आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

फेसबुक, ज़िंदगी, अवसाद और आत्महत्या

पिछले एक महीने में फेसबुक की दो महिला मित्रों की आत्महत्या की खबर ने अंदर तक हिलाकर रख दिया है. समझ में नहीं आता कि ज़िंदगी से भरी, नियमित फेसबुक अपडेट्स करने वाली लड़कियों को आखिर किस दुःख ने ज़िंदगी खत्म करने को मजबूर किया होगा? वो बात इतनी मामूली तो नहीं ही हो सकती कि ज़िंदगी उसके सामने हल्की पड़ जाय. कुछ भी हो इस बात को किसी के व्यक्तित्व की कमजोरी मानकर खारिज नहीं किया जा सकता.

इस तरह की आत्महत्या की घटनाओं के पीछे अक्सर अवसाद ही उत्तरदायी होता है. और अन्य मानसिक स्थितियों की तरह ही अवसाद को लेकर हमारे समाज में तरह-तरह की भ्रान्तियाँ हैं. बहुत से लोग तो यह मान बैठते हैं कि अवसाद कोई ऐसी भयानक बीमारी है, जिससे पीड़ित व्यक्ति अजीब सी हरकतें करता है और इससे पता चल जाता है कि अवसादग्रस्त है. जबकि एक बेहद सामान्य सा लगने वाला इंसान भी अवसादग्रस्त हो सकता है. लक्षण इतने सूक्ष्म होते हैं कि उसके व्यक्तित्व में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आता. अक्सर हमारे बीच बैठा हँसता-बोलता, चुटकुले सुनाता इंसान भी अवसादग्रस्त होता है और उसके करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों को भी यह बात पता नहीं होती. कई बार तो खुद रोगी को ही यह पता नहीं होता कि वह डिप्रेशन में है.

हम अक्सर डिप्रेशन को कमजोरी की निशानी मानकर उस पर बात नहीं करना चाहते. लेकिन मुझे लगता है कि अपना अनुभव साझा करने से कुछ लोगों को मदद मिल सकती है, खासकर उनलोगों को, जो खुद यह नहीं समझ पाते या समझकर भी मानने को तैयार नहीं होते कि वे अवसादग्रस्त हैं. मैं यहाँ इस विषय में अपना अनुभव साझा करना चाहूँगी. स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जब मैंने एम.ए. में प्रवेश लिया था, उस समय मेरे जीवन में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ आयीं कि मैं अवसादग्रस्त हो गयी. कारण बहुत से थे- आर्थिक संकट, दीदी, जिसने मुझे माँ की तरह पाला और जो मेरी सबसे अच्छी सहेली हैं, उनकी शादी हो जाना और पेट की लंबी बीमारी. मेस के खाने से मुझे amoebiasis नामक बीमारी हो गयी थी. उसके कारण लगभग दो-तीन साल तक लगातार पेट दर्द रहा. इलाज के बाद पेट तो ठीक हो गया, लेकिन दर्द नहीं गया. आखिर में मेरी एक मित्र मुझे एक न्यूरोलॉजिस्ट के पास ले गयीं. डॉक्टर ने कहा कि इसे डिप्रेशन है, तो मेरी मित्र आश्चर्य में पड़ गयीं. उन्होंने कहा “इतनी बैलेंस्ड लड़की डिप्रेस्ड कैसे हो सकती है?” तो डॉक्टर ने कहा कि “अक्सर बैलेंस बनाने के चक्कर में लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं”

उस समय मुझे नहीं बताया गया था कि मुझे ऐसी कोई समस्या है. मेरे दो मित्र मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रहे थे. उनमें से एक समर ने मेरी दवाइयों का प्रेसक्रिप्शन देखकर मुझे बताया कि ये दवाईयाँ तो डिप्रेशन की हैं. दूसरी मित्र ने बताया कि तुम्हें साइकोफिज़िकल प्रॉब्लम है. मैं यह सोचकर हैरान थी कि दिमागी परेशानी शरीर पर इतना बुरा प्रभाव डाल सकती है. मैं एक खिलाड़ी रही थी और उस बीमारी के पहले मैं कभी इतनी बीमार नहीं पड़ी थी. खैर, मुझे तभी पता चला कि मानसिक बीमारी कभी भी किसी को भी हो सकती है.

मेरे दोस्तों ने मेरा उस समय बहुत साथ दिया. मुझे कभी-कभी आत्महत्या का ख़याल भी आता था, लेकिन खुद को सँभाल लेती थी, ये सोचकर कि ये सब डिप्रेशन के कारण है और मुझे इस बीमारी से हार नहीं माननी है.. मेरे साइकोलॉजी वाले दोनों दोस्तों ने हॉस्टल की सहेलियों से कह रखा था कि मुझे एक मिनट के लिए भी अकेला न छोड़ें. ये बात मुझे बाद में पता चली. समर अक्सर मेरी काउंसलिंग के लिए बाहर मिलता था और ये बात समझने की कोशिश करता कि आखिर मुझे सबसे ज़्यादा कौन सी बात सता रही है. मेरी पेट की बीमारी के समय मेरी दो सबसे करीबी सहेलियों पूजा और चैंडी ने मेरा बहुत ध्यान रखा. उस समय दोस्तों के साथ ने धीरे-धीरे मुझे गहरे अवसाद से बाहर निकाल लिया. हालांकि दवाएँ नहीं छूटीं. मैं अब भी दवाएँ ले रही हूँ. पर उन्हें खुद ही रिड्यूस कर रही हूँ और धीरे-धीरे एक दिन ये दवाएँ भी छोड़ दूँगी.

