आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

शुक्रिया दोस्त, इंसानियत पर मेरा भरोसा बनाये रखने के लिए

बात तब की है, जब मैं इलाहाबाद में पढ़ती थी और वहाँ से आजमगढ़ के गाँव में स्थित अपने घर अक्सर अकेली आती-जाती थी. मैं बचपन से एक छोटे शहर में पली-बढ़ी थी, और वह भी रेलवे स्टेशन के आसपास जहाँ कभी रात नहीं होती. मेरे लिए बहुत मुश्किल था बस से इलाहाबाद से आजमगढ़ और वहाँ से तीस किलोमीटर दूर एकदम धुर गाँव में जाना. शाम होते ही कस्बों और गाँव में चहल-पहल कम होने लगती थी. सर्दियों में काफी परेशानी होती थी क्योंकि गाँव पहुँचते-पहुँचते अक्सर अँधेरा हो जाता था. और उस पर भी शहर से गाँव जाने में कम से कम तीन जगह सवारियाँ बदलनी पड़तीं. जल्दी सवारियाँ मिलती नहीं थीं. कभी-कभी घंटों इंतज़ार करना पड़ता. इन सब कठिनाइयों से बचने के लिए मैं इलाहाबाद से एकदम सुबह लगभग साढ़े पाँच-छः बजे निकलती, लेकिन तब भी देर हो ही जाती.

उस दिन भी ऐसा ही हुआ. मैं अकेली गाँव से लगभग पन्द्रह किलोमीटर दूर स्थित एक कस्बे में पहुँच गयी, लेकिन वहाँ से कोई सवारी नहीं मिल रही थी. मैं टैक्सी स्टैंड (टैक्सी का मतलब उस क्षेत्र में जीप ही होता है) पर खड़ी थी. अचानक एक जीप मेरे पास आकर रुकी. ड्राइवर ने पूछा कहाँ जाना है. मैंने गंतव्य बताया तो बोला ‘बैठ जाइए, हम उधर ही जा रहे हैं. छोड़ देंगे.’ उनका कहने का मतलब शायद यह था कि वे रोज़ सवारियाँ नहीं ढोते. जीप में और भी कई लोग बैठे थे. एक महिला भी थीं, तो मैं बैठ गयी.

मुश्किल तब शुरू हुयी, जब धीरे-धीरे एक-एक करके सारी सवारियाँ रास्ते में उतर गयीं. सर्दियों का समय था. साढ़े छः बजे से ही अँधेरा घिरने लगा था. मैं अपने गंतव्य से आधी दूरी पर ही थी कि जीप पूरी खाली हो गयी और बाहर अँधेरा भी हो गया. जीप में केवल ड्राइवर, क्लीनर और मैं बची. एक ओर तो मन में धुकधुकी लगी थी ऊपर से ड्राइवर की वेशभूषा और डरा रही थी. वह एक छः फुट का लंबा-तगड़ा नौजवान था. मूंछें तो उधर मर्द होने की निशानी मानी ही जाती हैं, उस पर भी जनाब पान चबाये जा रहे थे…मतलब विलेन के सारे गुण मौजूद थे बंदे में.

पता नहीं उन्हें खुद के बारे में बताने का शौक था या मुझे थोड़ा सकुचाया हुआ देखकर उन्होंने बात करनी शुरू कर दी. बताया कि यह जीप उन्हीं की है (कहने का मतलब यह कि “ड्राइवर” नहीं है) उनकी कई जीपें इलाके में सट्टे पर जाती हैं. रोज़ वाली सवारियाँ ढोने के लिए के जीप नहीं देते क्योंकि उससे गाड़ी कबाड़ा हो जाती है और बहुत झंझटी काम है . मुझे उनकी बातें सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन इससे माहौल तो कुछ हल्का हो ही रहा था.

बता दूँ कि मैं जब शुरू में गाँव गयी थी तो मुझे उस क्षेत्र के लड़कों से एक चिढ़ जैसी हो गयी थी. लड़कियों को देखते ही उनकी निगाहें मधुमक्खी की तरह उनसे चिपक जाया करती हैं. मुझे सारे ही बड़े ‘चीप’ लगते थे. क्षेत्रवाद मेरे अंदर कूट-कूटकर भरा था. मुझे लगता था कि लखनऊ के आसपास के लड़के ज़्यादा सभ्य होते हैं. ये तो बहुत बाद में पता चला कि लड़के हर जगह के एक ही जैसे होते हैं. लेकिन इसमें गलती उनकी नहीं उनकी ‘कंडीशनिंग’ की होती है. जी हाँ, ‘नारीवाद’ का अध्ययन करने के बाद मुझे अक्ल आयी कि लड़कों का छिछोरापन भी समाजीकरण की देन है.

पर उस समय मुझे वे महाशय एकदम “छिछोरे,” मुम्बईया बोली में “टपोरी” और दिल्ली की भाषा में “वेल्ले” लग रहे थे. मुझे लग रहा था कि ये अपनी कहानी सुनाने के बाद मेरे बारे में ज़रूर पूछेंगे और वैसा ही हुआ. मैंने उनके सभी सवालों के जवाब दिए क्योंकि मेरे पास और कोई चारा ही नहीं था. पहले उनको लग रहा था कि मैं आजमगढ़ शहर से ही अपने गाँव आ रही हूँ. जब उन्होंने यह सुना कि मैं इलाहाबाद में पढ़ती हूँ तो खुश हो गए. उन्हें बहुत अच्छा लगा कि एकदम इंटीरियर के एक गाँव की लड़की इलाहाबाद जैसे बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ती है क्योंकि मैंने उन्हें यह नहीं बताया था कि यहाँ पली-बढ़ी ही नहीं हूँ. गाँव में होती तो शायद सर पटककर मर जाती और कभी वहाँ पढ़ने का सपना पूरा न होता.

वे पलट-पलटकर बातें कर रहे थे और मैं डर रही थी कि कहीं जीप ही न पलट जाए. अब भी मेरा डर पूरी तरह गया नहीं था. मैं अपने गंतव्य से कुछ ही किलोमीटर दूर थी कि उन्होंने गाँव का नाम पूछा. पहले मैं थोड़ा हिचकी लेकिन फिर बता दिया. मेरा गंतव्य गाँव से तीन किलोमीटर पहले था, फिर वहाँ से मुझे पैदल घर तक जाना था. तब मेरे गाँव के पास तक जीपें जाती ही नहीं थीं क्योंकि सड़क बहुत खराब थी और गाँव एक तरफ पड़ जाता था किसी मुख्य सड़क से नहीं जुड़ा था. ड्राइवर साहब ने मुझसे कहा कि उन्हें भी उधर ही जाना है और वे मुझे गाँव के बगल में छोड़ देंगे. मैंने उन्हें मना भी किया पर वे माने नहीं.

