आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

चाइनीज़ खाने का स्वाद, ग्लूटामेट और मैगी विवाद

लगभग एक साल पहले हम तीन लडकियाँ (वैसे आप महिलायें भी कह सकते हैं😀 ) अपने एक मित्र को देखकर हिन्दू राव अस्पताल से लौट रहे थे. मित्र तेज बुखार के चलते दो दिन से अस्पताल में भर्ती थे. बाकी दोनों लडकियों को जी.टी.बी. नगर स्टेशन से मेट्रो पकड़नी थी और मुझे ऑटो. इसलिए हमलोग कैम्प तक साथ आये. वहां पहुँचते-पहुँचते शाम के सात बज चुके थे और संयोग से हम तीनों ही अकेले रहने वाली हैं तो हमने सोचा कि घर जाकर बनाने से अच्छा बाहर खाकर चलते हैं.
तय किया गया कि चाइनीज़/मंचूरियन खाया जाय. हम एक रेस्टोरेंट में घुस गए और चाइनीज़ फ्राइड राईस और मंचूरियन के साथ स्वीट कॉर्न सूप का ऑर्डर दिया. सूप काफी गाढ़ा था. आमतौर पर मुझे गाढ़ा सूप पसंद नहीं है, लेकिन जब चखा तो जैसे आत्मा तृप्त हो गयी. इतना टेस्टी सूप मैंने पहले कभी नहीं पिया. खाना खाकर और हमेशा की तरह बचा हुआ खाना पैक करवाकर हम वहां से निकले. एक ने तो मेट्रो पकड़ ली और दूसरी जो मेरी बचपन की सहेली है, मेरे साथ मेरे घर आ गयी. देर रात तक हमने चाय पी-पीकर खूब गप्पें मारीं. रात में खाना बनाने से छुट्टी हो तो कितना हल्का-हल्का सा महसूस होता है ये वही जान सकता है जिसे रोज़ सुबह से ही रात के खाने के बारे में सोचना शुरू कर देना पड़ता है.
दूसरे दिन जब मैं सोकर उठी तो चेहरा बहुत भारी-भारी सा लग रहा था और आँखें पूरी नहीं खुल रही थीं. शीशे में देखा तो चौंक गयी. पूरा चेहरा सूजा हुआ था और आँखें छोटी हो गयी थीं. वैसे ये समस्या मेरे लिए नई नहीं है. एलर्जिक शरीर होने के नाते कभी-कभी ऐसा हो जाता है. अक्सर पीरियड्स के आसपास भी चेहरे में सूजन आ जाती है लेकिन इतना भारीपन नहीं होता. सिर अजीब ढंग से दुःख रहा था और नींद सी आ रही थी. हालांकि सहेली को मेरा चेहरा ज्यादा सूजा नहीं लग रहा था, लेकिन मुझे महसूस हो रहा था. खैर, मैंने सोचा की अभी सोकर उठी हूँ. थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
सहेली दोपहर तक चली गयी. मेरा चेहरे की सूजन और सिर दर्द शाम तक नहीं ठीक हुआ, तो मुझे थोड़ी चिंता हुई. मैंने नेट ऑन करके swollen face गूगल करना शुरू किया. उसमें मुझे जो जानकारी मिली, उसे पढ़कर मैं चौंक गयी. मैंने chinese restaurant syndrome के बारे में पढ़ा. यह एक समस्या है, जो कि माना जाता है कि Monosodium glutamate (MSG)  (लोकप्रिय नाम अजीनोमोटो) नामक तत्व के कारण होती है. मोनोसोडियम ग्लूटामेट सूप और नूडल्स जैसे खानों में अच्छे स्वाद के लिए मिलाया जाता है. हालांकि अभी इस पर पूरी तरह शोध नहीं हुआ है और यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उक्त समस्या का कारण MSG ही है. आश्चर्य तो मुझे हो रहा था लेकिन साथ ही हंसी आ रही थी कि कहीं ये चीन वालों की सबको “चीनी” बनाने की साजिश तो नहीं….क्योंकि कसम से मेरा चेहरा बिलकुल चाइनीज़ लग रहा था😀 . खैर, उस दिन तो रात हो गई थी. मैंने तय किया कि अगले दिन डॉ के पास जाकर पूछूंगी कि कोई खतरे की बात तो नहीं है क्योंकि मुझे पहले से ही फूड एलर्जी है और दूध, दूध से बने पदार्थ और नट्स आदि खाना मना है. लेकिन दूसरे दिन तक लक्षण कम हो गए थे और तीसरे दिन तक लगभग समाप्त.
जब मैगी पर इसी तत्व को लेकर बैन लगा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि मैगी खाकर कभी भी इस तरह की कोई समस्या मुझे नहीं हुई. जाहिर है की यदि उसमें एम्.एस.जी. होगा भी तो उसकी मात्रा बहुत कम होगी. मैगी तो एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी का उत्पाद है इसलिए उसकी जांच हुई और उस पर बैन लगा दिया गया और ये रेस्टोरेंट वाले चाइनीज़ खाने में जो भर-भरके MSG डाल रहे हैं, उन पर बैन क्यों नहीं लगता? जांच क्यों नहीं होती? असल में, आमतौर पर लोगों को कोई समस्या ही नहीं होती और सौ में से एक किसी को होती भी है, तो उसे जानकारी ही नहीं होती. लेकिन यह भी बात तो सही है की यूँ तो सभी डिब्बा बंद उत्पादों और बाहर के खानों में कुछ न कुछ रासायनिक तत्व होते ही हैं. सब्जी और फल भी तो कीटनाशकों और रासायनिक खादों के कारण प्रदूषित होते हैं .उनमें फ्रूट हारमोंस डालकर पकाया या बड़ा किया जाता है, वह भी तो नुकसानदायक ही है. हम किस-किस चीज़ से बचेंगे और किस तरह से बचेंगे?