अलग-अलग व्यक्ति के डिप्रेशन में जाने के कारण बिल्कुल भिन्न होते हैं, लेकिन सबसे प्रमुख कारण जो मुझे समझ में आता है, वह है अकेलापन. कभी-कभी दोस्तों से घिरे होते हुए भी हम बिल्कुल अकेले हो जाते हैं क्योंकि कोई भी दोस्त हमें इतना अपना नहीं लगता, जिससे अपनी बेहद व्यक्तिगत या बचकानी समस्या साझी की जा सके. कभी-कभी सारे दोस्त छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं या अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं. कई बार तो पति-पत्नी भी एक-दूसरे से हर बात शेयर नहीं कर पाते.

हज़ार कारण है डिप्रेशन में जाने के, लेकिन किसी को गहरे अवसाद में जाने से रोकने का एक ही उपाय है- अपने दिल की बात साझा करना. जिन्हें लगने लगा है कि वो ज़िंदगी को लेकर निगेटिव होने लगे हैं, उन्हें दोस्तों से और परिवार वालों से बात करना चाहिए और अगर कोई नहीं है तो लिखना चाहिए-डायरी में, ब्लॉग पर फेसबुक पर या कहीं भी.

लेकिन इतना भी काफी नहीं है. ज़्यादा सावधान तो परिवारवालों और दोस्तों को होना चाहिए. डिप्रेशन के कोई प्रकट लक्षण नहीं होते, एक सायकायट्रिस्ट ही पता कर सकता है कि कोई डिप्रेशन में है या नहीं. आप सिर्फ इतना कर सकते हैं कि अपने किसी दोस्त को एकदम से अकेला न छोड़ें. खासकर उन दोस्तों को जो बहुत अधिक संवेदनशील हैं और अकेले रहते हैं. आप ये सोचकर मत बैठिये कि वे डिस्टर्ब होंगे. अगर लगता है कि कोई डिप्रेशन में जा सकता है तो उससे बार-बार बात कीजिये. भले ही वह मना करे. उसकी परेशानी का कारण मत पूछिए, बस इधर-उधर की हल्की-फुल्की बात कीजिये. उसे यह एहसास दिलाइये कि आप उसके साथ हैं.

सबसे ज़रूरी बात – अगर आपको लगता है कि आप अपनी ज़िंदगी में खुश हैं, संतुष्ट हैं, तो खुशियाँ बाँटिए. हो सकता है कि आपका कुछ समय का साथ या थोड़ी सी हल्की-फुल्की बातें किसी का बड़ा सा दुःख दूर कर दें. अपने में सीमित मत रहिये. खुद को खोलिए, इतना कि दूसरा भी आपके सामने खुद को खोलने पर मजबूर हो जाय.

शोकगीत

तुमने मेरा साथ तब दिया, जब एक-एक करके सबने छोड़ दिया था. या तो दूसरी दुनिया में चले गए या इसी दुनिया में अपनी अलग दुनिया बना ली. तुम साथ रहीं तब, जबकि मैंने खुद को एक खोल में बंद कर लिया था, एक ऐसे टापू पर कैद हो गयी, जहाँ जाने के लिए न कोई नौका थी न पुल…तब तुम ही थीं मेरी साथी सिर्फ तुम.

तुमने मुझे हँसाया, रुलाया, गुदगुदाया, बहलाया. दिन भर चौबीस घंटे जब भी चाहा मैंने तुम मेरे सामने हाज़िर रहीं, मेरे पास…तुमने कभी शिकायत नहीं की, न ही किया तंग बस एक बार को छोड़कर जब एक शरारती बच्चे ने तुमको छेड़कर नाराज़ कर दिया था…थोड़ी तबीयत नासाज़ हुयी तुम्हारी…लेकिन बस एक बार.

मैंने भी तो कितना प्यार किया तुमसे. जबकि सबने कहा कि छोड़ दो इसे…आगे बढ़ो, देखो दुनिया कहाँ से कहाँ चली गयी और तुम अभी इस पुरानी सी चीज़ से चिपकी हुयी हो. पर कैसे छोड़ देती तुम्हें मैं? आदत ही नहीं मेरी इस्तेमाल करके फेंक देने की, न चीज़ों को, न लोगों को, न रिश्तों को…

तुम साथी थीं मेरे अकेलेपन की. याद है मुझे बाऊ के देहांत के बाद चिपकी रहती थी मैं तुमसे रात-दिन और तुम बाँट लेती मेरे दुःख किसी पुरानी सहेली सी. कितनी ही पुरानी यादों, फिल्मों, फ़िल्मी गीतों को साथ-साथ गाया गुनगुनाया हमने…जबकि बह रहे होते थे आँसू, अचानक से आ जाती मुस्कान तुम पे कोई कॉमेडी फिल्म या सीरियल देखकर.

