आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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दीवाने लोग

दीवाने लोग पड़ ही जाते हैं अक्सर किसी न किसी के प्यार में
अफ़सोस ये कि जिससे प्यार है, उसे पता ही नहीं,
जाने क्या मिलता है और जाने क्या खो जाता है,
रात आती है, मगर नींद गुमशुदा है कहीं,
जागकर लिखते हैं कुछ-कुछ डायरी में दीवाने
दूसरे ही पल काटकर उसे, लिखते हैं फिर मिटाते हैं
बंद कर डायरी या फिर, लेट जाते हैं मुँह ढँककर
देखते हैं अँधेरे में कभी एकटक सामने की दीवार,

कट जाती है यूँ ही हर रात नींद के इंतज़ार में
दीवाने लोग जब भी पड़ जाते हैं किसी के प्यार में।
*** ***

3341375526_a6d60049d5काश कोई लौटा पाता वो पल, जब देखा था पहली बार तुम्हें
कि चीज़ें सभी उलट-पुलट हो गयीं है तभी से
रातें रतजगा कराने लगीं, दिनों पर पड़ गया मनों बोझ,
कुछ और आता नहीं दिमाग में तुम्हारे सिवा
मासूम छलिये,
ये तुमने क्या किया अनजाने में?
या कि जानबूझकर ?
नहीं तो नज़रें चुराकर देखते क्यों रहे बार-बार
और नज़र मिलने पर यूँ देखा दूसरी ओर, ज्यों कुछ हुआ ही नहीं,
तुम्हारी हर नज़र धंस गयी है सीने में काँटों की तरह
अब वहाँ अनगिनत काँटे हैं और असह्य चुभन

नहीं सोचा था उम्र के इस मोड़ पर भी हुआ करता है दीवानों सा प्यार
काश कोई लौटा पाता वो पल, जब देखा था तुम्हें पहली बार।
*** *** ***
जानती हूँ तुम्हारी कविताओं में मेरा ज़िक्र नहीं होता
जाने क्यों ढूँढती फिरती हूँ उन शब्दों में अपनी गुंजाइश,

मासूम छलिये, ये तुम अच्छा नहीं करते
कि प्यार से भरे शब्द यूँ उछाल देते हो अपने दीवानों में
ज्यों कोई शादी में उछाल देता है गरीबों में सिक्के,
गरीब टूट पड़ते हैं सिक्कों पर, दीवाने शब्दों पर
कि शब्द कीमती हैं उनके लिए सिक्कों की तरह,
वो ढूँढते हैं उनमें अपने होने का अर्थ-
कहीं कोई ज़िक्र, कोई हल्का सा इशारा कि तुमने याद किया
भूले से भी कौंधा तुम्हारे ज़ेहन में उनका नाम कभी,
दीवाने ढूँढते हैं और निकाल ही लेते हैं कोई अर्थ अपने मतलब का,

मासूम छलिये,
यूँ अपने दीवानों का तमाशा बनाना अच्छा है क्या?

कि तू प्यार में है

सुना था कि इश्क सिर्फ एक बार हुआ करता है या कि पहला प्यार भुलाए नहीं भूलता या फिर पहले प्यार सी गर्मी फिर कभी नहीं आ पाती…झूठ है सब,परले दर्जे का झूठ…”ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं।” प्यार एक नहीं, हज़ार बार हो सकता है। पहले प्यार को छोड़कर या पहले प्यार के रहते, दूसरा, तीसरा, चौथा प्यार हो सकता है। अलग-अलग समय में अलग-अलग से या एक ही आदमी से कई-कई बार हो सकता है। जुनूनी प्यार, रूहानी प्यार, रूमानी प्यार। प्यार रंगों से हो सकता है, ब्रश से, कैनवस से, कलम से और कागज़ से हो सकता है। अपनी नोटबुक से हो सकता है। प्यार चित्रों से हो सकता है, किताबों से हो सकता है।  प्यार लिखने से हो सकता है। यूँ ही नहीं हम चार दिनों से जाग रहे हैं। जीना मुहाल हुआ है। रात के ढाई बजे हैं, रेडियो पर गाना बज रहा है- ‘तूने तो पल भर में चोरी किया रे जिया,’ बाहर बारिश हो रही है, गैस पर चाय चढ़ी है, उँगलियाँ की-बोर्ड पर और हमारी आँखों में नींद नहीं…

(ठीक है तुम्हारे पास सुकून होगा। सोये होगे तुम आराम से नर्म बिस्तर पर, लेकिन मेरे जैसी आज़ादी है क्या तुम्हारे पास?)

