आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

उसका मन

कुछ दिन पहले उसकी परीक्षाएँ चल रही थीं और वो मुझसे फोन पर आराम से बातें करती थी. एक दिन मैंने पूछा कि तुम्हारे तो इम्तिहान चल रहे हैं न? तो बोली “हाँ मौसी लेकिन मुझे कोई टेंशन नहीं. आई एम कूल” 🙂  होती भी कैसे? हमने कभी उस पर अच्छे मार्क्स लाने का बोझ डाला ही नहीं. और डालते भी तो उसे लेने वालों में से नहीं 🙂 वो उन खुशनसीब बच्चों में से है जिन्हें पहले से पता होता है कि वे दुनिया में अपनी तरह के अकेले हैं और उन्हें किसी “चूहा-दौड़” का हिस्सा नहीं बनना है.

मेरी दीदी बचपन से ही बहुत क्रिएटिव थी. सात-आठ साल की उम्र से ही अम्मा को देखकर अपनी गुड़िया के लिए कपड़े सिलने लगी थी. बाद में कटाई-सिलाई की एक्सपर्ट बन गयी. बचपन से लेकर अपनी शादी तक मेरे सारे कपड़े वही सिलती थी. वो पढ़ाई में तो अच्छी थी ही साथ ही कढ़ाई, बुनाई, पेंटिंग हर चीज़ में माहिर थी. उनकी बेटी उनसे भी एक कदम आगे. असल में वो अपने मम्मी-पापा जैसी भी है और मेरे जैसी भी 🙂 . वो दीदी की तरह आर्ट और क्राफ्ट में बहुत अच्छी है, मेरी तरह सात-आठ साल की उम्र से कवितायें लिखती है (किसी को दिखाती नहीं लेकिन) और जीजाजी की तरह निडर और साहसी है. ऐसा नहीं कि पढ़ने में उसका मन नहीं लगता लेकिन उसे मेरी तरह “टॉप” करने और सबसे आगे रहने का भूत नहीं सवार रहता. दीदी ने एक बार कहा भी कि मौसी से कुछ सीख लो, वो कितनी मेहनत करती थी, हमेशा टॉप करती थी, तो मैडम बोली “मौसी यूनीक है. मेरी मौसी जैसा कोई नहीं हो सकता” दीदी के पास कोई जवाब नहीं इस बात का. दीदी ने यह बात मुझे बताई तो मुझे हँसी आ गयी. मैंने दीदी से कहा कि आगे से मुझसे या किसी और से भी उसकी तुलना मत करना.

वो मिशनरी के स्कूल में पढ़ती है. उसके स्कूल में ICSC बोर्ड है. दीदी को चिंता थी कि इस बोर्ड में ज़्यादा मार्क्स नहीं आते, तो उसका एडमिशन CBSC बोर्ड के किसी स्कूल में करवा देते हैं. लेकिन मैंने भी मना किया और शीतल का भी मन नहीं था कहीं और जाकर पढ़ने का. लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ जब पता चला कि इनके स्कूल में कला वर्ग है ही नहीं. मतलब इन बच्चों के पास समाजशास्त्र, नागरिकशास्त्र, भूगोल, इतिहास आदि जैसे विषय पढ़ने का विकल्प ही नहीं है. वहीं नहीं आसपास के किसी CBCE के स्कूल में भी कला वर्ग नहीं है. हारकर शीतल को कॉमर्स लेना पड़ा और उसका उसके प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ा.