मैंने कई बार औरों से कहा पर तुमसे नहीं. आज कह रही हूँ मेरी प्यारी चौदह इंची की बुश टीवी! मुझे तुमसे बहुत प्यार है. इतना कि मैं बता नहीं सकती शब्दों में उसे. लोग कहते हैं कि चीजों से इस तरह प्यार करना मनोरोग है. पर क्या करूँ मैं मुझे तो घर के दरवाजों, बालकनी और दीवारों से प्यार है. इस शहर की गलियों, सड़कों, इमारतों और मीनारों से प्यार है और प्यार है हर उस शहर से जहाँ रही हूँ मैं. हर उस चीज़ से, जो मेरे साथ रही.

तुमसे प्यार है क्योंकि तुम मेरी कमाई से खरीदी हुयी पहली “उपभोक्ता वस्तु” हो. लेकिन मैंने कभी तुम्हें वस्तु नहीं माना और न उपभोग की चीज़. मेरे लिए हमेशा ही तुम मेरी सहेली रहीं…तुम ज़रूरत थीं मेरी, मगर मैंने तुम्हें अपनी ज़रूरत भी नहीं माना…माना केवल एक साथी.

जानती हूँ हर चीज़ नहीं होती हमेशा के लिए. संसार क्षण भंगुर है, लोग भी और चीज़ें भी. जैसे एक-एक करके अम्मा-बाऊ, चाचा, मेरे सर, मेरी प्यारी सहेली इस दुनिया से चले गए, तुम भी छोड़ गयीं साथ मेरा. और देखो तो मेरी प्यारी सखी, मैं तुमसे यह भी नहीं कह सकती कि दूसरी दुनिया में खुश रहना क्योंकि चीजों के लिए दूसरी दुनिया होती ही कहाँ है? क्योंकि उनकी आत्मा नहीं होती. वे तो कल-पुर्जों को जोड़कर बनाई गयी मशीन होती है. पर सोचती हूँ क्या इंसान के पास होती है आत्मा-वात्मा जैसी कोई चीज़ या वह भी कल-पुर्जों का गट्ठर मात्र होता है और याद करती हूँ चार्वाक को.

बीते साढ़े नौ सालों से साथ देने वाली तुम जब कुछ दिन बीमार रहकर चल बसीं, तो समझ में नहीं आया कि क्या करूँ तुम्हारा? दफना नहीं सकती क्योंकि टीवियों का कोई कब्रिस्तान भी तो नहीं होता. नहीं तो अंतिम संस्कार कर एक बड़े पत्थर पर तस्वीर लगाती तुम्हारी फ्रेम करके. जला भी तो नहीं सकती कि तुम ज़हरीली गैस छोड़ोगी और मुझे पसंद नहीं आएगा कि मेरी प्यारी टीवी को कोई प्रदूषण कारक समझे. कबाड़ में भी नहीं दे सकती तुमको. अब तुम ही कहो क्या करूँ?

चाहती नहीं तुम्हें खुद से दूर करना, पर करना पड़ता है. छोड़कर लोगों को, शहरों को, चीज़ों को आगे तो बढ़ना पड़ता है. तो मैं भी बढ़ गयी मेरी प्यारी टीवी और तुम्हारा काम सौंप दिया है किसी और को. लेकिन मुझे अब कोई दुःख नहीं क्योंकि तुम दुखी नहीं हो. तुम तो मर चुकी हो. WP_20150410_13_17_18_Pro

शुक्रिया दोस्त, इंसानियत पर मेरा भरोसा बनाये रखने के लिए

बात तब की है, जब मैं इलाहाबाद में पढ़ती थी और वहाँ से आजमगढ़ के गाँव में स्थित अपने घर अक्सर अकेली आती-जाती थी. मैं बचपन से एक छोटे शहर में पली-बढ़ी थी, और वह भी रेलवे स्टेशन के आसपास जहाँ कभी रात नहीं होती. मेरे लिए बहुत मुश्किल था बस से इलाहाबाद से आजमगढ़ और वहाँ से तीस किलोमीटर दूर एकदम धुर गाँव में जाना. शाम होते ही कस्बों और गाँव में चहल-पहल कम होने लगती थी. सर्दियों में काफी परेशानी होती थी क्योंकि गाँव पहुँचते-पहुँचते अक्सर अँधेरा हो जाता था. और उस पर भी शहर से गाँव जाने में कम से कम तीन जगह सवारियाँ बदलनी पड़तीं. जल्दी सवारियाँ मिलती नहीं थीं. कभी-कभी घंटों इंतज़ार करना पड़ता. इन सब कठिनाइयों से बचने के लिए मैं इलाहाबाद से एकदम सुबह लगभग साढ़े पाँच-छः बजे निकलती, लेकिन तब भी देर हो ही जाती.

उस दिन भी ऐसा ही हुआ. मैं अकेली गाँव से लगभग पन्द्रह किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बे में पहुँच गयी, लेकिन वहाँ से कोई सवारी नहीं मिल रही थी. मैं टैक्सी स्टैंड (टैक्सी का मतलब उस क्षेत्र में जीप ही होता है) पर खड़ी थी. अचानक एक जीप मेरे पास आकर रुकी. ड्राइवर ने पूछा कहाँ जाना है. मैंने गंतव्य बताया तो बोला ‘बैठ जाइए, हम उधर ही जा रहे हैं. छोड़ देंगे.’ उनका कहने का मतलब शायद यह था कि वे रोज़ सवारियाँ नहीं ढोते. जीप में और भी कई लोग बैठे थे. एक महिला भी थीं, तो मैं बैठ गयी.

