आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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अपने अपने दुःख

मैं और शीतल रोज़ रात में खाने के बाद मुहल्ले के पीछे जुगनू गोली को टहलाने निकलते हैं। वहाँ लगभग रोज़ एक बुजुर्ग सरदार जी टहलते दिखते हैं।

कुछ दिनों से हमारा शगल था उनके बारे में अनुमान लगाने का। उनको फोन पर बात करते देख मैं कहती कि परिवार से छिपकर घर से बाहर अकेले टहलकर अपनी किसी प्रेमिका से बात करते हैं। शीतल गेस करती कि हो सकता है अकेले हों। परिवार हो ही न।
कल उन्होंने ख़ुद ही हमको रोका। शीतल को देखकर पूछा कि बेटा खाना-वाना नहीं खाते हो क्या? यहीं से बात शुरू हुई तो वे अपनी कहानी बताने लगे।

उनके अनुसार उन्होंने एक आँख वाली अफ़गानी औरत से शादी की। उसे पढ़ाया लिखाया। दो लड़के और एक लड़की पैदा हुई। उन सबको भी अच्छी शिक्षा दिलाई। अस्सी लाख की कोठी बेचकर उन्हें विदेश भेज दिया।

विदेश जाकर उनकी पत्नी ने अपनी बहन के देवर से शादी कर ली। लड़के-लड़की दोनों ने इन बुजुर्ग से बोलना चालना छोड़ दिया। बड़े लड़के ने इनका फोन ही ब्लॉक कर दिया। इन्होंने बहुत कहा कि इन्हें भी वहाँ बुला लें लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ।

उनके दो भाई भी हैं। वे भी बात नहीं करते। एक माँ थी जिसकी देखभाल में वक्त गुज़रता था। पिछले साल उनका देहांत हो गया तो ये इस मोहल्ले में आ गये। कोठी बेचकर बचे पैसों में से कुछ लाख बचे हैं, उसी में काम चल रहा है। खाना बनाना आता नहीं गुरुद्वारे में खाते हैं और रोज़ मरने की दुआ करते हैं।

उनकी ये कहानी सुनकर हमदोनों बहुत दुःखी हो गए। गोली भी दो पंजे उनके पैरों पर रखकर दुःख जताने लगी। कुत्तों को जाने कैसे पता चल जाता है कि सामने वाला परेशान है।

ख़ैर, उन्होंने मेरे बारे में पूछा तो बात-बात में मैंने बताया कि मैंने शादी नहीं की है। सबकी तरह उन्होंने भी कारण पूछा मैंने कहा मुझे अकेले रहना अच्छा लगता है। तो वे समझाने लगे कि बेटा अभी ठीक लग रहा है बुढ़ापा कैसे कटेगा? मैं मन ही मन में हँस पड़ी। नहीं, उन पर नहीं इस सोच पर कि कोई बुढ़ापे का सहारा बनेगा? मैंने उनसे कहा कि अंकल, कहीं मैंने भी शादी कर ली और मेरा पति और बच्चे मुझे छोड़कर और मेरे पैसे लेकर भाग गए तो मैं क्या करूँगी। इसीलिए अकेले रहना ज़्यादा अच्छा है। चलते-चलते मैंने कहा कि आपको अपनी प्रॉपर्टी नहीं बेचनी चाहिए थी।


न मैं किसी के निर्णय को जज करने वाली कोई नहीं होती हूँ, लेकिन कुछ प्रश्नों में मन उलझ गया। अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर बच्चों पर खर्च कर देना कहाँ की समझदारी है? जीवनसाथी या बच्चे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे इस बात की क्या गारण्टी है? लोग धोखा खाने के बाद भी दूसरों से कैसे कह लेते हैं कि एक बार तुम भी धोखा खाने का प्रयास करो।

फिर से

कहते हैं हर लिखने वाले के जीवन में एक समय ऐसा ज़रूर आता है, जब उसका लिखने-पढने से जी उचट जाता है. अंग्रेजी में इसे राइटर्स ब्लॉक कहते हैं. मैं खुद को कोई लेखक-वेखक नहीं मानती और न ही अपने जीवन में कभी इसका अनुभव किया था. लेकिन पिछले दो-तीन सालों में मुझे ऐसा ही कुछ महसूस हो रहा है. ऐसा लगता है मानो दिमाग बंद हो गया हो. न कुछ पढ़ पा रही हूँ न ही लिख पा रही हूँ. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे जीवन में ऐसा भी समय आएगा. एक वाक्य लिख पाना भी मुश्किल हो गया. अगर कुछ लिखती भी हूँ तो ऐसा बकवास होता है कि खुद ही पढ़ने का मन नहीं होता.

ऐसा सब के साथ होता होगा या नहीं भी. मुझे ज़्यादा नहीं पता. लेकिन इसे इतना लम्बा नहीं चलना चाहिए. इतना कि लगे अब दोबारा कभी कुछ नहीं लिख पाऊँगी. कभी-कभी खूब ज़ोर-ज़ोर से रोने का मन होता है. मैं बचपन से लेकर कुछ सालों पहले  तक बस पढ़ती ही रही हूँ. पढ़ाई के लिए सब कुछ छोड़ दिया मैंने- संगीत, पेंटिंग, स्केचिंग, स्पोर्ट्स सब कुछ. ये मेरी जिंदगी है और अभी लगता है कि जिंदगी ही खत्म हो गयी और मैं बेजान हूँ. ये उसी तरह है मानो किसी धावक के पैर कट गये हों, या किसी पेंटर के हाथ या किसी गायक का गला बुरी तरह ख़राब हो गया हो. जो जिसके लिए जीता है उससे वही छिन जाय.

कोशिश कर रही हूँ कि इससे उबर पाऊं. मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा है कि मैं लिख क्या रही हूँ? पिछले पूरे साल एक भी ब्लॉग पोस्ट नहीं लिखी और इस साल की यह पहली ब्लॉग पोस्ट है. मुझे नहीं पता कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? क्या मेरा मन कहीं और लगा हुआ है या इसका कारण डिप्रेशन है या मेरे मन-मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया है या अब क्षमता नहीं रही या बूढ़ी हो गयी हूँ? कारण कुछ भी हो, मैं दिल से लिख नहीं पा रही.

क्या मैं इससे कभी उबर पाऊँगी? क्या मैं फिर से लिख पाऊँगी?

 

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