आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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अवसाद-२ (साँझ की धूप)

धान के खेतों पर
दूर तक फैली,
थकी, निढाल पीली-पीली
साँझ की धूप,
आ जाती है खिड़की से
मेरे कमरे में,
और भर देती है उसे
रक्ताभ पीले रंग से,
… …
इस उदास पीले रंग की
अलौकिक आभा से
मिल जाता है
मेरे उदास मन का पीला रंग,
और चल देता है
मेरा मन
साँझ की धूप के सहारे
एक अनन्त यात्रा की ओर,
यह निर्जन स्थान
शायद सूरज है या
आकाश का दूसरा छोर,
जहाँ चारों ओर
प्रकाश ही प्रकाश है…
स्वर्णिम पीला प्रकाश,
… …
मैं आँखे खोलती हूँ
और पाती हूँ अपने आपको
अपने कमरे में
जहाँ अब…
अंधेरा फैल चुका होता है,
अपना चेहरा देखती हूँ
आईने में,
मेरी आँखें उदास और थकी हैं,
उनमें पीलापन है
शायद… …
साँझ की धूप का पीलापन…

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