आज परीक्षा परिणाम आया तो वो उत्तीर्ण तो हो गयी लेकिन अपेक्षित अंक नहीं ला पायी. अपने मनपसंद विषय अंग्रेजी में उसके बहुत अच्छे अंक हैं, शेष विषयों में नहीं. उसके टीचर्स भी प्रतिशत से संतुष्ट नहीं हैं, उन्होंने उसे दो विषयों में पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करने की सलाह दी है. वो दिल्ली से अंग्रेजी साहित्य से बी.ए. करने के बाद NIFT में एडमिशन लेना चाहती थी. उसे फैशन डिज़ाइनिंग का कोर्स करके भारतीय हस्तकला के क्षेत्र में काम करना है. ‘ज्वेलरी डिज़ाइनिंग’ में विशेष रूचि है उसकी. अब उसका प्रवेश दिल्ली विश्वविद्यालय में तो नहीं हो पायेगा क्योंकि यहाँ अस्सी प्रतिशत से कम लाने वाला बच्चा अंग्रेजी, कॉमर्स, अर्थशास्त्र आदि में ऑनर्स करने की सोच भी नहीं सकता. यह भी बड़ी विचित्र सी बात है कि एडमिशन उसे अंग्रेजी में लेना है और मार्क्स बाकी के विषयों के भी जुड़ेंगे. थोड़ी दुखी लग रही थी वो लेकिन हताश नहीं थी. मैं और दीदी-जीजाजी तो इस बात से खुश हैं कि मज़े-मज़े में इम्तहान देकर लड़की पास हो गयी 🙂 हमें नहीं फर्क पड़ता इस बात से कि उसके मार्क्स कितने आये?

खैर, मेरी बिटिया को चूहा-दौड़ से दूर रहना था और हम उसे इससे दूर ही रखेंगे. वो अपने आसपास के सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरुक और सोचने वाली लड़की है. लिखने में भी खूब मन लगता है तो विकल्प के रूप में उसने पत्रकारिता और हिंदी साहित्य पढ़ने के बारे में सोचा है. जो भी हो वो करेगी वही जो उसका मन होगा.

सडकों पर जीने वाले

हर शनिवार मोहल्ले में सब्जी बाज़ार लगता है. वहीं सब्जी बेचता है वो. इतना ज़्यादा बोलता है कि लडकियाँ उसको बदतमीज समझकर सब्जी नहीं लेतीं और लड़के मज़ाक उड़ाकर मज़े लेते हैं. मैं उससे सब्जी इसलिए लेती हूँ क्योंकि उनकी क्वालिटी अच्छी होती है. मुझे देखकर दूर से ही बुलाता है. कभी ‘बहन’ कहता है कभी ‘मैडम’. मैंने एक दो बार नाम पूछा तो हँस दिया. नाम नहीं बताया आज तक.

पहले बहुत ज़्यादा बीड़ी पीता था. मैं हमेशा टोकती थी, तो मुझे देखकर बीड़ी बुझा देता था. एक-डेढ़ साल पहले से उसे खाँसी रहने लगी. मैंने उससे कहा भी कि तुम जिस तरह से खाँस रहे हो, मुझे लगता है फेफड़े ठीक नहीं हैं तुम्हारे. डॉक्टर को दिखाने के लिए बोला तो बात हँसी में उड़ा दी. करीब छः महीने पहले उसकी आवाज़ बदल गयी. मैंने पूछा “दर्द होता है” बोला नहीं. मैंने कहा कि किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाओ नहीं तो कैंसर हो जायेगा. दो बच्चे हैं उसके, बताया था उसने. मैंने उसे बच्चों का वास्ता दिया. इस पर बस चुप हो गया.

उसके बाद दो हफ्ते दिखा ही नहीं. फिर जब दिखा तो अपने आप से बताया “डॉक्टर को दिखाया मैने. दवा लम्बी चलेगी. डॉक्टर बोला ‘बीड़ी पिएगा तो आवाज़ चली जाएगी’, तो बीड़ी भी कम कर दिया” मुझे बहुत ख़ुशी हुयी उसकी बात सुनकर. उसके अगले हफ्ते उसकी आवाज़ काफी ठीक हो गयी. स्वस्थ भी लगने लगा. लेकिन सब्जी न लगाने की वजह से काम कम हो गया. सब्जी की क्वालिटी भी कुछ हल्की लगी, फिर भी मैं उसी से सब्जी लेती रही. धीरे-धीरे उसने फिर से काम जमा लिया है.

आज सब्जी लेने गयी तो सीधे उसके पास पहुँची. मैंने बीन्स माँगी तो उसने मना कर दिया क्योंकि बीन्स की क्वालिटी अच्छी नहीं थी. मैंने उससे कहा भी कि दे दो मैं छाँट लूँगी लेकिन वो नहीं माना. उदास होकर बोला किसी को नहीं दिया बहन, पूरी बोरी ख़राब निकल गयी. लेकिन गलत सौदा नहीं दूँगा अपने गाहकों को. खैर, मैंने उससे दूसरी सब्जियाँ लीं और लौटने लगी.

