आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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बीमारी और जानकारी

पिछले पांच-छः महीने मैं गले में भयंकर दर्द से पीड़ित रही. वैसे मुझे धूल और प्रदूषण से एलर्जी है और सर्द-गर्म से भी. इससे अक्सर गले में खरास और छाले हो जाते हैं. अगस्त में मैंने एक कॉलेज में adhok असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में पढ़ाना शुरू किया था, उसी बीच घर की सफाई करते-करते धूल से गले में छाले हो गए, जिससे दर्द हुआ और बढ़ता ही गया. खरास और छाले तो अक्सर हो जाते हैं, लेकिन दर्द से लगा कि इन्फेक्शन है. लेकिन एंटीबायोटिक खाने से भी लाभ नहीं हुआ.

तब लगा कि डॉक्टर को दिखाना ही पड़ेगा. एक अनुभवी ENT विशेषज्ञ को दिखाया. उन्होंने सारे लक्षण सुनकर कहा कि एलर्जी ही है, कुछ एंटी एलर्जिक दवाएं लिखीं और मुझे खुले और साफ वातावरण में रहने की हिदायत भी दी. पूरे एक हफ्ते उनकी लिखीं दवाएं खाने से फायदा नहीं हुआ, तो मैं घबरा गयी. मैंने अपनी डॉक्टर सहेली को सब बताया, तो उसने एम्स में दिखाने को कहा.

मुझे ऐसा लगता था जैसे गले में घाव है. कुछ भी खाने-पीने में, यहाँ तक कि सांस लेने में भी दर्द हो रहा था. मुझे गले की परेशानी अक्सर हो जाती है, लेकिन इतना कष्ट पहली बार हुआ. लग रहा था कि गाना-गुनगुनाना तो दूर, मैं अब ठीक से बोल भी नहीं पाऊँगी कभी. थोड़ी देर बात करने पर भी दर्द बढ़ जाता था और उस पर लेक्चर भी देने पड़ रहे थे.

जब एम्स में डॉक्टर को दिखाया, तो उन्होंने बताया कि गले में अल्सर हैं. डॉक्टर ने बताया कि इसका कारण एलर्जी भी हो सकती है और Acid Reflux भी. एलर्जी का तो पता था मुझे लेकिन एसिड रिफ्लक्स का मतलब समझ में नहीं आया. इंटरनेट खंगाला तो पता चला कि यह एक ऐसी स्थिति होती है जब पेट में भोजन को पचाने वाला एसिड किसी कारण से गले तक वापस चला आता है और गले में घाव पैदा कर देता है.

यह सब जानकर मेरा दिमाग घूम गया था. कैसी-कैसी समस्याएं पैदा होती रहती हैं शरीर में और उनके बारे में हम जान तभी पाते हैं, जब हम किसी बीमारी से ग्रस्त होते हैं. अगर मुझे एसिड रिफ्लक्स के बारे में पहले से ही पता होता तो मैं पहले ही एसिडिटी दूर करने वाली दवा खाने लगती. लेकिन हमारी जानकारी की एक सीमा होती है. हम हर चीज़ के बारे में पूरी जानकारी तो नहीं रख सकते ना. 

डॉक्टर ने मुझे एंटी-एसिड और एंटी-एलर्जिक दवाएं दीं, जिन्हें डेढ़ महीने तक खाने के बाद मेरा गला ठीक हुआ. अभी भी पूरी तरह से आराम नहीं है और दवा खानी पड़ जाती है. इस लम्बी बीमारी से एक नयी बीमारी के बारे में पता चला.

बीमारी

सुयश जॉगिंग करते हुए लगातार ऋचा के बारे में सोच रहा था. पिछले कुछ दिनों से वो बीमार सी दिख रही थी. हमेशा खिले-खिले चेहरे वाली तेज-तर्रार लड़की अचानक से निश्तेज लगने लगी थी. सुयश ने कई बार सोचा कि पूछे क्या बात है? उसे कोई परेशानी तो नहीं है, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया. जाने क्यों वो लड़की अपने आस-पास एक खोल बनाकर रखती है, जिसके अन्दर कोई प्रवेश नहीं पा सकता. वो कभी-कभी सोचता है कि इतना जिद्दी और खुद्दार भी नहीं होना चाहिए. अरे, अकेली रहती है, अपने पड़ोसी से कभी-कभार तो मदद माँग ही सकती है. लेकिन नहीं, बेकार का स्वाभिमान. अपना सारा काम अकेले करेगी. बीमार है, लेकिन मदद नहीं लेगी…सुयश को गुस्सा आने लगा था ‘जाने कुछ लड़कियाँ अपने-आप को क्या समझती हैं. उसके दोस्तों की गर्लफ्रेंड्स तो सारा काम करवा लेती हैं, पर ये लड़की किसी और ही मिट्टी की बनी हुयी है.’