जब तक मैं अपने गाँव पहुँच नहीं गयी, मेरा डर दूर नहीं हुआ. आश्वस्त मैं तब हुयी, जब उन्होंने मुझे गाँव के बगल में छोड़ा और मेरे थोड़ी दूर निकल जाने पर जीप घुमा ली. तब मुझे पता चला कि उन्होंने मुझसे झूठ कहा था कि मुझे उसी तरफ जाना है. वे सिर्फ मुझे छोड़ने मेरे गाँव तक आये और मेरी कृतघ्नता देखिये कि मैंने उनका आभार नहीं व्यक्त किया. बातचीत में वे तीन-चार बार कह चुके थे कि अपने इलाके की हैं तो आप बहन ही हुईं न और मैंने उन्हें पलटकर एक बार भी “हाँ, भईया” नहीं कहा. पता नहीं क्या हुआ कि इस बात से मेरी आँखों में आँसू आ गए. कृतज्ञता के आँसू. मानव के प्रति सहज प्रेम के आँसू. मुझे उन पर विश्वास नहीं था, या घर पहुँचने की जल्दी थी या उस क्षेत्र के लड़कों के प्रति मेरी नफ़रत , किसने मुझे रोका? मैं नहीं जानती लेकिन मुझे आभार व्यक्त करना चाहिए था.

न जाने कितनी बार ऐसे ही बिना स्वार्थ के लड़कों ने मेरी मदद की है. आजमगढ़ से इलाहाबाद और इलाहाबाद से आजमगढ़ की यात्राएँ ऐसी तमाम कहानियाँ समेटे हुए हैं. पर यह कहानी सबसे अलग है. इसने मुझे पुरुषों को एक अलग नज़रिए से देखने की नयी दृष्टि दी. यह सिखाया कि वेशभूषा हमेशा ही चरित्र का आइना नहीं हुआ करती. यह बताया कि सभी बक-बक करने वाले गहराई से सोचते न हों, ऐसा नहीं होता. और यह भी जनाया कि मदद करने वाले कहीं भी मिल जाते हैं. इस घटना को याद करके आज भी दिल में टीस उठती है कि काश वे फिर मिल जाते और मैं उनसे कह पाती “शुक्रिया दोस्त, इंसानियत में मेरा भरोसा बनाए रखने के लिए.”

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मृच्छकटिक, अभिसरण और नुसरत की कव्वाली

‘अभिसारिका नायिका’ मुझे शुरू से ही बड़ी अच्छी लगती है. आधुनिक अर्थों में निडर और बोल्ड. अभिसारिका उस स्त्री को कहते हैं, जो अपने प्रिय से मिलने एक नियत ‘संकेत स्थल’ पर जाती है. कोई उसे देख न ले, इसलिए प्रायः यह समय रात्रि का होता है. लेकिन समय नियत नहीं. संकेत स्थल खेत, भग्न मंदिर, दूती का घर, जंगल, तीर्थ स्थान यहाँ तक कि श्मशान भी हो सकता है.

संस्कृत साहित्य में सम्भोग श्रृंगार के वर्णन में अभिसारिका नायिका का कई स्थलों पर वर्णन हुआ है, किन्तु मुझे अभिसरण का सबसे सुंदर दृश्य ‘मृच्छकटिक’ का लगता है. नायिका वसंतसेना, जो कि एक समृद्ध गणिका है, एक निर्धन ब्राह्मण चारुदत्त से प्रेम करती है. बरसात के मौसम में जबकि चारों ओर काले-काले मेघ छाये हुए हैं और उसके कारण तारों की रोशनी भी धरा तक नहीं पहुँच रही. मेघों के गर्जन और दामिनी के साथ मूसलाधार बारिश हो रही है. ऐसे घोर अन्धकार में वसंतसेना चारुदत्त से मिलने उसके घर जाती है.

अचानक हुए मेघ गर्जन से भयभीत वसंतसेना चारुदत्त के ह्रदय से लग जाती है. विदूषक ‘दुर्दिन’ को उपालंभ देता है कि वह नायिका को मेघ गर्जन से डरा रहा है, तो चारुदत्त उससे कहता है कि ऐसा मत कहो. इसी दुर्दिन से भयभीत होकर तो वसंतसेना मेरे ह्रदय से लगी है.

चारुदत्त कहता है-
धन्यानि तेषां खलु जीवितानि ये कामिनीनां गृहमगतानाम्।
आर्द्राणि मेघोदकशीतलानि गात्राणि गात्रेषु परिष्वजन्ति॥

-अर्थात् वास्तव में उनके जीवन धन्य हैं, जो घर में आयी हुयी कामिनियों के बादल के जल से शीतल हुए शरीरों का अपने शरीरों से आलिंगन करते हैं.

(ये विचार मुझे नुसरत फ़तेह अली खान की कव्वाली ‘है कहाँ का इरादा तुम्हारा सनम, किसके दिन को अदाओं से बहलाओगे. ये बता दो तुम इस चाँदनी रात में, किससे वादा किया है, कहाँ जाओगे’ सुनते हुए आया.)

वो ऐसे ही थे (3)

मेरी और बाऊ की उम्र में लगभग 42-43 साल का अंतर था, यानि लगभग दो पीढ़ी जितना. कहते हैं कि एक पीढ़ी के बाद ‘पीढ़ी अंतराल’ समाप्त हो जाता है. इसीलिये दादा-पोते में ज़्यादा पटती है और शायद इसीलिए हम बच्चों की भी बाऊ से खूब बनती थी. मैं उनके ज़्यादा ही मुँह लगी थी.

वे बेहद मस्तमौला थे, ये तो मैं पहले ही बता चुकी हूँ-बेहद निश्चिन्त, फक्कड़ और दूरदर्शी होते हुए भी वर्तमान में जीने वाले. हमें उन्होंने बचपन से ही तर्क और प्रश्न करना सिखाया था और उनसे सबसे ज़्यादा बहस मैं ही करती थी. उनकी हर बात का विरोध करती थी. उन्होंने भी तो यही किया था 🙂

मुझे लेकर वे बहुत निश्चिन्त रहा करते थे. उनका मानना था कि मेरे अंदर बहुत अधिक जिजीविषा है और मैं सारी परेशानियों को झेलते हुए अपने जीवन में कहीं न कहीं पहुँच जाऊँगी. उन्हें मेरी शादी को लेकर भी कभी चिंता नहीं हुयी. शादी की तो खैर घर में बात ही नहीं होती थी, अगर होती भी तो सिर्फ दीदी की शादी की. बाऊ का मानना था कि मेरे लिए लड़का ढूँढना उनके बस की बात नहीं है 🙂

उनके मस्तमौलापन का एक किस्सा है. बाऊ ने अपनी पेंशन उन्नाव से आजमगढ़ ट्रांसफर कराई थी. कागज़ डाक में कहीं खो गया और उन्हें पूरा एक साल लग गया नया कागज़ बनवाने में. उस अवधि में बाऊ को पेंशन नहीं मिल रही थी और हम बहुत ज़बरदस्त आर्थिक संकट में पड़ गए. दीदी की शादी के बाद मैं अकेली पड़ गयी थी और ऊपर से यह मसला. इसके चलते मैं डिप्रेशन में आ गई. कई-कई बार आत्महत्या करने का मन होता था. बटाई पर मिला गेहूँ रखने के लिए घर में सल्फास की गोलियाँ रखी हुयी थीं. दो-तीन बार मैं सल्फास की गोलियों के डब्बे के पास पहुंचकर रुक गयी.

