आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

सुबह की बारिश और आत्मालाप

रात देर से सोई। अनु की कहानियाँ पढ़ रही थी। आख़िरी कहानी पढ़कर रोना आ गया। थोड़ी देर तक कुछ सोचती रही, फिर हल्की झपकी लग गयी। अचानक कुछ आवाजों से नींद खुली। मेरी नींद है ही इतनी कच्ची। ज़रा सी आहट होने पर भाग जाती है। पहले सोचा गोली कोई शरारत कर रही होगी, लेकिन वो अपने बिस्तर पर थी। मैं उठी और जाकर दरवाजा खोल दिया। थर्ड फ्लोर पर रहने का नतीजा है या यहाँ रहते-रहते आठ साल हो जाने से उपजा आत्मविश्वास, कि अब मैं बेखटके रात के किसी भी पहर बाहर बालकनी में निकल आती हूँ।

सुबह के छः बजे थे, लेकिन अभी उजाला नहीं हुआ था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। मुझे ये बारिश अच्छी लग रही थी। और भी बहुत से लोग इसका आनंद ले रहे होंगे, लेकिन अगर बारिश तेज हो गयी तो? इन्हीं दिनों ओले भी पड़ जाते हैं, जिनका असर उल्टा होता है। गेहूँ की बालियाँ झड जायेंगी, किसानों का कितना नुक्सान होगा? आम के बौर टूट जायेंगे और आम की फसल खराब हो जायेगी। मैं भी अजीब हूँ। हर घटना के साइड इफेक्ट्स ज़रूर सोचने लग जाती हूँ।

जाने क्या सूझा कि बालकनी से सिर बाहर निकाल दिया। बारिश की बूँदें ‘टप-टप’ सिर पर पड़ने लगीं। कोई होगा मेरे जैसा पागल जो सुबह के छः बजे बालकनी में खड़े होकर ऐसी हरकत करेगा? कम से कम मेरी उम्र की कोई ‘महिला’ तो ऐसा करने के  बारे में नहीं ही सोच सकती। वैसे पागलों की कमी नहीं है दुनिया में। मैंने गली से बाहर पार्क की ओर झाँका कि देखूँ कोई और भी मेरी ही तरह जाग रहा है या नहीं। एक पेड़ की कुछ सूखी डालियाँ दिखीं, मेरी ही तरह पानी में भीगती हुयी। कोने के घर की खिड़की के शेड पर बैठा एक कबूतर पता नहीं क्यों भीग रहा था? पानी से बचने के लिए बहुत सी जगहें हैं। कई बालकनियाँ, जिनमें कपड़े टाँगने के लिए डोर बंधी होती हैं। लेकिन शायद कबूतर भी मेरी ही तरह भीगने के मज़े ले रहा हो या वो सिर छुपाने के लिए खतरा उठाने को तैयार नहीं।

मुझे ये दृश्य बहुत मनभावन लग रहा था। अंदर आकर एक कप चाय बनायी और मोढा लेकर बाहर बालकनी में बैठ गयी। याद नहीं पड़ता कि इससे पहले कब मैं अपने इतने पास थी। अजीब सी बात है न? अक्सर अकेले होते हुए भी हम अपने पास नहीं होते? या कभी-कभी अकेले होने पर हम खुद से ज़्यादा दूर हो जाते हैं। जाने कहाँ-कहाँ मन भटकता रहता है? और कभी भीड़ में भी अपने बहुत पास होते हैं। मुझे रह-रहकर अरविन्द जी का दिया शब्द ‘आत्मालाप’ याद आ रहा था। खुद से ही तो बातें कर रही थी मैं। हममें से जो भी ब्लॉग पर अपने बारे में कुछ लिखता है, आत्मालाप ही तो होता है।

सोचा कि किसी को फोन किया जाय। और अपने सबसे करीबी साथी को फोन किया। अगर आपके पास एक भी ऐसा साथी है, जिससे आप कभी भी फोन करके कुछ भी शेयर कर सकते हैं, तो आप दुनिया के सबसे खुशनसीब इंसान है। थोड़ी देर बातें करने के बाद फोन रख दिया। पर कह नहीं पायी “शुक्रिया दोस्त, मेरी ज़िंदगी में होने के लिए। मुझे हर पल यह एहसास दिलाने के लिए कि डेढ़ करोड़ की आबादी वाले इस शहर में मैं अकेली नहीं हूँ।”

पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (२.)

मैं पहले ही दो दिन पुस्तक मेला घूम आयी थी, इसलिए फिर जाने का कोई इरादा नहीं था. लेकिन बीस फरवरी को जब पुस्तक मेले में थी, तभी अनु का मेसेज आया कि वह कल अपने बच्चों को लेकर आ रही है, मैं आ सकती हूँ क्या? मेरा बहुत दिनों से उसके बच्चों आदित और आद्या से मिलने का मन था, तो मैंने झट से हाँ का मेसेज कर दिया. उसके बाद शाम को फेसबुक पर आशुतोष के यह जिक्र करने पर कि उसने आराधना दी से पैसे लेकर पार्टी दी, उसकी मंडली ने उसको घेर लिया कि हमें भी पार्टी चाहिए. तय हुआ कि नेहा और प्रोमिला जी पार्टी देंगी. मज़े की बात तब तक मैं प्रोमिला जी को जानती तो थी, लेकिन फेसबुक पर दोस्त नहीं थी… :)

दूसरे दिन पहले तो अनु से मिलना था, फिर नेहा और आशुतोष एंड कम्पनी के साथ पार्टी करनी थी. मेसेज के माध्यम से पता चला कि अनु फूड कोर्ट में है. मैं वहीं पहुँची. अनु ने अपने बच्चों से मेरा परिचय करवाया, फिर हम हॉल न. 12 के अंदर हिंदयुग्म के स्टाल पर आ गए. उसके पहले हमने एकलव्य प्रकाशन के स्टाल पर बच्चों के लिए कुछ किताबें लीं. आदित और आद्या बड़े ही प्यारे बच्चे हैं. अपनी उम्र के और बच्चों से कहीं अधिक समझदार और मम्मा का कहना मानने वाले. हिन्दयुग्म के स्टाल पर कई लोगों से मिलना हुआ. मैंने अनु की कहानी-संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ लेकर उससे हस्ताक्षरित करवाई. फिर हमने साथ तस्वीरें खिंचवाई. फेसबुक मित्र सोनारुपा विशाल से भी मिलना हुआ. रमा भारती जी भी बहुत ही गर्मजोशी से मिलीं. वे तब तक फेसबुक पर मेरी मित्र नहीं थीं, लेकिन हम एक-दूसरे को जानते थे.

