आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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कक्कू

पागल लोग होते हैं ना, उनका पाला ज़िंदगी में पागल लोगों से ही पड़ता है. मैं पागल हूँ, तो पागल लोग ही मिलते हैं. वो भी ऐसा ही है-कक्कू. खुद को वेल्ला कहने में ज़रा सी भी शर्म नहीं आती उसे. जाने कौन सी घड़ी में उससे मुलाक़ात हुयी और दोस्ती हो गयी. यूँ तो खुद को बड़ा होशियार समझता है, लेकिन मेरे सामने होशियारी किसी की नहीं चलती… 🙂

एक तो रोज़ रोज़ चला आता है. मैं कितना तो मना करती हूँ, उसके बाद भी. बहाने भी ऐसे-ऐसे बनाता है कि जी जल जाय. कभी फोन का बिल लेकर दरवाजा खटखटाएगा “मैडम, ये बाहर धूप में पड़ा सूख रिया था, मैंने सोचा इसे घर पहुंचा दूँ. थोड़ी कुल्लर की हवा लेगा, तो हरा हो जाएगा.” ‘लिफाफा है या मनीप्लांट?’ मैं लिफाफा लेकर दरवाजा बंद करना चाहूँगी तो बोलेगा “डाकिये को चाय नहीं पिलायेंगी? इत्ती मेहनत की बेचारे ने.” अब मैं तो इतनी बेशर्म हूँ नहीं कि दरवाजा बंद कर दूँ मुँह पर.

कभी-कभी दूध का पैकेट लेकर आ जाता है और बोलता है “पता चला है कि मैडम ने सुबह से चाय नहीं पी है” “पी चुकी हूँ” मैं बेरुखी से बोलूंगी, तो कहेगा “तो मुझे पिला दीजिए” मैं कहूँगी “शर्म तो आती नहीं तुम्हें” “नईं जी, बिल्कुल भी नईं, शर्म गल्त काम करने वालों को आती है. मैं गल्त करता नहीं और झूठ कदी मैं बोलता नईं.” …’बोलना तो ढंग से आता नहीं, झूठ क्या बोलेगा तू, बेशर्म’ मैं सोचूंगी… पर फिर भी, कितना भी बेशर्म हो, है तो अपना दोस्त ही.

यूँ तो उसकी बेतुकी बातों पर गुस्सा आता, लेकिन उसके जाने के बाद हँसी आती. ये भी कमाल की बात है कि आप किसी के भी घर में ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ करके घुस जाओ, और मेजबान को आप पर गुस्सा भी न आये. पर धीरे-धीरे उससे गहरी दोस्ती होती गयी और पता चलता गया कि इस हँसी-खुशी वाले चेहरे के पीछे भी लंबी दर्दीली कहानी है. बड़ा स्ट्रगल किया है बंदे ने और खुद के बल पर खड़ा है.

एक दिन ऐसे ही आ गया. मैं थोड़ी परेशान थी, पर मैंने उससे ढेर सारी बातें की. करती ही गयी. वो मुझे लगातार देखे जा रहा था बस. मैंने उससे कहा भी “मेरी ओर ऐसे मत देखो” पर वो नहीं माना. मैंने उसकी आँखों में देखा और मुझे बड़ी ज़ोर का रोना आया. उसने उठकर पानी दिया. मैंने कहा, “मैं बहुत परेशान हूँ” तो बोला, “वो तो मुझे तभी लग गया था, जब तू लगातार बोले जा रही थी. मुझे पता है तू परेशान होती है, तो बकबक करके छिपाने की कोशिश करती है, पर इससे कोई फ़ायदा नहीं. मैं चाहता था कि तू रो ले. फूटकर बह जाने दे.”

मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, गज़ब का मनोवैज्ञानिक है ये तो. “बड़ी-बड़ी बातें करने लग गए हो” मैंने कहा. तो बोला, “मैडम, ज़िंदगी की किताब है ही ऐसी. सब पढ़ा देती है” “चुप करो, तुम्हारे ऊपर ये दर्शन-वर्शन सूट नहीं करता.” मैं बोली, तो तपाक से बोला, “वो क्या होता है जी?”