एक दिन मैंने बाऊ से पूछा ‘बाऊ, सल्फास की कितनी गोलियाँ खा लेने पर तुरन्त मौत हो जायेगी. उन्होंने अखबार से मुँह हटाये बगैर कहा “बड़ों के लिए 5-6 गोलियाँ काफी हैं. छोटे 3-4 में ही निपट जाते हैं. तुम चाहो तो दसों एक साथ खा लो, जिससे कहीं कोई कमी न रह जाए” मैं बाऊ का जवाब सुनकर गुस्से में आ गई. सोचा था कुछ सहानुभूति मिलेगी और यहाँ ये ऐसे बातें कर रहे थे, जैसे ‘आत्महत्या विज्ञान’ में डिप्लोमा करके बैठे हों. उसके बाद बाऊ ने कहा “वैसे एक बात याद रखो. सल्फास खाकर मारना बड़ा कष्टकर होता है. कितने लोग तो सल्फास की गोलियाँ खाते ही ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्लाने लगते हैं. जहाँ-जहाँ से गोलियाँ जाती हैं, अंग गल जाता है. तुम ऐसा करो, फाँसी लगा लो.” मैंने उनकी बाद की बात ठीक से सुनी ही नहीं. मुझे तो सिर्फ सल्फास खाने के साइड  इफेक्ट सुनाई दे रहे थे. भला कोई अपने बच्चों से ऐसे बात करता है 🙂

कार्य प्रगति पर है, कृपया धीरे चलें

रात के दस बज रहे थे, जब उसका फोन आया. सुबीर कैम्प के एक रेस्टोरेंट में दोस्तों के साथ साउथ इन्डियन खा रहा था. फोन उठाते ही ‘उसकी’ सिसकियाँ सुनाई देने लगीं. सुबीर परेशान हो गया. दोस्तों से माफी माँगकर बाहर आया और पूछा ‘क्या हुआ?’ ‘कुछ नहीं’ उसने सुबकते हुए कहा. ‘अब यही प्रॉब्लम है तुम्हारी. फोन कर देती हो और बताती नहीं कि क्या बात है?’ सुबीर ने थोड़ा खीझकर कहा, तो फोन काट दिया गया. सुबीर को लगा कि उसको चिढ़ना नहीं चाहिए था. जाने क्यों परेशान है वो? फिर वह बार-बार फोन करता रहा, लेकिन उधर से फोन कटता रहा. नाराज़ हो गयी थी वह.

‘अच्छी मुसीबत है’ सुबीर बड़बड़ाया. और दोस्तों से इजाज़त लेकर मेट्रो स्टेशन के गेट की ओर बढ़ गया. बारिश हल्की थी, मगर कपड़े गीले करने के लिए काफी थी. ऐसे मौसम के बाद भी कैम्प में काफी चहल-पहल थी. ज़्यादा भीड़ उन लड़के-लड़कियों की थी, जो टिफिन या कुक के बनाए बेस्वाद खाने से बचने के लिए आसपास के इलाकों से कैम्प भाग आते हैं डिनर करने.

मेट्रो में बैठे-बैठे सुबीर ‘उसके’ बारे में ही सोच रहा था. कितना परेशान करती है ये जिद्दी लड़की. लेकिन वो चाहकर भी उसे इग्नोर नहीं कर सकता. उसके बारे में कोई एक राय भी नहीं बना पाता. कभी-कभी उसे लगता है कि बिगड़ी हुयी है तो कभी बहुत समझदार. कभी लगता है कि उसे चाहती है और कभी लगता है कि बस मज़ाक करती है. घर से लड़-झगड़कर बाहर पढ़ने आयी है, इसलिए सुबीर उसका सम्मान करता है. सुबीर उसका ध्यान रखता है, लेकिन वो बेफिकरी. किसी बात से तो डर नहीं लगता उसको. न घरवालों से, न दुनिया से. एक बार उसके घरवाले यहाँ घूमने आये थे तो परिचय के सारे लड़के-लड़कियाँ भी साथ चल दिए. अचानक एक जगह ‘उसने’ सुबीर का हाथ पकड़कर पीछे खींचा. ‘थोड़ा धीरे चलिए, देखिये न क्या लिखा है’ उसने जिस ओर इशारा किया था, वहाँ लिखा था ‘मेट्रो का कार्य प्रगति पर है. कृपया धीरे चलें’ वह सच में धीरे चलना भूल गया था. निक्की उसकी ज़िंदगी में न आती तो शायद उसे इसकी अहमियत भी न पता चलती. सुबीर यह सोचकर मुस्कुरा उठा, फिर हडबडाकर चारों ओर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है.

एक घंटे बाद सुबीर लक्ष्मीनगर में था. उसे पता था कि ये लड़की फोन नहीं उठाएगी. तो सीधे उसके पी.जी. के बाहर पहुँचा और चिल्लाकर बुलाया उसको “निक्कीईईई.” ये नाम कोई और नहीं लेता तो उसने बालकनी से झाँका और बोली ‘आप?’ फिर ‘आंटी जी’ के रोकने के बावजूद धड़-धड़ करती नीचे आ गई. रो-रोकर आँखें सुजा रखी थीं उसने.

‘मुझे पता था कि आप ज़रूर आयेंगे’ चहककर बोली वो.
‘तुमने और कोई चारा छोड़ा था क्या? और ये क्या हालत बना रखी है?’
‘अच्छा, अब आप डाँटो मत’
‘हुआ क्या?’
‘कुछ नहीं’
‘रूममेट से झगड़ा हुआ?’
‘नहीं’
‘ऋचा ने कुछ कहा?’
‘उहूँ’
‘फिर क्या हुआ?’
‘पूरे तीन दिन से फोन नहीं किया आपने’
‘हाँ, तो मैंने तुमसे कहा था न कि पढ़ाई पर ध्यान दो. सेमेस्टर इक्ज़ाम हैं तुम्हारे और मुझे भी पढ़ना है’
‘तो मेरी वजह से आपकी पढ़ाई डिस्टर्ब होती है? और क्या मैं पढ़ती नहीं? क्या मेरी थर्ड पोजीशन नहीं आयी इस सेमस्टर में?’
‘ठीक है-ठीक है. माना कि तीसरी पोजीशन आयी तुम्हारी. पर अगर तुम इन सब ब्वॉयफ्रैंड वगैरह के चक्कर में न पड़तीं, तो फर्स्ट आतीं’
‘मुझे नहीं बनना किताबी कीड़ा. मुझे लाइफ एन्जॉय करनी है.’
‘निक्की, बस थोड़े दिन पढ़ाई पर ध्यान दे लो.’
‘हाँ, तो मैं कैसे ध्यान दूँ पढ़ाई में, जब आप मेरा ध्यान नहीं रखते’
उसने सुबीर की आँखों में देखते हुए कहा. उसके इस तरह से देखने पर सुबीर हमेशा असहज हो जाता है. सुबीर ने बात बदल दी.
‘बस इतनी सी ही बात थी कि मैंने फोन नहीं किया कि कुछ और?’
‘वो… … नितिन’
‘उफ़, तुम आजकल के लड़के-लड़कियों के ये चोंचले. झगड़ा हुआ उससे?’
‘नहीं ब्रेकअप’
‘चलो, अच्छा हुआ. झंझट छूटी. मुझे आपका ‘नितिन पुराण’ नहीं सुनना पड़ेगा और आप पढ़ाई की ओर ध्यान देंगी’ सुबीर मुस्कुराकर बोला.
‘मेरी लाइफ का इतना बड़ा टर्निंग प्वाइंट और आपको मज़ाक सूझ रहा है.’ उसने रोना सा मुँह बनाकर कहा.
‘अच्छा-अच्छा बोलो फटाफट. क्यों हुआ ब्रेकअप?
‘आपकी वजह से?’
‘मेरी वजह से?’ सुबीर एकदम से चौंक गया.
‘हाँ, नितिन ने कहा कि मैं हर समय आपकी बातें करती रहती हूँ. हर समय आपकी तारीफ़ करती रहती हूँ. मेरे हर तीसरे सेंटेंस में आपका नाम आता है ‘सुबीर ये-सुबीर वो’-तो मैं आपको ही ब्वॉयफ्रैंड क्यों नहीं बना लेती.’
सुबीर थोड़ी देर हँसता रहा.
फिर पूछा ‘तुमने क्या कहा?’
‘मैंने सोचा कि पहले आपसे तो पूछ लूँ. विल यू…?’ उसने शरारत से पूछा.
‘निक्की, मैं तुमसे सात साल बड़ा हूँ’
‘तो? आई डोंट केयर’
‘तुम्हारी सहेली का भाई हूँ.’
‘स्टिल आई डोंट केयर’
‘तुम्हारे घरवालों ने तुम्हारी ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर छोड़ी है. वो लोग क्या कहेंगे?’
‘बस इत्ती सी बात है न? ये न होता तो बन जाते मेरे ब्वॉयफ्रैंड?’ उसने फिर सुबीर की आँखों में झाँका. पहली बार सच्चाई दिखी सुबीर को उसकी आँखों में. और वो घबरा गया.
‘बकवास मत करो. जाओ अपने रूम पर’ सुबीर ने उसे डांटते हुए कहा.
‘असल बात ये है कि आप अपने आप से डरते हो. फट्टू हो आप’ गुस्से में कहकर वो तेजी से निकल गयी.

