से सिलती थीं. अगर सादे कपड़े होते थे, तो उस पर फूल काढ़ती थीं. अम्मा स्वेटर बुनने में इतनी पारंगत थी कि तीन दिन में एक स्वेटर तैयार कर देती थी. हमारे स्कूल के लिये रात रात भर जागकर चार दिन में भाई-बहन दोनों के स्वेटर तैयार कर दिये थे.

अम्मा काश-बल्ले( एक प्रकार के घास जिससे औरतें पहले टोकरी वगैरह बनाती थीं) से खूब तरह-तरह की टोकरियाँ बनाती थीं. सिकहुली, कुरुई, पिटारी आदि कुछ नाम मुझे याद हैं. अफ़सोस की अम्मा के देहांत के समय मैं सिर्फ़ 13 की थी, नहीं तो कुछ सीख लेती. ये हुनर उन्हीं के साथ चला गया. अब भी गाँव की कुछ भाभियाँ ये हुनर जानती हैं, पर थोड़ा-बहुत. पर, अम्मा तो माहिर थीं ऐसे कामों में.

कहते हैं कि इन्सान जब जाता है तो अपने साथ कुछ नहीं ले जाता, पर अम्मा गईं तो अपने साथ सब कुछ ले गईं. वो अपनापन, जो हमारी फ़्राक पर काढ़ा करती थीं; वो सपने, जो वो कुरुई, पिटारी के साथ बुना करती थीं; वो प्यार की गर्मी, जो स्वेटर में डाल देती थीं; वो रिश्तों के ताने-बाने जो क्रोशिया के धागों से सजावट की झालरों में पिरो देती थीं, सब ले गईं अपने साथ और साथ ले गई वो हुनर, जो लोकसंस्कृति को संजोने के लिये एक पीढ़ी से दूसरी सीखती जाती है. लोकसंस्कृति ऐसे ही टुकड़ों-टुकड़ों में तिरोहित होती जा रही है, परलोक जाने वाली माँओं के साथ.

एक कविता उनकी याद में…


उनकी ज़िंदगी के वो रूमानियत भरे दिन (2.)

हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल (पचास और साठ के दशक) पिताजी के जीवन का भी स्वर्णकाल था क्योंकि वे उस समय युवा थे और नयी-नयी शादी हुयी थी. अपने खानदान क्या, पूरे गाँव में अपनी पत्नी को अपने साथ शहर लाने वाले पिताजी पहले युवक थे. नहीं तो उस समय पिया लोग कमाने रंगून और कलकतवा चले जाते थे और पियानियाँ (मतलब पत्नियाँ) घर बैठकर विरह में कजरी और बिदेसिया गाती थीं–“चार रे महीना कहि के गइलैं कलकतवा बीति गइलैं बारह बरीस रे बिदेसिया” इससे ये पता चलता है कि पिया लोग बरसों घर नहीं जाते थे और पत्नियाँ सौतन की कल्पना कर-करके जल-जलकर राख होती थीं और “कोयला भई न राख” वाली गति बना लेती थीं. पिताजी ने अम्मा को बिरहगीत गाने का मौका ज्यादा नहीं दिया और शादी के लगभग तीन साल बाद(तीन साल तब भी लगा दिये) अम्मा को लेकर उन्नाव आ गये, जहाँ वे उस समय पोस्टेड थे.