अनु को अपने घर जाना था, लेकिन चलते-चलते वे सत्यानन्द निरुपम जी से मिलना चाहती थीं, तो हम राजकमल प्रकाशन की ओर बढ़े. वहाँ बहुत अधिक भीड़ थी. पता चला कि रवीश कुमार अपनी पुस्तक “इश्क में शहर होना” पर आटोग्राफ दे रहे हैं. पाठकगण पुस्तक खरीदकर पंक्तिबद्ध होकर अपनी प्रति हस्ताक्षरित करवा रहे थे. यह भी खबर मिली कि थोड़ी देर में जावेद अख्तर भी आने वाले हैं. पहले ही स्टाल पूरा भरा हुआ था और भीड़ देखकर मुझे घबराहट हो रही थी. मैं यह सोच रही थी कि जावेद जी के आने पर क्या लोग डबल स्टोरी बनाकर खड़े होंगे :P अनु रवीश जी के साथ काम कर चुकी है, इसलिए आद्या और आदित उनको व्यक्तिगत रूप से जानते हैं. आदित ने पूछा “ममा, रवीश अंकल के पास इतनी भीड़ क्यों है?” तो अनु ने जवाब दिया, “बेटा, रवीश अंकल सुपरस्टार हो गए हैं.” :)

हम वहीं खड़े थे, तब तक विभावरी और प्रियंवद आते हुए दिखे. विभावरी ने बताया कि ‘विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि आप पुस्तक मेले आयी हुयी हैं’ विश्वस्त सूत्र फेसबुक पर उपलब्ध होते हैं :) एक संक्षिप्त मुलाक़ात के बाद वे वाणी प्रकाशन की ओर बढ़ गए. वे प्रियदर्शन के किसी कार्यक्रम में शिरकत करने जा रहे थे. मैं थोड़ी देर अनु के साथ घूमती रही, फिर उससे विदा लेकर दखल प्रकाशन की ओर बढ़ गयी. इस बीच नेहा से मेसेज पर बात हो रही थी. उससे मैंने कहा था कि हॉल न. 12 में आ जाये. लेकिन आशुतोष के मिलने की पूरी संभावना दखल प्रकाशन के स्टाल पर ही थी. और वही हुआ :)

दखल प्रकाशन के स्टाल पर एक साथ नेहा, आशुतोष, अदनान, नैयर, रितेश मिश्र और अभिनव सव्यसाँची मिल गए. आशुतोष और नेहा को छोड़कर बाकी सबसे मैं पहली बार मिल रही थी. नेहा के काम के सिलसिले में मैंने उसे अशोक भाई से भी मिलवाया. रितेश इलाहाबादी मित्र हैं और समर की वजह से उनसे फेसबुक पर परिचय हुआ था. आशुतोष ने मुझे सुघोष मिश्र से भी मिलवाया, जो रितेश के अनुज हैं और इलाहाबाद के मेधावी स्कॉलर. वे पूरा एक ट्राली बैग भर किताबें खरीदकर जाने कहाँ ले जा रहे थे :)

हमलोग वहाँ से ‘पार्टी करने’ बाहर की ओर जा ही रहे थे कि नेहा लेखक मंच की ओर मुड गयी. हमलोग वहीं खड़े होकर उसका इंतज़ार करने लगे. तभी दूर से कोई इशारे करता दिखाई दिया. ध्यान से देखा तो फेसबुक मित्र ‘महाकवि और फोटोग्राफर’ शायक आलोक महोदय खड़े हुए थे. उनका नाम इतने सम्मान से इसलिए ले रही हूँ कि ऐसा नहीं करूँगी तो जनाब बुरा मान जायेंगे :) मैं उनके पास पहुँची तो इतनी गर्मजोशी से मिले मानो स्कूल टाइम के ‘चढी-बडी’ हों. साथ में संजय शेफर्ड और रचना आभा भी थे. फिर नेहा भी आ गयी. हमने आपसे में एक-दूसरे का परिचय करवाया और खूब फोटो खिंचाई हुयी.

नेहा फिर कहीं चली गयी. तब तक ब्लॉगर मित्र इंदु सिंह मिल गयीं. उनसे भी मैं दिल से मिलना चाहती थी क्योंकि फेसबुक ने मुझे बताया था कि वे मेरे बचपन के शहर उन्नाव की हैं. इंदु के साथ फेसबुक के युवा साथी सुशील कृष्णेत से भी पहली बार मुलाक़ात हुयी. सुशील से इसके पहले फेसबुक पर कई बार बातें हो चुकी थीं, लेकिन मेरे घर के बिल्कुल पास नेहरु विहार में रहते हुए कभी मुलाकात नहीं हुयी. उनके साथ रमा भारती जी भी थीं. हमने थोड़ी देर बातें कीं. फिर मैं सबसे विदा लेकर आशुतोष, अदनान और नैयर के पास आ गयी, जो बडी देर से भूखे पेट हमारा इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन नेहा जी गायब थीं. उनको बुलाया गया. तब तक हम वहीं ज़मीन पर बैठकर पेट में कूद रहे चूहों को शांत करने की कोशिश कर रहे थे और फोटो खींचकर दिल बहला रहे थे :P