चलते-चलते वे मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों के पास आ गए थे. सीढ़ी की छाया में खड़ा सुबीर सोचता रहा ‘ये बीस साल की लड़की कितनी सयानी, कितनी निडर और साहसी है? कैसे इसने अपनी बात रख दी झट से. कल को ऐसे ही झट से रिश्ता तोड़ भी देगी. लेकिन जब तक साथ है पूरी ईमानदारी से. कोई बेईमानी नहीं.’

बारिश अचानक काफी तेज हो गयी थी. विजिबिलिटी दस मीटर. निक्की अभी दस कदम ही चली होगी कि सामने से एक कार तेजी से आकर रुकी. ठीक समय पर कार ड्राइवर ने ब्रेक लगाया और ठीक समय पर निक्की रुक गयी, लेकिन इस झटके से वो बस गिरने वाली ही थी कि सुबीर ने दौड़कर उसे थाम लिया और कुछ सेकेण्ड वैसे ही खड़ा रहा. ‘तुम्हारी दुनिया? तुम्हारे लोग?’ निक्की ने पूछा. ‘भाड़ में जाएँ.’ सुबीर ने मुस्कुराकर जवाब दिया.

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे. बारिश में भी मेट्रो की वजह से गुलज़ार लक्ष्मीनगर मेट्रो स्टेशन पर कई जोड़ी निगाहें उनको घूर रही थीं. उन सबसे बेखबर सुबीर ने निक्की को अपनी बाहों में भर लिया.

सुबह की बारिश और आत्मालाप

रात देर से सोई। अनु की कहानियाँ पढ़ रही थी। आख़िरी कहानी पढ़कर रोना आ गया। थोड़ी देर तक कुछ सोचती रही, फिर हल्की झपकी लग गयी। अचानक कुछ आवाजों से नींद खुली। मेरी नींद है ही इतनी कच्ची। ज़रा सी आहट होने पर भाग जाती है। पहले सोचा गोली कोई शरारत कर रही होगी, लेकिन वो अपने बिस्तर पर थी। मैं उठी और जाकर दरवाजा खोल दिया। थर्ड फ्लोर पर रहने का नतीजा है या यहाँ रहते-रहते आठ साल हो जाने से उपजा आत्मविश्वास, कि अब मैं बेखटके रात के किसी भी पहर बाहर बालकनी में निकल आती हूँ।

सुबह के छः बजे थे, लेकिन अभी उजाला नहीं हुआ था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। मुझे ये बारिश अच्छी लग रही थी। और भी बहुत से लोग इसका आनंद ले रहे होंगे, लेकिन अगर बारिश तेज हो गयी तो? इन्हीं दिनों ओले भी पड़ जाते हैं, जिनका असर उल्टा होता है। गेहूँ की बालियाँ झड जायेंगी, किसानों का कितना नुक्सान होगा? आम के बौर टूट जायेंगे और आम की फसल खराब हो जायेगी। मैं भी अजीब हूँ। हर घटना के साइड इफेक्ट्स ज़रूर सोचने लग जाती हूँ।

जाने क्या सूझा कि बालकनी से सिर बाहर निकाल दिया। बारिश की बूँदें ‘टप-टप’ सिर पर पड़ने लगीं। कोई होगा मेरे जैसा पागल जो सुबह के छः बजे बालकनी में खड़े होकर ऐसी हरकत करेगा? कम से कम मेरी उम्र की कोई ‘महिला’ तो ऐसा करने के  बारे में नहीं ही सोच सकती। वैसे पागलों की कमी नहीं है दुनिया में। मैंने गली से बाहर पार्क की ओर झाँका कि देखूँ कोई और भी मेरी ही तरह जाग रहा है या नहीं। एक पेड़ की कुछ सूखी डालियाँ दिखीं, मेरी ही तरह पानी में भीगती हुयी। कोने के घर की खिड़की के शेड पर बैठा एक कबूतर पता नहीं क्यों भीग रहा था? पानी से बचने के लिए बहुत सी जगहें हैं। कई बालकनियाँ, जिनमें कपड़े टाँगने के लिए डोर बंधी होती हैं। लेकिन शायद कबूतर भी मेरी ही तरह भीगने के मज़े ले रहा हो या वो सिर छुपाने के लिए खतरा उठाने को तैयार नहीं।

मुझे ये दृश्य बहुत मनभावन लग रहा था। अंदर आकर एक कप चाय बनायी और मोढा लेकर बाहर बालकनी में बैठ गयी। याद नहीं पड़ता कि इससे पहले कब मैं अपने इतने पास थी। अजीब सी बात है न? अक्सर अकेले होते हुए भी हम अपने पास नहीं होते? या कभी-कभी अकेले होने पर हम खुद से ज़्यादा दूर हो जाते हैं। जाने कहाँ-कहाँ मन भटकता रहता है? और कभी भीड़ में भी अपने बहुत पास होते हैं। मुझे रह-रहकर अरविन्द जी का दिया शब्द ‘आत्मालाप’ याद आ रहा था। खुद से ही तो बातें कर रही थी मैं। हममें से जो भी ब्लॉग पर अपने बारे में कुछ लिखता है, आत्मालाप ही तो होता है।

सोचा कि किसी को फोन किया जाय। और अपने सबसे करीबी साथी को फोन किया। अगर आपके पास एक भी ऐसा साथी है, जिससे आप कभी भी फोन करके कुछ भी शेयर कर सकते हैं, तो आप दुनिया के सबसे खुशनसीब इंसान है। थोड़ी देर बातें करने के बाद फोन रख दिया। पर कह नहीं पायी “शुक्रिया दोस्त, मेरी ज़िंदगी में होने के लिए। मुझे हर पल यह एहसास दिलाने के लिए कि डेढ़ करोड़ की आबादी वाले इस शहर में मैं अकेली नहीं हूँ।”

पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (२.)

