आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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जंगल जलेबी, स्लेटी रुमाल, नकचढ़ी लड़की और पहाड़ी लड़का

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बचपन की कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनका मतलब उस समय समझ में नहीं आता है. जब हम बड़े हो जाते हैं, तब समझ में आता है कि अमुक काम को करने से, किसी विशेष व्यक्ति से मिलने से या किसी जगह जाने से क्यों रोका गया था? समझ ही कितनी होती है तब? ऐसे ही कुछ दोस्त होते हैं, जो उस समय हमारे दुश्मन लगते हैं, जबकि बाद में पता चलता है कि अगर वो न होते, तो कुछ घटनाओं का मतलब ही बदल जाता. और हमारे बचपन की यादें इतनी खुशनुमा न होतीं.

मैंने जब होश संभाला था, तो खुद को उन्नाव जिले की बाबूगंज रेलवे कालोनी में पाया था. उसके पहले की सारी यादें इतनी धुँधली हैं कि उन्हें मिलाकर एक अब्स्ट्रेक्ट ही बन पाता है. अम्मा-बाऊ की बतायी गयी बातों से ही उन्हें आपस में जोड़ पाती थी. तो अब वे भी नहीं हैं. उस कालोनी में जब हम आये तो मेरी उम्र लगभग पाँच साल रही होगी. और कालोनी में जो सबसे पहला दोस्त बना, वो मुझसे तीन-चार साल बड़ा था. यूँ तो उसका नाम राघवेन्द्र सिंह जलाल था, लेकिन उसके घर में सब उसे राकेश बुलाते थे. चार भाइयों और एक बहन में सबसे छोटा लड़का. उसके पिताजी आर.पी.एफ. में थे. कुमाउँनी थे वे लोग. पता नहीं कब उसके घर से मेरे घर का नाता बन गया और अम्मा उन सभी भाइयों को अपने बेटों जैसे मानने लगीं.

मेरी माता जी की एक विशेषता थी कि जब उनकी किरपा किसी पर बरसती थी, तो उसकी सीमा नहीं होती थी. राकेश पर अम्मा की विशेष कृपा थी. वो हम-दोनों भाई-बहनों से बड़ा और अम्मा की नज़रों में बहुत समझदार था, तो अम्मा ने उसे हमारा अभिभावक नियुक्त कर दिया. क्योंकि उन्हें लगता था कि कालोनी के और सारे लड़के एक नम्बर के गुंडे हैं और उनसे हमारी रक्षा उनके द्वारा नियुक्त सेनापति ही कर सकता था 🙂 वो हमदोनों की हर बदमाशी की खबर अम्मा तक पहुँचाता, अम्मा हमें डाँटती और मैं मन ही मन कुढ़ती रहती थी. अम्मा को पता था कि मैं एक नम्बर की ढीठ और नकचढी लड़की थी, इसलिए मेरे मामले में तो अम्मा मेरा पक्ष भी नहीं सुनती थीं. राकेश ने शिकायत की नहीं कि सीधे डाँट पड़ती (और कभी-कभी मार भी 😦 )

जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जा रही थी, राकेश की रोक-टोक और अम्मा की डाँट भी. उस कालोनी में दो फील्ड थीं, एक छोटी, जो रेलवे की सम्पत्ति थी और एक ठीक उसके बगल में खाली फील्ड, जो उस समय उन्नाव के सबसे बड़े मुहल्लों में से एक मोतीनगर से रेलवे कालोनी को अलग करती थी. राकेश मुझे बड़ी फील्ड में अकेले जाने से रोकता. हम आइस-पाइस खेलते, तो दो-तीन साल बड़े लड़कों के साथ छिपने से रोकता. एक बार जब मैंने उसकी बात नहीं मानीं, तो गुस्से में जाकर अम्मा से शिकायत कर दी. पता नहीं अम्मा के पास जाकर क्या खुसुर-फुसुर की कि अम्मा की बमबारी-गोलाबारी शुरू हो गयी- “कहा था तुमसे कि राकेश की बात माना करो, फिर क्यों उसके मना करने के बाद भी “उस लड़के” के साथ झाड़ी में छिपने गयी.” “तो क्या हुआ? ये कौन होता है मुझे मना करने वाला?” मेरे इतना कहने के साथ दो चांटे पड़े ‘तड़-तड़.’ मैंने रोना शुरू कर दिया. राकेश को भी मेरा मार खाना बुरा लगा. उसने कहा “जाने दो चाची, आगे से नहीं करेगी ऐसा” पर इससे क्या? वो मेरा पक्का दुश्मन बन गया.

