आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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घर और महानगर

घर

(१.)
शाम ढलते ही
पंछी लौटते हैं अपने नीड़
लोग अपने घरों को,
बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़
पर वो क्या करें ?
जिनके घर
हर साल ही बसते-उजड़ते हैं,
यमुना की बाढ़ के साथ.

(२.)
चाह है एक छोटे से घर की
जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो,
ताकि हवाएँ बेरोक-टोक
इधर से उधर आ-जा सकें.

*** *** ***

महानगर

(१.)
मन घबराता है,
समझ में नहीं आता कहाँ जायें ?
महानगर के आकाश में
चाँद भी साफ नहीं दिखता,
जिसे देखकर कोई
कविता लिखी जाये.

(२.)
छोटे शहरों में
छोटी-छोटी बातें भी
बड़ी हो जाती हैं
महानगरों में,
बड़ी बातों पर भी
ध्यान नहीं देता कोई.


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पिल्ला-कथा का अंत

कल रात मैं बिल्कुल नहीं सो पायी. मैं जिस पपी को अपनी गली से उठाकर ले आयी थी. वो हर एक घंटे बाद सू-सू करती थी और फिर कटोरी खटकाती थी, दूध माँगने के लिये. ये भूख भी इतनी कठोर होती है कि बच्चा और कुछ सीखे चाहे न, खाना माँगना ज़रूर सीख जाता है. तो रात भर मैं इस आगंतुक की सेवा-शुश्रूषा में लगी रही. दिन में थोड़ी देर आराम किया. और फिर निकल पड़ी उसकी माँ की खोज में. मैंने आधा मोहल्ला ढूँढ़ डाला, पर उसकी माँ नहीं मिली. कुछ मौसियाँ ज़रूर मिलीं, जिन्होंने उसे सूँघा और फिर मुँह फेर लिया. एक मौसी थोड़ी अच्छे दिल की थी, तो वो अपनी गली के नुक्क्ड़ तक हम दोनों को छोड़ने आयी.
मैं बहुत निराश हुयी. आखिर में एक चाय वाले ने मेरी हालत पर दया करके कहा कि आप इसे यहीं छोड़ दो, हम पाल लेंगे. आपको लग रहा होगा कि ये चाय वाला कहाँ से टपक पड़ा? तो साहब ये मेरी खुशकिस्मती है कि मैं महानगर के ऐसे कोने पर रहती हूँ, जहाँ का माहौल पूरी तरह तो नहीं, लेकिन काफ़ी कुछ कस्बों जैसा है.
मैं उत्तरी दिल्ली के गाँधी विहार नाम के मोहल्ले में रहती हूँ, जो अनेक छोटे-छोटे प्लाटों में बँटा हुआ है. यह पूरा क्षेत्र एक विशेष कारण से बहुत महत्त्वपूर्ण है कि यहाँ सिविल सर्विसेज़ की तैयारी करने वाले काफ़ी संख्या में रहते हैं. इन लोगों के कारण यहाँ हर नुक्कड़ पर चाय-नाश्ते और खाने की दुकानें हैं. गाँधी विहार के पीछे “धीरपुर विलेज ग्रीन प्रोजेक्ट” के नाम पर काफ़ी लम्बा-चौड़ा मैदान छूटा हुआ है, जिसके किनारे सड़क बनी हुई है. इस सड़क और मोहल्ले के बीच में भी दो-तीन चाय की दुकानें हैं. उन्ही में से एक चाय वाले ने मेरी मुश्किल हल कर दी.
आज रात को मैं चैन से सो सकूँगी. पर कहाँ?? मुझे अब उसकी याद आ रही है. मैं अगर ग्राउंड फ़्लोर पर होती तो निश्चित ही पाल लेती उसे. पता नहीं क्यों ? वो अपनी काली-काली आँखों से मुझे बड़ी ध्यान से देखती थी. जितनी देर मैं उसके आस-पास होती…वो आराम से सोती. मेरे इधर-उधर होते ही कूँ-कूँ करने लगती.  कल उसने परेशान किया और आज उसकी याद परेशान कर रही है.

