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'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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नारीवादी स्त्री प्रेम नहीं करती?

फेसबुक बड़ी मज़ेदार जगह है. यहाँ गंभीर विमर्श के लिए भले ही अपेक्षित स्थान न हो, लेकिन उसके लिए सामग्री अवश्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।  यह पोस्ट फेसबुक पर मेरे एक स्टेटस और उस पर आये एक कमेन्ट से सम्बन्धित है।

परसों मैंने एक बात लिखी प्रेम और आकर्षण के बारे में- “कभी-कभी प्रेम और आकर्षण में अंतर कर पाना बहुत कठिन होता है। समय बीतने के साथ इनका अंतर पता चलता है। आकर्षण, एक निश्चित समयावधि के बाद घटता जाता है और प्रेम…समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।” इस स्टेटस पर कमेन्ट करते हुए एक फेसबुक मित्र सुनील जी ने कहा ‘औरत मर्द से दूर इंसानियत की भाषा में बात करने के लिए धन्यवाद!’ उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मैं अक्सर औरतों से जुड़े मुद्दे उठाती रहती हूँ और नारीवादी के रूप में जानी जाती हूँ। और लोगों को ये भ्रम होता है कि नारीवादी स्त्रियाँ पुरुषों से नफ़रत करती हैं, इसलिए प्रेम के बारे में सोचती ही नहीं हैं, प्रेम करना तो दूर की बात। कल रात में सोते समय इस बात की याद आ गयी। और अचानक से बहुत से विचार उमड़-घुमड़ मचाने लगे।

मैंने सोचा कि कि नारीवादी या आधुनिक खुले विचारों वाली औरतों को लोग प्रेम विरोधी क्यों समझ लेते हैं? उनके मन में प्रेम का कैसा स्वरूप होता है, जिसे सिर्फ परम्परागत ढंग से सोचने वाली स्त्रियों के साथ ही जोड़ा जा सकता है, आधुनिक स्त्रियों के साथ नहीं? शायद वो ये सोचते हैं कि चूँकि आधुनिक औरतें किसी तरह की गुलामी बर्दाश्त नहीं करतीं, इसीलिये उन्हें प्रेम में बंधना भी पसंद नहीं। जबकि उनका ये सोचना सिरे से गलत है।

इस विषय में सोचते-सोचते मुझे ‘स्त्री मुक्ति संगठन’ की साथी पद्मा दी का एक वक्तव्य याद आया कि ‘प्रेम, दो स्वतन्त्र व्यक्तित्व वालों में ही संभव है।’ दो ऐसे लोग, जो एक-दूसरे पर किसी मजबूरी के तहत निर्भर न हों। यहाँ यह बात समझनी चाहिए कि प्रेम में जो अंतर्निर्भरता होती है, वह मजबूरन थोपी गयी नहीं होती। वह स्वतः उपजती है और उसका कारण प्रेम के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।

इसी प्रसंग में बहुत पहले एम.ए. की कक्षा में हमारी काव्यशास्त्र की प्राध्यापिका का एक व्याख्यान याद आया, जिसमें उन्होंने रामायण की रचना के विषय में लोकख्यात श्लोक का उद्धरण दिया था। वह श्लोक है-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम् ।।

(हे निषाद, तुम अनंत वर्षों तक प्रतिष्ठा प्राप्त न कर सको, क्योंकि तुमने क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से कामभावना से ग्रस्त एक का वध कर डाला है।)

इस श्लोक और इससे जुड़ी किंवदंती के विषय में प्रायः सभी सुधीजन जानते होंगे। महर्षि वाल्मीकि वन में भ्रमण कर रहे होते हैं कि उनकी दृष्टि रतिक्रिया में लिप्त क्रौंच पक्षी के जोड़े पर पड़ती है। अगले ही पल उनमें से एक बहेलिये के तीर से घायल होकर भूमि पर गिरकर मर जाता है। दूसरा पक्षी बेचैन होकर इस डाल से उस डाल घूम-घूमकर चीत्कार करने लगता है। यह ह्रदयविदारक दृश्य देखकर ही शोकाकुल महर्षि वाल्मीकि के मुख से उक्त श्लोक निकल पड़ता है। इस श्लोक को काव्य का प्रारम्भिक श्लोक माना जाता है। इसके पहले भी बहुत कुछ लिखा जा चुका था, लेकिन किसी दूसरे की भावनाओं को स्वयं अनुभूत कर स्वतः फूट पड़े ये शब्द ही कविता माने गए। संस्कृत काव्यशास्त्र के अनुसार ‘रसमय वाक्य ही काव्य है।’ और दूसरों के भावों को कविता पढ़ते समय स्वयं अनुभव करना ही रस है।