मैं पहले ही दो दिन पुस्तक मेला घूम आयी थी, इसलिए फिर जाने का कोई इरादा नहीं था. लेकिन बीस फरवरी को जब पुस्तक मेले में थी, तभी अनु का मेसेज आया कि वह कल अपने बच्चों को लेकर आ रही है, मैं आ सकती हूँ क्या? मेरा बहुत दिनों से उसके बच्चों आदित और आद्या से मिलने का मन था, तो मैंने झट से हाँ का मेसेज कर दिया. उसके बाद शाम को फेसबुक पर आशुतोष के यह जिक्र करने पर कि उसने आराधना दी से पैसे लेकर पार्टी दी, उसकी मंडली ने उसको घेर लिया कि हमें भी पार्टी चाहिए. तय हुआ कि नेहा और प्रोमिला जी पार्टी देंगी. मज़े की बात तब तक मैं प्रोमिला जी को जानती तो थी, लेकिन फेसबुक पर दोस्त नहीं थी… 🙂

दूसरे दिन पहले तो अनु से मिलना था, फिर नेहा और आशुतोष एंड कम्पनी के साथ पार्टी करनी थी. मेसेज के माध्यम से पता चला कि अनु फूड कोर्ट में है. मैं वहीं पहुँची. अनु ने अपने बच्चों से मेरा परिचय करवाया, फिर हम हॉल न. 12 के अंदर हिंदयुग्म के स्टाल पर आ गए. उसके पहले हमने एकलव्य प्रकाशन के स्टाल पर बच्चों के लिए कुछ किताबें लीं. आदित और आद्या बड़े ही प्यारे बच्चे हैं. अपनी उम्र के और बच्चों से कहीं अधिक समझदार और मम्मा का कहना मानने वाले. हिन्दयुग्म के स्टाल पर कई लोगों से मिलना हुआ. मैंने अनु की कहानी-संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ लेकर उससे हस्ताक्षरित करवाई. फिर हमने साथ तस्वीरें खिंचवाई. फेसबुक मित्र सोनारुपा विशाल से भी मिलना हुआ. रमा भारती जी भी बहुत ही गर्मजोशी से मिलीं. वे तब तक फेसबुक पर मेरी मित्र नहीं थीं, लेकिन हम एक-दूसरे को जानते थे.

अनु को अपने घर जाना था, लेकिन चलते-चलते वे सत्यानन्द निरुपम जी से मिलना चाहती थीं, तो हम राजकमल प्रकाशन की ओर बढ़े. वहाँ बहुत अधिक भीड़ थी. पता चला कि रवीश कुमार अपनी पुस्तक “इश्क में शहर होना” पर आटोग्राफ दे रहे हैं. पाठकगण पुस्तक खरीदकर पंक्तिबद्ध होकर अपनी प्रति हस्ताक्षरित करवा रहे थे. यह भी खबर मिली कि थोड़ी देर में जावेद अख्तर भी आने वाले हैं. पहले ही स्टाल पूरा भरा हुआ था और भीड़ देखकर मुझे घबराहट हो रही थी. मैं यह सोच रही थी कि जावेद जी के आने पर क्या लोग डबल स्टोरी बनाकर खड़े होंगे 😛 अनु रवीश जी के साथ काम कर चुकी है, इसलिए आद्या और आदित उनको व्यक्तिगत रूप से जानते हैं. आदित ने पूछा “ममा, रवीश अंकल के पास इतनी भीड़ क्यों है?” तो अनु ने जवाब दिया, “बेटा, रवीश अंकल सुपरस्टार हो गए हैं.” 🙂

हम वहीं खड़े थे, तब तक विभावरी और प्रियंवद आते हुए दिखे. विभावरी ने बताया कि ‘विश्वस्त सूत्रों से पता चला कि आप पुस्तक मेले आयी हुयी हैं’ विश्वस्त सूत्र फेसबुक पर उपलब्ध होते हैं 🙂 एक संक्षिप्त मुलाक़ात के बाद वे वाणी प्रकाशन की ओर बढ़ गए. वे प्रियदर्शन के किसी कार्यक्रम में शिरकत करने जा रहे थे. मैं थोड़ी देर अनु के साथ घूमती रही, फिर उससे विदा लेकर दखल प्रकाशन की ओर बढ़ गयी. इस बीच नेहा से मेसेज पर बात हो रही थी. उससे मैंने कहा था कि हॉल न. 12 में आ जाये. लेकिन आशुतोष के मिलने की पूरी संभावना दखल प्रकाशन के स्टाल पर ही थी. और वही हुआ 🙂

दखल प्रकाशन के स्टाल पर एक साथ नेहा, आशुतोष, अदनान, नैयर, रितेश मिश्र और अभिनव सव्यसाँची मिल गए. आशुतोष और नेहा को छोड़कर बाकी सबसे मैं पहली बार मिल रही थी. नेहा के काम के सिलसिले में मैंने उसे अशोक भाई से भी मिलवाया. रितेश इलाहाबादी मित्र हैं और समर की वजह से उनसे फेसबुक पर परिचय हुआ था. आशुतोष ने मुझे सुघोष मिश्र से भी मिलवाया, जो रितेश के अनुज हैं और इलाहाबाद के मेधावी स्कॉलर. वे पूरा एक ट्राली बैग भर किताबें खरीदकर जाने कहाँ ले जा रहे थे 🙂

हमलोग वहाँ से ‘पार्टी करने’ बाहर की ओर जा ही रहे थे कि नेहा लेखक मंच की ओर मुड गयी. हमलोग वहीं खड़े होकर उसका इंतज़ार करने लगे. तभी दूर से कोई इशारे करता दिखाई दिया. ध्यान से देखा तो फेसबुक मित्र ‘महाकवि और फोटोग्राफर’ शायक आलोक महोदय खड़े हुए थे. उनका नाम इतने सम्मान से इसलिए ले रही हूँ कि ऐसा नहीं करूँगी तो जनाब बुरा मान जायेंगे 🙂 मैं उनके पास पहुँची तो इतनी गर्मजोशी से मिले मानो स्कूल टाइम के ‘चढी-बडी’ हों. साथ में संजय शेफर्ड और रचना आभा भी थे. फिर नेहा भी आ गयी. हमने आपसे में एक-दूसरे का परिचय करवाया और खूब फोटो खिंचाई हुयी.