मुश्किल तब शुरू हुयी, जब धीरे-धीरे एक-एक करके सारी सवारियाँ रास्ते में उतर गयीं. सर्दियों का समय था. साढ़े छः बजे से ही अँधेरा घिरने लगा था. मैं अपने गंतव्य से आधी दूरी पर ही थी कि जीप पूरी खाली हो गयी और बाहर अँधेरा भी हो गया. जीप में केवल ड्राइवर, क्लीनर और मैं बची. एक ओर तो मन में धुकधुकी लगी थी ऊपर से ड्राइवर की वेशभूषा और डरा रही थी. वह एक छः फुट का लंबा-तगड़ा नौजवान था. मूंछें तो उधर मर्द होने की निशानी मानी ही जाती हैं, उस पर भी जनाब पान चबाये जा रहे थे…मतलब विलेन के सारे गुण मौजूद थे बंदे में.

पता नहीं उन्हें खुद के बारे में बताने का शौक था या मुझे थोड़ा सकुचाया हुआ देखकर उन्होंने बात करनी शुरू कर दी. बताया कि यह जीप उन्हीं की है (कहने का मतलब यह कि “ड्राइवर” नहीं है) उनकी कई जीपें इलाके में सट्टे पर जाती हैं. रोज़ वाली सवारियाँ ढोने के लिए के जीप नहीं देते क्योंकि उससे गाड़ी कबाड़ा हो जाती है और बहुत झंझटी काम है . मुझे उनकी बातें सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन इससे माहौल तो कुछ हल्का हो ही रहा था.

बता दूँ कि मैं जब शुरू में गाँव गयी थी तो मुझे उस क्षेत्र के लड़कों से एक चिढ़ जैसी हो गयी थी. लड़कियों को देखते ही उनकी निगाहें मधुमक्खी की तरह उनसे चिपक जाया करती हैं. मुझे सारे ही बड़े ‘चीप’ लगते थे. क्षेत्रवाद मेरे अंदर कूट-कूटकर भरा था. मुझे लगता था कि लखनऊ के आसपास के लड़के ज़्यादा सभ्य होते हैं. ये तो बहुत बाद में पता चला कि लड़के हर जगह के एक ही जैसे होते हैं. लेकिन इसमें गलती उनकी नहीं उनकी ‘कंडीशनिंग’ की होती है. जी हाँ, ‘नारीवाद’ का अध्ययन करने के बाद मुझे अक्ल आयी कि लड़कों का छिछोरापन भी समाजीकरण की देन है.

पर उस समय मुझे वे महाशय एकदम “छिछोरे,” मुम्बईया बोली में “टपोरी” और दिल्ली की भाषा में “वेल्ले” लग रहे थे. मुझे लग रहा था कि ये अपनी कहानी सुनाने के बाद मेरे बारे में ज़रूर पूछेंगे और वैसा ही हुआ. मैंने उनके सभी सवालों के जवाब दिए क्योंकि मेरे पास और कोई चारा ही नहीं था. पहले उनको लग रहा था कि मैं आजमगढ़ शहर से ही अपने गाँव आ रही हूँ. जब उन्होंने यह सुना कि मैं इलाहाबाद में पढ़ती हूँ तो खुश हो गए. उन्हें बहुत अच्छा लगा कि एकदम इंटीरियर के एक गाँव की लड़की इलाहाबाद जैसे बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ती है क्योंकि मैंने उन्हें यह नहीं बताया था कि यहाँ पली-बढ़ी ही नहीं हूँ. गाँव में होती तो शायद सर पटककर मर जाती और कभी वहाँ पढ़ने का सपना पूरा न होता.

वे पलट-पलटकर बातें कर रहे थे और मैं डर रही थी कि कहीं जीप ही न पलट जाए. अब भी मेरा डर पूरी तरह गया नहीं था. मैं अपने गंतव्य से कुछ ही किलोमीटर दूर थी कि उन्होंने गाँव का नाम पूछा. पहले मैं थोड़ा हिचकी लेकिन फिर बता दिया. मेरा गंतव्य गाँव से तीन किलोमीटर पहले था, फिर वहाँ से मुझे पैदल घर तक जाना था. तब मेरे गाँव के पास तक जीपें जाती ही नहीं थीं क्योंकि सड़क बहुत खराब थी और गाँव एक तरफ पड़ जाता था किसी मुख्य सड़क से नहीं जुड़ा था. ड्राइवर साहब ने मुझसे कहा कि उन्हें भी उधर ही जाना है और वे मुझे गाँव के बगल में छोड़ देंगे. मैंने उन्हें मना भी किया पर वे माने नहीं.