अब प्रश्न यह कि मैंने यह प्रसंग यहाँ क्यों प्रस्तुत किया? बात ये है कि यह तो सभी लोग जानते हैं कि क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक की मृत्यु पर दूसरे के शोक से यह श्लोक फूटा. पर ये किसी को नहीं मालूम कि मरने वाला पक्षी नर था या मादा थी। हमारी प्राध्यापिका यही बात समझा रही थीं कि प्रायः लोग मानते हैं कि मरने वाला नर था, लेकिन उनके अनुसार मादा थी। वो इसलिए कि नर की मृत्यु पर मादा के विलाप में विरह की वह पीड़ा नहीं होगी, जो  नर के विलाप में होगी। उन्होंने इसे सीधे स्त्री-पुरुष के प्रेम से जोड़ा। उनके अनुसार एक स्त्री भी अपने पति को उतना ही प्रेम करती है, जितना कि पुरुष, लेकिन अपने पति या प्रेमी की मृत्यु पर उसके शोक में प्रेम के बिछड़ने के साथ ही साथ और भी बहुत सी आशंकाएँ होती हैं। वो यह सोचती है कि अब इतने बड़े संसार में वह अकेली कैसे रहेगी? उसके बच्चों का और उसका पालन-पोषण कैसे होगा? अब उसे शेष जीवन वैधव्य में बिताना पड़ेगा आदि-आदि।

इसके विपरीत यदि किसी पुरुष की प्रेमिका या पत्नी की मृत्यु होती है, तो उसके विरह में ‘सिर्फ प्रेम’ होगा और कोई भावना नहीं क्योंकि वह आर्थिक या सामाजिक रूप से प्रेमिका या पत्नी पर आश्रित नहीं होता। वह सिर्फ अपनी पत्नी के विरह में व्याकुल होगा। विरह की तीव्र अनुभूति जितनी यहाँ होगी, उतनी वहाँ नहीं. यहाँ यह भी स्पष्ट है कि यहाँ ‘विरह’ की बात हो रही है ‘शोक’ की नहीं। पत्नी का दुःख ‘शोक’ होगा क्योंकि उसमें प्रेम के अतिरिक्त अन्य भाव सम्मिलित होंगे, लेकिन पति का दुःख ‘विरह’ होगा।

आपको ये स्थापना बेतुकी लग सकती है। कुछ-कुछ मुझे भी लगती है। लेकिन जब इसे हम ऊपर पद्मा दी की बात से और हमारे मौजूदा सामाजिक ढाँचे से जोड़कर देखते हैं, तो बात को समझने का नया आयाम मिलता है। हमारे समाज में लड़कियों  को ‘आत्मनिर्भर’ नहीं बनाया जाता। मैंने दिल्ली में ऐसी लड़कियों से बात की है, जो ब्वॉयफ्रेंड, प्रेमी या पति चाहती हैं, तो अच्छी जॉब और अच्छे-खासे बैंक-बैलेंस वाला, जिससे वह उनके सारे खर्चे उठा सके। साथ ही इतना लंबा-तगड़ा भी कि उनकी रक्षा कर सके और मज़े की बात ये कि उन्हें अपनी इस सोच के लिए कोई ‘गिल्ट’ भी नहीं होता। ऐसा लगता है कि उन्हें पति या प्रेमी नहीं, ए.टी.एम. या चौकीदार चाहिए। ये बात अलग है कि सारी लड़कियाँ ऐसा नहीं सोचतीं, लेकिन अधिकांश लड़कियों की सोच ऐसी ही है।

लेकिन इसमें लड़कियों की कोई गलती नहीं है. गलती उनके पालन-पोषण के ढंग में है, समाज की मानसिकता में है। क्यों नहीं हम अपनी लड़कियों को इतना आत्मनिर्भर बनाते कि वह अपना खर्च खुद उठा सकें, अपनी रक्षा खुद कर सकें। क्यों उन्हें ये सारी अपेक्षाएँ अपने प्रेमी या पति से करनी पड़ें?