नेहा फिर कहीं चली गयी. तब तक ब्लॉगर मित्र इंदु सिंह मिल गयीं. उनसे भी मैं दिल से मिलना चाहती थी क्योंकि फेसबुक ने मुझे बताया था कि वे मेरे बचपन के शहर उन्नाव की हैं. इंदु के साथ फेसबुक के युवा साथी सुशील कृष्णेत से भी पहली बार मुलाक़ात हुयी. सुशील से इसके पहले फेसबुक पर कई बार बातें हो चुकी थीं, लेकिन मेरे घर के बिल्कुल पास नेहरु विहार में रहते हुए कभी मुलाकात नहीं हुयी. उनके साथ रमा भारती जी भी थीं. हमने थोड़ी देर बातें कीं. फिर मैं सबसे विदा लेकर आशुतोष, अदनान और नैयर के पास आ गयी, जो बडी देर से भूखे पेट हमारा इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन नेहा जी गायब थीं. उनको बुलाया गया. तब तक हम वहीं ज़मीन पर बैठकर पेट में कूद रहे चूहों को शांत करने की कोशिश कर रहे थे और फोटो खींचकर दिल बहला रहे थे 😛

वहाँ बैठे-बैठे अनेक महान विभूतियों के दर्शन हुए. महान पत्रकार/संपादक ओम थान्वी जी और महान साहित्यकार/आलोचक नामवर सिंह जी. लेकिन हमलोग इन सबसे बेखबर फोटो खिंचाई  में व्यस्त थे 🙂 नेहा आयी तो उसने कहा कि किसी काम से उसे वाणी प्रकाशन जाना है. शायद वर्तिका नंदा की पुस्तक का विमोचन होना था. स्टाल पर पता चला कि विमोचन वहाँ न होकर लाल चौक पर है. तो नेहा ने तय किया कि वह लाल चौक जायेगी, लेकिन हम क्या करते? भूख के मारे बुरा हाल था 😛 आखिर नेहा को हमारी हालत पर दया आयी और उसने आशुतोष को खाने-पीने के लिए धन पकड़ाया. हम अकेले खाना तो नहीं चाहते थे, लेकिन भूख के हाथों मजबूर थे 😦

फिर हम मतलब मैं, आशुतोष, नैयर, अदनान और अभिनव फूडकोर्ट पहुँचे. बहुत देर विचार-विमर्श करके खाने के लिए मँगवाया गया. प्रोमिला जी तब तक आयी नहीं थीं. आतीं भी तो मिलतीं कैसे क्योंकि किसी के पास एक-दूसरे का फोन नम्बर ही नहीं था. आखिर में, आशुतोष ने ‘विश्वस्त सूत्रों’ से फोन नंबर लेकर उन्हें फोन किया तो पता चला कि वे पुस्तक मेले में ही थीं. तब तक हमलोग मज़ाक कर रहे थे कि खाने वाले हाज़िर और मेजबान गुम 🙂 थोड़ी देर में प्रोमिला जी आ गयीं. और उसके बाद नेहा. हम खाते-पीते और बातें करते रहे. थोड़ी देर की मुलाक़ात में ही लग रहा था कि हम वर्षों पुराने मित्र हैं और कई सालों के बाद दोबारा मिल रहे हैं.

खाने-पीने के बाद सबलोग विदा लेकर इधर-उधर हो लिए. मैंने फूडकोर्ट के बाहर के घास के मैदान (अंग्रेजी में लॉन) में महाकवि और फोटोग्राफर शायक आलोक महोदय को अकेले बैठे देखा तो उनसे बातचीत करने के मौके को गँवाना उचित नहीं समझा. मेरे साथ अदनान, नैयर और आशुतोष भी चल दिए. अक्षय भी वहीं बैठे थे. थोड़ी देर बाद अभिनव भी आ गए. फिर थोड़ी देर बाद आशु और अभिनव अपने फेफड़े फूँकने कहीं चले गए और बाकी लोग बैठे रहे. महाकवि शायक हमलोगों से बातें करते हुए एक के बाद एक समकालीन कवियों और साहित्यकारों की ‘खबर’ लेते रहे, जैसा कि वे फेसबुक पर भी करते हैं. उनका कहना है कि वे दिन में एक बार झगड़ न लें, तो उन्हें “जाने कैसा-कैसा” महसूस होता है 🙂

महाकवि शायक थोड़ी देर के लिए पेटपूजा करने के लिए गए तो मैंने नैयर से बात की. नैयर ने अपने द्वारा खरीदी हुयी 40 किताबों की फोटो दिखाई, जिनमें हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की किताबें सम्मिलित थीं. मैंने सोचा कि जनाब किसी साहित्य के विद्यार्थी होंगे, लेकिन पूछने पर पता चला कि वे “अर्थ साइंसेज” में आर.ए. यानि रिसर्च असिस्टेंट हैं. इन्हें कहते हैं असली पाठक 🙂 महाकवि खाने-पीने का सामान लेकर लौटे और शिकायत करने लगे कि यहाँ खाना बहुत महँगा है. ये बात तो मैंने भी गौर की है कि प्रगति मैदान में हर जगह खाना ज़रूरत से ज़्यादा महँगा है. उसी समय महाकवि के पीछे कोई पहचाना सा चेहरा दिखा. मैंने महाकवि से पूछा, “उन्हें देख रहे हो. अज़दक वाले प्रमोद जी हैं न?” उन्हें भी ऐसा ही कुछ लगा था लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी. वो तो जब उन्होंने सिगरेट सुलगाई, तो तुरंत दिमाग की बत्ती जल गयी क्योंकि मैंने सबसे पहले उनकी ऐसी ही फोटो देखी थी ब्लॉग पर.

मैं झट से उनके पास पहुँची और उन्हें अपना परिचय देकर बात करना शुरू कर दिया. प्रमोद जी कई बार मुझे उनके ब्लॉग पर की गयी टिप्पणी का जवाब दे चुके हैं, लेकिन उन्होंने मुझे पहचाना नहीं. मुझे अपना पूरा परिचय उन्हें देना पड़ा. वे थोड़ी देर तक टीचर की तरह मुझसे सवाल करते रहे और मैं आदर्श विद्यार्थी की तरह जवाब देती रही 😦 फिर महाकवि भी आ गए. प्रमोद जी ने झट से उन्हें पहचान लिया. महाकवि से मुझे थोड़ी जलन भी हुयी इस बात को लेकर 🙂 प्रमोद जी के पूछने पर ही महाकवि ने वह स्टेटमेंट दिया था कि जब तक वे झगड़ा न करें, उन्हें डिप्रेशन सा फील होता है 🙂 और तभी हमें भी यह ज्ञान प्राप्त हुआ. थोड़ी देर बाद प्रत्यक्षा और वंदना राग जी भी आयीं और उनसे हेलो-हाय हुयी.

कुछ घटनाएँ बडी मज़ेदार हुईं पुस्तक मेले में. मैं कभी किसी सम्मलेन/काव्य पाठ/ साहित्य चर्चा आदि में नहीं जाती, इसलिए मुझे लगता था कि कोई मुझे पहचानेगा नहीं. लेकिन नूतन यादव जी मिलीं और झट से उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें पहचान लिया. पाँच-सात मिनट बात हुयी उनसे. उन्होंने मुझे बताया कि उनके किसी दोस्त ने कहा है कि ‘मुक्ति आपकी मित्र हैं और नारीवादी हैं, तो आप उनसे क्यों नहीं पूछतीं कि वे लड़कों को “बाबू” कहकर क्यों बुलाती हैं’ 🙂 मुझे इस बात से यह महसूस हुआ कि लोग कितनी गंभीरता से लेते हैं मेरी बातों को. मैंने नूतन जी से कहा कि मैं बाबू सिर्फ उन लड़कों को कहती हूँ, जिन्हें छोटा भाई मानती हूँ, बाकी सबको नहीं कहती.