एक बूढ़े व्यक्ति हैं. अदरक, मिर्च, लहसुन बेचते हैं. राजनीति की बड़ी बातें करते हैं. उनसे मैं तीखी वाली मिर्च लेती हूँ. आज पूछा तो कहने लगे “तीखे की गारंटी नहीं है आज की मिर्च में” मैंने कहा कोई बात नहीं दे दीजिये. एक लड़की ने आकर धनिया का दाम पूछा तो सीधे बोले “बिटिया धनिया सूख गयी है. लेने लायक नहीं है”

कई बार ऐसा हुआ है कि किसी रिक्शे वाले को नियमित किराये से ज़्यादा पैसे दिए हैं, तो उसने ईमानदारी से लौटा दिए. एक बार गलती से फुटकर पैसे लेकर नहीं गयी. पास में दो हज़ार की नोट थी और रिक्शे वाले के पास इतने पैसे खुल्ले नहीं थे. उसने कहा “मैडम, मोहल्ले में ही तो खड़ा रहता हूँ. फिर दे देना.” एक चाय वाले बाबा हैं. रात में दोस्त के साथ वहाँ चाय पी थी. लगभग दो महीने बाद हम दोबारा चाय पीने गए तो बाबा ने पैसे नहीं लिए और दस रूपये वापस दिए. बोले “पिछली बार बीस की जगह पचास रूपये दे गये थे आप.”

मैं इस पोस्ट के अंत में कोई ‘नैतिक शिक्षा’ नहीं देने वाली हूँ, लेकिन जबसे सब्जी बाज़ार से लौटकर आई हूँ सोच नहीं पा रही हूँ कि वो लोग, जो देश के हजारों करोड़ रूपये हड़पकर ऐशो आराम की ज़िन्दगी बिता रहे होते हैं या विदेश भाग जाते हैं, वो लोग किस मिटटी के बने होते हैं? उन्हें रात में नींद आती होगी क्या?

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शनिवार की सब्जी बाज़ार

फिर से

कहते हैं हर लिखने वाले के जीवन में एक समय ऐसा ज़रूर आता है, जब उसका लिखने-पढने से जी उचट जाता है. अंग्रेजी में इसे राइटर्स ब्लॉक कहते हैं. मैं खुद को कोई लेखक-वेखक नहीं मानती और न ही अपने जीवन में कभी इसका अनुभव किया था. लेकिन पिछले दो-तीन सालों में मुझे ऐसा ही कुछ महसूस हो रहा है. ऐसा लगता है मानो दिमाग बंद हो गया हो. न कुछ पढ़ पा रही हूँ न ही लिख पा रही हूँ. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे जीवन में ऐसा भी समय आएगा. एक वाक्य लिख पाना भी मुश्किल हो गया. अगर कुछ लिखती भी हूँ तो ऐसा बकवास होता है कि खुद ही पढ़ने का मन नहीं होता.

ऐसा सब के साथ होता होगा या नहीं भी. मुझे ज़्यादा नहीं पता. लेकिन इसे इतना लम्बा नहीं चलना चाहिए. इतना कि लगे अब दोबारा कभी कुछ नहीं लिख पाऊँगी. कभी-कभी खूब ज़ोर-ज़ोर से रोने का मन होता है. मैं बचपन से लेकर कुछ सालों पहले  तक बस पढ़ती ही रही हूँ. पढ़ाई के लिए सब कुछ छोड़ दिया मैंने- संगीत, पेंटिंग, स्केचिंग, स्पोर्ट्स सब कुछ. ये मेरी जिंदगी है और अभी लगता है कि जिंदगी ही खत्म हो गयी और मैं बेजान हूँ. ये उसी तरह है मानो किसी धावक के पैर कट गये हों, या किसी पेंटर के हाथ या किसी गायक का गला बुरी तरह ख़राब हो गया हो. जो जिसके लिए जीता है उससे वही छिन जाय.