बस यहीं पर मैं अपने मूल विषय पर आ जाती हूँ. एक आज़ाद या जिसे आप नारीवादी कहते हैं, वह औरत यदि किसी से प्रेम करती है तो सिर्फ इसलिए कि वह उसे अच्छा लगता है, उसके साथ समय बिताना अच्छा लगता है, …न कि इस कारण कि वह खर्चे उठा रहा है या सहारा और सुरक्षा दे रहा है। ठीक यहीं पर पद्मा दी की कही हुयी ये बात सटीक बैठती है कि प्रेम दो स्वतन्त्र व्यक्तित्वों में ही संभव है। एक-दूसरे पर निर्भरता यहाँ भी होती है, लेकिन किसी मजबूरी या एहसान के कारण नहीं, प्रेम के कारण।

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दर्दे-ए-हिज्र बेहतर है फिर तो तेरे पास होने से

मुझे तारीखें याद नहीं रहतीं. पिछली दफा तुम किस तारीख को आये, कब गए, अगली बार कब आओगे, कुछ भी नहीं. मैं कैलेण्डर के पन्ने नहीं पलटती, जिससे तुम्हारे जाने का दिन याद रहे… और जब तुम आते हो, तो अपने हाथों से नयी तारीख लगाते हो.

तुम्हारे जाने से ज़िंदगी ठहर सी जाती है. यूँ लगता है कोई हलचल ही नहीं. ना सुबह उठने की जल्दी, ना कोई काम करने का मन. बस पड़े रहने का जी करता है, जिससे ठहरी हुयी ज़िंदगी से तालमेल बिठाया जा सके.

तुम्हारे आने के ठीक पहले परदे धो दिए जाते हैं, चादरें बदल दी जाती हैं, घर के सामानों पर पड़ी धूल पोछकर साफ़ कर दी जाती है, गुलदान में नए फूल लगा दिए जाते हैं.  बस, तारीख नहीं बदली जाती, क्योंकि उसका रुके रहना या बदलना तुम तय करते हो.

और फिर…

तुम्हारे आने पर महक उठते हैं मुरझाए हुए फूल, उनके रंग चटख हो उठते हैं, पत्ते अधिक हरे हो जाते हैं, खिड़की के बाहर का आसमान गहरा नीला हो जाता है. पर… मैं ये सब नहीं देखना चाहती. मैं तुम्हारे होने को किसी और से बाँटना नहीं चाहती. फिर गहरा सन्नाटा. सुकून देता हुआ. बहुत देर तक…

‘कब जाना है?’

‘परसों’

…सुनकर लगा ज्यों दिल ने अपनी जगह छोड़ दी हो, पर काम दोगुना कर दिया. अब धडकन गले में सुनायी दे रही है और भी तेज…आँखें दो दिन बाद की घटनाएँ देखने लग जाती हैं. कान बीस डेसीबल से भी कम की आवाज सुन सकते हैं.  सन्नाटा और भी गहरा हो जाता है, पर सुकून नहीं देता. बेचैन कर देता है.

अड़तालीस घंटे अभी बाकी हैं. पर खर्चूं कैसे ? हिसाब जो नहीं आता. मुझे मालूम है मैं खर्चीली इन्हें यूँ ही गँवा दूँगी. हमारे दिल की धडकनें कुछ सोचने भी तो नहीं देतीं…

अजीब सी स्थिति है. इसे समझना मुश्किल है. गणित के सवाल हल करने से भी ज्यादा.  मुझे खुद नहीं मालूम कि मेरी हालत कैसी हो गयी?