जब तक मैं अपने गाँव पहुँच नहीं गयी, मेरा डर दूर नहीं हुआ. आश्वस्त मैं तब हुयी, जब उन्होंने मुझे गाँव के बगल में छोड़ा और मेरे थोड़ी दूर निकल जाने पर जीप घुमा ली. तब मुझे पता चला कि उन्होंने मुझसे झूठ कहा था कि मुझे उसी तरफ जाना है. वे सिर्फ मुझे छोड़ने मेरे गाँव तक आये और मेरी कृतघ्नता देखिये कि मैंने उनका आभार नहीं व्यक्त किया. बातचीत में वे तीन-चार बार कह चुके थे कि अपने इलाके की हैं तो आप बहन ही हुईं न और मैंने उन्हें पलटकर एक बार भी “हाँ, भईया” नहीं कहा. पता नहीं क्या हुआ कि इस बात से मेरी आँखों में आँसू आ गए. कृतज्ञता के आँसू. मानव के प्रति सहज प्रेम के आँसू. मुझे उन पर विश्वास नहीं था, या घर पहुँचने की जल्दी थी या उस क्षेत्र के लड़कों के प्रति मेरी नफ़रत , किसने मुझे रोका? मैं नहीं जानती लेकिन मुझे आभार व्यक्त करना चाहिए था.

न जाने कितनी बार ऐसे ही बिना स्वार्थ के लड़कों ने मेरी मदद की है. आजमगढ़ से इलाहाबाद और इलाहाबाद से आजमगढ़ की यात्राएँ ऐसी तमाम कहानियाँ समेटे हुए हैं. पर यह कहानी सबसे अलग है. इसने मुझे पुरुषों को एक अलग नज़रिए से देखने की नयी दृष्टि दी. यह सिखाया कि वेशभूषा हमेशा ही चरित्र का आइना नहीं हुआ करती. यह बताया कि सभी बक-बक करने वाले गहराई से सोचते न हों, ऐसा नहीं होता. और यह भी जनाया कि मदद करने वाले कहीं भी मिल जाते हैं. इस घटना को याद करके आज भी दिल में टीस उठती है कि काश वे फिर मिल जाते और मैं उनसे कह पाती “शुक्रिया दोस्त, इंसानियत में मेरा भरोसा बनाए रखने के लिए.”

बेकार की बातें हैं…

पता है मेसेज क्यों नहीं देखा मैंने??? इसलिए नहीं कि मुझे टाइम नहीं मिला, बल्कि इसलिए कि नाराज़ थी तुमसे। तुम्हें पता नहीं चला? चलो अच्छी बात है! कहाँ मेरी हर बात जानते हो तुम? हर बात तो चौबीस घंटे साथ रहने वाला जीवनसाथी भी नहीं जानता, तुम तो खैर…

कभी-कभी लगता है कि खूब-खूब बीमार पड़ जाऊँ। तब तो आओगे न भागे-भागे मुझसे मिलने? देखने मुझको? मेरी सेवा करने?…कि तब भी बना दोगे कोई बहाना ऐसा कि मैं कुछ बोल ही न पाऊँ उसके आगे…चाहती हूँ कि तबीयत खराब हो जाए। पर कमबख्त बुखार कभी आता नहीं और दर्द नापा जाता नहीं… जो पता चले कि कहाँ है और कितना है? च्च्च बेचारा …

और ये जो चिड़ियाँ हैं न? लोग कहते हैं कि खत्म हो गयी हैं सारी चिडियाँ दिल्ली से एकदम…झूठ कहते हैं सब..। रोज़ सुबह परेशान करती हैं गाना गा-गाकर। बहुत गुस्सा आता है मुझे।…क्यों??? हुँह…याद नहीं न तुमको?…ये उस दिन भी बोली थी, जब तुम आये थे।

पता है…? मुझे बुरा ये नहीं लगता कि तुम औरों को इतना समय क्यों देते हो? लगता है कि बस ऐसे ही मेरे समय में से एक-एक मिनट कम होता जा रहा है। बँटता जा रहा है। बुरा ये नहीं लगता कि उस समय, उस जगह वो क्यों था या थी…बस लगता है कि मैं क्यों नहीं??? किसी भी जगह। तुम्हारी ज़िंदगी के हर वक्त में, हर जगह…बस मैं ही नहीं थी।

मुझे तो यूँ भी आदत है अकेले रहने की। अकेलेपन से बढ़कर कोई साथी नहीं मेरा।..खलता तब है जब कोई आदत बिगाड़ जाता है…मुझे मेरे ही साथी से दूर कर जाता है…। कितना बुरा मानता होगा वो बेचारा-मेरा अकेलापन।…तुम्हें पसंद हैं तुम्हारे साथी सारे…चलो अच्छा…मुझे मेरे ही साथ रहने दो…अब जाओ ! तुम्हारे घर में तुम्हारे घरवाले इंतज़ार कर रहे होंगे तुम्हारा…मेरे कमरे में मेरा अकेलापन…।

मुझे पता है कि तुम कहोगे- “भक्, बेकार की बातें हैं सब। इमोशनल ड्रामा…काम करो अपना।…ये सब छोड़ो…जब बुलाती हो, तब तो तुम्हारे पास होता हूँ…।”… …

एक बात पूछूँ??? दिल पे हाथ रखकर सच्ची-सच्ची कहना- क्या सच में???

मृच्छकटिक, अभिसरण और नुसरत की कव्वाली

‘अभिसारिका नायिका’ मुझे शुरू से ही बड़ी अच्छी लगती है. आधुनिक अर्थों में निडर और बोल्ड. अभिसारिका उस स्त्री को कहते हैं, जो अपने प्रिय से मिलने एक नियत ‘संकेत स्थल’ पर जाती है. कोई उसे देख न ले, इसलिए प्रायः यह समय रात्रि का होता है. लेकिन समय नियत नहीं. संकेत स्थल खेत, भग्न मंदिर, दूती का घर, जंगल, तीर्थ स्थान यहाँ तक कि श्मशान भी हो सकता है.