कोशिश कर रही हूँ कि इससे उबर पाऊं. मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा है कि मैं लिख क्या रही हूँ? पिछले पूरे साल एक भी ब्लॉग पोस्ट नहीं लिखी और इस साल की यह पहली ब्लॉग पोस्ट है. मुझे नहीं पता कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? क्या मेरा मन कहीं और लगा हुआ है या इसका कारण डिप्रेशन है या मेरे मन-मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया है या अब क्षमता नहीं रही या बूढ़ी हो गयी हूँ? कारण कुछ भी हो, मैं दिल से लिख नहीं पा रही.

क्या मैं इससे कभी उबर पाऊँगी? क्या मैं फिर से लिख पाऊँगी?

 

कहाँ जाएँ?

कल की बात है. डॉ के यहाँ जाना ज़रूरी न होता तो घर से ज्यादा दूर निकलती ही नहीं, लेकिन मजबूरी हमसे जो कुछ भी कराये कम है. तीन-चार दिन से धुएं की वजह से जुगनू (मेरा पपी) की आँखों से पानी बह रहा था, इसलिए उसको भी दोपहर बारह बजे टहलाया वो भी सिर्फ पन्द्रह-बीस मिनट. डॉ के यहाँ जाने के लिए ऑटो लिया. मुँह पे मास्क देखकर ऑटो वाले भैया ने प्रदूषण के बारे में बातचीत शुरू कर दी. वैसे आजकल अधिसंख्य लोगों की बातचीत का मुख्य विषय आसपास फैली धुएँ की चादर ही है.

ऑटो वाले भैया ने पूछा मास्क कितने का मिलता है? मैंने उन्हें बताया कि इस मास्क का इस ज़हरीली हवा में कोई मतलब नहीं है, ये तो मैं धूल से बचने के लिए पहनती हूँ. फिर वो बताने लगे कि तीन-चार दिन से उनकी आँखों में मिर्ची सी लग रही है. खाँसी-जुकाम ठीक ही नहीं हो रहा है. मैंने उनसे पूछा पान क्यों खाते हैं, तो बताया ‘गला तर रखने के लिए.’ सफाई भी दी कि दिन में दो-तीन से ज्यादा नहीं खाते. उनको बच्चों की चिंता थी. कहने लगे कि बच्चों के अंग कोमल होते हैं, उनको ज्यादा परेशानी हो रही है. मैंने उन्हें सलाह दी कि कुछ दिन बच्चों को स्कूल न भेजें. सोचिये, कहाँ तो लोगों को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती रहती हूँ, कहाँ उनको पढ़ने से रोकने के लिए कह रही हूँ. मन हुआ कि दिल्ली छोड़ देने की सलाह दूँ, लेकिन किस मुँह से दूँ. प्रदूषण से हरदम गला खराब रहने के बाद भी मैं ही कहाँ छोड़ पा रही हूँ. आखिर, रोजी-रोटी है हमारी यहाँ और फिर कौन-कौन सी जगहें छोड़ेंगे हम. ये तो हवा है, कहीं भी पहुँच जायेगी.

मैंने रिक्शे वाले भैया को दो कुछ नसीहतें दीं. पान में धीरे-धीरे तम्बाकू की मात्रा कम करें, गले के लिए मुलेठी चूसें और भाप लें और एक प्रदूषण वाला मास्क खरीद लें. और मैं क्या कर सकती हूँ. गंतव्य तक पहुँचते-पहुँचते रिक्शे वाले भैया मेरे गृह जनपद के पड़ोसी निकले. बड़े खुश हुए मिलकर. मैंने उन्हें अलविदा कहा और उनकी बातों पर गौर करने लगी. वो कह रहे थे कि मौसम विभाग झूठ कह रहा है कि ये कोहरा है. कोहरा आँखों में चुभता नहीं, उसे मिर्ची की तरह जलाता नहीं. उनसे क्या कहती कि हम आज न जाने कितने ही आँखों देखे झूठों को जी रहे हैं. हम देख कुछ और रहे हैं, महसूस कुछ और कर रहे हैं और हमें बताया कुछ और जा रहा है. खैर…

मुहल्ले में बहुत पेड़-पौधे हैं, तो धुएं का पता नहीं चलता. शहर में निकलकर पता चला कि किसी ‘Post Apocalypse Film’ जैसे माहौल में रह रहे हैं, जहाँ साँस लेने लायक ऑक्सीजन नहीं बचती. घरों-संस्थानों के अन्दर कृत्रिम ऑक्सीजन ढंग से ऑक्सीजन पैदा किया जाता है और घर के बाहर बिना ऑक्सीजन मास्क के नहीं निकला जा सकता.