सच कहता है कोई कि ‘तुम एकदम पागल हो, तुम्हें कोई भी बेवकूफ बना सकता है। बड़ी सयानी बनी फिरती हो।’ ये तो नहीं पता कि मैं पागल हूँ या नहीं, लेकिन मेरे दिल में ख़याल बड़े अजीब-अजीब से आते हैं, बड़ी अटपटी सी इच्छाएँ होती हैं। कई बार सोचा कि तीज का चाँद लाकर अपने कमरे में सजा लूँ। कई बार मन होता है- झरने के साथ पहाड़ी के ऊपर से नीचे गिरने का, बादलों के साथ बरसकर धरती को भिगो देने का, नदी के साथ बह जाने का, जंगल में अकेले भटकने का, पराग्लाइडर से घाटियों के ऊपर-ऊपर उड़ने का। एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ जाने की इच्छा होती है। रेगिस्तान के समंदर में डूब जाने को जी करता है। अतीत में जाकर अपने मनपसंद गायक को चूम लेने का मन होता है…भक् पागल लड़की!

(दीवानी होती हैं ऐसी लड़कियाँ…इनसे बचकर रहना चाहिए…ये वायरस की तरह खतरनाक हैं समाज के लिए…)

एक फूल है। सुन्दर सा, प्यारा सा, लेकिन वर्जित। उसे सूँघना मना है। देखना मना है। उसके आस-पास होने तक पर निषेधाज्ञा लागू है। मन में हुलस तो बड़ी थी उसे छूने की, अपना बना लेने की, लेकिन डर भी था। बहुत सोचा कि उसे न देखा जाय। उस बगीचे से ही न गुजरें, जिसमें वो फूल खिला हो। लाख रोका अपने दिल को। आँखें बंद कर लीं। दोनों हाथों की मुट्ठियाँ कसकर बाँधकर भींच लीं। सोचा था ऐसे ही गुज़र जायेंगे वो पल। लेकिन नहीं, ठीक उस बगीचे के बगल में  पहुँचने पर किसी ने आवाज़ दी और आँख खुल गयी। सामने वो फूल था। उसके रंग और खुशबू मन में समा गए…जी पर एक सम्मोहन… और मैं उसमें डूबती जा रही हूँ। रात-रात भर उसका ख़याल परेशान करता है…एकाध बार सोचा कि चिल्लाकर सबको बता दूँ उसका नाम…जाहिर कर दूँ कि इस छलावे के आसपास भी मत फटकना। ये तुम्हें अपने जादू से सम्मोहित करके छोड़ देगा। पलटकर देखेगा भी नहीं तुमको। लड़ते रहना तुम उसके रंग और खुशबू की यादों से…। पर किसी और को कुँए में धकेलना अच्छी बात है क्या? या शैतानी में ये भी किया जा सकता है। किसी का चैन और सुकून देखते न बनता हो, तो बददुआ दे दो उसे ‘जा तुझे प्यार हो जाय और वो भी किसी ऐसे से, जिसे तू पा न सके। तुझे चंदा से लगन लग जाय या आवारा बादलों से नेह लगा बैठे। दूर-दूर से देखकर तड़पे। पास भी पहुँच ना पाये।’

(निषिद्ध की आकांक्षा रचनाधर्मिता के लिए ऊर्जास्रोत है…ये शाप नहीं वरदान है मूरख!)

‘किस दुनिया में जी रही है तू लड़की। ये सब भरम है भरम।’ मेरा दिमाग बहुत बोलता है। लड़ता रहता है दिल से हर वक्त। पर जीतता दिल है। बोला दिमाग से- ‘क्या हुआ जो प्यार एक भ्रम है। यूँ तो ज़िंदगी भी एक छलावा है। यूँ तो दुनिया भी फानी है। शरीर नश्वर। जब सब मिट ही जाना है एक दिन, तो जी क्यों न लें इस पल को, जब एक नशा सा छाया है। वासंती मौसम में प्यार की बौछार हो रही है। होने दो। इसमें भीग जाने दो। जुकाम के डर से बारिश की खुशबू से मत भागो। जश्न मनाओ ज़िंदगी का रोज़-रोज़…ओ व्यापारियों, बहीखातों से ऊपर सिर उठाओ। कुँए के मेंढकों, बाहर निकलो, बहती नदियों में छलाँग लगाओ।’

(लगता है आज की रात फिर नींद नहीं आयेगी। ठीक है। ना आये। हम रात को जाने ही न देंगे। हम सुबह ही न होने देंगे।)

हम रतजगा करेंगे इंशा के साथ, मजाज़ के साथ। इंशा, इंशा, इंशा-

और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का|
सुबह का होना दूभर कर दें रस्ता रोक सितारों का|

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हमने बादल फैला दिए हैं आसमान पर। सितारों का रास्ता रोक दिया है। कौन कहता है कि असर सिर्फ पहले प्यार में होता है? जश्न मना लड़की कि तू प्यार में है।

(ये गाना ‘नींद लूटने वाले’ के लिए)

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