वहाँ बैठे-बैठे अनेक महान विभूतियों के दर्शन हुए. महान पत्रकार/संपादक ओम थान्वी जी और महान साहित्यकार/आलोचक नामवर सिंह जी. लेकिन हमलोग इन सबसे बेखबर फोटो खिंचाई  में व्यस्त थे :) नेहा आयी तो उसने कहा कि किसी काम से उसे वाणी प्रकाशन जाना है. शायद वर्तिका नंदा की पुस्तक का विमोचन होना था. स्टाल पर पता चला कि विमोचन वहाँ न होकर लाल चौक पर है. तो नेहा ने तय किया कि वह लाल चौक जायेगी, लेकिन हम क्या करते? भूख के मारे बुरा हाल था :P आखिर नेहा को हमारी हालत पर दया आयी और उसने आशुतोष को खाने-पीने के लिए धन पकड़ाया. हम अकेले खाना तो नहीं चाहते थे, लेकिन भूख के हाथों मजबूर थे :(

फिर हम मतलब मैं, आशुतोष, नैयर, अदनान और अभिनव फूडकोर्ट पहुँचे. बहुत देर विचार-विमर्श करके खाने के लिए मँगवाया गया. प्रोमिला जी तब तक आयी नहीं थीं. आतीं भी तो मिलतीं कैसे क्योंकि किसी के पास एक-दूसरे का फोन नम्बर ही नहीं था. आखिर में, आशुतोष ने ‘विश्वस्त सूत्रों’ से फोन नंबर लेकर उन्हें फोन किया तो पता चला कि वे पुस्तक मेले में ही थीं. तब तक हमलोग मज़ाक कर रहे थे कि खाने वाले हाज़िर और मेजबान गुम :) थोड़ी देर में प्रोमिला जी आ गयीं. और उसके बाद नेहा. हम खाते-पीते और बातें करते रहे. थोड़ी देर की मुलाक़ात में ही लग रहा था कि हम वर्षों पुराने मित्र हैं और कई सालों के बाद दोबारा मिल रहे हैं.

खाने-पीने के बाद सबलोग विदा लेकर इधर-उधर हो लिए. मैंने फूडकोर्ट के बाहर के घास के मैदान (अंग्रेजी में लॉन) में महाकवि और फोटोग्राफर शायक आलोक महोदय को अकेले बैठे देखा तो उनसे बातचीत करने के मौके को गँवाना उचित नहीं समझा. मेरे साथ अदनान, नैयर और आशुतोष भी चल दिए. अक्षय भी वहीं बैठे थे. थोड़ी देर बाद अभिनव भी आ गए. फिर थोड़ी देर बाद आशु और अभिनव अपने फेफड़े फूँकने कहीं चले गए और बाकी लोग बैठे रहे. महाकवि शायक हमलोगों से बातें करते हुए एक के बाद एक समकालीन कवियों और साहित्यकारों की ‘खबर’ लेते रहे, जैसा कि वे फेसबुक पर भी करते हैं. उनका कहना है कि वे दिन में एक बार झगड़ न लें, तो उन्हें “जाने कैसा-कैसा” महसूस होता है :)

महाकवि शायक थोड़ी देर के लिए पेटपूजा करने के लिए गए तो मैंने नैयर से बात की. नैयर ने अपने द्वारा खरीदी हुयी 40 किताबों की फोटो दिखाई, जिनमें हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की किताबें सम्मिलित थीं. मैंने सोचा कि जनाब किसी साहित्य के विद्यार्थी होंगे, लेकिन पूछने पर पता चला कि वे “अर्थ साइंसेज” में आर.ए. यानि रिसर्च असिस्टेंट हैं. इन्हें कहते हैं असली पाठक :) महाकवि खाने-पीने का सामान लेकर लौटे और शिकायत करने लगे कि यहाँ खाना बहुत महँगा है. ये बात तो मैंने भी गौर की है कि प्रगति मैदान में हर जगह खाना ज़रूरत से ज़्यादा महँगा है. उसी समय महाकवि के पीछे कोई पहचाना सा चेहरा दिखा. मैंने महाकवि से पूछा, “उन्हें देख रहे हो. अज़दक वाले प्रमोद जी हैं न?” उन्हें भी ऐसा ही कुछ लगा था लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी. वो तो जब उन्होंने सिगरेट सुलगाई, तो तुरंत दिमाग की बत्ती जल गयी क्योंकि मैंने सबसे पहले उनकी ऐसी ही फोटो देखी थी ब्लॉग पर.

मैं झट से उनके पास पहुँची और उन्हें अपना परिचय देकर बात करना शुरू कर दिया. प्रमोद जी कई बार मुझे उनके ब्लॉग पर की गयी टिप्पणी का जवाब दे चुके हैं, लेकिन उन्होंने मुझे पहचाना नहीं. मुझे अपना पूरा परिचय उन्हें देना पड़ा. वे थोड़ी देर तक टीचर की तरह मुझसे सवाल करते रहे और मैं आदर्श विद्यार्थी की तरह जवाब देती रही :( फिर महाकवि भी आ गए. प्रमोद जी ने झट से उन्हें पहचान लिया. महाकवि से मुझे थोड़ी जलन भी हुयी इस बात को लेकर :) प्रमोद जी के पूछने पर ही महाकवि ने वह स्टेटमेंट दिया था कि जब तक वे झगड़ा न करें, उन्हें डिप्रेशन सा फील होता है :) और तभी हमें भी यह ज्ञान प्राप्त हुआ. थोड़ी देर बाद प्रत्यक्षा और वंदना राग जी भी आयीं और उनसे हेलो-हाय हुयी.

कुछ घटनाएँ बडी मज़ेदार हुईं पुस्तक मेले में. मैं कभी किसी सम्मलेन/काव्य पाठ/ साहित्य चर्चा आदि में नहीं जाती, इसलिए मुझे लगता था कि कोई मुझे पहचानेगा नहीं. लेकिन नूतन यादव जी मिलीं और झट से उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें पहचान लिया. पाँच-सात मिनट बात हुयी उनसे. उन्होंने मुझे बताया कि उनके किसी दोस्त ने कहा है कि ‘मुक्ति आपकी मित्र हैं और नारीवादी हैं, तो आप उनसे क्यों नहीं पूछतीं कि वे लड़कों को “बाबू” कहकर क्यों बुलाती हैं’ :) मुझे इस बात से यह महसूस हुआ कि लोग कितनी गंभीरता से लेते हैं मेरी बातों को. मैंने नूतन जी से कहा कि मैं बाबू सिर्फ उन लड़कों को कहती हूँ, जिन्हें छोटा भाई मानती हूँ, बाकी सबको नहीं कहती.