धुआँ आँख-नाक और मुँह को छीलता हुआ अन्दर जाता है. पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा हो रहा है या और लोगों के साथ भी. पहले की तरह मुझे लौटने के लिए एक घर न होने पर रोना नहीं आता था, कल आ रहा था. अगर वापस जाने का कोई ठिकाना होता तो मैं लौट जाती. लेकिन लोग पर्यावरण को लेकर इतने असंवेदनशील हैं कि वहाँ भी स्थिति यहाँ के जैसी होने में देर नहीं लगेगी. फिर वही बात ‘मरकर भी चैन न आया तो कहाँ जायेंगे?’

ऊपर वाले

कोई रात के तीन बजे होंगे जब ऊपर से लड़ने-झगड़ने और चीज़ें तोड़ने-पटकने की आवाजें आने लगीं. मैं समझ गई कि टॉप फ्लोर वाले आज फिर झगड़ने के मूड में है. पहले “धम्म” से कोई चीज़ ज़मीन पर गिरी, फिर स्टील की चम्मच-प्लेटें गिरने की आवाजें और सबसे आखिर में “छन्नऽऽ” का शोर. मतलब ऊपर वाली लड़की भी मेरी तरह अपना गुस्सा बेचारी क्रॉकरी पर उतार रही है. ‘आज नींद आ चुकी’ मैंने सोचा और उठकर एक किताब पढ़ने लगी.

थोड़ी देर बाद दरवाजा खुलने और फिर बंद होने की आवाज़ आई. शायद लड़की ने लड़के को कमरे से बाहर निकाल दिया था. वो पहले तो धीरे-धीरे दरवाजा खटखटाकर दबी आवाज़ में “ओपन द डोर-ओपन द डोर” कहता रहा. करीब पन्द्रह मिनट बाद उसके सीढ़ियों से नीचे जाने की आवाज़ सुनाई दी. मैंने चैन की सांस ली, किताब उठाकर टेबल पर रखी, टेबल लैम्प बंद किया और सोने की कोशिश करने लगी. अचानक फिर दरवाजा खुलने की आवाज़ आई. लड़की बालकनी में खड़े होकर रो-रोकर लड़के से वापस आने के लिए कह रही थी. उसकी सारी बातें मुझे सीढ़ियों के रोशनदान से सुनाई दे रही थीं, जबकि वह अपनी समझ से काफी धीरे बोल रही थी. शायद लड़का नीचे गली में या सामने वाले पार्क में ही था. पांच मिनट में हाज़िर हो गया. मैं डर गई कि कहीं फिर से लड़ाई-झगड़ा न शुरू हो जाय. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

ऊपर वाले बच्चे अरुणाचल प्रदेश के हैं और मेरे मकान मालिक के प्रिय हैं. मकान मालिक की ख़ास बात यह है कि वे अपने कमरे नॉर्थ ईस्ट के छात्रों को देना पसंद करते हैं क्योंकि वे अपने से मतलब रखते हैं. ऊपर वाला कमरा लड़की ने किराए पर ले रखा है, उसका दोस्त आता-जाता रहता है और हफ्ते-दस दिन में उनके घमासान युद्ध की वजह से मेरी नींद खराब हो जाती है. कभी-कभी गुस्सा आता है, लेकिन फिर सोचती हूँ ‘जाने दो. वैसे ही प्यार के दुश्मन क्या कम हैं ज़माने में, जो मैं भी बन जाऊं.’ 🙂