संस्कृत साहित्य में सम्भोग श्रृंगार के वर्णन में अभिसारिका नायिका का कई स्थलों पर वर्णन हुआ है, किन्तु मुझे अभिसरण का सबसे सुंदर दृश्य ‘मृच्छकटिक’ का लगता है. नायिका वसंतसेना, जो कि एक समृद्ध गणिका है, एक निर्धन ब्राह्मण चारुदत्त से प्रेम करती है. बरसात के मौसम में जबकि चारों ओर काले-काले मेघ छाये हुए हैं और उसके कारण तारों की रोशनी भी धरा तक नहीं पहुँच रही. मेघों के गर्जन और दामिनी के साथ मूसलाधार बारिश हो रही है. ऐसे घोर अन्धकार में वसंतसेना चारुदत्त से मिलने उसके घर जाती है.

अचानक हुए मेघ गर्जन से भयभीत वसंतसेना चारुदत्त के ह्रदय से लग जाती है. विदूषक ‘दुर्दिन’ को उपालंभ देता है कि वह नायिका को मेघ गर्जन से डरा रहा है, तो चारुदत्त उससे कहता है कि ऐसा मत कहो. इसी दुर्दिन से भयभीत होकर तो वसंतसेना मेरे ह्रदय से लगी है.

चारुदत्त कहता है-
धन्यानि तेषां खलु जीवितानि ये कामिनीनां गृहमगतानाम्।
आर्द्राणि मेघोदकशीतलानि गात्राणि गात्रेषु परिष्वजन्ति॥

-अर्थात् वास्तव में उनके जीवन धन्य हैं, जो घर में आयी हुयी कामिनियों के बादल के जल से शीतल हुए शरीरों का अपने शरीरों से आलिंगन करते हैं.

(ये विचार मुझे नुसरत फ़तेह अली खान की कव्वाली ‘है कहाँ का इरादा तुम्हारा सनम, किसके दिन को अदाओं से बहलाओगे. ये बता दो तुम इस चाँदनी रात में, किससे वादा किया है, कहाँ जाओगे’ सुनते हुए आया.)

वो ऐसे ही थे (3)

मेरी और बाऊ की उम्र में लगभग 42-43 साल का अंतर था, यानि लगभग दो पीढ़ी जितना. कहते हैं कि एक पीढ़ी के बाद ‘पीढ़ी अंतराल’ समाप्त हो जाता है. इसीलिये दादा-पोते में ज़्यादा पटती है और शायद इसीलिए हम बच्चों की भी बाऊ से खूब बनती थी. मैं उनके ज़्यादा ही मुँह लगी थी.

वे बेहद मस्तमौला थे, ये तो मैं पहले ही बता चुकी हूँ-बेहद निश्चिन्त, फक्कड़ और दूरदर्शी होते हुए भी वर्तमान में जीने वाले. हमें उन्होंने बचपन से ही तर्क और प्रश्न करना सिखाया था और उनसे सबसे ज़्यादा बहस मैं ही करती थी. उनकी हर बात का विरोध करती थी. उन्होंने भी तो यही किया था :)

मुझे लेकर वे बहुत निश्चिन्त रहा करते थे. उनका मानना था कि मेरे अंदर बहुत अधिक जिजीविषा है और मैं सारी परेशानियों को झेलते हुए अपने जीवन में कहीं न कहीं पहुँच जाऊँगी. उन्हें मेरी शादी को लेकर भी कभी चिंता नहीं हुयी. शादी की तो खैर घर में बात ही नहीं होती थी, अगर होती भी तो सिर्फ दीदी की शादी की. बाऊ का मानना था कि मेरे लिए लड़का ढूँढना उनके बस की बात नहीं है :)

उनके मस्तमौलापन का एक किस्सा है. बाऊ ने अपनी पेंशन उन्नाव से आजमगढ़ ट्रांसफर कराई थी. कागज़ डाक में कहीं खो गया और उन्हें पूरा एक साल लग गया नया कागज़ बनवाने में. उस अवधि में बाऊ को पेंशन नहीं मिल रही थी और हम बहुत ज़बरदस्त आर्थिक संकट में पड़ गए. दीदी की शादी के बाद मैं अकेली पड़ गयी थी और ऊपर से यह मसला. इसके चलते मैं डिप्रेशन में आ गई. कई-कई बार आत्महत्या करने का मन होता था. बटाई पर मिला गेहूँ रखने के लिए घर में सल्फास की गोलियाँ रखी हुयी थीं. दो-तीन बार मैं सल्फास की गोलियों के डब्बे के पास पहुंचकर रुक गयी.