उठो, आगे बढ़ो कि रुकना ख़त्म हो जाना है

ज़िंदगी में सब कुछ वैसा कभी नहीं हो सकता जैसा हमने सोचा होता है. कभी-कभी थोड़ा-बहुत वैसा होता है और कभी बिलकुल नहीं. मैंने बचपन से ही शादी के बारे में कभी नहीं सोचा और न अपने राजकुमार के बारे में कोई सपने देखे, लेकिन फिर भी यह तो कभी न कभी सोचा ही कि कोई ऐसा होगा जिसके लिए मैं ज़िंदगी में सबसे ज्यादा प्रिय होऊँगी… ऐसा कोई राजकुमार जो सफ़ेद घोड़े पर चढ़कर आएगा…नहीं सोचा था, लेकिन हुआ.. एक राजकुमार आया मेरी ज़िंदगी में. सफ़ेद घोड़े पर सवार. उसमें वो सारी खूबियाँ थीं जो एक लड़की अपने प्रेमी में चाहती है. संवेदनशील, खूब प्यार करने वाला, देखभाल करने वाला, मेरी भावनाओं को समझने वाला, मुझसे पहले ही मेरी परेशानियां जान जाने वाला, मेरे दुःख में मुझसे ज्यादा दुःखी और खुशी में मुझसे कहीं अधिक खुश होने वाला, मेरी तरक्की को अपनी तरक्की मानने वाला और सबसे बढ़कर मेरा बहुत सम्मान करने वाला…

लेकिन… कहीं कुछ तो गलत था. शायद वही कि सब कुछ वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं और जब जैसा हम चाहते हैं, वैसा होता है, तो वो हमारी ज़िंदगी में नहीं होता या बहुत कम समय के लिए होता है. मेरे राजकुमार के साथ भी यही था. वो घोड़े पर बैठकर आया था. पता नहीं कैसे उसका घोड़ा मेरे घर के पास रुक गया. वो वापस जाना चाहता था, तब तो घोड़ा टस से मस नहीं हुआ, लेकिन जब उसने रुकना चाहा तो घोड़ा चल पड़ा और ऐसा चला कि रुका ही नहीं. मैं अपने राजकुमार का साथ चाहती थी. वो भी हाथ बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ना चाहता था लेकिन रुकना उसके बस में नहीं था. मेरा घोड़ा हमेशा से मेरे बस में है. उसे बड़ी जतन से ट्रेंड किया है मैंने. उसकी लगाम पर मेरी पकड़ मजबूत है और उसकी वजह हमारे बीच अच्छी समझ. मेरा घोड़ा जिद्दी, लेकिन मेरी बात मानने वाला है. लेकिन वह बेचारा भी क्या करता. जब उसके पास पहुँचता वो और आगे निकल जाता.

आखिर मैंने तय कर लिया कि मैं अपनी राह चलूंगी. पीछा नहीं करूंगी. तब से हमदोनों ही अपने-अपने रास्ते दौड़ रहे हैं. हम एक-दूसरे को देख सकते हैं. बातें कर सकते हैं, लेकिन साथ नहीं हो सकते. वो दौड़ रहा है इस आस में कि कभी न कभी उसका घोड़ा रुक जाएगा, फिर वहीं कहीं हम रात्रि विश्राम के लिए शिविर लगा लेंगे. और मैं दौड़ रही हूँ बिना किसी आस कि मुझे बस दौड़ना है. मुझे नहीं पता कि आगे क्या होने वाला है. क्या कभी ज़िंदगी की ये दौड़ ख़त्म होगी? क्या कहीं कोई मंजिल भी होती है? क्या खानाबदोशों सी इस ज़िंदगी में कोई पड़ाव भी आता है? मुझे नहीं मालूम. न मैं मालूम करना चाहती हूँ.

मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे बगल में कौन दौड़ रहा है? दौड़ते-दौड़ते मैं अगर गिर गयी तो कोई उठाने वाला भी होगा या नहीं? मैं तो बस तेज चलती हवाओं की सरसराहट को अपने कानों के पास से गुजरते महसूस करना चाहती हूँ, सफ़र की थकान को बारिश की बूंदों में धोकर बहा देना चाहती हूँ, खिलती धूप की तपिश से अन्दर की तपिश को जलाकर राख कर देना चाहती हूँ. मैं चल रही हूँ लेकिन किसी मंजिल की तलाश में नहीं. इसलिए चल रही हूँ कि रुकना ख़त्म हो जाना है. जब उदास होकर बैठती हूँ तो भवानी प्रसाद मिश्र की यह कविता पढ़ लेती हूँ.