दूसरी घटना, जिस दिन शिखा जी से मिली थी, लालित्य ललित जी भी मिले और उन्होंने पूछा “कैसी हो आराधना?” मैंने कहा “मैंने तो सोचा कि आप पहचानेंगे ही नहीं” तो वे बोले “नहीं, मेरी मैगी ड्यू है न आपके यहाँ” एक बार फेसबुक पर ये बात हुयी थी कि वे मेरे घर पर मैगी पार्टी के लिए आयेंगे 🙂 ये बात लगभग दो साल पुरानी है, लेकिन उन्हें याद है. तीसरी बात, सुघोष ने मुझे बताया कि उन्हें मेरा उपनाम ‘मुक्ति’ इतना अच्छा लगा कि उन्होंने अपनी किसी परिचित का उपनाम भी मुक्ति रख दिया है.

कुल मिलाकर इस खुशफहमी के साथ कि मुझे बहुत से लोग पढते हैं, पसंद करते हैं और प्यार करते हैं, मैं मेले से लौट आयी. मैं कभी प्रोफाइल देखकर दोस्ती नहीं करती और न दोस्ती होने के बाद हिसाब लगाती हूँ कि अगले से मुझे क्या और कितना फ़ायदा होने वाला है? मेरे इस “इम्प्रैक्टिकल एप्रोच” के कारण मेरे करीबी दोस्त बहुत कम हैं. लेकिन पुस्तक मेले में बहुत से लोगों से मिलकर ऐसा लगा कि नए दोस्त बनाए जा सकते हैं. हम नए-नए लोगों से मिलकर खुद को और समझ पाते हैं, खुद की कमियों को ढूँढ़ पाते हैं और खुद के थोड़ा और करीब आ जाते हैं.

पुस्तक मेला (2015) से लौटकर (१)

बहुत दिनों से खुद को एक अदृश्य खोल में बंद कर रखा था. पता नहीं सभी को ऐसा लगता है या सिर्फ मेरे साथ ऐसा होता है कि कभी-कभी किसी से भी मिलने का मन नहीं होता, बात करने का मन नहीं होता. बस अकेले में खुद के साथ वक्त बिताना अच्छा लगता है- किताबों, फिल्मों, रंग-ब्रश, कैनवस और अपने पालतू पिल्ले के साथ. पता नहीं इंसानों के साथ से क्यों डर लगता है? जाने ये अवसाद का कोई लक्षण है या स्वाभाविक मनःस्थिति, लेकिन लोगों से मिलने-जुलने, घुलने-मिलने में एक संकोच और हिचक का भाव तो हमेशा ही दिल में रहता है.

पुस्तक मेला एक बहुत अच्छा मौका होता है, अपने आभासी दुनिया के दोस्तों से मिलने का. लेकिन जाने क्यों पिछली बार किसी से मिलने का मन ही नहीं हुआ. बस एक दिन जाकर अपने शोध से सम्बन्धित पुस्तकें ले आयी. इतनी तेजी से घूमकर वापस आ गयी कि कहीं कोई टकरा न जाय. जानबूझकर उन स्टालों पर नहीं गयी, जहाँ किसी परिचित के मिल जाने की संभावना थी. जब हम पहले से डरे होते हैं, तो और भी ज़्यादा डर लगता है ठोकरें लगने से. इस बात से डर लगता है कि कहीं ऐसा न हों कि जो व्यक्ति आभासी दुनिया में इतना अच्छा दोस्त है, वास्तविकता में वैसा न हो? मैं ऐसी बातों से बहुत डरती हूँ.

लेकिन, आखिर कब तक खुद को एक दायरे में बाँधकर रखती. तो इस साल अपनी इन सारी आशंकाओं को एक किनारे करके पहुँच ही गयी पुस्तक मेले में और यह मेरे जीवन का यादगार पुस्तक मेला हो गया. वैसे तो इससे पहले भी पुस्तक मेले में अपने ब्लॉगर मित्रों से मिली हूँ, लेकिन ब्लॉगर मित्र तो विचारों से इतने निकट आ जाते हैं कि उनसे वास्तविक दुनिया में मिलना बिल्कुल भी अचंभित नहीं करता. फिर वैसे भी ब्लॉगिंग के मित्र कम से कम चार-पाँच साल से मित्र तो हैं ही. इस बार नया यह रहा कि बहुत से फेसबुक के मित्र भी मिले, जिनसे मेरा परिचय एक साल से भी कम का है.

18 फरवरी को ज्यों हाल न. 12 में पहुँची त्यों आशीष राय जी से मुलाक़ात हो गयी. वैसे हम पहले से तय करके गए थे कि पुस्तक मेले में मिलेंगे. कहाँ मिलेंगे यह तय नहीं था और फोन से तय करना था, लेकिन हिंद युग्म के स्टाल पर पहुँचते ही वे मिल गए. उनसे बात ही कर रही थी कि रंजू भाटिया जी, अंजू जी और सुनीता जी भी आ गयीं. शैलेश भारतवासी जी ने हम सब लोगों की फोटो ली. मुकेश कुमार सिन्हा जी भी मिले. मृदुला शुक्ला जी भी आयीं हिन्दयुग्म के स्टाल पर उन्होंने सबसे पहले मेरे गर्दन दर्द के बारे में पूछा और कहा कि उन्हें भी ये समस्या हो गयी. लगा कि फेसबुक मित्र कितना ध्यान देते हैं हमारे स्वास्थ्य की तरफ 🙂 शैलेश जी, मुकेश जी और अंजू जी से मैं पहले भी मिल चुकी हूँ, लेकिन बाकी सबसे पहली बार मिलना हुआ. आशीष जी से तो खूब गप्पें मारीं. जूनियर होने का फ़ायदा भी उठाया और फूड कोर्ट जाकर चाय-नाश्ता किया 🙂

उसके बाद मैं हिंद युग्म प्रकाशन से दखल प्रकाशन के बीच चक्कर लगाती रही. दखल प्रकाशन पर अशोक भाई और किरण से बातें कीं थोड़ी देर. उसके बाद फेसबुक मित्र तारा शंकर, रिफाह खान, इलाहाबादी मित्र सूचित कपूर और उनकी पत्नी श्रुति से भी मुलाक़ात हुयी. संज्ञा जी से भी भेंट और संक्षिप्त बातचीत हुयी. इन सबसे भी पहली बार ही मिलना हुआ, लेकिन सभी इतनी गर्मजोशी से मिले कि जैसे बरसों से जानते हों.

