आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the tag “glimpses”

एक बैचलर का कमरा, धुआँ और दर्शन

१.

कमरे का एक कोना. ज़मीन पर बिछा बिस्तर. उसके बगल में फर्श पर राख से पूरी भरी हुयी ऐश ट्रे और उसमें जगह न पाकर इधर-उधर छिटकी अधजली सिगरटें. एक कॉफी मग, जिसमें एक तरफ  रखी हुयी इमर्सन राड. गद्दे पर अधखुली रजाई, जिस पर पड़ता एक धूप का टुकड़ा रजाई के बैंगनी रंग को पूरे कमरे में बिखेर रहा था. तकिये के एक ओर औंधी रखी एक किताब.

कमरे में हल्का-हल्का सा फैला बैंगनी रंग का धुआँ दर्शन से धुएँ के शाश्वत सम्बन्ध को दर्शा रहा था (‘यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्नि:”) मतलब ‘जहाँ धुआँ है, वहाँ आग भी होगी’. यहाँ आग नहीं है, सिर्फ़ धुआँ है क्योंकि सिगरेटें बुझी हैं. इससे ये सिद्ध होता है कि कभी-कभी दर्शन की स्थापनाएँ गलत भी हो सकती हैं. इसके उलट एक नयी स्थापना सामने आती है कि जहाँ धुआँ है, वहाँ सिगरेट भी होगी और जहाँ सिगरेट है, वहाँ दार्शनिक भी होगा क्योंकि दार्शनिकों का सिगरेट से गहरा नाता होता है.

२.

कमरे का दूसरा कोना. पढ़ने की एक मेज, जिसके एक किनारे रखे दो स्पीकर. दूसरे कोने पर एक छोटा सा टेबल लैम्प. एक खाली पेन स्टैंड और उसके बगल में मेज पर पड़ी तीन-चार कलमें. मेज के बीचोंबीच एक लैपटॉप, जो नेट पर दोस्तों से चैट करने के और गाने सुनने के काम आता है.

मेज के बगल में एक लकड़ी का रैक. उस पर करीने से सजी किताबें (कमरे की एकमात्र सलीके की चीज़) कुछ नोट्स. और एक बड़ी सी अलार्म घड़ी (जितनी बड़ी हो सकती है उतनी बड़ी). रैक के बगल में ज़मीन पर पड़ा एक अधखुला सूटकेस (जो अक्सर अधखुला ही रहता है) और उसमें से बेतरतीब झाँकते कुछ कपड़े (कमरे के मालिक की लापरवाही के गवाह). सूटकेस के ऊपर सूखने को पड़ी एक गीली अंडरवियर (एक और गवाह).

३.

रसोई. प्लेटफार्म पर चूल्हे के साथ एक छोटा सिलेंडर. रायल स्टैग की एक मझोली खाली बोतल और एक छोटी भरी बोतल. तीन खाली ‘फ्यूल’ की बोतलें. ये ‘फ्यूल’ किसी ‘इंजन’ को ‘स्टार्ट’ करने में काम आया होगा और उससे उत्पन्न ‘ऊर्जा’ अपने नष्ट न होने के नियम का पालन करती हुयी किसी और ‘पदार्थ’ में परिवर्तित होकर पर्यावरण में विलीन हो गयी होगी.

टेटली के टी-बैग्स का खुला पैक. चार-पाँच मैगी के पैकेट. सिंक के नीचे डस्टबिन में पड़ी आधा दर्जन गोल्ड फ्लैक की खाली डिब्बियाँ, जो कि कमरे में फैले शाश्वत धुएँ के साथ कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित कर रही थीं.

समाज को बदलने का सारा विमर्श, इतिहास को पलट देने के संकल्प,  संसार को समझने का सारा दर्शन इसी डस्टबिन के हवाले…

निष्कर्ष – धुआँ धुआँ…

Advertisements

Post Navigation