इस सबके बावजूद राकेश के साथ रहना मजबूरी थी क्योंकि हमदोनों “बिगड़े हुए” भाई-बहन को बिना उसके साथ के, न खेलने की इजाज़त थी और न कहीं आने-जाने की. दीदी का स्कूल सुबह से शाम तक का होता था और अम्मा को घर के सारे काम करने होते थे. हमारा स्कूल ‘विवेकानंद’ रेलवे कालोनी के पीछे ही था और ग्यारह बजे हम प्राइमरी के बच्चे फ्री हो जाते. हम सारा दिन खेलते रहते. अम्मा हम पर नज़र नहीं रख सकती थीं, इसीलिये राकेश को कह रखा था इस काम के लिए और वो पूरी ईमानदारी से ये ज़िम्मेदारी निभाता था 🙂

मैं उससे कभी सीधे मुँह बात नहीं करती थी, उस समय के अलावा, जब वो हमारे लिए बाऊ की बनायी हुयी लग्गी से बड़ी फील्ड में लगे जंगल जलेबी और खजूर के पेड़ से फल तोड़ता था. जंगल जलेबी के विशालकाय पेड़ की निचली डालियों तक तो लग्गी पहुँच जाती थी, लेकिन ऊपर की डालों पर नहीं. एक दिन एक भी जंगल जलेबी न पाने से मेरा मुँह बन गया, तो राकेश पेड़ पर ही चढ़ गया. मुझे ये घटना पूरी तरह से याद नहीं क्योंकि उस समय मैं सिर्फ आठ या नौ साल की थी, लेकिन इतना याद है कि वो अपनी गंदी सी स्लेटी रुमाल में ऊपर से जंगल जलेबी के फल बाँधकर ले आया था. हम होली जलाने के लिए सूखी लकडियाँ काटकर ले आते, कभी-कभी उपले चुराते 🙂 वो एक काम और मेरी पसन्द का करता था. गर्मी की छुट्टियों में कैरम, लूडो और शतरंज खेलने के अलावा हमें कॉमिक्स पढ़ने का शौक चर्राया. वो पता नहीं कहाँ-कहाँ से प्रति चवन्नी एक दिन के किराए पर कॉमिक्स लेकर आता था और वापस भी वही करता था 🙂

एक-दो साल बाद बाऊ का ट्रांसफर उन्नाव के बगल में स्थित एक छोटे से स्टेशन मगरवारा हो गया. ट्रक में हमारे साथ चन्दन भैय्या भी गए हमें पहुँचाने. बाद में राकेश वहाँ भी आता था और कई बार ‘जंगल जलेबी’ भी लाता था क्योंकि मगरवारा में वो पेड़ नहीं था. कभी-कभी खुमानी वगैरह भी ले आता था, जो उसके गाँव से कोई लाया होता था. पर मुझे वो अच्छी नहीं लगती थी.

मैं बचपन में उससे इतना चिढ़ती थी कि कालोनी के कल्चर के विरुद्ध मैंने उसे राखी कभी नहीं बाँधी. जबकि उसके चन्दन भैया को बांधती थी. मुझसे चार साल बड़ा था, लेकिन मैंने उसे कभी ‘भैय्या’ नहीं कहा. मैं थोड़ी लंबी हो गयी तो वही मुझे चिढ़ाता था “गुड्डू, अब तो तू मुझसे बड़ी हो गयी. अब मैं तुझे ‘दीदी’ कहूँगा- गुड्डू दीदी” तब भी मैं बहुत गुस्सा होती थी- “तुम हमें दीदी कहोगे, तो सबलोग हमें तुमसे बड़ा समझने लगेंगे” और कौन लड़की बड़ी दिखना चाहती है भला 🙂

