आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the tag “puppy”

नए साल का उपहार ‘सोना’

कभी-कभी लगता है कि ज़िंदगी कितनी बकैत चीज़ है. कितनी बेरहम. किसी की नहीं सुनती. कभी नहीं रुकती. लोग आयें, बिछड़ जाएँ. साल आयें, बीत जाएँ.  ये चलती ही जाती है. सब कुछ रौंदती. किसी बुलडोज़र की तरह अपना रास्ता बनाती.

तो ये चल रही है. तारीखों के आने-जाने का इस पर कोई असर नहीं. कुछ खास तारीखें बस एक मौका देती हैं, मुड़कर एक बार देख लेने का कि ज़िंदगी कितनी बीती, कैसे बीती? कुछ हिसाब-किताब खोने-पाने का. कुछ अफ़सोस, कुछ खुशियाँ. नए साल की पूर्व संध्या भी ऐसी ही एक तारीख है जो अचानक मानो अपनी धुन में चल रही ज़िंदगी को एक झटका देती है कि ‘देख, तू बीत रही है. धीरे-धीरे रीत रही है और एक दिन खाली हो जायेगी, चुक जायेगी.’ तब होश आता है कि दोस्तों, ये ज़िंदगी तो ऐसी ही है. इसे लाइन पर लाना पड़ेगा. क्यों भाग रही है दुनिया से रेस मिलाने को? रोको इसे. कुछ लम्हें चुरा लो, कुछ खुशियाँ झटक लो. नहीं तो ये बीत जायेगी और हम हाथ मलते रह जायेंगे.

तो मैंने भी इस साल कुछ खुशियाँ झटकने की कोशिश की है. एक नया ब्लॉग बनाया है कि मैं नए-नए लोगों के विचार और भावनाएँ जान सकूँ और उसे अपने दोस्तों को बता सकूँ. … और एक पपी पाली है ‘सोना.’ ये मेरा खुद से खुद को क्रिसमस और नए साल का उपहार है. खुशियाँ कहीं बाहर नहीं होतीं, अपने ही अंदर होती हैं, बस उनको खींचकर बाहर निकालना होता है, नहीं तो ये बेरहम ज़िंदगी उन्हें अपने साथ ही लिए जायेगी.  खुशियाँ मनाने का ये मेरा अपना तरीका है. अपने जन्मदिन पर अकेली थी, तो खुद ही जाकर पेस्ट्री ले आयी और रात में एक मूवी देखते हुए पेस्ट्री खाई और आज मैं अपनी पपी के साथ नए साल की खुशियाँ मना रही हूँ. उसे पेस्ट्री नहीं खिला सकती तो उसका हिस्सा भी खुद खा रही हूँ   🙂

सोना येलो लेब्रेडोर है. अभी सिर्फ़ सैंतीस दिन की है, इसलिए मुझे उसको ठण्ड से बचाने के लिए अपने पास सुलाना पड़ता है और वो किसी छोटे बच्चे की तरह मेरी बाँह पर सर रखकर सो जाती है. मेरे हिलने-डुलने पर अजीब सी आवाज़ निकालती है गूं-गूं करके   🙂

ये रही उसकी कुछ फोटोग्राफ्स

इससे मिलती-जुलती कड़ियाँ:

मेरे घर आयी एक नन्हीं कली

अब सब कुछ पहले जैसा है

Advertisements

आस-पड़ोस की बातें

मेरा मोहल्ला संभवतः दिल्ली का सबसे इंटरेस्टिंग मोहल्ला होगा. इसके ऊपर मैंने कुछ दिन पहले एक लेख भी लिखा था मोहल्ला मोहब्बत वाला 🙂 . यहाँ पिछले पाँच सालों से रह रही हूँ. इसलिए काफी लोगों से परिचय भी हो गया है. लोगों से मेरा मतलब दुकानदारों से है, बकिया दोस्त-वोस्त तो हैं ही.