बुरी बात है
चुप मसान में बैठे-बैठे
दुःख सोचना, दर्द सोचना !
शक्तिहीन कमज़ोर तुच्छ को
हाज़िर नाज़िर रखकर
सपने बुरे देखना !
टूटी हुई बीन को लिपटाकर छाती से
राग उदासी के अलापना !

बुरी बात है !
उठो, पांव रक्खो रकाब पर
जंगल-जंगल नद्दी-नाले कूद-फांद कर
धरती रौंदो !
जैसे भादों की रातों में बिजली कौंधे,
ऐसे कौंधो ।

ओह, मैं तो अपने राजकुमार को भूल ही गयी… बात तो वहीं से शुरू हुयी थी ना?

छोड़ो🙂

साइकिल वाली लड़की

साइकिल चलाये ज़माना बीत गया. अब सोचते हैं कि चला कि पायेंगे या नहीं? पता नहीं. लेकिन फिर से एक बार साइकिल पर बैठकर दूर-दराज के गाँवों में निकल जाने का मन करता है, जैसे बचपन में करते थे. बाऊ  के ड्यूटी से वापस लौटते ही मेरे और भाई के बीच होड़ लग जाती थी कि पहले कब्ज़ा कौन जमाता है साइकिल पर. भाई लम्बाई में मात खा जाता था मुझसे. एक साल छोटा था तो लम्बाई भी उतनी ही कम थी. वैसे भी लड़कियाँ जल्दी लंबी हो जाती हैं. उसे साइकिल सीखनी होती थी और मुझे चलानी होती थी. अपनी लम्बाई के चलते वो चढ़ नहीं पाता था और मैं साइकिल पाते ही ये जा और वो जा🙂

ये जो आलिया भट्ट हैं न, आज स्कूटी पे बैठकर पूछती हैं “Why should boys have all the fun?” हम आज से चौबीस-पच्चीस साल पहले कहते थे, साइकिल पे बैठकर. स्कूटी तो हम निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों के लिए तब भी एक सपना था और अब भी सपना ही है. जो थी, वो हमारी साइकिल और उससे जुड़े हमारे सुख-दुःख. साइकिल मिलते ही मानो पंख मिल जाते थे. घुमक्कड़ और आवारा मन, शरीर को अपने काबू में ले लेता था और फिर जहाँ-जहाँ मन कहे, वहाँ-वहाँ हम.एक अद्भुत आज़ादी का अनुभव.

लड़कों से साइकिल रेस लगाते थे. रेलवे कॉलोनी से मीलों दूर के गाँव चले जाते थे. कभी-कभी टक्कर मारकर किसी बदमाश लड़के को गिराकर सबक सिखा देते थे और कभी खुद ही गिर जाते थे. कई बार ऐसे ही गिरे तो घुटने छिल जाते थे बुरी तरह से. भलभल खून बहने लगता. हमें लगता कि अब तो हुयी अम्मा के हाथों कुटाई गुड्डू तुम्हारी. फिर तय करते कि जब तक खून बंद नहीं होगा घर ही नहीं जायेंगे. हैंडपंप पे जाकर चोट धोते. उसमें गड़ी हुयी एक-एक रोड़ी निकालते. घाव को ठीक से साफ़ करते और फूँक-फूँककर सुखाते. दर्द तो खूब होता, लेकिन वो अम्मा की कुटाई और डाँट से कम दर्दीला दर्द था🙂

घर जाते तो बेहद दर्द के बावजूद लंगड़ाकर नहीं चलते थे. धीरे-धीरे सीधा चलने की कोशिश करते. मालूम था हमको कि अम्मा को पता चला तो फिर वही उपदेश शुरू कर देंगी और साईकिल न चलाने के लिए दस-दस कारण गिनवायेंगी. “कहते हैं तुमसे कि अभी पैडल तक पूरा पैर नहीं पहुँचता है, इतनी ऊँची साइकिल मत चलाओ,”  “यहाँ के लड़के बहुत उजड्ड हैं. उनमें से किसी ने टक्कर मारी होगी. कहते हैं कि इन लड़कों के साथ साइकिल मत चलाओ,” “ज़मीन अच्छी नहीं है यहाँ की. रेह और रोड़ी भरी पड़ी है मिट्टी में. ऐसी मिट्टी में साईकिल मत चलाओ” वगैरह-वगैरह. मेरे साइकिल चलाने से मेरे गिरने को जोड़कर वो अपनी बात सिद्ध कर देंगी कि हमें किन-किन कारणों से साइकिल नहीं चलानी चाहिए.शुक्र है कि चोट लगने पर “लड़की हो, लड़की की तरह रहा करो” नहीं सुनने को मिलता. नहीं तो ये तो उनका फेवरेट डायलॉग था🙂

हम चुपचाप धीरे से डिटॉल की शीशी उठाते थे और टायलेट में घुस जाते था. पता था कि अम्मा की नज़र पड़े न पड़े, दीदी की ज़रूर पड़ जायेगी. तो सयाने हम अपने चोट को डिटॉल से अच्छी तरह धोकर-सुखाकर शीशी वापस उसकी जगह पर रख देते थे और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती.