जब मैंने मगरवारा से उन्नाव ट्रेन से पढ़ने आना-जाना शुरू किया और भीड़ में अनचाहे स्पर्शों का सामना करना पड़ा, तब समझ में आया कि क्यों अम्मा और राकेश मुझे किशोरावस्था के लड़कों के साथ सुनसान जगहों पर जाने से मना करते थे? क्यों कुछ लड़कों के साथ खेलने पर इसलिए पाबंदी थी कि वे “गंदे लड़के” थे और ये बात राकेश अम्मा को बताता रहता था. तब ये भी समझ में आया कि क्यों एक बार एक लड़के के साथ घनी झाडियों में छिपने के कारण राकेश की शिकायत पर अम्मा से दो चांटे खाने पड़े थे और ये भी कि उसने अम्मा के पास जाकर खुसुर-फुसुर करके क्या बताया होगा?

आज मुझे लगता है कि दस-ग्यारह साल की उम्र तक मेरे साथ कोई अप्रिय घटना न होने का सबसे बड़ा कारण अम्मा की सतर्कता के साथ ही राकेश का होना भी था. मैं सोच नहीं सकती कि उसके बगैर मेरा बचपन कैसा होता? यूँ तो नकचढ़ी और ढीठ, लेकिन दुनियादारी की बातों से अनजान मैं निश्चिन्त होकर इसलिए खेल पायी क्योंकि राकेश मेरे साथ होता था. शायद वो नहीं होता, तो अम्मा मुझे बाहर खेलने ही न भेजतीं. डेली पैसेंजरी शुरू करते ही मैं इतनी समझदार हो गयी कि अपनी देखभाल खुद कर सकती थी. अम्मा वैसे भी बहुत सतर्क रहती थीं और मगरवारा की कालोनी भी बहुत छोटी थी. मैं खूब ऊधम मचाती लड़कों के साथ क्योंकि मुझे कभी उनके साथ असहज नहीं लगा. शायद एक अप्रिय घटना मेरी ये सहजता मुझसे छीन लेती.

राकेश और उसके घरवालों से हमारा सम्बन्ध बहुत बाद तक बना रहा. जब बाऊ के रिटायरमेंट के बाद हम गाँव शिफ्ट हुए, तब भी चन्दन भइय्या पहुँचाने गए थे और बाद में अक्सर हमारे गाँव आते रहते थे. हमलोग भी जब उन्नाव जाते थे, तो उनलोगों से मिलते थे. बाद में वो लोग भी नैनीताल शिफ्ट हो गए. केन्द्र सरकार की नौकरी करने वाले लोग जाने कहाँ-कहाँ से आकर मिलते हैं और फिर अपने-अपने देस चले जाते हैं. मेरे बचपन के साथी जाने कहाँ हैं? कुछ की तो बिल्कुल कोई खबर नहीं.

मैं लगभग ग्यारह-बारह साल से राकेश से नहीं मिली हूँ. अभी कुछ दिन पहले चन्दन भइय्या का फोन आया. शायद दीदी से मेरा फोन नम्बर लिया था. उन्होंने बताया कि उनकी अम्मा गुजर गयी हैं. उन्होंने शादी बना ली है (वो लोग ऐसे ही बोलते थे) और टीचर लग गए हैं नैनीताल जिले में ही. राकेश भी वहीं कहीं पढ़ा रहा है. मुझसे भईया ने पूछा “दीदी ने बताया तूने शादी नहीं बनायी. तुम्हारे लोगों को हुआ क्या है? कोई शादी ही नहीं बनाना चाहता. राकेश ने भी नहीं बनायी अब तक.”

काठगोदाम एक्सप्रेस से हल्द्वानी जाते वक्त रास्ते में लालकुआँ पड़ता है. वहीं के एक गाँव में मेरे दोस्त का घर है. उन लोगों ने पता भी दिया था, लेकिन वो घर पर छूटा है और सालों से घर ही नहीं गई. सोच रही हूँ, फिर से पता पूछकर कभी हो ही आऊँ.

