आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

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कार्य प्रगति पर है, कृपया धीरे चलें

रात के दस बज रहे थे, जब उसका फोन आया. सुबीर कैम्प के एक रेस्टोरेंट में दोस्तों के साथ साउथ इन्डियन खा रहा था. फोन उठाते ही ‘उसकी’ सिसकियाँ सुनाई देने लगीं. सुबीर परेशान हो गया. दोस्तों से माफी माँगकर बाहर आया और पूछा ‘क्या हुआ?’ ‘कुछ नहीं’ उसने सुबकते हुए कहा. ‘अब यही प्रॉब्लम है तुम्हारी. फोन कर देती हो और बताती नहीं कि क्या बात है?’ सुबीर ने थोड़ा खीझकर कहा, तो फोन काट दिया गया. सुबीर को लगा कि उसको चिढ़ना नहीं चाहिए था. जाने क्यों परेशान है वो? फिर वह बार-बार फोन करता रहा, लेकिन उधर से फोन कटता रहा. नाराज़ हो गयी थी वह.

‘अच्छी मुसीबत है’ सुबीर बड़बड़ाया. और दोस्तों से इजाज़त लेकर मेट्रो स्टेशन के गेट की ओर बढ़ गया. बारिश हल्की थी, मगर कपड़े गीले करने के लिए काफी थी. ऐसे मौसम के बाद भी कैम्प में काफी चहल-पहल थी. ज़्यादा भीड़ उन लड़के-लड़कियों की थी, जो टिफिन या कुक के बनाए बेस्वाद खाने से बचने के लिए आसपास के इलाकों से कैम्प भाग आते हैं डिनर करने.

मेट्रो में बैठे-बैठे सुबीर ‘उसके’ बारे में ही सोच रहा था. कितना परेशान करती है ये जिद्दी लड़की. लेकिन वो चाहकर भी उसे इग्नोर नहीं कर सकता. उसके बारे में कोई एक राय भी नहीं बना पाता. कभी-कभी उसे लगता है कि बिगड़ी हुयी है तो कभी बहुत समझदार. कभी लगता है कि उसे चाहती है और कभी लगता है कि बस मज़ाक करती है. घर से लड़-झगड़कर बाहर पढ़ने आयी है, इसलिए सुबीर उसका सम्मान करता है. सुबीर उसका ध्यान रखता है, लेकिन वो बेफिकरी. किसी बात से तो डर नहीं लगता उसको. न घरवालों से, न दुनिया से. एक बार उसके घरवाले यहाँ घूमने आये थे तो परिचय के सारे लड़के-लड़कियाँ भी साथ चल दिए. अचानक एक जगह ‘उसने’ सुबीर का हाथ पकड़कर पीछे खींचा. ‘थोड़ा धीरे चलिए, देखिये न क्या लिखा है’ उसने जिस ओर इशारा किया था, वहाँ लिखा था ‘मेट्रो का कार्य प्रगति पर है. कृपया धीरे चलें’ वह सच में धीरे चलना भूल गया था. निक्की उसकी ज़िंदगी में न आती तो शायद उसे इसकी अहमियत भी न पता चलती. सुबीर यह सोचकर मुस्कुरा उठा, फिर हडबडाकर चारों ओर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है.

एक घंटे बाद सुबीर लक्ष्मीनगर में था. उसे पता था कि ये लड़की फोन नहीं उठाएगी. तो सीधे उसके पी.जी. के बाहर पहुँचा और चिल्लाकर बुलाया उसको “निक्कीईईई.” ये नाम कोई और नहीं लेता तो उसने बालकनी से झाँका और बोली ‘आप?’ फिर ‘आंटी जी’ के रोकने के बावजूद धड़-धड़ करती नीचे आ गई. रो-रोकर आँखें सुजा रखी थीं उसने.