रात के समय दर्द उभरता. सोते समय पैर छूता चारपाई की पाटी से और मुँह से हल्की सी चीख निकल जाती. अम्मा लोग के तो जैसे चार कान होते हैं. बच्चों की चुन्नी सी भी आवाज़ सुनायी पड़ जाती  है. पूछतीं “का हुआ रे.” कुछ नहीं अम्मा कहते-कहते गला भर आता था. अम्मा को तुरंत शक हो जाता था. उठतीं और टॉर्च जलाकर देखतीं फ्रॉक़ थोड़ी ऊपर उठ जाने से घुटने की चोट दिख जाती थी, जिसमें पाटी से दुखकर खून रिस आया होता था. अम्मा बोलीं “ये चोट कैसे लगी रे?” “गिर गए थे” हम भर्राई आवाज़ में रुलाई रोकते-रोकते कहते. “साइकिल से गिर गए थे बोल” मैं हाँ में सर हिलाती और सर झुकाकर, आँख बंद करके उनकी मार का इंतज़ार करने लगती थी. लेकिन अम्मा तो अम्मा होती है. पट्टी ले आती थीं. अक्सर दिन की चोट पर अम्मा रात में पट्टी बाँधती. ये बात अलग है कि सबलोग सो रहे होते इसलिए चिल्लाकर तो नहीं, धीरे-धीरे बड़बड़ाती जातीं. वही बातें, जो ऊपर लिखी हैं🙂

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लिखि लिखि पतियाँ

एक बार फिर एक चिट्ठी…तुम्हारी याद आती नहीं, जाती जो नहीं…

आराधना का ब्लॉग

सुनो प्यार,

तुमने कहा था जाते-जाते कि शर्ट धुलवाकर और प्रेस करवाकर रख देना। अगली बार आऊंगा तो पहनूँगा। लेकिन वो तबसे टंगी है अलगनी पर, वैसी ही गन्दी, पसीने की सफ़ेद लकीरों से सजी। मैंने नहीं धुलवाई।

उससे तुम्हारी खुशबू जो आती है।

*** *** ***

तुम्हारा रुमाल, जो छूट गया था पिछली बार टेबल पर। भाई के आने पर उसे मैंने किताबों के पीछे छिपा दिया था। आज जब किताबें उठाईं पढ़ने को, वो रूमाल मिला।

मैंने किताबें वापस रख दीं। अब रूमाल पढ़ रही हूँ।

*** *** ***

तुम्हारी तस्वीर जो लगा रखी है मैंने दीवार पर, उसे देखकर ट्यूशन पढ़ने आये लड़के ने पूछा, “ये कौन हैं आपके” मुझसे कुछ कहते नहीं बना।

सोचा कि अगली बार आओगे, तो तुम्हीं से पूछ लूँगी।

*** *** ***

सुनो, पिछली बार तुमने जो बादाम खरीदकर रख दिए थे और कहा था कि रोज़ खाना। उनमें घुन लग गए…

View original post 144 और  शब्द

फेसबुक, ज़िंदगी, अवसाद और आत्महत्या

पिछले एक महीने में फेसबुक की दो महिला मित्रों की आत्महत्या की खबर ने अंदर तक हिलाकर रख दिया है. समझ में नहीं आता कि ज़िंदगी से भरी, नियमित फेसबुक अपडेट्स करने वाली लड़कियों को आखिर किस दुःख ने ज़िंदगी खत्म करने को मजबूर किया होगा? वो बात इतनी मामूली तो नहीं ही हो सकती कि ज़िंदगी उसके सामने हल्की पड़ जाय. कुछ भी हो इस बात को किसी के व्यक्तित्व की कमजोरी मानकर खारिज नहीं किया जा सकता.

इस तरह की आत्महत्या की घटनाओं के पीछे अक्सर अवसाद ही उत्तरदायी होता है. और अन्य मानसिक स्थितियों की तरह ही अवसाद को लेकर हमारे समाज में तरह-तरह की भ्रान्तियाँ हैं. बहुत से लोग तो यह मान बैठते हैं कि अवसाद कोई ऐसी भयानक बीमारी है, जिससे पीड़ित व्यक्ति अजीब सी हरकतें करता है और इससे पता चल जाता है कि अवसादग्रस्त है. जबकि एक बेहद सामान्य सा लगने वाला इंसान भी अवसादग्रस्त हो सकता है. लक्षण इतने सूक्ष्म होते हैं कि उसके व्यक्तित्व में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आता. अक्सर हमारे बीच बैठा हँसता-बोलता, चुटकुले सुनाता इंसान भी अवसादग्रस्त होता है और उसके करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों को भी यह बात पता नहीं होती. कई बार तो खुद रोगी को ही यह पता नहीं होता कि वह डिप्रेशन में है.