दरअसल अम्मा को साथ ले जाने का एक विशेष कारण था. उन दिनों बिजली आदि से चलने वाली चक्की नहीं होती थी. औरतें घर में ही जांता (हाथ चक्की) चलाकर आटा पीसती थीं और दाल दरती थीं. इसलिये सुबह-सुबह मुँह अँधेरे उठना पड़ता था. अम्मा को ये सब करने में कोई परेशानी नहीं थी. पर भयंकर जाड़े में भी भोर में नहाकर और एक कपड़ा पहनकर ही खाना बनाना पड़ता था (जैसा कि मैं पहले बता चुकी हूँ खाना बनाते और खाते समय दर्जी का सिला कपड़ा पहनने की अनुमति नहीं थी). अम्मा का जब ब्याह हुआ था, तो वो सिर्फ़ 15 साल की थी. बेहद दुबली-पतली बेचारी अम्मा की हड्डियाँ काँप जाती थीं जाड़े में. घर की बड़ी बहू होने के कारण सारे घर की ज़िम्मेदारी भी अम्मा पर ही थी. इतना सारा काम करने के कारण अम्मा बीमार रहने लगीं. उस पर भी कोई उन पर ध्यान नहीं देता था. घर की बहुओं की औकात ही क्या होती है? उन्हीं दिनों हमारी छोटी बुआ का टी.बी. का रोग लगने से देहांत हो गया. उन दिनों ये एक घातक बीमारी थी और इसका कोई इलाज नहीं था. अम्मा ने उनकी बड़ी सेवा की थी. पिताजी को जब अम्मा की बीमारी का पता लगा, तो उन्हें लगा कि कहीं अम्मा को भी ये रोग न लग जाये. तो उन्होंने फिर से घर वालों का विरोध करते हुये अम्मा को साथ ले जाने का फ़ैसला कर लिया. ले गये थे वो अम्मा का इलाज कराने, पर वापस पहुँचाने नहीं गये.

जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि अम्मा-पिताजी की शादी के लगभग ग्यारह साल बाद दीदी का जन्म हुआ था. इस बीच अम्मा रह रहकर बीमार पड़ जाती थीं और उनका इलाज चलता रहता था. अम्मा-पिताजी ने बाल-बच्चे न होने का खूब फ़ायदा उठाया. खूब घूमे-फिरे, फ़िल्में देखीं, बाहर खाना खाया(अम्मा ने नहीं, वो बाहर का नहीं खाती थीं, मरते दम तक नहीं खाया) रेडियो पर खूब गाने सुने( उन दिनों किसी के पास रेडियो होना बड़ी बात थी) और खूब गप्पें हाँकीं. कुल मिलाकर वो दिन उनकी ज़िन्दगी के रूमानियत भरे दिन थे.

वो समय हिन्दी सिनेमा का ही नहीं, भोजपुरी सिनेमा का भी स्वर्णकाल था. भोजपुरी की पहली फ़िल्म थी “गंगा मैया तोहैं पियरी चढ़इबौं.” अम्मा को ये फ़िल्म बहुत पसन्द थी और इसके गाने वो अक्सर गुनगुनाया करती थीं. इसके अलावा “बिदेसिया” और “लागी नहीं छूटे रामा” फ़िल्मों की भी अम्मा बहुत प्रशंसा करती थीं. बिदेसिया का गाना “हंसि-हंसि पनवा खिअउलै बेइमनवा” अम्मा का मनपसंद गाना था. इसके अलावा जो गाना उन्हें अच्छा लगता था–“लाले-लाले ओठवा से बरसै ललइया, हो कि रस चुऐला, जइसै अमवा की डरिया से रसा चुऐला”(ये गाना तलत महमूद और लता जी ने गाया है). सब लोग बताते हैं कि जब मैं छोटी थी, तो अम्मा के गाने दोहराती थी. मेरी तोतली बोली में भोजपुरी गाने सबको बहुत अच्छे लगते थे. मज़े की बात कि मैं भोजपुरी न तब बोल पाती थी और न अब बोल पाती हूँ, पर गाने गा लेती हूँ.

अम्मा-पिताजी फ़िल्मों के इतने दीवाने थे कि कभी-कभी एक सिनेमाहाल से निकलते थे फ़िल्म देखकर और दूसरे में घुस जाते थे. लोग कहते हैं कि आजकल समाज पर फ़िल्मों का कुछ ज्यादा ही असर दिख रहा है, तो वो तब भी कम नहीं था. उसी समय देवानंद के सफेद शर्ट और काली पैंट के साथ काली कोट पहनने पर पाबंदी लग गयी थी क्योंकि कुछ लड़कियों ने उन्हें इस पोशाक में देखकर आत्महत्या कर ली थी. मेरे पिताजी भी बहुत ही हैंडसम थे. पाचँ फिट ग्यारह इंच की लम्बाई, गोरा-चिट्टा रंग और छरहरा शरीर. कोई उन्हें देवानंद कहता था, तो कोई सुनील दत्त और मेरी अम्मा पिताजी पर वारी-वारी जाती थीं.


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