‘मुझे पता था कि आप ज़रूर आयेंगे’ चहककर बोली वो.
‘तुमने और कोई चारा छोड़ा था क्या? और ये क्या हालत बना रखी है?’
‘अच्छा, अब आप डाँटो मत’
‘हुआ क्या?’
‘कुछ नहीं’
‘रूममेट से झगड़ा हुआ?’
‘नहीं’
‘ऋचा ने कुछ कहा?’
‘उहूँ’
‘फिर क्या हुआ?’
‘पूरे तीन दिन से फोन नहीं किया आपने’
‘हाँ, तो मैंने तुमसे कहा था न कि पढ़ाई पर ध्यान दो. सेमेस्टर इक्ज़ाम हैं तुम्हारे और मुझे भी पढ़ना है’
‘तो मेरी वजह से आपकी पढ़ाई डिस्टर्ब होती है? और क्या मैं पढ़ती नहीं? क्या मेरी थर्ड पोजीशन नहीं आयी इस सेमस्टर में?’
‘ठीक है-ठीक है. माना कि तीसरी पोजीशन आयी तुम्हारी. पर अगर तुम इन सब ब्वॉयफ्रैंड वगैरह के चक्कर में न पड़तीं, तो फर्स्ट आतीं’
‘मुझे नहीं बनना किताबी कीड़ा. मुझे लाइफ एन्जॉय करनी है.’
‘निक्की, बस थोड़े दिन पढ़ाई पर ध्यान दे लो.’
‘हाँ, तो मैं कैसे ध्यान दूँ पढ़ाई में, जब आप मेरा ध्यान नहीं रखते’
उसने सुबीर की आँखों में देखते हुए कहा. उसके इस तरह से देखने पर सुबीर हमेशा असहज हो जाता है. सुबीर ने बात बदल दी.
‘बस इतनी सी ही बात थी कि मैंने फोन नहीं किया कि कुछ और?’
‘वो… … नितिन’
‘उफ़, तुम आजकल के लड़के-लड़कियों के ये चोंचले. झगड़ा हुआ उससे?’
‘नहीं ब्रेकअप’
‘चलो, अच्छा हुआ. झंझट छूटी. मुझे आपका ‘नितिन पुराण’ नहीं सुनना पड़ेगा और आप पढ़ाई की ओर ध्यान देंगी’ सुबीर मुस्कुराकर बोला.
‘मेरी लाइफ का इतना बड़ा टर्निंग प्वाइंट और आपको मज़ाक सूझ रहा है.’ उसने रोना सा मुँह बनाकर कहा.
‘अच्छा-अच्छा बोलो फटाफट. क्यों हुआ ब्रेकअप?
‘आपकी वजह से?’
‘मेरी वजह से?’ सुबीर एकदम से चौंक गया.
‘हाँ, नितिन ने कहा कि मैं हर समय आपकी बातें करती रहती हूँ. हर समय आपकी तारीफ़ करती रहती हूँ. मेरे हर तीसरे सेंटेंस में आपका नाम आता है ‘सुबीर ये-सुबीर वो’-तो मैं आपको ही ब्वॉयफ्रैंड क्यों नहीं बना लेती.’
सुबीर थोड़ी देर हँसता रहा.
फिर पूछा ‘तुमने क्या कहा?’
‘मैंने सोचा कि पहले आपसे तो पूछ लूँ. विल यू…?’ उसने शरारत से पूछा.
‘निक्की, मैं तुमसे सात साल बड़ा हूँ’
‘तो? आई डोंट केयर’
‘तुम्हारी सहेली का भाई हूँ.’
‘स्टिल आई डोंट केयर’
‘तुम्हारे घरवालों ने तुम्हारी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर छोड़ी है. वो लोग क्या कहेंगे?’
‘बस इत्ती सी बात है न? ये न होता तो बन जाते मेरे ब्वॉयफ्रैंड?’ उसने फिर सुबीर की आँखों में झाँका. पहली बार सच्चाई दिखी सुबीर को उसकी आँखों में. और वो घबरा गया.
‘बकवास मत करो. जाओ अपने रूम पर’ सुबीर ने उसे डांटते हुए कहा.
‘असल बात ये है कि आप अपने आप से डरते हो. फट्टू हो आप’ गुस्से में कहकर वो तेजी से निकल गयी.

चलते-चलते वे मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के पास आ गए थे. सीढ़ी की छाया में खड़ा सुबीर सोचता रहा ‘ये बीस साल की लड़की कितनी सयानी, कितनी निडर और साहसी है? कैसे इसने अपनी बात रख दी झट से. कल को ऐसे ही झट से रिश्ता तोड़ भी देगी. लेकिन जब तक साथ है पूरी ईमानदारी से. कोई बेईमानी नहीं.’

बारिश अचानक काफी तेज हो गयी थी. विजिबिलिटी दस मीटर. निक्की अभी दस कदम ही चली होगी कि सामने से एक कार तेजी से आकर रुकी. ठीक समय पर कार ड्राइवर ने ब्रेक लगाया और ठीक समय पर निक्की रुक गयी, लेकिन इस झटके से वो बस गिरने वाली ही थी कि सुबीर ने दौड़कर उसे थाम लिया और कुछ सेकेण्ड वैसे ही खड़ा रहा. ‘तुम्हारी दुनिया? तुम्हारे लोग?’ निक्की ने पूछा. ‘भाड़ में जाएँ.’ सुबीर ने मुस्कुराकर जवाब दिया.

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे. बारिश में भी मेट्रो की वजह से गुलज़ार लक्ष्मीनगर मेट्रो स्टेशन पर कई जोड़ी निगाहें उनको घूर रही थीं. उन सबसे बेखबर सुबीर ने निक्की को अपनी बाहों में भर लिया.

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दर्दे-ए-हिज्र बेहतर है फिर तो तेरे पास होने से

मुझे तारीखें याद नहीं रहतीं. पिछली दफा तुम किस तारीख को आये, कब गए, अगली बार कब आओगे, कुछ भी नहीं. मैं कैलेण्डर के पन्ने नहीं पलटती, जिससे तुम्हारे जाने का दिन याद रहे… और जब तुम आते हो, तो अपने हाथों से नयी तारीख लगाते हो.

तुम्हारे जाने से ज़िंदगी ठहर सी जाती है. यूँ लगता है कोई हलचल ही नहीं. ना सुबह उठने की जल्दी, ना कोई काम करने का मन. बस पड़े रहने का जी करता है, जिससे ठहरी हुयी ज़िंदगी से तालमेल बिठाया जा सके.