एक दिन मैंने बाऊ से पूछा ‘बाऊ, सल्फास की कितनी गोलियाँ खा लेने पर तुरन्त मौत हो जायेगी. उन्होंने अखबार से मुँह हटाये बगैर कहा “बड़ों के लिए 5-6 गोलियाँ काफी हैं. छोटे 3-4 में ही निपट जाते हैं. तुम चाहो तो दसों एक साथ खा लो, जिससे कहीं कोई कमी न रह जाए” मैं बाऊ का जवाब सुनकर गुस्से में आ गई. सोचा था कुछ सहानुभूति मिलेगी और यहाँ ये ऐसे बातें कर रहे थे, जैसे ‘आत्महत्या विज्ञान’ में डिप्लोमा करके बैठे हों. उसके बाद बाऊ ने कहा “वैसे एक बात याद रखो. सल्फास खाकर मारना बड़ा कष्टकर होता है. कितने लोग तो सल्फास की गोलियाँ खाते ही ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्लाने लगते हैं. जहाँ-जहाँ से गोलियाँ जाती हैं, अंग गल जाता है. तुम ऐसा करो, फाँसी लगा लो.” मैंने उनकी बाद की बात ठीक से सुनी ही नहीं. मुझे तो सिर्फ सल्फास खाने के साइड  इफेक्ट सुनाई दे रहे थे. भला कोई अपने बच्चों से ऐसे बात करता है :)

कार्य प्रगति पर है, कृपया धीरे चलें

रात के दस बज रहे थे, जब उसका फोन आया. सुबीर कैम्प के एक रेस्टोरेंट में दोस्तों के साथ साउथ इन्डियन खा रहा था. फोन उठाते ही ‘उसकी’ सिसकियाँ सुनाई देने लगीं. सुबीर परेशान हो गया. दोस्तों से माफी माँगकर बाहर आया और पूछा ‘क्या हुआ?’ ‘कुछ नहीं’ उसने सुबकते हुए कहा. ‘अब यही प्रॉब्लम है तुम्हारी. फोन कर देती हो और बताती नहीं कि क्या बात है?’ सुबीर ने थोड़ा खीझकर कहा, तो फोन काट दिया गया. सुबीर को लगा कि उसको चिढ़ना नहीं चाहिए था. जाने क्यों परेशान है वो? फिर वह बार-बार फोन करता रहा, लेकिन उधर से फोन कटता रहा. नाराज़ हो गयी थी वह.

‘अच्छी मुसीबत है’ सुबीर बड़बड़ाया. और दोस्तों से इजाज़त लेकर मेट्रो स्टेशन के गेट की ओर बढ़ गया. बारिश हल्की थी, मगर कपड़े गीले करने के लिए काफी थी. ऐसे मौसम के बाद भी कैम्प में काफी चहल-पहल थी. ज़्यादा भीड़ उन लड़के-लड़कियों की थी, जो टिफिन या कुक के बनाए बेस्वाद खाने से बचने के लिए आसपास के इलाकों से कैम्प भाग आते हैं डिनर करने.

मेट्रो में बैठे-बैठे सुबीर ‘उसके’ बारे में ही सोच रहा था. कितना परेशान करती है ये जिद्दी लड़की. लेकिन वो चाहकर भी उसे इग्नोर नहीं कर सकता. उसके बारे में कोई एक राय भी नहीं बना पाता. कभी-कभी उसे लगता है कि बिगड़ी हुयी है तो कभी बहुत समझदार. कभी लगता है कि उसे चाहती है और कभी लगता है कि बस मज़ाक करती है. घर से लड़-झगड़कर बाहर पढ़ने आयी है, इसलिए सुबीर उसका सम्मान करता है. सुबीर उसका ध्यान रखता है, लेकिन वो बेफिकरी. किसी बात से तो डर नहीं लगता उसको. न घरवालों से, न दुनिया से. एक बार उसके घरवाले यहाँ घूमने आये थे तो परिचय के सारे लड़के-लड़कियाँ भी साथ चल दिए. अचानक एक जगह ‘उसने’ सुबीर का हाथ पकड़कर पीछे खींचा. ‘थोड़ा धीरे चलिए, देखिये न क्या लिखा है’ उसने जिस ओर इशारा किया था, वहाँ लिखा था ‘मेट्रो का कार्य प्रगति पर है. कृपया धीरे चलें’ वह सच में धीरे चलना भूल गया था. निक्की उसकी ज़िंदगी में न आती तो शायद उसे इसकी अहमियत भी न पता चलती. सुबीर यह सोचकर मुस्कुरा उठा, फिर हडबडाकर चारों ओर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है.

एक घंटे बाद सुबीर लक्ष्मीनगर में था. उसे पता था कि ये लड़की फोन नहीं उठाएगी. तो सीधे उसके पी.जी. के बाहर पहुँचा और चिल्लाकर बुलाया उसको “निक्कीईईई.” ये नाम कोई और नहीं लेता तो उसने बालकनी से झाँका और बोली ‘आप?’ फिर ‘आंटी जी’ के रोकने के बावजूद धड़-धड़ करती नीचे आ गई. रो-रोकर आँखें सुजा रखी थीं उसने.