दूसरी घटना, जिस दिन शिखा जी से मिली थी, लालित्य ललित जी भी मिले और उन्होंने पूछा “कैसी हो आराधना?” मैंने कहा “मैंने तो सोचा कि आप पहचानेंगे ही नहीं” तो वे बोले “नहीं, मेरी मैगी ड्यू है न आपके यहाँ” एक बार फेसबुक पर ये बात हुयी थी कि वे मेरे घर पर मैगी पार्टी के लिए आयेंगे :) ये बात लगभग दो साल पुरानी है, लेकिन उन्हें याद है. तीसरी बात, सुघोष ने मुझे बताया कि उन्हें मेरा उपनाम ‘मुक्ति’ इतना अच्छा लगा कि उन्होंने अपनी किसी परिचित का उपनाम भी मुक्ति रख दिया है.

कुल मिलाकर इस खुशफहमी के साथ कि मुझे बहुत से लोग पढते हैं, पसंद करते हैं और प्यार करते हैं, मैं मेले से लौट आयी. मैं कभी प्रोफाइल देखकर दोस्ती नहीं करती और न दोस्ती होने के बाद हिसाब लगाती हूँ कि अगले से मुझे क्या और कितना फ़ायदा होने वाला है? मेरे इस “इम्प्रैक्टिकल एप्रोच” के कारण मेरे करीबी दोस्त बहुत कम हैं. लेकिन पुस्तक मेले में बहुत से लोगों से मिलकर ऐसा लगा कि नए दोस्त बनाए जा सकते हैं. हम नए-नए लोगों से मिलकर खुद को और समझ पाते हैं, खुद की कमियों को ढूँढ़ पाते हैं और खुद के थोड़ा और करीब आ जाते हैं.

पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (१)

बहुत दिनों से खुद को एक अदृश्य खोल में बंद कर रखा था. पता नहीं सभी को ऐसा लगता है या सिर्फ मेरे साथ ऐसा होता है कि कभी-कभी किसी से भी मिलने का मन नहीं होता, बात करने का मन नहीं होता. बस अकेले में खुद के साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है- किताबों, फिल्मों, रंग-ब्रश, कैनवस और अपने पालतू पिल्ले के साथ. पता नहीं इंसानों के साथ से क्यों डर लगता है? जाने ये अवसाद का कोई लक्षण है या स्वाभाविक मनःस्थिति, लेकिन लोगों से मिलने-जुलने, घुलने-मिलने में एक संकोच और हिचक का भाव तो हमेशा ही दिल में रहता है.

पुस्तक मेला एक बहुत अच्छा मौका होता है, अपने आभासी दुनिया के दोस्तों से मिलने का. लेकिन जाने क्यों पिछली बार किसी से मिलने का मन ही नहीं हुआ. बस एक दिन जाकर अपने शोध से सम्बन्धित पुस्तकें ले आयी. इतनी तेजी से घूमकर वापस आ गयी कि कहीं कोई टकरा न जाय. जानबूझकर उन स्टालों पर नहीं गयी, जहाँ किसी परिचित के मिल जाने की संभावना थी. जब हम पहले से डरे होते हैं, तो और भी ज़्यादा डर लगता है ठोकरें लगने से. इस बात से डर लगता है कि कहीं ऐसा न हों कि जो व्यक्ति आभासी दुनिया में इतना अच्छा दोस्त है, वास्तविकता में वैसा न हो? मैं ऐसी बातों से बहुत डरती हूँ.

लेकिन, आखिर कब तक खुद को एक दायरे में बाँधकर रखती. तो इस साल अपनी इन सारी आशंकाओं को एक किनारे करके पहुँच ही गयी पुस्तक मेले में और यह मेरे जीवन का यादगार पुस्तक मेला हो गया. वैसे तो इससे पहले भी पुस्तक मेले में अपने ब्लॉगर मित्रों से मिली हूँ, लेकिन ब्लॉगर मित्र तो विचारों से इतने निकट आ जाते हैं कि उनसे वास्तविक दुनिया में मिलना बिल्कुल भी अचंभित नहीं करता. फिर वैसे भी ब्लॉगिंग के मित्र कम से कम चार-पाँच साल से मित्र तो हैं ही. इस बार नया यह रहा कि बहुत से फेसबुक के मित्र भी मिले, जिनसे मेरा परिचय एक साल से भी कम का है.

18 फरवरी को ज्यों हाल न. 12 में पहुँची त्यों आशीष राय जी से मुलाक़ात हो गयी. वैसे हम पहले से तय करके गए थे कि पुस्तक मेले में मिलेंगे. कहाँ मिलेंगे यह तय नहीं था और फोन से तय करना था, लेकिन हिंद युग्म के स्टाल पर पहुँचते ही वे मिल गए. उनसे बात ही कर रही थी कि रंजू भाटिया जी, अंजू जी और सुनीता जी भी आ गयीं. शैलेश भारतवासी जी ने हम सब लोगों की फोटो ली. मुकेश कुमार सिन्हा जी भी मिले. मृदुला शुक्ला जी भी आयीं हिन्दयुग्म के स्टाल पर उन्होंने सबसे पहले मेरे गर्दन दर्द के बारे में पूछा और कहा कि उन्हें भी ये समस्या हो गयी. लगा कि फेसबुक मित्र कितना ध्यान देते हैं हमारे स्वास्थ्य की तरफ :) शैलेश जी, मुकेश जी और अंजू जी से मैं पहले भी मिल चुकी हूँ, लेकिन बाकी सबसे पहली बार मिलना हुआ. आशीष जी से तो खूब गप्पें मारीं. जूनियर होने का फ़ायदा भी उठाया और फूड कोर्ट जाकर चाय-नाश्ता किया :)

उसके बाद मैं हिंद युग्म प्रकाशन से दखल प्रकाशन के बीच चक्कर लगाती रही. दखल प्रकाशन पर अशोक भाई और किरण से बातें कीं थोड़ी देर. उसके बाद फेसबुक मित्र तारा शंकर, रिफाह खान, इलाहाबादी मित्र सूचित कपूर और उनकी पत्नी श्रुति से भी मुलाक़ात हुयी. संज्ञा जी से भी भेंट और संक्षिप्त बातचीत हुयी. इन सबसे भी पहली बार ही मिलना हुआ, लेकिन सभी इतनी गर्मजोशी से मिले कि जैसे बरसों से जानते हों.