तुम्हारे आने के ठीक पहले परदे धो दिए जाते हैं, चादरें बदल दी जाती हैं, घर के सामानों पर पड़ी धूल पोछकर साफ़ कर दी जाती है, गुलदान में नए फूल लगा दिए जाते हैं.  बस, तारीख नहीं बदली जाती, क्योंकि उसका रुके रहना या बदलना तुम तय करते हो.

और फिर…

तुम्हारे आने पर महक उठते हैं मुरझाए हुए फूल, उनके रंग चटख हो उठते हैं, पत्ते अधिक हरे हो जाते हैं, खिड़की के बाहर का आसमान गहरा नीला हो जाता है. पर… मैं ये सब नहीं देखना चाहती. मैं तुम्हारे होने को किसी और से बाँटना नहीं चाहती. फिर गहरा सन्नाटा. सुकून देता हुआ. बहुत देर तक…

‘कब जाना है?’

‘परसों’

…सुनकर लगा ज्यों दिल ने अपनी जगह छोड़ दी हो, पर काम दोगुना कर दिया. अब धडकन गले में सुनायी दे रही है और भी तेज…आँखें दो दिन बाद की घटनाएँ देखने लग जाती हैं. कान बीस डेसीबल से भी कम की आवाज सुन सकते हैं.  सन्नाटा और भी गहरा हो जाता है, पर सुकून नहीं देता. बेचैन कर देता है.

अड़तालीस घंटे अभी बाकी हैं. पर खर्चूं कैसे ? हिसाब जो नहीं आता. मुझे मालूम है मैं खर्चीली इन्हें यूँ ही गँवा दूँगी. हमारे दिल की धडकनें कुछ सोचने भी तो नहीं देतीं…

अजीब सी स्थिति है. इसे समझना मुश्किल है. गणित के सवाल हल करने से भी ज्यादा.  मुझे खुद नहीं मालूम कि मेरी हालत कैसी हो गयी?

…पता है …?

इस समय मैं दुखी नहीं हूँ. बिल्कुल नहीं. क्योंकि तुम पास हो,  लेकिन …

तुम्हें जाना है… इसलिए मैं खुश भी नहीं…

छुअन के चार पड़ाव

पहला पड़ाव

मेरा जन्मदिन. हम दिन भर घूमे थे. शाम को हॉस्टल के गेट पर खड़े होकर बातें कर रहे थे. मेरा मन नहीं हो रहा था कि तुम्हें छोड़कर अंदर जाऊँ. शाम का धुँधलका, गुलाबी ठण्ड. तभी हल्की हवा का एक झोंका आया और मेरे बालों की एक लट मेरे चेहरे पर बिखर गयी. जाने क्या सोचकर मेरी आँखे भर आयी थीं. तुमने अपने हाथों से मेरे चेहरे से वो लट उठाकर कानों के पीछे अटका दी, इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए कि कहीं तुम्हारा हाथ मेरे कान या गर्दन से छू ना जाए, पर वो छू ही गया और मेरा पूरा शरीर सिहर उठा. तुमने कहा, “मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ” तुम्हारी वो छुअन, बातों की और हाथों की, अभी भी मुझे सिहरा देती है.

दूसरा पड़ाव

तुम मुझसे मिलने हॉस्टल आये. हम विजिटिंग हॉल में बैठे. मैं नाराज़ थी किसी बात पर और तुम मनाने की कोशिश कर रहे थे. अचानक तुमने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और बोले, “तुम्हारे हाथ तो आम के नवपल्लवों की तरह कोमल हैं.” मुझे तुम्हारी ये हिन्दी सुनकर हँसी आ गयी. मैं आज भी अपने हाथ अपने गालों पर रखकर महसूसने की कोशिश करती हूँ कि वे वाकई नव आम्रपल्लवों जैसे कोमल हैं कि नहीं.

तीसरा पड़ाव

हम बस से घर जा रहे थे. मैं आठ घंटे की यात्रा से बहुत थक गयी थी और बार-बार ऊँघ रही थी. मेरे बगल में बैठे हुए तुमने अपना हाथ पीछे से मेरे कन्धों पर रखा और मेरा सिर अपने कन्धों पर टिका लिया और मैं चुपचाप सोने का नाटक करती रही…

चौथा पड़ाव

तुम मेरे घर आये थे. गर्मियों की रात थी. गाँव में लाईट तो रहती नहीं. सबलोग रात का खाना खाकर बाहर बैठे हुए थे. मैं बारी-बारी से सबके बिस्तर लगा रही थी. मैं पिताजी के लिए  मच्छरदानी लेने कमरे में आयी तो पानी पीने का बहाना करके तुम भी आ गए. मेरा हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा और अचानक रुककर बोले, “डर गयी थी ना?” मैं तड़पकर रह गयी कि बेवकूफ ने इतना अच्छा मौका गँवा दिया… गले क्यों नहीं लगा लिया?

छुअन के इन पड़ावों के साथ ही हमारा नाता गहरा होता जाता है… …

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