दूसरे दिन शाम को मकान मालिक मेरे यहाँ आये, तो बातों ही बातों में पूछने लगे “आपको ऊपर वाली लड़की से कोई परेशानी तो नहीं है?” मैंने कहा “नहीं तो, क्यों?” “क्योंकि इसका दोस्त जहाँ रहता है (जाहिर है वह कमरा भी इन्हीं का है) वहाँ अक्सर इन दोनों में लड़ाइयाँ होती रहती थीं. आस-पड़ोस वाले काफी शिकायत करते थे.” “नहीं, ऐसी कोई ख़ास परेशानी तो नहीं.” कहते-कहते मेरे मुँह तक रात वाली बात आ ही गई थी. फिर जाने क्या सोचकर रुक गई. उन्होंने मानो खुद को विश्वास दिलाने के लिए पूछा, “पक्का?” मैंने जवाब दिया. “हाँ, पक्का!” उनको देखकर लगा जैसे उन्होंने चैन की सांस ली हो. जाते-जाते कहने लगे, “अगर थोड़ी बहुत परेशानी हो तो इग्नोर कीजियेगा. कुछ ही दिन पहले लड़की की माँ की कैंसर से डेथ हुयी है. बहुत स्ट्रेस में है बेचारी.”

उनके जाने के बाद मैं रात वाली घटना के बारे में दोबारा सोचने लगी. किसी की पृष्ठभूमि पता चल जाने के बाद कैसे हमारा नज़रिया उसके प्रति बदल जाता है. अब मुझे ऊपर वालों पर बिलकुल गुस्सा नहीं आ रहा था. वैसे आस-पड़ोस वालों की बातें नहीं सुननी चाहिए, लेकिन जब बातें अपने आप कानों में पड़ें तो क्या किया जाय 🙂