वापस हिन्दयुग्म के स्टाल पर आयी, तो आशीष जी से बात करने के दौरान ही स्टाल के अंदर से किसी ने ज़ोर-ज़ोर से ‘आराधना-आराधना’ पुकारना शुरू किया. चौंककर उधर देखा तो पूजा और अनु खड़ी थीं. उनके पास पहुँची तो पूजा ने पूछा “पहचाना?” उनका दावा था कि पूरे पुस्तक मेले में उन्हें कोई नहीं पहचान पाया :) मैंने कहा कि “तुम्हें कौन पहचान पायेगा?” आखिर में यह सिद्ध करने के लिए कि मैंने उन्हें पहचान लिया है, मुझे पूजा और अनु का नाम लेना पड़ा :P थोड़ी देर हम गपियाये. फिर वो लोग चले गए. पता चला कि किशोर चौधरी भी स्टाल पर आने वाले हैं, तो मैं वहीं बैठकर इंतज़ार करने लगी. इसी बीच आशीष जी चले गए. वहाँ अनिमेष से मुलाक़ात हुयी. शैलेश जी ने कोई परचा पकड़ाया था मुझे जिसमें वास्तु “विज्ञान” लिखा हुआ था. मैंने उस पर आपत्ति की कि वास्तु कोई विज्ञान थोड़े ही है. इसी बात पर अनिमेष से बातचीत होने लगी. बाद में उनसे फेसबुक पर मित्रता हो गयी :) दोस्त ऐसे भी बनते हैं :) किशोर चौधरी आये तो उनसे मिलकर और किताब भेंट लेकर मैं दखल प्रकाशन वापस चली गयी.

दखल प्रकाशन के स्टाल पर फेसबुक मित्र और छोटे भाई आशुतोष मिले, जिन्होंने ‘और लोगों’ को जलाने के ;लिए मेरे साथ एक फोटो ली. वहीं पर फेसबुक मित्र अभिनव सब्यसाची से भी मुलाक़ात हुयी. नीलिमा जी को ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों से ही उनके ब्लॉग ‘चोखेर बाली’ के कारण जानती हूँ, उनसे भी पहली बार वहीं मिली, लेकिन समयाभाव के कारण बात नहीं हुयी. अपनी पुरानी साथी रूपाली दी और उनकी बिटिया से मिलना भी सुखद रहा.

20 फरवरी का पूरा दिन शिखा वार्ष्णेय जी, सोनल और अभिषेक के नाम था. शिखा जी और सोनल से मिलना कई सालों से स्थगित हो जाता है किसी न किसी कारणवश. कभी मेरी तबीयत खराब होती है, कभी कोई आवश्यक कार्य पड़ जाता है. इस बार उनसे मिलना फेसबुक पर तय हुआ. अभिषेक के माध्यम से पता चलता रहा कि वे कहाँ हैं. जब मैं मेला पहुँची तो शिखा जी हॉल न. 12 के लेखक मंच पर अप्रवासी भारतीय साहित्यकारों के कार्यक्रम में लगभग ऊँघ सी रही थीं. अभिषेक ने बताया कि वे बारह बजे से ही आकर एक के बाद एक अप्वाइंटमेंट और कार्यक्रम निपटा रही थीं. सोनल कहीं गयी हुयी थी कि पीछे से आकर उसने मुझे चौंका सा दिया. इसी बीच नीतीश मुझे देखकर आ गया और मुझे लगभग घुमाकर अपनी ओर करके शिकायत करना शुरू किया कि आप मेले में आयीं तो मुझे क्यों नहीं बताया. सच में मैं उसकी इस प्यार भरी शिकायत पर झेंप गयी क्योंकि मैंने उससे वादा किया था कि जब भी बुक फेयर जाऊँगी, उसे बता दूँगी. उसके दोस्तों की मंडली बाहर थी. वो मुझसे मिलने का वादा लेकर चला गया.

कार्यक्रम खत्म होने पर शिखा जी भी नीचे आयीं और गले लगाकर मिलीं. सोनल और शिखा जी से मैं पहली बार मिली, लेकिन इतनी गर्मजोशी से कि जैसे बरसों की बिछड़ी सहेलियाँ हों. वहाँ कोई न कोई शिखा जी को रोककर मिलना चाह रहा था और मैं, सोनल और अभिषेक उनको सेलिब्रिटी कहकर चुटकी ले रहे थे. शिखा जी भीड़ से बचने के लिए हमलोगों को लेकर बाहर फूडकोर्ट के सामने वाले लॉन में गयीं. हमने साथ में छोले-भटूरे खाए. सोनल को मेरे स्वास्थ्य की इतनी चिंता थी कि उसने मुझे पहले एक सेब खाने को दिया, जिससे मेरे पेट पर छोले-भटूरे का दुष्प्रभाव न पड़े :) बहुत करीबी दोस्तों को ही मालूम है कि मुझे पेट-सम्बन्धी समस्या है. सोनल से मैं कभी नहीं मिली, लेकिन उसे ये पता है :). फिर काफी देर तक हम वहीं बैठकर गपियाते रहे. मित्र राकेश कुमार सिंह जी ने आकर खुद अपना परिचय दिया और बहुत ही गर्मजोशी से मिले. मित्रों की सदाशयता कभी-कभी दिल को छू जाती है.