ये बेचारे कहाँ जायें???

आज मैं सो नहीं पा रही हूँ. सोचा था कि जल्दी सो जाऊँगी. इधर रोज़ ही तीन-चार बज जाते हैं. पर क्या करूँ?… बात ही ऐसी है. जब आपको मेरे जागने का कारण पता चलेगा तो आप मुझे या तो परले दर्ज़े की बेवकूफ़ समझेंगे या फिर पागल. हुआ यह कि लगभग एक बजे मैं कुछ ब्लॉग पढ़ रही थी, तभी मेरी गली में किसी पिल्ले की कूँ-कूँ सुनाई दी. पिल्ले मेरी कमज़ोरी हैं. मैं उन्हें बिल्कुल परेशान नहीं देख सकती. मुझे ये तो लगा कि ये मेरे ब्लॉक का नहीं हो सकता, क्योंकि मेरी गली में बस एक फ़ीमेल डॉग है ( कुतिया कहने में अटपटा लगता है) और वो जब पपीज़ देती है, तो मुझे पता लग जाता है. लगता है कोई बच्चा किसी और ब्लॉक से उठा लाया होगा और घर से डाँट खाने के बाद यूँ ही छोड़ दिया होगा.
पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब आवाज़ लगातार आती रही तो मैंने बालकनी से नीचे झाँका. एक पिल्ला बेचारा ठंड से बचने के लिये आश्रय ढूँढ़ रहा था. कभी किसी स्कूटर के नीचे जाकर छिपने की कोशिश करता तो कभी किसी घर के दरवाजे पर कुछ देर रुकता. मुझसे रहा नहीं गया. मैंने अपने कमरे में ताला बंद किया और पहुँच गयी उसके पास. उस समय रात के सवा दो बज रहे थे. मैं जब तिमंज़िले से नीचे उतरी, तो ग्राउंड फ़्लोर के लड़के कॉलसेंटर के अपने काम से लौटे ही थे. उन्होंने अचरज़ से मुझे देखा. पर पूछा कुछ नहीं. उनको पता है कि मैं कभी भी कुछ भी कर सकती हूँ.
तो…मैं पिल्ले को उठा लायी. उसके पंजे बर्फ़ जैसे ठंडे थे. कमरे में आकर मैंने हीटर जलाया. उसके पंजे सेंके. उसे कटोरी में दूध दिया. वो गटगट करके आधी कटोरी दूध पी गया…ओ माफ़ कीजियेगा, पी गयी, क्योंकि वो एक मादा है. फिर मैंने एक पुराने टूटे हुए टब में गुनगुने करके कुछ कपड़े रखे और उसको रखा. वो तुरंत सो गयी. मैं भी आकर बिस्तर पर लेटी. अभी वो बहुत छोटी पपी है, तो थोड़ी-थोड़ी देर बाद गूँ-गूँ करके… अपनी माँ को याद करने लगती है. मेरी नींद बहुत कच्ची है, इसलिये मैं उसकी इन आवाज़ों के कारण सो नहीं पा रही हूँ और रात के पौने चार बजे लिख रही हूँ. अभी वो शांत है और मुझे ये चिंता लग गयी है कि मैं उसको कल कहाँ छोड़ुँगी? महानगर के लोग देसी पिल्ले पालते नहीं. कुत्ते, जो पहले घरों में यूँ ही पल जाया करते थे, अब स्टेटस सिंबल बन गये हैं. अब बताइये… ये देसी कुत्ते कहाँ जायें? कुत्ते प्राचीनकाल से ही मनुष्य के साथी रहे हैं. गाँव-कस्बों के गली-मोहल्लों में तो इनके रहने की गुँजाइश अभी बची हुयी है, पर महानगरों में…?
फिर खटर-पटर हो रही है. उफ़…ये तो टब चबा रही है.

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