यहाँ सुबह से ही सब्जी की दुकानें लग जाती हैं, पर शाम को काफी ठेले होते हैं, जिनमें हर तरह की मौसमी सब्जियां मिल जाती हैं. एक दिन एक सब्जी वाले के पास हरी-हरी भिन्डी देखकर ठिठक गयी. उसके पास कुछ ही भिन्डी बची थी. मैंने दाम पूछा तो बोला, “वइसे तो आठ रूपिया पौव्वा हैं. मुला किलो-खांड लेइहो तो सस्ता लगा देबे.” (वैसे तो आठ रूपये पाव हैं, पर अगर किलो के लगभग लेना हो तो सस्ता लगा दूँगा.) मैं अपनी परिचित बोली सुनकर चौंकी. मैंने झट से पूछा, “उन्नाव के हो का भईया?”  “हाँ, मुला आपका कईसे मालूम?” वो आश्चर्य से पूछने लगा. मैंने कहा, “हमहूँ हुवन कि अहिन. पर तुम  हियाँ का करि रह्यो? उन्नावे के बगल मा तो कानपुर-लखनऊ जइसे बड़े सहर हैं.”( मैं भी वहीं की हूँ, पर तुम यहाँ क्या कर रहे हो. उन्नाव के बगल में तो वैसे भी लखनऊ-कानपुर जैसे शहर हैं?) तो बोला, “वी हमरी सास रहती रहैं हियाँ, तौ बुला लिहिन कि आओ हियाँ कमाव-खाव आके.” (मेरी सास रह रही थीं यहाँ पर, तो हमें भी बुला लिया कि तुम भी यहीं आकर कमाओ)  इस तरह मुझे मेरे बचपन के शहर का एक आदमी मिला और मुझे उससे वैसा ही अपनापन महसूस हुआ जैसा लड़कियों-औरतों को अपने पीहर के किसी भी व्यक्ति से होता है 🙂 . वो मेरा दोस्त बन गया था. पर इधर कई दिनों से वो नहीं दिख रहा है. लगता है कहीं और चला गया कमाने-खाने.

एक सेबवाला है. मुझे देखते ही बुलाता है, “बहिनजी, आपकी पसंद वाला जूस वाला किन्नौर सेब आया है.” एक-दो बार तो झेंप जाती हूँ कि कमबख्त को इतनी ज़ोर से चिल्लाकर बताने की क्या ज़रूरत है? पर उस बेचारे की गलती नहीं है. उससे बहुत दिनों से सेब खरीद रही हूँ. पर जब वो सुनहरे शिमला वाले सेब लाता है, तब नहीं लेती. मुझे वो खुसखुसे होने के कारण अच्छे नहीं लगते. तो जब वो लाल वाले जूसी सेब लाता है तो चिल्लाकर बताता है और गारंटी भी देता है कि अगर सेब में जूस नहीं हुआ तो वापस ले लेगा :-). है ना मजेदार इंसान?

एक आंटी हैं, जिनकी वीडियो लाइब्रेरी है. किराए पर सी.डी. देती हैं. उनके यहाँ से इतनी पिक्चरें लेती हूँ कि उन्हें मेरे घर का नम्बर तो याद ही हो गया है, ये भी याद है कि मैं कौन-कौन सी पिक्चरें देख चुकी हूँ? ( ये अलग बात है कि मेरा नाम नहीं मालूम :-)) एक-दो बार वो खुद ही मेरी पसंद की फ़िल्में सजेस्ट कर देती हैं. एक दिन उन्होंने मुझे “रेड एलर्ट” फिल्म देखने का सुझाव दिया. ये एकदम नयी फिल्म है और नक्सलवाद पर बनी ठीक-ठाक फिल्म है और मज़े की बात ये कि फिल्मों की इतनी शौक़ीन होने के बाद भी मैंने इसका नाम तक नहीं सुना था. जब उनके यहाँ मोज़रबियर की  पुरानी क्लासिक हिन्दी फिल्म की सी.डी. आती है, तो मुझे बता देती हैं. आज ही उन्होंने ‘नया-दिन नयी रात’ और ‘गोदान’ की सी.डी. दिखाई. उनके पास और भी कई पुरानी फिल्मों की सी.डी. हैं, जो मुझे देखनी हैं.

एक फ्रूटी है, जो अपने पति पेप्सी के साथ कोने के एक घर में पाली हुयी है. हाँ, क्योंकि वो एक डॉगी है. प्यारी सी फ्रूटी के यहाँ पिछले साल जब हम उसकी पपी “कली” को लेने गए थे, तो इतनी नाराज़ हुयी थी कि भौंक-भौंककर पूरे मोहल्ला सर पर उठा लिया था. पर अब मुझे देखकर भौंकती नहीं है. आकर मेरे पैरों पर खड़ी हो जाती है और कूँ-कूँ करती है, जैसे पूछती हो कि “मैंने अपनी बच्ची तुम्हें दी थी, देखभाल के लिए. अब वो कहाँ है बताओ?” कौन कहता है कि जानवर बोल नहीं सकते? वो बोलते हैं, अपनी आँखों से, अपने हाव-भाव से. फ्रूटी ने जब पहली बार मेरे पैरों पर खड़े होकर मेरी आँखों में प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा था, तो मैं उससे आँखें नहीं मिला पायी, मेरी आँखें भीग गयीं थीं…

अब सब कुछ पहले जैसा है

छत पर पानी खेलकर आयी और सज़ा पायी (बैठी रहो सीढ़ी पर, अंदर मत आना नहीं तो फर्श गंदी हो जायेगी)