हम अक्सर डिप्रेशन को कमजोरी की निशानी मानकर उस पर बात नहीं करना चाहते. लेकिन मुझे लगता है कि अपना अनुभव साझा करने से कुछ लोगों को मदद मिल सकती है, खासकर उनलोगों को, जो खुद यह नहीं समझ पाते या समझकर भी मानने को तैयार नहीं होते कि वे अवसादग्रस्त हैं. मैं यहाँ इस विषय में अपना अनुभव साझा करना चाहूँगी. स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जब मैंने एम.ए. में प्रवेश लिया था, उस समय मेरे जीवन में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ आयीं कि मैं अवसादग्रस्त हो गयी. कारण बहुत से थे- आर्थिक संकट, दीदी, जिसने मुझे माँ की तरह पाला और जो मेरी सबसे अच्छी सहेली हैं, उनकी शादी हो जाना और पेट की लंबी बीमारी. मेस के खाने से मुझे amoebiasis नामक बीमारी हो गयी थी. उसके कारण लगभग दो-तीन साल तक लगातार पेट दर्द रहा. इलाज के बाद पेट तो ठीक हो गया, लेकिन दर्द नहीं गया. आखिर में मेरी एक मित्र मुझे एक न्यूरोलॉजिस्ट के पास ले गयीं. डॉक्टर ने कहा कि इसे डिप्रेशन है, तो मेरी मित्र आश्चर्य में पड़ गयीं. उन्होंने कहा “इतनी बैलेंस्ड लड़की डिप्रेस्ड कैसे हो सकती है?” तो डॉक्टर ने कहा कि “अक्सर बैलेंस बनाने के चक्कर में लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं”

उस समय मुझे नहीं बताया गया था कि मुझे ऐसी कोई समस्या है. मेरे दो मित्र मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रहे थे. उनमें से एक समर ने मेरी दवाइयों का प्रेसक्रिप्शन देखकर मुझे बताया कि ये दवाईयाँ तो डिप्रेशन की हैं. दूसरी मित्र ने बताया कि तुम्हें साइकोफिज़िकल प्रॉब्लम है. मैं यह सोचकर हैरान थी कि दिमागी परेशानी शरीर पर इतना बुरा प्रभाव डाल सकती है. मैं एक खिलाड़ी रही थी और उस बीमारी के पहले मैं कभी इतनी बीमार नहीं पड़ी थी. खैर, मुझे तभी पता चला कि मानसिक बीमारी कभी भी किसी को भी हो सकती है.

मेरे दोस्तों ने मेरा उस समय बहुत साथ दिया. मुझे कभी-कभी आत्महत्या का ख़याल भी आता था, लेकिन खुद को सँभाल लेती थी, ये सोचकर कि ये सब डिप्रेशन के कारण है और मुझे इस बीमारी से हार नहीं माननी है.. मेरे साइकोलॉजी वाले दोनों दोस्तों ने हॉस्टल की सहेलियों से कह रखा था कि मुझे एक मिनट के लिए भी अकेला न छोड़ें. ये बात मुझे बाद में पता चली. समर अक्सर मेरी काउंसलिंग के लिए बाहर मिलता था और ये बात समझने की कोशिश करता कि आखिर मुझे सबसे ज़्यादा कौन सी बात सता रही है. मेरी पेट की बीमारी के समय मेरी दो सबसे करीबी सहेलियों पूजा और चैंडी ने मेरा बहुत ध्यान रखा. उस समय दोस्तों के साथ ने धीरे-धीरे मुझे गहरे अवसाद से बाहर निकाल लिया. हालांकि दवाएँ नहीं छूटीं. मैं अब भी दवाएँ ले रही हूँ. पर उन्हें खुद ही रिड्यूस कर रही हूँ और धीरे-धीरे एक दिन ये दवाएँ भी छोड़ दूँगी.

अलग-अलग व्यक्ति के डिप्रेशन में जाने के कारण बिल्कुल भिन्न होते हैं, लेकिन सबसे प्रमुख कारण जो मुझे समझ में आता है, वह है अकेलापन. कभी-कभी दोस्तों से घिरे होते हुए भी हम बिल्कुल अकेले हो जाते हैं क्योंकि कोई भी दोस्त हमें इतना अपना नहीं लगता, जिससे अपनी बेहद व्यक्तिगत या बचकानी समस्या साझी की जा सके. कभी-कभी सारे दोस्त छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं या अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं. कई बार तो पति-पत्नी भी एक-दूसरे से हर बात शेयर नहीं कर पाते.

हज़ार कारण है डिप्रेशन में जाने के, लेकिन किसी को गहरे अवसाद में जाने से रोकने का एक ही उपाय है- अपने दिल की बात साझा करना. जिन्हें लगने लगा है कि वो ज़िंदगी को लेकर निगेटिव होने लगे हैं, उन्हें दोस्तों से और परिवार वालों से बात करना चाहिए और अगर कोई नहीं है तो लिखना चाहिए-डायरी में, ब्लॉग पर फेसबुक पर या कहीं भी.

लेकिन इतना भी काफी नहीं है. ज़्यादा सावधान तो परिवारवालों और दोस्तों को होना चाहिए. डिप्रेशन के कोई प्रकट लक्षण नहीं होते, एक सायकायट्रिस्ट ही पता कर सकता है कि कोई डिप्रेशन में है या नहीं. आप सिर्फ इतना कर सकते हैं कि अपने किसी दोस्त को एकदम से अकेला न छोड़ें. खासकर उन दोस्तों को जो बहुत अधिक संवेदनशील हैं और अकेले रहते हैं. आप ये सोचकर मत बैठिये कि वे डिस्टर्ब होंगे. अगर लगता है कि कोई डिप्रेशन में जा सकता है तो उससे बार-बार बात कीजिये. भले ही वह मना करे. उसकी परेशानी का कारण मत पूछिए, बस इधर-उधर की हल्की-फुल्की बात कीजिये. उसे यह एहसास दिलाइये कि आप उसके साथ हैं.