इसी बीच एक और फेसबुक मित्र अभिलाषा, जो कि बिना मिले ही छोटी बहन बन गयी है, मुझसे मिलने वहाँ आ गयी. उसके साथ आशुतोष भी था. थोड़ी देर में शिखा जी अपने अगले कार्यक्रम के लिए चली गयीं. अभिषेक और सोनल भी उनके साथ ही चले गए. बीच में नितीश अपने दोस्तों की मंडली के साथ मुझसे मिलकर चला गया था. उसकी दोस्त शिवा और अनमोल जो कि फेसबुक पर मेरी भी दोस्त है, से भी पहली बार मिलना हुआ. आशुतोष ने हमको खाते हुए देखा तो कुछ खिलाने के लिए कहने लगा. इलाहाबादी जूनियर होने का पूरा फ़ायदा उठाया उसने :)

फूडकोर्ट में बैठकर बच्चों (मेरे लिए तो ये बच्चे ही हैं) ने थोड़ा-बहुत खाना खाया और फिर कुछ देर तक बातें करते रहे. अभिलाषा और उसके दोस्त चले गए. आशुतोष का दोस्त अक्षय, जो देखने में बहुत अंतर्मुखी सा लग रहा था, बाद में पता चला कि फेसबुक पर बहुत अच्छे विचार व्यक्त करता है. हम किसी को देखकर कैसे अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वह कितना चिंतनशील है? अक्षय को मैंने उसी रात फेसबुक पर मैत्री प्रस्ताव भेजकर मित्र मंडली में सम्मिलित कर लिया :)

इसके बाद हम दखल के स्टाल पर गए. किरण और वेरा मुझे रास्ते में मिल गयीं. किरण ने कहा कि कल हमारी कोई फोटो नहीं खींची गयी तो आज एक लेते हैं यादगार के लिए. वेरा ने हमारी फोटो ली. बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व है अशोक भाई और किरण की इस बिटिया का. दखल के स्टाल पर पंकज श्रीवास्तव जी मिले. अशोक भाई से मिलकर और एक पुस्तक लेकर मैं शिखा जी और अभिषेक के साथ मेट्रो स्टेशन आ गयी. वहाँ से हम अपने-अपने रास्ते हो लिए.

तो 18 और 20 फरवरी दोनों ही दिन कुछ आभासी मित्र वास्तविक दुनिया में मिले और कुछ अचानक मिले और बाद में आभासी दुनिया के मित्र बने. मित्रों के मिलने और बनने का यह सिलसिला ज़िंदगी भर चलता है, लेकिन यह बहुत ही नया अनुभव है कि आप जिससे कभी भी न मिलें हों और न उनके विचारों से बहुत परिचित हों, वे अचानक से मिलें और इतने अपने से लगें.

क्रमशः

दिए के जलने से पीछे का अँधेरा और गहरा हो जाता है…

aradhana mukti:

फिर फिर याद करना बचपन की छूटी गलियों को…

Originally posted on आराधना का ब्लॉग:

मैं शायद कोई किताब पढ़ रही थी या टी.वी. देख रही थी, नहीं मैं एल्बम देख रही थी, बचपन की फोटो वाली. अधखुली खिड़की से धुंधली सी धूप अंदर आ रही थी. अचानक डोरबेल बजती है. मैं दरवाजा खोलती हूँ, कूरियर वाला हाथ में एक पैकेट थमाकर चला जाता है. मैं वापस मुडती हूँ, तो खुद को एक प्लेटफॉर्म पर पाती हूँ.

मैं अचकचा जाती हूँ. नंगे पैर प्लेटफॉर्म पर. कपडे भी घरवाले पहने हैं. अजीब सा लग रहा है. मेरे हाथ में एक टिकट है. शायद कूरियर वाले ने दिया है. अचानक एक ट्रेन आकर रुकती है और कोई अदृश्य शक्ति मुझे उसमें धकेल देती है. मैं ट्रेन में चढ़ती हूँ और एक रेलवे स्टेशन पर उतर जाती हूँ. ये कुछ जान जानी-पहचानी सी जगह है. हाँ, शायद ये उन्नाव है. मेरे बचपन का शहर. लेकिन कुछ बदला-बदला सा.

मुझे याद नहीं कि मैं इसके पहले मैं यहाँ…

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फूलों वाले कुर्ते

एक लड़की थी. सीधी-सादी सी, जैसी कि अमूमन प्रेम कहानियों में नायिकाएँ हुआ करती हैं- किशोरावस्था को पारकर यौवन की दहलीज पर पाँव रखने वाली, सपनों और उन्हें पूरा करने के जोश से भरी हुयी. एक लड़का था. नौजवान, सजीला और प्रेम-कहानियों के नायकों की तरह ही शरीफ.

लड़की जब लड़के के घर के सामने से निकलती, तो लड़का बैडमिंटन खेल रहा होता और अक्सर उसे देखने के चक्कर में या तो रैकेट को हवा में घुमा देता या इतनी जोर से मारता कि शटल बाहर जा गिरती. लड़की में ऐसा कुछ खास नहीं था कि उसे एक नज़र में चाहने लगा जाय, लेकिन प्रेम की केमिस्ट्री अलग ही होती है, क्या पता कब किससे मिल जाय?

लड़के को लड़की अच्छी लगती थी. वो उसको देखता था और इसका एहसास उसके दोस्तों के साथ-साथ लड़की को भी हो गया था. लड़की को भी लड़का अच्छा लगता था, इसका पता किसी को न था. फिर एक दिन लड़के ने साहस करके उससे उसका नाम पूछ ही लिया…फिर जैसा कि और प्रेम-कहानियों में होता है, उनमें दोस्ती हो गयी.

लड़की ने बताया कि वह छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाती है और खुद भी प्राइवेट बी.ए. कर रही है. और कुछ लड़के ने पूछा नहीं और लड़की ने बताया नहीं. लड़का बी.एस.सी. एजी कर रहा था और कॉलेज की ओर से बैडमिंटन खेलता था.  लड़के ने ये खुद बताया, लड़की ने पूछा नहीं.

लड़की ट्यूशन पढ़ाकर घर लौटते समय लड़के के घर के सामने वाले पार्क में रुकती, जहाँ लड़का इंतज़ार कर रहा होता. फिर दोनों खूब ढेर सारी बातें करते. लड़के को बारिश बहुत पसंद थी. सोंधी-सोंधी मिट्टी की खुशबू, मोर का नाचना, पेड़ के पत्तों का धुलकर ताजा हो जाना, अपने घर के बरामदे में बैठकर बारिश देखना और पकौड़े खाना लड़के को बहुत अच्छा लगता था. लड़की को बारिश नहीं पसंद थी. उसे नहीं अच्छा लगता जब पानी में भीगकर कांपते हुए परिंदे सिर छुपाने को ओट ढूँढते फिरते हैं. लड़की की इस बात पर लड़का खूब हँसता था. लड़की को बसंत पसंद था क्योंकि उस समय खूब फूल खिलते हैं.