चाइनीज़ खाने का स्वाद, ग्लूटामेट और मैगी विवाद

लगभग एक साल पहले हम तीन लडकियाँ (वैसे आप महिलायें भी कह सकते हैं 😀 ) अपने एक मित्र को देखकर हिन्दू राव अस्पताल से लौट रहे थे. मित्र तेज बुखार के चलते दो दिन से अस्पताल में भर्ती थे. बाकी दोनों लडकियों को जी.टी.बी. नगर स्टेशन से मेट्रो पकड़नी थी और मुझे ऑटो. इसलिए हमलोग कैम्प तक साथ आये. वहां पहुँचते-पहुँचते शाम के सात बज चुके थे और संयोग से हम तीनों ही अकेले रहने वाली हैं तो हमने सोचा कि घर जाकर बनाने से अच्छा बाहर खाकर चलते हैं.
तय किया गया कि चाइनीज़/मंचूरियन खाया जाय. हम एक रेस्टोरेंट में घुस गए और चाइनीज़ फ्राइड राईस और मंचूरियन के साथ स्वीट कॉर्न सूप का ऑर्डर दिया. सूप काफी गाढ़ा था. आमतौर पर मुझे गाढ़ा सूप पसंद नहीं है, लेकिन जब चखा तो जैसे आत्मा तृप्त हो गयी. इतना टेस्टी सूप मैंने पहले कभी नहीं पिया. खाना खाकर और हमेशा की तरह बचा हुआ खाना पैक करवाकर हम वहां से निकले. एक ने तो मेट्रो पकड़ ली और दूसरी जो मेरी बचपन की सहेली है, मेरे साथ मेरे घर आ गयी. देर रात तक हमने चाय पी-पीकर खूब गप्पें मारीं. रात में खाना बनाने से छुट्टी हो तो कितना हल्का-हल्का सा महसूस होता है ये वही जान सकता है जिसे रोज़ सुबह से ही रात के खाने के बारे में सोचना शुरू कर देना पड़ता है.
दूसरे दिन जब मैं सोकर उठी तो चेहरा बहुत भारी-भारी सा लग रहा था और आँखें पूरी नहीं खुल रही थीं. शीशे में देखा तो चौंक गयी. पूरा चेहरा सूजा हुआ था और आँखें छोटी हो गयी थीं. वैसे ये समस्या मेरे लिए नई नहीं है. एलर्जिक शरीर होने के नाते कभी-कभी ऐसा हो जाता है. अक्सर पीरियड्स के आसपास भी चेहरे में सूजन आ जाती है लेकिन इतना भारीपन नहीं होता. सिर अजीब ढंग से दुःख रहा था और नींद सी आ रही थी. हालांकि सहेली को मेरा चेहरा ज्यादा सूजा नहीं लग रहा था, लेकिन मुझे महसूस हो रहा था. खैर, मैंने सोचा की अभी सोकर उठी हूँ. थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
सहेली दोपहर तक चली गयी. मेरा चेहरे की सूजन और सिर दर्द शाम तक नहीं ठीक हुआ, तो मुझे थोड़ी चिंता हुई. मैंने नेट ऑन करके swollen face गूगल करना शुरू किया. उसमें मुझे जो जानकारी मिली, उसे पढ़कर मैं चौंक गयी. मैंने chinese restaurant syndrome के बारे में पढ़ा. यह एक समस्या है, जो कि माना जाता है कि Monosodium glutamate (MSG)  (लोकप्रिय नाम अजीनोमोटो) नामक तत्व के कारण होती है. मोनोसोडियम ग्लूटामेट सूप और नूडल्स जैसे खानों में अच्छे स्वाद के लिए मिलाया जाता है. हालांकि अभी इस पर पूरी तरह शोध नहीं हुआ है और यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उक्त समस्या का कारण MSG ही है. आश्चर्य तो मुझे हो रहा था लेकिन साथ ही हंसी आ रही थी कि कहीं ये चीन वालों की सबको “चीनी” बनाने की साजिश तो नहीं….क्योंकि कसम से मेरा चेहरा बिलकुल चाइनीज़ लग रहा था 😀 . खैर, उस दिन तो रात हो गई थी. मैंने तय किया कि अगले दिन डॉ के पास जाकर पूछूंगी कि कोई खतरे की बात तो नहीं है क्योंकि मुझे पहले से ही फूड एलर्जी है और दूध, दूध से बने पदार्थ और नट्स आदि खाना मना है. लेकिन दूसरे दिन तक लक्षण कम हो गए थे और तीसरे दिन तक लगभग समाप्त.
जब मैगी पर इसी तत्व को लेकर बैन लगा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि मैगी खाकर कभी भी इस तरह की कोई समस्या मुझे नहीं हुई. जाहिर है की यदि उसमें एम्.एस.जी. होगा भी तो उसकी मात्रा बहुत कम होगी. मैगी तो एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी का उत्पाद है इसलिए उसकी जांच हुई और उस पर बैन लगा दिया गया और ये रेस्टोरेंट वाले चाइनीज़ खाने में जो भर-भरके MSG डाल रहे हैं, उन पर बैन क्यों नहीं लगता? जांच क्यों नहीं होती? असल में, आमतौर पर लोगों को कोई समस्या ही नहीं होती और सौ में से एक किसी को होती भी है, तो उसे जानकारी ही नहीं होती. लेकिन यह भी बात तो सही है की यूँ तो सभी डिब्बा बंद उत्पादों और बाहर के खानों में कुछ न कुछ रासायनिक तत्व होते ही हैं. सब्जी और फल भी तो कीटनाशकों और रासायनिक खादों के कारण प्रदूषित होते हैं .उनमें फ्रूट हारमोंस डालकर पकाया या बड़ा किया जाता है, वह भी तो नुकसानदायक ही है. हम किस-किस चीज़ से बचेंगे और किस तरह से बचेंगे?

उठो, आगे बढ़ो कि रुकना ख़त्म हो जाना है

ज़िंदगी में सब कुछ वैसा कभी नहीं हो सकता जैसा हमने सोचा होता है. कभी-कभी थोड़ा-बहुत वैसा होता है और कभी बिलकुल नहीं. मैंने बचपन से ही शादी के बारे में कभी नहीं सोचा और न अपने राजकुमार के बारे में कोई सपने देखे, लेकिन फिर भी यह तो कभी न कभी सोचा ही कि कोई ऐसा होगा जिसके लिए मैं ज़िंदगी में सबसे ज्यादा प्रिय होऊँगी… ऐसा कोई राजकुमार जो सफ़ेद घोड़े पर चढ़कर आएगा…नहीं सोचा था, लेकिन हुआ.. एक राजकुमार आया मेरी ज़िंदगी में. सफ़ेद घोड़े पर सवार. उसमें वो सारी खूबियाँ थीं जो एक लड़की अपने प्रेमी में चाहती है. संवेदनशील, खूब प्यार करने वाला, देखभाल करने वाला, मेरी भावनाओं को समझने वाला, मुझसे पहले ही मेरी परेशानियां जान जाने वाला, मेरे दुःख में मुझसे ज्यादा दुःखी और खुशी में मुझसे कहीं अधिक खुश होने वाला, मेरी तरक्की को अपनी तरक्की मानने वाला और सबसे बढ़कर मेरा बहुत सम्मान करने वाला…