बीते हुए दिन… फिर से नॉस्टेल्जिया

नॉस्टेल्जिया बड़ी अजीब सी चीज़ होती है। पता नहीं ये एक मानसिक स्थिति है या मानसिक विकार या बीमारी, लेकिन है अजीब। मुझे लगता है कि कुछ लोग प्रवृत्ति से ही अतीतजीवी होते हैं और ये उनकी बीमारी नहीं होती। या तो शौक होता है या फिर आदत या खुशफहमी कि वो दिन लौटकर आयेंगे, कभी न कभी। ये अलग बात है कि विस्मृति प्रकृति का वरदान है। यदि हमारे अन्दर भूलने की शक्ति न होती, तो हम अपनी ही यादों के बोझ तले घुट-घुटकर दम तोड़ देते या पागल हो जाते। भूलना ज़रूरी है, नई चीज़ें सीखने के लिए, लेकिन स्मृतियाँ भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होतीं।

कुछ लोगों के लिए यादों का अलग ही मतलब होता है। वे अतीतमोही होते हैं और यादों में ही खुशी ढूँढ़ते रहते हैं। कुछ लोगों को यादें आ-आकर सताती हैं, लेकिन अतीतजीवी लोग तो यादों में ही चले जाते हैं। उनकी ज़िंदगी में अतीत घुस जाता है, वे अतीत में ही रहना पसंद करते हैं। ये सब उलट-पुलट तब चलती है, जब आप खाली बैठे हों और उससे भी अधिक तब, जब आप बेहद उदास अकेले लेटे हों अपने कमरे में और आपके पास परिवार के नाम पर एक कुत्ते के सिवा कोई भी पास न हो…यूँ तो बहुत लोग साथ होने का दावा करते हैं। और जबकि आपका अतीत, वर्तमान से कहीं अधिक हरा-भरा, चहल-पहल वाला और सुनहरा हो। तब यादें बहुत कीमती लगती हैं और आप अक्सर किसी अपने की याद में डूबे रहना चाहते हैं।

दो-तीन दिन से मुझे भी किसी की बहुत याद आ रही है। अम्मा-बाऊ की याद तो साथ रहती ही है, लेकिन इस मौसम में बसंत चाचा की बहुत याद आती है। बसंत पंचमी को उनका जन्मदिन होता है, जैसे बाऊ का कृष्ण जन्माष्टमी को। बाऊ के दोस्त थे बसंत चाचा। हालांकि बाऊ से सात-आठ साल छोटे होने के कारण उनको दद्दू कहते थे, लेकिन दोस्ती बराबर की थी। अम्मा को अपनी माँ मानते थे और अक्सर बाऊ की शिकायत अम्मा से करके बाऊ को डँटवाया करते थे। उनकी बदमाशियों के बारे में मैंने एक पोस्ट भी लिखी थी।

हमलोगों के लिए वो किसी भी तरह अम्मा-बाऊ से कम नहीं थे। जब हम भाई-बहनों से सम्बन्धित किसी निर्णय में अम्मा-बाऊ का एक-एक वोट होता, तो हम चाचा का इंतज़ार करते और अक्सर उनका वोट हमारे पक्ष में होता। मुझे याद है, जब हमारा स्कूल टेबल टेनिस की जिला प्रतियोगिता में जीता था। मैं टी.टी. टीम की मुख्य खिलाड़ी थी और मुझे डिस्ट्रिक्ट की ओर से मंडलीय प्रतियोगिता में लखनऊ जाना था। मैं पहली बार मंडलीय प्रतियोगिता में भाग लेने की कल्पना मात्र से बहुत उत्साहित और प्रसन्न थी। फॉर्म पर अभिभावक के हस्ताक्षर चाहिए थे। अम्मा मुझे बाहर भेजने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थी। उनके अनुसार एक तेरह साल की लड़की को बिना माँ-बाप के कहीं नहीं जाना चाहिए। बाऊ की हाँ थी, लेकिन वो अम्मा के खिलाफ कभी नहीं जाते थे। उन्हें लगता था कि अम्मा उनसे ज्यादा समझती हैं, घर-परिवार के बारे में। मैं भी एक नंबर की ज़िद्दी। मेरा रोना-धोना चालू था कि दीदी ने इशारा किया चाचा को बुलाने का। मैं झट से स्टेशन गयी और रेलवे के फोन से चाचा को सन्देश भिजवा दिया। उन दिनों छोटे शहरों में घरों में फोन नहीं हुआ करते थे। रेलवे वाले स्टेशन के फोन से काम चला लिया करते थे। चाचा बगल के स्टेशन गंगाघाट में पोस्टेड थे और सन्देश मिलते ही ड्यूटी खत्म करके अगली गाड़ी से मगरवारा आ गए। उन्होंने अम्मा को बहुत समझाया कि ‘बिटिया अकेली नहीं होगी, तीन टीचर्स साथ जा रही हैं और दो चपरासी। फिर साथ में और लड़कियाँ भी तो होंगी।’ चाचा के आने से दीदी को भी साहस हुआ मेरी ओर से बोलने का और मुझे लखनऊ जाने की अनुमति मिल गयी।