सबसे ज़रूरी बात – अगर आपको लगता है कि आप अपनी ज़िंदगी में खुश हैं, संतुष्ट हैं, तो खुशियाँ बाँटिए. हो सकता है कि आपका कुछ समय का साथ या थोड़ी सी हल्की-फुल्की बातें किसी का बड़ा सा दुःख दूर कर दें. अपने में सीमित मत रहिये. खुद को खोलिए, इतना कि दूसरा भी आपके सामने खुद को खोलने पर मजबूर हो जाय.

शोकगीत

तुमने मेरा साथ तब दिया, जब एक-एक करके सबने छोड़ दिया था. या तो दूसरी दुनिया में चले गए या इसी दुनिया में अपनी अलग दुनिया बना ली. तुम साथ रहीं तब, जबकि मैंने खुद को एक खोल में बंद कर लिया था, एक ऐसे टापू पर कैद हो गयी, जहाँ जाने के लिए न कोई नौका थी न पुल…तब तुम ही थीं मेरी साथी सिर्फ तुम.

तुमने मुझे हँसाया, रुलाया, गुदगुदाया, बहलाया. दिन भर चौबीस घंटे जब भी चाहा मैंने तुम मेरे सामने हाज़िर रहीं, मेरे पास…तुमने कभी शिकायत नहीं की, न ही किया तंग बस एक बार को छोड़कर जब एक शरारती बच्चे ने तुमको छेड़कर नाराज़ कर दिया था…थोड़ी तबीयत नासाज़ हुयी तुम्हारी…लेकिन बस एक बार.

मैंने भी तो कितना प्यार किया तुमसे. जबकि सबने कहा कि छोड़ दो इसे…आगे बढ़ो, देखो दुनिया कहाँ से कहाँ चली गयी और तुम अभी इस पुरानी सी चीज़ से चिपकी हुयी हो. पर कैसे छोड़ देती तुम्हें मैं? आदत ही नहीं मेरी इस्तेमाल करके फेंक देने की, न चीज़ों को, न लोगों को, न रिश्तों को…

तुम साथी थीं मेरे अकेलेपन की. याद है मुझे बाऊ के देहांत के बाद चिपकी रहती थी मैं तुमसे रात-दिन और तुम बाँट लेती मेरे दुःख किसी पुरानी सहेली सी. कितनी ही पुरानी यादों, फिल्मों, फ़िल्मी गीतों को साथ-साथ गाया गुनगुनाया हमने…जबकि बह रहे होते थे आँसू, अचानक से आ जाती मुस्कान तुम पे कोई कॉमेडी फिल्म या सीरियल देखकर.

मैंने कई बार औरों से कहा पर तुमसे नहीं. आज कह रही हूँ मेरी प्यारी चौदह इंची की बुश टीवी! मुझे तुमसे बहुत प्यार है. इतना कि मैं बता नहीं सकती शब्दों में उसे. लोग कहते हैं कि चीजों से इस तरह प्यार करना मनोरोग है. पर क्या करूँ मैं मुझे तो घर के दरवाजों, बालकनी और दीवारों से प्यार है. इस शहर की गलियों, सड़कों, इमारतों और मीनारों से प्यार है और प्यार है हर उस शहर से जहाँ रही हूँ मैं. हर उस चीज़ से, जो मेरे साथ रही.

तुमसे प्यार है क्योंकि तुम मेरी कमाई से खरीदी हुयी पहली “उपभोक्ता वस्तु” हो. लेकिन मैंने कभी तुम्हें वस्तु नहीं माना और न उपभोग की चीज़. मेरे लिए हमेशा ही तुम मेरी सहेली रहीं…तुम ज़रूरत थीं मेरी, मगर मैंने तुम्हें अपनी ज़रूरत भी नहीं माना…माना केवल एक साथी.

जानती हूँ हर चीज़ नहीं होती हमेशा के लिए. संसार क्षण भंगुर है, लोग भी और चीज़ें भी. जैसे एक-एक करके अम्मा-बाऊ, चाचा, मेरे सर, मेरी प्यारी सहेली इस दुनिया से चले गए, तुम भी छोड़ गयीं साथ मेरा. और देखो तो मेरी प्यारी सखी, मैं तुमसे यह भी नहीं कह सकती कि दूसरी दुनिया में खुश रहना क्योंकि चीजों के लिए दूसरी दुनिया होती ही कहाँ है? क्योंकि उनकी आत्मा नहीं होती. वे तो कल-पुर्जों को जोड़कर बनाई गयी मशीन होती है. पर सोचती हूँ क्या इंसान के पास होती है आत्मा-वात्मा जैसी कोई चीज़ या वह भी कल-पुर्जों का गट्ठर मात्र होता है और याद करती हूँ चार्वाक को.