वापस हिन्दयुग्म के स्टाल पर आयी, तो आशीष जी से बात करने के दौरान ही स्टाल के अंदर से किसी ने ज़ोर-ज़ोर से ‘आराधना-आराधना’ पुकारना शुरू किया. चौंककर उधर देखा तो पूजा और अनु खड़ी थीं. उनके पास पहुँची तो पूजा ने पूछा “पहचाना?” उनका दावा था कि पूरे पुस्तक मेले में उन्हें कोई नहीं पहचान पाया 🙂 मैंने कहा कि “तुम्हें कौन पहचान पायेगा?” आखिर में यह सिद्ध करने के लिए कि मैंने उन्हें पहचान लिया है, मुझे पूजा और अनु का नाम लेना पड़ा 😛 थोड़ी देर हम गपियाये. फिर वो लोग चले गए. पता चला कि किशोर चौधरी भी स्टाल पर आने वाले हैं, तो मैं वहीं बैठकर इंतज़ार करने लगी. इसी बीच आशीष जी चले गए. वहाँ अनिमेष से मुलाक़ात हुयी. शैलेश जी ने कोई परचा पकड़ाया था मुझे जिसमें वास्तु “विज्ञान” लिखा हुआ था. मैंने उस पर आपत्ति की कि वास्तु कोई विज्ञान थोड़े ही है. इसी बात पर अनिमेष से बातचीत होने लगी. बाद में उनसे फेसबुक पर मित्रता हो गयी 🙂 दोस्त ऐसे भी बनते हैं 🙂 किशोर चौधरी आये तो उनसे मिलकर और किताब भेंट लेकर मैं दखल प्रकाशन वापस चली गयी.

दखल प्रकाशन के स्टाल पर फेसबुक मित्र और छोटे भाई आशुतोष मिले, जिन्होंने ‘और लोगों’ को जलाने के ;लिए मेरे साथ एक फोटो ली. वहीं पर फेसबुक मित्र अभिनव सब्यसाची से भी मुलाक़ात हुयी. नीलिमा जी को ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों से ही उनके ब्लॉग ‘चोखेर बाली’ के कारण जानती हूँ, उनसे भी पहली बार वहीं मिली, लेकिन समयाभाव के कारण बात नहीं हुयी. अपनी पुरानी साथी रूपाली दी और उनकी बिटिया से मिलना भी सुखद रहा.

20 फरवरी का पूरा दिन शिखा वार्ष्णेय जी, सोनल और अभिषेक के नाम था. शिखा जी और सोनल से मिलना कई सालों से स्थगित हो जाता है किसी न किसी कारणवश. कभी मेरी तबीयत खराब होती है, कभी कोई आवश्यक कार्य पड़ जाता है. इस बार उनसे मिलना फेसबुक पर तय हुआ. अभिषेक के माध्यम से पता चलता रहा कि वे कहाँ हैं. जब मैं मेला पहुँची तो शिखा जी हॉल न. 12 के लेखक मंच पर अप्रवासी भारतीय साहित्यकारों के कार्यक्रम में लगभग ऊँघ सी रही थीं. अभिषेक ने बताया कि वे बारह बजे से ही आकर एक के बाद एक अप्वाइंटमेंट और कार्यक्रम निपटा रही थीं. सोनल कहीं गयी हुयी थी कि पीछे से आकर उसने मुझे चौंका सा दिया. इसी बीच नीतीश मुझे देखकर आ गया और मुझे लगभग घुमाकर अपनी ओर करके शिकायत करना शुरू किया कि आप मेले में आयीं तो मुझे क्यों नहीं बताया. सच में मैं उसकी इस प्यार भरी शिकायत पर झेंप गयी क्योंकि मैंने उससे वादा किया था कि जब भी बुक फेयर जाऊँगी, उसे बता दूँगी. उसके दोस्तों की मंडली बाहर थी. वो मुझसे मिलने का वादा लेकर चला गया.

कार्यक्रम खत्म होने पर शिखा जी भी नीचे आयीं और गले लगाकर मिलीं. सोनल और शिखा जी से मैं पहली बार मिली, लेकिन इतनी गर्मजोशी से कि जैसे बरसों की बिछड़ी सहेलियाँ हों. वहाँ कोई न कोई शिखा जी को रोककर मिलना चाह रहा था और मैं, सोनल और अभिषेक उनको सेलिब्रिटी कहकर चुटकी ले रहे थे. शिखा जी भीड़ से बचने के लिए हमलोगों को लेकर बाहर फूडकोर्ट के सामने वाले लॉन में गयीं. हमने साथ में छोले-भटूरे खाए. सोनल को मेरे स्वास्थ्य की इतनी चिंता थी कि उसने मुझे पहले एक सेब खाने को दिया, जिससे मेरे पेट पर छोले-भटूरे का दुष्प्रभाव न पड़े 🙂 बहुत करीबी दोस्तों को ही मालूम है कि मुझे पेट-सम्बन्धी समस्या है. सोनल से मैं कभी नहीं मिली, लेकिन उसे ये पता है :). फिर काफी देर तक हम वहीं बैठकर गपियाते रहे. मित्र राकेश कुमार सिंह जी ने आकर खुद अपना परिचय दिया और बहुत ही गर्मजोशी से मिले. मित्रों की सदाशयता कभी-कभी दिल को छू जाती है.

इसी बीच एक और फेसबुक मित्र अभिलाषा, जो कि बिना मिले ही छोटी बहन बन गयी है, मुझसे मिलने वहाँ आ गयी. उसके साथ आशुतोष भी था. थोड़ी देर में शिखा जी अपने अगले कार्यक्रम के लिए चली गयीं. अभिषेक और सोनल भी उनके साथ ही चले गए. बीच में नितीश अपने दोस्तों की मंडली के साथ मुझसे मिलकर चला गया था. उसकी दोस्त शिवा और अनमोल जो कि फेसबुक पर मेरी भी दोस्त है, से भी पहली बार मिलना हुआ. आशुतोष ने हमको खाते हुए देखा तो कुछ खिलाने के लिए कहने लगा. इलाहाबादी जूनियर होने का पूरा फ़ायदा उठाया उसने 🙂

फूडकोर्ट में बैठकर बच्चों (मेरे लिए तो ये बच्चे ही हैं) ने थोड़ा-बहुत खाना खाया और फिर कुछ देर तक बातें करते रहे. अभिलाषा और उसके दोस्त चले गए. आशुतोष का दोस्त अक्षय, जो देखने में बहुत अंतर्मुखी सा लग रहा था, बाद में पता चला कि फेसबुक पर बहुत अच्छे विचार व्यक्त करता है. हम किसी को देखकर कैसे अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वह कितना चिंतनशील है? अक्षय को मैंने उसी रात फेसबुक पर मैत्री प्रस्ताव भेजकर मित्र मंडली में सम्मिलित कर लिया 🙂

इसके बाद हम दखल के स्टाल पर गए. किरण और वेरा मुझे रास्ते में मिल गयीं. किरण ने कहा कि कल हमारी कोई फोटो नहीं खींची गयी तो आज एक लेते हैं यादगार के लिए. वेरा ने हमारी फोटो ली. बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व है अशोक भाई और किरण की इस बिटिया का. दखल के स्टाल पर पंकज श्रीवास्तव जी मिले. अशोक भाई से मिलकर और एक पुस्तक लेकर मैं शिखा जी और अभिषेक के साथ मेट्रो स्टेशन आ गयी. वहाँ से हम अपने-अपने रास्ते हो लिए.

तो 18 और 20 फरवरी दोनों ही दिन कुछ आभासी मित्र वास्तविक दुनिया में मिले और कुछ अचानक मिले और बाद में आभासी दुनिया के मित्र बने. मित्रों के मिलने और बनने का यह सिलसिला ज़िंदगी भर चलता है, लेकिन यह बहुत ही नया अनुभव है कि आप जिससे कभी भी न मिलें हों और न उनके विचारों से बहुत परिचित हों, वे अचानक से मिलें और इतने अपने से लगें.

क्रमशः

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