मुझे दूसरा आश्चर्य तब हुआ, जब उसने कहा, “चाय बनाऊँ तेरे लिए” मुझे हँसी आ गयी. “चाय, और तुम?” अपने घर में उसने अपने बापजी को दूध गर्म करके देने के अलावा कभी रसोई का कोई काम नहीं किया.
मैंने कहा, “नीतू (उसकी पत्नी) के लिए भी कभी चाय बनायी है”
“अरे, वो मुझे किचेन से धक्के देकर भगा देती है”
“किया क्या था तुमने?”
“कुछ नहीं, वो बीमार थी, तो मैं चाय बनाने गया. मैंने वन-थर्ड दूध और टू-थर्ड पानी मिलाकर बर्तन में डालकर गैस पर रखा और वो बह गया”
“वाह-वाह! बह गया, अपने-आप? आप क्या कर रहे थे?”
“नहीं, मैंने कुछ नहीं किया था सच्ची. इतना भी पुअर कॉमन सेन्स नहीं मेरा”
“चलो-चलो, पता है मुझे. जो पेट्रोल की टंकी के ऊपर माचिस की तीली लगाकर देखे कि तेल बचा है कि नहीं, उसका कॉमन सेन्स कैसा होगा?” उसका मुँह देखने लायक था. (उसने ही ये बात बतायी थी मुझे. ये तब की बात थी जब वो अठारह साल का था और पहले-पहल अपने बापजी की ‘एल.एम.एल. वेस्पा’ लेकर दोस्त के साथ निकला था 🙂 )वो बोला, “लड़कियों को कोई बात नहीं बतानी चाहिए. जाने कब, किसके सामने, किस मौके पर उगल दें.”
“मुद्दे पर आओ और बताओ जब चाय का पानी उबलकर बहा, तो तुम कहाँ थे?”
“मैं एनीमल प्लेनेट देख रहा था” कहकर ज़ोर से हँसा,” फिर नीतू ने मुझे किचेन से निकाल दिया और तुरंत किचेन साफ करने लग गयी. उसकी तबीयत किचेन गन्दा देखकर ठीक हो गयी. हा हा हा हा! ”
“इसमें हँसने वाली कौन सी बात है? अपनी बीवियों को जो आपलोग “किचेन की शोभा” कहते फिरते हैं. दरअसल बात उनकी तारीफ़ की होती नहीं. मतलब तो ये होता है कि वो खाना बनाती है और आप बैठे-बैठे खाते हैं”
“अरे, तो क्या मैं कुछ नहीं करता?”
“क्या करते हो?”
“वो खाना बनाती है, तो मैं उसको पप्पी देता हूँ. वो खुश हो जाती है और मन से काम करती है. हे हे हे हे!”
“छिः”
“अरे, तू छिः बोल रही है, तो आगे से नहीं करूँगा.”
‘ओफ्फोह! किससे पाला पड़ा है. ऐसे दोस्तों को कौन झेल सकता है मेरे सिवा?’ मैं सोच रही थी कि वो चाय बनाकर ले आया.

“देख, कैसी बनी है, खराब बोलेगी, तो ऊपर फ़ेंक दूँगा. मैं किसी के लिए चाय नहीं बनाता.” अकड़ तो देखो इनकी. मैंने कहा, “मैं नहीं पीऊंगी. तुमने धौंस क्यों जमाई?” “अच्छा-अच्छा माफ कर. चल पी के बता” ‘ऐसे किसी से चाय पीने को कहते हैं भला?’ मैंने चाय पी. सच में अच्छी बनी थी. पर मैंने उसे बताया नहीं और बोला, “ठीक है” उसका मुँह उतर गया. बेचारा 🙂 फिर अचानक कुछ सोचकर चौंका.

(बात दरअसल ये थी कि एक साल पहले कुछ दोस्त ग्राउंड से वापस आकर चाय पी रहे थे. कक्कू अकड़ से बोला, “मैंने आज तक किसी के लिए चाय नहीं बनायी.” मैंने कहा, “मैं बनवा लूँगी एक दिन.”
“ओए चल.”
“अरे नहीं, तू ऐवें ही मत ले इसे कक्कू. तुझे पता नहीं ये लड़की पत्थर को कोल्हू में डालकर तेल निकाल सकती है और जार्ज बुश से अपनी रसोई में चाय बनवा सकती है.” एक दोस्त बोला.
“सुन लो.” मैंने कॉलर उचकाते हुए कक्कू से कहा.
“हुँह, देखूँगा.”
“तो लगी हज़ार-हज़ार की शर्त.” दोस्त बोला.
“लगी.”)

मुझे पता है इस समय अचानक कक्कू को वो शर्त याद आ गयी. मैंने सारा समय उसे बातों में लगाए रखा चाय बनाते समय. उसका ध्यान ही नहीं गया कि वो शर्त हार रहा है.

उसने मेरी ओर देखा और बोला, “मान गए  छोरी”
“तो रखो हज़ार रूपये.” कहते हुए मैंने उसकी ओर हथेली फैलाई. उसने बुरा सा मुँह बनाते हुए हज़ार रूपये मेरे हाथ पर रख दिए. मैं मन ही मन बोली, ‘तू बड़ा श्याणा है, तो मैं कम हूँ क्या कक्कू’ 🙂

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