अब किसी पड़ोसी को इस बात की शिकायत नहीं होगी कि उसने छत पर सूखने के लिए टंगे कपड़ों को खींचकर ज़मीन पर गिरा दिया , कि उसने उनके कमरे के सामने पोटी या सुसु कर दी, अब किसी को छत पर जाने से भौंक-भौंककर कोई नहीं रोकेगा… अब मुझे भी रात में दो बजे उठाकर खेलने के लिए नहीं भौंकेगा, न ही कोई सुबह-सुबह बेड की चादर खींचकर वाक पर चलने की जिद करेगा ….अब बिस्तर से नीचे उतरने पर मुझे मेरी चप्पलें अपनी जगह मिलेंगी , अब दोस्तों के आने पर उनकी चप्पलें काटे जाने के डर से उठाकर रैक पर नहीं  रखनी  पड़ेंगी … अब छत की टंकी से गिरने  वाले पानी में भीगकर कोई अपने नन्हे-नन्हे पंजों से कमरे की फर्श पर निशान  नहीं बनाएगा …मेरा घर साफ-सुथरा रहेगा … मेरे झाडू लगाने पर उसे खींचकर कोई नहीं खेलेगा और न ही कोई पोछा लेकर भागेगा … मेरे बाथरूम में जाने पर दरवाजे पर पंजे मारकर उसे खोलने की कोशिश नहीं करेगा और न ही बाहर निकलने पर पैरों से लिपट जाएगा … कोई ज़बरदस्ती बिस्तर पर बैठाने की जिद नहीं करेगा … दोनों पंजे से पकड़कर कोई मुँह नहीं चाटेगा…अब मुझे बाहर जाने से पहले उसकी चिंता नहीं करनी पड़ेगी… और न लौटने की कोई उत्सुकता होगी .

उसका प्रिय काम चप्पल काटना (मेरी दो जोड़ी चप्पलें और मेरी दो सहेलियों की एक-एक जोड़ी चप्पलें काट दीं )

… अब सब कुछ पहले जैसा है…कोई हलचल नहीं … शांत, स्थिर, खामोश …न हँसने का कोई बहाना , न गुस्सा होने की कोई वजह … मैं अब अकेली हूँ पहले की तरह … पता नहीं मेरे साथ ऐसा क्यों होता है कि मैं जिसे बहुत चाहती हूँ, वो मुझसे दूर हो जाता है …अब तो मुझे डर लगने लगा है किसी से भी प्यार करने से या दोस्ती करने से …मैं उसे बहुत चाहती थी …बहुत ज्यादा. मेरी कली कुछ ही दिनों में मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गयी थी …

उसने मेरी ज़िंदगी को खुशियों से भर दिया था कुछ दिनों के लिए और जाते-जाते उन्हें वापस ले गयी…जाने कब तक के लिए … अब वो इस दुनिया में नहीं है…वो चली गयी , किसी दूसरी दुनिया में , लेकिन मुझे मालूम है, वो जहाँ भी होगी …कोई न कोई शैतानी कर रही होगी …उसने वहाँ भी सबको तंग कर दिया होगा …

( बेड पर चढ़ने के लिए झगड़ा)

मेरे घर आयी एक नन्ही कली

मुझे होली में एक पामेरेनियन पपी उपहार में मिली. मैं उसकी कुछ फोटो अपलोड कर रही हूँ. मैंने उसका नाम कली रखा है. कली बहुत शैतान है. वो या तो खेलती है या फिर सोती रहती है. सोती भी है अजीब-अजीब मुद्राओं में. अभी दो महीने की भी पूरी नहीं हुई है, पर बड़ी अक्ल है उसमें. मेरे बेड पर सोने के लिये चादर खींचती है और मेरे जवाब न देने पर भौंकने लगती है. जब उसे अपनी मम्मी की याद आती है, तो बालकनी में जाकर मुँह ऊपर करके कूँ-कूँ करती है. मैं उसको अभी सुबह-शाम उसकी मम्मी के पास ले जाती हूँ.

कुछ दिन पहले मैं एक पपी को रात में गली से उठाकर ले आयी थी. उसे मैंने एक चाय वाले को दे दिया था. दूसरे दिन जब उससे पूछने गयी, तो उसने कहा कि एक लड़का पपी को ले गया. मैं उसको याद करके इतनी परेशान हुई कि किसी से मेरा दुःख देखा नहीं गया और उन्होंने मुझे ये पपी उपहार में दे दी.

मेरे कुछ मनोवैज्ञानिक दोस्त कहते हैं कि पिल्लों को लेकर तुम्हारी दीवानगी एक मानसिक व्याधि है. वो क्या कहते हैं उसे ओ.सी.डी. (ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर). जिसमें कोई व्यक्ति किसी एक बात के पीछे पड़ जाता है. कुछ लोग सफाई के पीछे इतने पागल हो जाते हैं कि हमेशा अपना हाथ धोते रहते हैं. कुछ लोग किसी और बात के पीछे पड़े रहते हैं. मेरे जैसे लोगों को “मेनेयिक” भी कहा जाता है. तो इसका मतलब यह है कि मुझे “पपी मेनिया” हुआ है. अच्छा शब्द है न.

Post Navigation