लेकिन… कहीं कुछ तो गलत था. शायद वही कि सब कुछ वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं और जब जैसा हम चाहते हैं, वैसा होता है, तो वो हमारी ज़िंदगी में नहीं होता या बहुत कम समय के लिए होता है. मेरे राजकुमार के साथ भी यही था. वो घोड़े पर बैठकर आया था. पता नहीं कैसे उसका घोड़ा मेरे घर के पास रुक गया. वो वापस जाना चाहता था, तब तो घोड़ा टस से मस नहीं हुआ, लेकिन जब उसने रुकना चाहा तो घोड़ा चल पड़ा और ऐसा चला कि रुका ही नहीं. मैं अपने राजकुमार का साथ चाहती थी. वो भी हाथ बढ़ाकर मेरा हाथ पकड़ना चाहता था लेकिन रुकना उसके बस में नहीं था. मेरा घोड़ा हमेशा से मेरे बस में है. उसे बड़ी जतन से ट्रेंड किया है मैंने. उसकी लगाम पर मेरी पकड़ मजबूत है और उसकी वजह हमारे बीच अच्छी समझ. मेरा घोड़ा जिद्दी, लेकिन मेरी बात मानने वाला है. लेकिन वह बेचारा भी क्या करता. जब उसके पास पहुँचता वो और आगे निकल जाता.

आखिर मैंने तय कर लिया कि मैं अपनी राह चलूंगी. पीछा नहीं करूंगी. तब से हमदोनों ही अपने-अपने रास्ते दौड़ रहे हैं. हम एक-दूसरे को देख सकते हैं. बातें कर सकते हैं, लेकिन साथ नहीं हो सकते. वो दौड़ रहा है इस आस में कि कभी न कभी उसका घोड़ा रुक जाएगा, फिर वहीं कहीं हम रात्रि विश्राम के लिए शिविर लगा लेंगे. और मैं दौड़ रही हूँ बिना किसी आस कि मुझे बस दौड़ना है. मुझे नहीं पता कि आगे क्या होने वाला है. क्या कभी ज़िंदगी की ये दौड़ ख़त्म होगी? क्या कहीं कोई मंजिल भी होती है? क्या खानाबदोशों सी इस ज़िंदगी में कोई पड़ाव भी आता है? मुझे नहीं मालूम. न मैं मालूम करना चाहती हूँ.

मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे बगल में कौन दौड़ रहा है? दौड़ते-दौड़ते मैं अगर गिर गयी तो कोई उठाने वाला भी होगा या नहीं? मैं तो बस तेज चलती हवाओं की सरसराहट को अपने कानों के पास से गुजरते महसूस करना चाहती हूँ, सफ़र की थकान को बारिश की बूंदों में धोकर बहा देना चाहती हूँ, खिलती धूप की तपिश से अन्दर की तपिश को जलाकर राख कर देना चाहती हूँ. मैं चल रही हूँ लेकिन किसी मंजिल की तलाश में नहीं. इसलिए चल रही हूँ कि रुकना ख़त्म हो जाना है. जब उदास होकर बैठती हूँ तो भवानी प्रसाद मिश्र की यह कविता पढ़ लेती हूँ.

बुरी बात है
चुप मसान में बैठे-बैठे
दुःख सोचना, दर्द सोचना !
शक्तिहीन कमज़ोर तुच्छ को
हाज़िर नाज़िर रखकर
सपने बुरे देखना !
टूटी हुई बीन को लिपटाकर छाती से
राग उदासी के अलापना !

बुरी बात है !
उठो, पांव रक्खो रकाब पर
जंगल-जंगल नद्दी-नाले कूद-फांद कर
धरती रौंदो !
जैसे भादों की रातों में बिजली कौंधे,
ऐसे कौंधो ।

ओह, मैं तो अपने राजकुमार को भूल ही गयी… बात तो वहीं से शुरू हुयी थी ना?

छोड़ो 🙂

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