बीते साढ़े नौ सालों से साथ देने वाली तुम जब कुछ दिन बीमार रहकर चल बसीं, तो समझ में नहीं आया कि क्या करूँ तुम्हारा? दफना नहीं सकती क्योंकि टीवियों का कोई कब्रिस्तान भी तो नहीं होता. नहीं तो अंतिम संस्कार कर एक बड़े पत्थर पर तस्वीर लगाती तुम्हारी फ्रेम करके. जला भी तो नहीं सकती कि तुम ज़हरीली गैस छोड़ोगी और मुझे पसंद नहीं आएगा कि मेरी प्यारी टीवी को कोई प्रदूषण कारक समझे. कबाड़ में भी नहीं दे सकती तुमको. अब तुम ही कहो क्या करूँ?

चाहती नहीं तुम्हें खुद से दूर करना, पर करना पड़ता है. छोड़कर लोगों को, शहरों को, चीज़ों को आगे तो बढ़ना पड़ता है. तो मैं भी बढ़ गयी मेरी प्यारी टीवी और तुम्हारा काम सौंप दिया है किसी और को. लेकिन मुझे अब कोई दुःख नहीं क्योंकि तुम दुखी नहीं हो. तुम तो मर चुकी हो. WP_20150410_13_17_18_Pro

शुक्रिया दोस्त, इंसानियत पर मेरा भरोसा बनाये रखने के लिए

बात तब की है, जब मैं इलाहाबाद में पढ़ती थी और वहाँ से आजमगढ़ के गाँव में स्थित अपने घर अक्सर अकेली आती-जाती थी. मैं बचपन से एक छोटे शहर में पली-बढ़ी थी, और वह भी रेलवे स्टेशन के आसपास जहाँ कभी रात नहीं होती. मेरे लिए बहुत मुश्किल था बस से इलाहाबाद से आजमगढ़ और वहाँ से तीस किलोमीटर दूर एकदम धुर गाँव में जाना. शाम होते ही कस्बों और गाँव में चहल-पहल कम होने लगती थी. सर्दियों में काफी परेशानी होती थी क्योंकि गाँव पहुँचते-पहुँचते अक्सर अँधेरा हो जाता था. और उस पर भी शहर से गाँव जाने में कम से कम तीन जगह सवारियाँ बदलनी पड़तीं. जल्दी सवारियाँ मिलती नहीं थीं. कभी-कभी घंटों इंतज़ार करना पड़ता. इन सब कठिनाइयों से बचने के लिए मैं इलाहाबाद से एकदम सुबह लगभग साढ़े पाँच-छः बजे निकलती, लेकिन तब भी देर हो ही जाती.

उस दिन भी ऐसा ही हुआ. मैं अकेली गाँव से लगभग पन्द्रह किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बे में पहुँच गयी, लेकिन वहाँ से कोई सवारी नहीं मिल रही थी. मैं टैक्सी स्टैंड (टैक्सी का मतलब उस क्षेत्र में जीप ही होता है) पर खड़ी थी. अचानक एक जीप मेरे पास आकर रुकी. ड्राइवर ने पूछा कहाँ जाना है. मैंने गंतव्य बताया तो बोला ‘बैठ जाइए, हम उधर ही जा रहे हैं. छोड़ देंगे.’ उनका कहने का मतलब शायद यह था कि वे रोज़ सवारियाँ नहीं ढोते. जीप में और भी कई लोग बैठे थे. एक महिला भी थीं, तो मैं बैठ गयी.

मुश्किल तब शुरू हुयी, जब धीरे-धीरे एक-एक करके सारी सवारियाँ रास्ते में उतर गयीं. सर्दियों का समय था. साढ़े छः बजे से ही अँधेरा घिरने लगा था. मैं अपने गंतव्य से आधी दूरी पर ही थी कि जीप पूरी खाली हो गयी और बाहर अँधेरा भी हो गया. जीप में केवल ड्राइवर, क्लीनर और मैं बची. एक ओर तो मन में धुकधुकी लगी थी ऊपर से ड्राइवर की वेशभूषा और डरा रही थी. वह एक छः फुट का लंबा-तगड़ा नौजवान था. मूंछें तो उधर मर्द होने की निशानी मानी ही जाती हैं, उस पर भी जनाब पान चबाये जा रहे थे…मतलब विलेन के सारे गुण मौजूद थे बंदे में.

पता नहीं उन्हें खुद के बारे में बताने का शौक था या मुझे थोड़ा सकुचाया हुआ देखकर उन्होंने बात करनी शुरू कर दी. बताया कि यह जीप उन्हीं की है (कहने का मतलब यह कि “ड्राइवर” नहीं है) उनकी कई जीपें इलाके में सट्टे पर जाती हैं. रोज़ वाली सवारियाँ ढोने के लिए के जीप नहीं देते क्योंकि उससे गाड़ी कबाड़ा हो जाती है और बहुत झंझटी काम है . मुझे उनकी बातें सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन इससे माहौल तो कुछ हल्का हो ही रहा था.