‘मुझे पता था कि आप ज़रूर आयेंगे’ चहककर बोली वो.
‘तुमने और कोई चारा छोड़ा था क्या? और ये क्या हालत बना रखी है?’
‘अच्छा, अब आप डाँटो मत’
‘हुआ क्या?’
‘कुछ नहीं’
‘रूममेट से झगड़ा हुआ?’
‘नहीं’
‘ऋचा ने कुछ कहा?’
‘उहूँ’
‘फिर क्या हुआ?’
‘पूरे तीन दिन से फोन नहीं किया आपने’
‘हाँ, तो मैंने तुमसे कहा था न कि पढ़ाई पर ध्यान दो. सेमेस्टर इक्ज़ाम हैं तुम्हारे और मुझे भी पढ़ना है’
‘तो मेरी वजह से आपकी पढ़ाई डिस्टर्ब होती है? और क्या मैं पढ़ती नहीं? क्या मेरी थर्ड पोजीशन नहीं आयी इस सेमस्टर में?’
‘ठीक है-ठीक है. माना कि तीसरी पोजीशन आयी तुम्हारी. पर अगर तुम इन सब ब्वॉयफ्रैंड वगैरह के चक्कर में न पड़तीं, तो फर्स्ट आतीं’
‘मुझे नहीं बनना किताबी कीड़ा. मुझे लाइफ एन्जॉय करनी है.’
‘निक्की, बस थोड़े दिन पढ़ाई पर ध्यान दे लो.’
‘हाँ, तो मैं कैसे ध्यान दूँ पढ़ाई में, जब आप मेरा ध्यान नहीं रखते’
उसने सुबीर की आँखों में देखते हुए कहा. उसके इस तरह से देखने पर सुबीर हमेशा असहज हो जाता है. सुबीर ने बात बदल दी.
‘बस इतनी सी ही बात थी कि मैंने फोन नहीं किया कि कुछ और?’
‘वो… … नितिन’
‘उफ़, तुम आजकल के लड़के-लड़कियों के ये चोंचले. झगड़ा हुआ उससे?’
‘नहीं ब्रेकअप’
‘चलो, अच्छा हुआ. झंझट छूटी. मुझे आपका ‘नितिन पुराण’ नहीं सुनना पड़ेगा और आप पढ़ाई की ओर ध्यान देंगी’ सुबीर मुस्कुराकर बोला.
‘मेरी लाइफ का इतना बड़ा टर्निंग प्वाइंट और आपको मज़ाक सूझ रहा है.’ उसने रोना सा मुँह बनाकर कहा.
‘अच्छा-अच्छा बोलो फटाफट. क्यों हुआ ब्रेकअप?
‘आपकी वजह से?’
‘मेरी वजह से?’ सुबीर एकदम से चौंक गया.
‘हाँ, नितिन ने कहा कि मैं हर समय आपकी बातें करती रहती हूँ. हर समय आपकी तारीफ़ करती रहती हूँ. मेरे हर तीसरे सेंटेंस में आपका नाम आता है ‘सुबीर ये-सुबीर वो’-तो मैं आपको ही ब्वॉयफ्रैंड क्यों नहीं बना लेती.’
सुबीर थोड़ी देर हँसता रहा.
फिर पूछा ‘तुमने क्या कहा?’
‘मैंने सोचा कि पहले आपसे तो पूछ लूँ. विल यू…?’ उसने शरारत से पूछा.
‘निक्की, मैं तुमसे सात साल बड़ा हूँ’
‘तो? आई डोंट केयर’
‘तुम्हारी सहेली का भाई हूँ.’
‘स्टिल आई डोंट केयर’
‘तुम्हारे घरवालों ने तुम्हारी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर छोड़ी है. वो लोग क्या कहेंगे?’
‘बस इत्ती सी बात है न? ये न होता तो बन जाते मेरे ब्वॉयफ्रैंड?’ उसने फिर सुबीर की आँखों में झाँका. पहली बार सच्चाई दिखी सुबीर को उसकी आँखों में. और वो घबरा गया.
‘बकवास मत करो. जाओ अपने रूम पर’ सुबीर ने उसे डांटते हुए कहा.
‘असल बात ये है कि आप अपने आप से डरते हो. फट्टू हो आप’ गुस्से में कहकर वो तेजी से निकल गयी.

चलते-चलते वे मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के पास आ गए थे. सीढ़ी की छाया में खड़ा सुबीर सोचता रहा ‘ये बीस साल की लड़की कितनी सयानी, कितनी निडर और साहसी है? कैसे इसने अपनी बात रख दी झट से. कल को ऐसे ही झट से रिश्ता तोड़ भी देगी. लेकिन जब तक साथ है पूरी ईमानदारी से. कोई बेईमानी नहीं.’

बारिश अचानक काफी तेज हो गयी थी. विजिबिलिटी दस मीटर. निक्की अभी दस कदम ही चली होगी कि सामने से एक कार तेजी से आकर रुकी. ठीक समय पर कार ड्राइवर ने ब्रेक लगाया और ठीक समय पर निक्की रुक गयी, लेकिन इस झटके से वो बस गिरने वाली ही थी कि सुबीर ने दौड़कर उसे थाम लिया और कुछ सेकेण्ड वैसे ही खड़ा रहा. ‘तुम्हारी दुनिया? तुम्हारे लोग?’ निक्की ने पूछा. ‘भाड़ में जाएँ.’ सुबीर ने मुस्कुराकर जवाब दिया.

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे. बारिश में भी मेट्रो की वजह से गुलज़ार लक्ष्मीनगर मेट्रो स्टेशन पर कई जोड़ी निगाहें उनको घूर रही थीं. उन सबसे बेखबर सुबीर ने निक्की को अपनी बाहों में भर लिया.

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