ऐसे और ना जाने कितने ही किस्से हैं। जब उन्होंने अपना वोट हमलोगों के पक्ष में देकर हमारा हौसला बढ़ाया था। बाऊ के रिटायरमेंट के बाद हमलोग उन्हीं के क्वार्टर में एक साथ रहे। उनके तीन बेटे थे, जिनमें से एक गाँव में रहते थे और दो चाचा के साथ। चाचा के घर में बिताए दिन हमलोगों के लिए यादगार हैं। वैसे तो भईया लोगों का बचपन से हमारे घर में  आना-जाना लगा ही रहता था, लेकिन साथ रहने का अलग ही मज़ा था। पूरे घर में चार लड़के- दो चाचा के, एक हमारा भाई और एक हमारे चचेरे भाई, दो लड़कियाँ- मैं और दीदी और दो बाप- बाऊ और चाचा और माँ एक भी नहीं। पूरा हॉस्टल के जैसा माहौल होता था। भैय्या के दोस्त, दीदी के दोस्त और मेरी सहेलियाँ- दिन में कोई न कोई जमा ही रहता था। खूब पढ़ते थे। खूब टी.वी. देखते थे और ग्यारह बजे रात तक गप्पें भी मारते थे।

सबसे बड़ी बात, जो उस घर में थी वो ये थी कि दोनों बुजुर्गों को छोड़कर काम करने की ज़िम्मेदारी सभी पर बराबर थी। बुजुर्ग लोग बेचारे रात-दिन की ड्यूटी से ही हलकान रहते थे। मैं सफाई करती, दीदी खाने में सब्ज़ी बनातीं, तो भईया लोग बर्तन धोते और आटा गूँथते और रोटी सिंकवाते। एक दिन मेरे कज़िन और चाचा के मझले बेटे राजन भैया शायद आपस में बातें कर रहे थे या मैच देख रहे थे, याद नहीं, लेकिन दीदी बर्तन धो रही थीं। अचानक चाचा ड्यूटी से वापस घर आये। बिटिया को झौव्वा भर बर्तन माँजते देख आग-बबूला हो गए। भैय्या लोगों से बोले, “मुस्टंडों, तुम हट्टे-कट्टे बइठ के गप्पें मारि रह्यो और हमार बिटिया अकेले बर्तन मांज रही है। यही मारे तुम पंचन क खवा-पिया के इत्ता बड़ा कीन्हेंन  है।” भइय्या लोगन की तो सिट्टी-पिट्टी गुम। हडबड़ाकर उठे और “अरे दीदी बताईन ही नहीं” कहते हुए, दीदी को उठाकर झट से बर्तन धोने में जुट गए।

तो ऐसे थे हमारे बसंत चाचा। अभी अच्छी-अच्छी बातें लिख लीं, तो आगे लिखने का मन नहीं हो रहा है। आगे सारी दुःख भरी बातें हैं। हमारे उन्नाव छोड़कर आजमगढ़ अपने गाँव शिफ्ट होने की। इस बात से चाचा के डिप्रेशन में जाने की और फिर हमसे सदा के लिए बिछड़ जाने की। मुझसे नहीं कही जायेंगी वो बातें अभी। 2003 में चाचा भी हमें छोड़कर चले गए। उन्हें माउथ कैंसर हो गया था। इस गर्मी में उन्हें गए दस साल हो जायेंगे।

और अंत में ‘देवर’ फिल्म का ये गीत, जो मुझे उन दिनों की याद दिलाता है। रुलाता है, तड़पाता है, बेचैन करता है,  फिर भी बार-बार सुनती हूँ। कहा ना, किसी-किसी को अतीत में जीने की आदत होती है।

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