लड़की को फूल कुछ ज़्यादा ही पसंद थे. वो रोज़ अपने कुर्तों पर तरह-तरह के फूल काढ़ा करती थी. लड़का उससे पूछता कि ये बेतरतीब से क्यूँ हैं, तो वो बताती कि उसे इस तरह बेतरतीब फूल अच्छे लगते हैं. यूँ लगता है मानो अभी-अभी डाली से टूटकर उसके कुर्ते पर बिखर गए हों. लड़के को उसकी बातें बहुत अच्छी लगतीं. उसे ये भी अच्छा लगता कि लड़की गुणी है और अच्छी सिलाई-कढ़ाई कर लेती है.

लड़का, अपनी बातों में कुछ ज़्यादा ही आगे निकल जाता और भविष्य की योजनाएं बनाने लगता. हम एक छोटा सा घर बनाएँगे. ये करेंगे, वो करेंगे. तब लड़की चुप होकर लड़के का चेहरा देखा करती. कभी-कभी वो डर जाती और कभी उसे लगता कि वो सिंड्रेला है और लड़का उसका राजकुमार. लड़के ने लड़की से अपने बारे में सब कुछ बता दिया था कि वह अपने माँ-बाप का इकलौता लड़का है. गाँव में उनकी अच्छी-खासी ज़मीन है. उसके ताऊ ज़मींदार और गाँव के प्रधान हैं. लड़का खेती की बातें करता और कहता कि एग्रीकल्चर की पढ़ाई करके वो बहुत अच्छे से खेती करेगा. लड़की बहुत कुछ सोचती, लेकिन बताती नहीं.

एक दिन लड़की फूलों वाले कुर्ते की जगह नया कुरता पहनकर आयी और खुश होकर बताया कि उसने ट्यूशन के पैसों से नए सूट सिलवाए हैं और अब उसे वो फूलों वाले कुर्ते नहीं पहनने पड़ेंगे. लड़का नाराज़ हो गया. उसने लड़की से वही कुर्ते पहनकर आने को कहा. उसने लड़की को बताया कि उन कुर्तों की वजह से ही तो सबसे अलग दिखती है. वो उससे ज़िद करने लगा कि कल से वही कुर्ते पहनकर आये. लड़की उसके इस व्यवहार से दंग रह गयी. उसने तो सोचा था कि लड़का तारीफ़ करेगा, लेकिन ये तो उल्टे नाराज़ हो गया.

लड़की बहुत भारी मन से वापस लौटी. वो लड़के को कैसे बताए कि उसके कुर्तों के वो फूल, फूल नहीं थे, पैबंद थे, जो वो कपड़ों के फटने पर की गयी रफू को छुपाने के लिए काढ़ दिया करती थी. वो कैसे बताए कि उसके पिता की लंबी बीमारी और मृत्यु के बाद उसकी माँ पाँच बच्चों को किस-किस तरह से पाल रही थी? वो कैसे बताए कि वो कुर्ते, जिन्हें वो इतने खूबसूरत मान रहा है, अब इतने जर्जर हो चुके हैं कि कभी भी फटकर तार-तार हो सकते हैं. वो कैसे बताए कि उन कुर्तों पर अब इतनी जगह भी नहीं बची कि और फूल काढ़े जा सकें.

लड़की को अचानक ये एहसास हुआ कि वो सिंड्रेला नहीं है. और उसने अपना रास्ता बदल दिया.

बीमारी और जानकारी

पिछले पांच-छः महीने मैं गले में भयंकर दर्द से पीड़ित रही. वैसे मुझे धूल और प्रदूषण से एलर्जी है और सर्द-गर्म से भी. इससे अक्सर गले में खरास और छाले हो जाते हैं. अगस्त में मैंने एक कॉलेज में adhok असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में पढ़ाना शुरू किया था, उसी बीच घर की सफाई करते-करते धूल से गले में छाले हो गए, जिससे दर्द हुआ और बढ़ता ही गया. खरास और छाले तो अक्सर हो जाते हैं, लेकिन दर्द से लगा कि इन्फेक्शन है. लेकिन एंटीबायोटिक खाने से भी लाभ नहीं हुआ.

तब लगा कि डॉक्टर को दिखाना ही पड़ेगा. एक अनुभवी ENT विशेषज्ञ को दिखाया. उन्होंने सारे लक्षण सुनकर कहा कि एलर्जी ही है, कुछ एंटी एलर्जिक दवाएं लिखीं और मुझे खुले और साफ वातावरण में रहने की हिदायत भी दी. पूरे एक हफ्ते उनकी लिखीं दवाएं खाने से फायदा नहीं हुआ, तो मैं घबरा गयी. मैंने अपनी डॉक्टर सहेली को सब बताया, तो उसने एम्स में दिखाने को कहा.

मुझे ऐसा लगता था जैसे गले में घाव है. कुछ भी खाने-पीने में, यहाँ तक कि सांस लेने में भी दर्द हो रहा था. मुझे गले की परेशानी अक्सर हो जाती है, लेकिन इतना कष्ट पहली बार हुआ. लग रहा था कि गाना-गुनगुनाना तो दूर, मैं अब ठीक से बोल भी नहीं पाऊँगी कभी. थोड़ी देर बात करने पर भी दर्द बढ़ जाता था और उस पर लेक्चर भी देने पड़ रहे थे.

जब एम्स में डॉक्टर को दिखाया, तो उन्होंने बताया कि गले में अल्सर हैं. डॉक्टर ने बताया कि इसका कारण एलर्जी भी हो सकती है और Acid Reflux भी. एलर्जी का तो पता था मुझे लेकिन एसिड रिफ्लक्स का मतलब समझ में नहीं आया. इंटरनेट खंगाला तो पता चला कि यह एक ऐसी स्थिति होती है जब पेट में भोजन को पचाने वाला एसिड किसी कारण से गले तक वापस चला आता है और गले में घाव पैदा कर देता है.