2677419199_77bbabd9acवो दौड़ते-दौड़ते रुक गया. स्ट्रेचिंग करते हुए उसे ऋचा का फिर ध्यान आया. अगर वो उसकी जगह होता, तो क्या करता? एक अजनबी लड़के से मदद लेता? नहीं, वो भी नहीं लेता. लेकिन वो अजनबी कहाँ रहे अब? दो साल हो गए पड़ोसी बने हुए. कितनी बातें तो करती है, बेहिचक, बिंदास. हमेशा हँसकर मिलती है. पूरी बिल्डिंग में सभी तो उसे पसंद करते हैं. मिलनसार लड़की…बस कोई मदद नहीं लेती किसी से भी.
पर उसने भी तो कभी उससे पूछा नहीं. लेकिन पूछता भी कैसे? पुरुष अहंकार जो आ जाता है सामने. वो किसी से कम है क्या? फिर अगर ऋचा ने उसको ‘चीप टाइप’ का लड़का समझ लिया तो. एक बार सोसाइटी के गेट पर एक छोटे से एक्सीडेंट के बाद फोन नम्बर भी तो दिया था उसे. ज़ोर की मोच आयी थी लड़की को. लेकिन लड़की ने गलती से कभी एक मेसेज भी नहीं किया. हुँह, घमंडी कहीं की…

पर वो इतना सोच क्यों रहा है उसके बारे में? क्या वो भी सोचती होगी? बातें तो प्यार से करती है. हँसी-मज़ाक भी कर लेती है. इतनी बार चाय भी पी चुके हैं दोनों साथ, उसकी बालकनी में. उसकी मुस्कान कितनी प्यारी लगती है. पर उसने एक बार भी ऐसा कोई हिंट नहीं दिया, जिससे ये पता चले कि वो सुयश के बारे में सोचती क्या है?

दो दिनों से कितनी बेहाल लग रही है. ऑफिस जाते हुए और वापस आते हुए, रोज़ ही तो मिलती है. दोनों का ऑफिस टाइम एक ही है. नहीं सुयश का ऑफिस थोड़ी देर से होता है, लेकिन उसके साथ जाने के लिए वो थोड़ा पहले निकल जाता है. वो पसीना पोंछते हुए मुस्कुराया…आज तक किसी लड़की के लिए इतनी ज़हमत नहीं उठायी उसने. अब इस उम्र में टीनेज़र्स जैसा उत्साह रहता है रोज़ ऋचा का चेहरा देखने के लिए. लेकिन उसका चेहरा, इतना बेनूर क्यों दिख रहा है…आज तो ऑफिस भी नहीं गई. क्या हुआ है उसे?

सुयश बेचैन हो गया. उसे पूछना चाहिए कि ऋचा को किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है. ठीक है, इसलिए नहीं कि वो अच्छी लगती है, एक पड़ोसी के नाते सही…सुयश ने फोन की ओर हाथ बढ़ाया कि स्क्रीन पर एक अनजान नम्बर फ्लैश हो रहा था. “हैलो” “हाई, सुयश?” ये तो ऋचा की आवाज़ है. सुयश के पूरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गयी.

“हाँ, मैं सुयश. आप कौन?” उसने जानबूझकर अनजान बनते हुए पूछा.
“…म् मैं ऋचा”
“अरे ऋचा, क्या बात है?”
“सुयश, वो चार-पाँच दिन से मेरी तबीयत ठीक नहीं है”
“अरे, तुमने बताया क्यों नहीं. बोलो डॉक्टर के यहाँ चलना है क्या?”

“नहीं…डॉक्टर को मैंने दिखा दिया. डेंगू है शायद. बहुत वीकनेस लग रही है. तुम एक काम करोगे प्लीज़.”

“अरे, बिल्कुल, तुम बोलो तो.”
“एक दूध का पैकेट लेते आना ग्राउंड से आते समय. और ब्रेड का पैकेट भी. मैं तुमसे नहीं कहती…लेकि…”
“अरे, कोई बात नहीं. आखिर पड़ोसी हूँ तुम्हारा.”

“और प्लीज़, अपने कुक से मेरे लिए खिचड़ी बनवा देना…वो…”

“बिल्कुल…बिल्कुल. तुम चिन्ता मत करो. आकर मिलता हूँ तुमसे.”

“ठीक है…आ जाओ” ऋचा ने फोन रख दिया.

सुयश के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी. कोई बीमार है? भला कभी किसी की बीमारी से कोई इतना खुश हुआ करता है…भला हो डेंगू फैलाने वाले मच्छर का. सुयश मुस्कुराते हुए ग्राउंड से बाहर चल पड़ा- दूध का पैकेट लेने. उसके कान में ऋचा का बोला आख़िरी शब्द गूंज रहा था- “आ जाओ.”

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