…पता है …?

इस समय मैं दुखी नहीं हूँ. बिल्कुल नहीं. क्योंकि तुम पास हो,  लेकिन …

तुम्हें जाना है… इसलिए मैं खुश भी नहीं…

मैं प्यासी

जब घुमड़ घिरी घनघोर घटा

रह-रहके दामिनी चमक उठी,
उपवन में नाच उठे मयूर
सौंधी मिट्टी की महक बिखरी,
बूँदें बरसीं रिमझिम-रिमझिम
सूखी धरती की प्यास बुझी,
पर मैं बिरहन प्यासी ही रही…
… … …
ये प्रकृति का भरा-पूरा प्याला
हर समय छलकता रहता है,
ऋतुओं के आने-जाने का
क्रम निशदिन चलता रहता है,
सारे के सारे तृप्त हुए
प्याले के अमृतरस को पी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
वो मिलन अधूरा मिलन रहा
वो रात अधूरी रात रही,
कुछ भी ना, कहा कुछ भी ना सुना
वो बात अधूरी बात रही,
वो मुझसे कुछ कहते शायद
मैं तो सुध-बुध थी खो बैठी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
ये कैसी ठंडी आग है जो
तन-मन में जलती रहती है,
ना मुझे समझ में आती है
ना किसी से कहते बनती है,
जब-जब भी बुझाना चाहा है
ये और बढ़ी,मैं और जली,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
रातों में बंद पलकों से
ये यूँ ही रिसते रहते हैं,
मैं जानना चाहती हूँ लेकिन
जाने आँसू क्या कहते हैं,
इनके यूँ बहते रहने से
मौसम भीगा, मैं भी भीगी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
जलने की चाह रहे यूँ ही
ये प्यास, प्यास ही बनी रहे,
उनसे मिलकर ना मिलने की
ये आस, आस ही बनी रहे,
अपने अंतस की पीड़ा को
मन ही मन में, मैं सहती रहूँ,
मैं तो बस यही चाहती हूँ
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रहूँ… …

फिर एक इंतज़ार

तुम क्यों आते हो??
तुम्हारे आने के साथ
आता है डर
तुम्हारे जाने का,
मैं भी  कितनी पागल हूँ…
कि तुम्हारे आने से पहले
तकती हूँ राह तुम्हारी,
और करती हूँ
घण्टों इंतज़ार…
और तुम्हारे आने के बाद
हो जाती हूँ उदास
कि कुछ देर रहकर साथ
लौट जाओगे तुम,
पीछे छोड़ जाओगे
उदासी, सूनापन
और फिर
एक लंबा इंतज़ार… …

 

 

तुम्हारा जाना

फूल सभी मुरझा गये
सूरज बुझ गया
चिड़िया गूँगी हो गयी,
सन्नाटा फैल गया
सब ओर…
दिशायें सूनी हो गयीं,
रंगो से भरा ये संसार
कब हो गया फीका-सा
मुझे धुँधली सी भी नहीं याद,
कि देखी हैं कब बहारें मैंने
तुम्हारे जाने के बाद.
…….
तुम्हारे आने से
फैल जाती थी
हवाओं में महक,
और गुनगुना उठती थीं
पेड़ों की पत्तियाँ,
लगता था सारा संसार
अपना-अपना सा,
जगता था
अपने अस्तित्व की
पूर्णता का एहसास,
आज अधूरी हो गयी हूँ मैं
तुम्हारे जाने के बाद.

मेरे जीवन में भी काश

मेरे जीवन में भी काश
एक बार आता मधुमास

कामदेव का बाण मुझे भी लग जाता
मुझको भी हो जाती
पिया मिलन की आस
मेरे जीवन में…

रिक्त हृदय का प्याला
भर जाता मधु से
मिट जाती मेरे भी
हृदय के प्रेम की प्यास
मेरे जीवन में…

विरह-अग्नि में मैं भी जलती
धीरे-धीरे
प्रेम आग है
मुझको भी होता विश्वास

मेरे जीवन में भी काश
एक बार आता मधुमास.

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