बता दूँ कि मैं जब शुरू में गाँव गयी थी तो मुझे उस क्षेत्र के लड़कों से एक चिढ़ जैसी हो गयी थी. लड़कियों को देखते ही उनकी निगाहें मधुमक्खी की तरह उनसे चिपक जाया करती हैं. मुझे सारे ही बड़े ‘चीप’ लगते थे. क्षेत्रवाद मेरे अंदर कूट-कूटकर भरा था. मुझे लगता था कि लखनऊ के आसपास के लड़के ज़्यादा सभ्य होते हैं. ये तो बहुत बाद में पता चला कि लड़के हर जगह के एक ही जैसे होते हैं. लेकिन इसमें गलती उनकी नहीं उनकी ‘कंडीशनिंग’ की होती है. जी हाँ, ‘नारीवाद’ का अध्ययन करने के बाद मुझे अक्ल आयी कि लड़कों का छिछोरापन भी समाजीकरण की देन है.

पर उस समय मुझे वे महाशय एकदम “छिछोरे,” मुम्बईया बोली में “टपोरी” और दिल्ली की भाषा में “वेल्ले” लग रहे थे. मुझे लग रहा था कि ये अपनी कहानी सुनाने के बाद मेरे बारे में ज़रूर पूछेंगे और वैसा ही हुआ. मैंने उनके सभी सवालों के जवाब दिए क्योंकि मेरे पास और कोई चारा ही नहीं था. पहले उनको लग रहा था कि मैं आजमगढ़ शहर से ही अपने गाँव आ रही हूँ. जब उन्होंने यह सुना कि मैं इलाहाबाद में पढ़ती हूँ तो खुश हो गए. उन्हें बहुत अच्छा लगा कि एकदम इंटीरियर के एक गाँव की लड़की इलाहाबाद जैसे बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ती है क्योंकि मैंने उन्हें यह नहीं बताया था कि यहाँ पली-बढ़ी ही नहीं हूँ. गाँव में होती तो शायद सर पटककर मर जाती और कभी वहाँ पढ़ने का सपना पूरा न होता.

वे पलट-पलटकर बातें कर रहे थे और मैं डर रही थी कि कहीं जीप ही न पलट जाए. अब भी मेरा डर पूरी तरह गया नहीं था. मैं अपने गंतव्य से कुछ ही किलोमीटर दूर थी कि उन्होंने गाँव का नाम पूछा. पहले मैं थोड़ा हिचकी लेकिन फिर बता दिया. मेरा गंतव्य गाँव से तीन किलोमीटर पहले था, फिर वहाँ से मुझे पैदल घर तक जाना था. तब मेरे गाँव के पास तक जीपें जाती ही नहीं थीं क्योंकि सड़क बहुत खराब थी और गाँव एक तरफ पड़ जाता था किसी मुख्य सड़क से नहीं जुड़ा था. ड्राइवर साहब ने मुझसे कहा कि उन्हें भी उधर ही जाना है और वे मुझे गाँव के बगल में छोड़ देंगे. मैंने उन्हें मना भी किया पर वे माने नहीं.

जब तक मैं अपने गाँव पहुँच नहीं गयी, मेरा डर दूर नहीं हुआ. आश्वस्त मैं तब हुयी, जब उन्होंने मुझे गाँव के बगल में छोड़ा और मेरे थोड़ी दूर निकल जाने पर जीप घुमा ली. तब मुझे पता चला कि उन्होंने मुझसे झूठ कहा था कि मुझे उसी तरफ जाना है. वे सिर्फ मुझे छोड़ने मेरे गाँव तक आये और मेरी कृतघ्नता देखिये कि मैंने उनका आभार नहीं व्यक्त किया. बातचीत में वे तीन-चार बार कह चुके थे कि अपने इलाके की हैं तो आप बहन ही हुईं न और मैंने उन्हें पलटकर एक बार भी “हाँ, भईया” नहीं कहा. पता नहीं क्या हुआ कि इस बात से मेरी आँखों में आँसू आ गए. कृतज्ञता के आँसू. मानव के प्रति सहज प्रेम के आँसू. मुझे उन पर विश्वास नहीं था, या घर पहुँचने की जल्दी थी या उस क्षेत्र के लड़कों के प्रति मेरी नफ़रत , किसने मुझे रोका? मैं नहीं जानती लेकिन मुझे आभार व्यक्त करना चाहिए था.

न जाने कितनी बार ऐसे ही बिना स्वार्थ के लड़कों ने मेरी मदद की है. आजमगढ़ से इलाहाबाद और इलाहाबाद से आजमगढ़ की यात्राएँ ऐसी तमाम कहानियाँ समेटे हुए हैं. पर यह कहानी सबसे अलग है. इसने मुझे पुरुषों को एक अलग नज़रिए से देखने की नयी दृष्टि दी. यह सिखाया कि वेशभूषा हमेशा ही चरित्र का आइना नहीं हुआ करती. यह बताया कि सभी बक-बक करने वाले गहराई से सोचते न हों, ऐसा नहीं होता. और यह भी जनाया कि मदद करने वाले कहीं भी मिल जाते हैं. इस घटना को याद करके आज भी दिल में टीस उठती है कि काश वे फिर मिल जाते और मैं उनसे कह पाती “शुक्रिया दोस्त, इंसानियत में मेरा भरोसा बनाए रखने के लिए.”

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