यह सब जानकर मेरा दिमाग घूम गया था. कैसी-कैसी समस्याएं पैदा होती रहती हैं शरीर में और उनके बारे में हम जान तभी पाते हैं, जब हम किसी बीमारी से ग्रस्त होते हैं. अगर मुझे एसिड रिफ्लक्स के बारे में पहले से ही पता होता तो मैं पहले ही एसिडिटी दूर करने वाली दवा खाने लगती. लेकिन हमारी जानकारी की एक सीमा होती है. हम हर चीज़ के बारे में पूरी जानकारी तो नहीं रख सकते ना. 

डॉक्टर ने मुझे एंटी-एसिड और एंटी-एलर्जिक दवाएं दीं, जिन्हें डेढ़ महीने तक खाने के बाद मेरा गला ठीक हुआ. अभी भी पूरी तरह से आराम नहीं है और दवा खानी पड़ जाती है. इस लम्बी बीमारी से एक नयी बीमारी के बारे में पता चला.

सम्बन्धों का जुड़ना-टूटना

“जब कोई दवा लंबे समय तक चलती रहती है, तो उसको अचानक बंद करने के परिणाम खतरनाक हो सकते हैं और मरीज़ पहले वाली स्थिति में जा सकता है. लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही दवाओं की खुराक क्रमशः कम करते हुए उन्हें धीरे-धीरे खत्म करना चाहिए. पुराने रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं. उन्हें अचानक से नहीं तोड़ना चाहिए. इससे चोट लग सकती है.” कोई समझा रहा था मुझे. और मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि ये “धीरे-धीरे” वाली अवधि कितनी लंबी होनी चाहिए? एक महीने, दो महीने या एक साल? और तब तक क्या किया जाय? उस रिश्ते को क्या नाम दिया जाय- “इट्स काम्प्लिकेटेड”?

ये ‘इंटरपर्सनल रिलेशंस’ कितना परेशान करते हैं यार. बाऊ अक्सर कहा करते थे कि हमारे देश में लोगों की ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा समाज के रस्मो-रिवाज से उलझने और आपसी सम्बन्धों को सुलझाने में ‘बरबाद’ हो जाता है. इसीलिए हम इतने पिछड़े हुए हैं. क्या पश्चिमी समाज में लोग प्यार नहीं करते? करते ही हैं. लेकिन दो लोगों के आपसी सम्बन्धों के पचड़े में समाज नहीं पड़ता. पता नहीं क्या होता है और क्या नहीं होता? लेकिन अपने यहाँ दो लोगों की रिलेशनशिप उनकी ज़िंदगी पर कोई असर डाले या न डाले, औरों की बदहजमी का कारण ज़रूर बन जाती है. और उसका असर रिलेशनशिप पर ज़रूर पड़ता है. नतीजा- काम्प्लिकेशन…

मैं आजकल इस बात पर विचार कर रही हूँ कि कोई भी प्रेम-सम्बन्ध (वर्तमान भाषा में ‘रिलेशनशिप’) खत्म कैसे किया जाय? क्या प्रेम खत्म होने के बाद हमें अपने साथी के बारे में ज़रा सा भी नहीं सोचना चाहिए. हो सकता है कि एक तरफ़ से प्रेम खत्म हो गया हो, पर दूसरे का क्या? लेकिन एक के मन से प्रेम खत्म हो जाने पर सिर्फ दूसरे का मन रखने के लिए रिश्ते को निभाते जाना भी ठीक है क्या? हम अक्सर कई जोड़ों को ऐसा करते हुए देखते हैं. क्यों?

दरअसल, हमारे समाज में प्रेम-सम्बन्ध ‘जोड़ना’ जितना बड़ा पाप समझा जाता है, उसे ‘तोड़ना’ उससे भी बड़ा पाप. हमें रिश्तों को ‘निभाने’ के बारे में तो सौ बातें सिखाई जाती हैं, लेकिन उन्हें खत्म करने के बारे में नहीं बताया जाता. और कहीं ये प्रेम-सम्बन्ध है, तब तो जन्म-जन्मांतर का नाता मान लिया जाता है. ‘एक हिंदू लड़की सिर्फ एक बार अपना पति/प्रेमी चुनती है’ ये डायलाग बचपन से फिल्मों के माध्यम से हमारे सब-कांशस दिमाग में इस तरह बिठा दिया जाता है कि हम रिश्ता टूटने की कल्पना से ही कांप उठते हैं. अक्सर टीनेजर्स रिश्ते के टूटने पर अपना आत्मविश्वास खो उठते हैं, और कभी-कभी तो बात आत्महत्या तक पहुँच जाती है.

खैर, मैं ये बात नहीं मानती कि प्रेम-सम्बन्ध जन्म-जन्मांतर के लिए होते हैं. ये दो संवेदनशील व्यक्तियों के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है, इस पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है.

मुझे लगता है कि हमें अपने बच्चों, खासकर टीनेजर्स को इस बात के लिए तैयार करना चाहिए कि अगर रिश्ते बनते हैं, तो खत्म भी होते हैं. हमें रिश्ते निभाने चाहिए, लेकिन सिर्फ ‘निभाने के लिए’ नहीं. अगर प्यार होता है, तो कोई भी किसी रिश्ते को नहीं तोड़ सकता, चाहे वो दोस्ती का रिश्ता हो या प्रेम का या कोई और, लेकिन अगर प्यार नहीं बचा है, तो सिर्फ नाम के लिए रिश्ते निभाने की कोई ज़रूरत नहीं. और न ही ये सोचने की ज़रूरत कि यदि रिश्ता टूट गया, तो हम खत्म हो जायेंगे. दुःख, तो हर रिश्ते के टूटने पर होता है, लेकिन उसे इस हद तक नहीं जाना चाहिए कि इंसान अपनी ज़िंदगी ही दाँव पर लगा दे. कोई भी चीज़ ज़िंदगी से ज़्यादा कीमती नहीं. इस विषय में आपके क्या विचार हैं?Image144c

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