फूलों वाले कुर्ते

एक लड़की थी. सीधी-सादी सी, जैसी कि अमूमन प्रेम कहानियों में नायिकाएँ हुआ करती हैं- किशोरावस्था को पारकर यौवन की दहलीज पर पाँव रखने वाली, सपनों और उन्हें पूरा करने के जोश से भरी हुयी. एक लड़का था. नौजवान, सजीला और प्रेम-कहानियों के नायकों की तरह ही शरीफ.

लड़की जब लड़के के घर के सामने से निकलती, तो लड़का बैडमिंटन खेल रहा होता और अक्सर उसे देखने के चक्कर में या तो रैकेट को हवा में घुमा देता या इतनी जोर से मारता कि शटल बाहर जा गिरती. लड़की में ऐसा कुछ खास नहीं था कि उसे एक नज़र में चाहने लगा जाय, लेकिन प्रेम की केमिस्ट्री अलग ही होती है, क्या पता कब किससे मिल जाय?

लड़के को लड़की अच्छी लगती थी. वो उसको देखता था और इसका एहसास उसके दोस्तों के साथ-साथ लड़की को भी हो गया था. लड़की को भी लड़का अच्छा लगता था, इसका पता किसी को न था. फिर एक दिन लड़के ने साहस करके उससे उसका नाम पूछ ही लिया…फिर जैसा कि और प्रेम-कहानियों में होता है, उनमें दोस्ती हो गयी.

लड़की ने बताया कि वह छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाती है और खुद भी प्राइवेट बी.ए. कर रही है. और कुछ लड़के ने पूछा नहीं और लड़की ने बताया नहीं. लड़का बी.एस.सी. एजी कर रहा था और कॉलेज की ओर से बैडमिंटन खेलता था.  लड़के ने ये खुद बताया, लड़की ने पूछा नहीं.

लड़की ट्यूशन पढ़ाकर घर लौटते समय लड़के के घर के सामने वाले पार्क में रुकती, जहाँ लड़का इंतज़ार कर रहा होता. फिर दोनों खूब ढेर सारी बातें करते. लड़के को बारिश बहुत पसंद थी. सोंधी-सोंधी मिट्टी की खुशबू, मोर का नाचना, पेड़ के पत्तों का धुलकर ताजा हो जाना, अपने घर के बरामदे में बैठकर बारिश देखना और पकौड़े खाना लड़के को बहुत अच्छा लगता था. लड़की को बारिश नहीं पसंद थी. उसे नहीं अच्छा लगता जब पानी में भीगकर कांपते हुए परिंदे सिर छुपाने को ओट ढूँढते फिरते हैं. लड़की की इस बात पर लड़का खूब हँसता था. लड़की को बसंत पसंद था क्योंकि उस समय खूब फूल खिलते हैं.

लड़की को फूल कुछ ज़्यादा ही पसंद थे. वो रोज़ अपने कुर्तों पर तरह-तरह के फूल काढ़ा करती थी. लड़का उससे पूछता कि ये बेतरतीब से क्यूँ हैं, तो वो बताती कि उसे इस तरह बेतरतीब फूल अच्छे लगते हैं. यूँ लगता है मानो अभी-अभी डाली से टूटकर उसके कुर्ते पर बिखर गए हों. लड़के को उसकी बातें बहुत अच्छी लगतीं. उसे ये भी अच्छा लगता कि लड़की गुणी है और अच्छी सिलाई-कढ़ाई कर लेती है.

लड़का, अपनी बातों में कुछ ज़्यादा ही आगे निकल जाता और भविष्य की योजनाएं बनाने लगता. हम एक छोटा सा घर बनाएँगे. ये करेंगे, वो करेंगे. तब लड़की चुप होकर लड़के का चेहरा देखा करती. कभी-कभी वो डर जाती और कभी उसे लगता कि वो सिंड्रेला है और लड़का उसका राजकुमार. लड़के ने लड़की से अपने बारे में सब कुछ बता दिया था कि वह अपने माँ-बाप का इकलौता लड़का है. गाँव में उनकी अच्छी-खासी ज़मीन है. उसके ताऊ ज़मींदार और गाँव के प्रधान हैं. लड़का खेती की बातें करता और कहता कि एग्रीकल्चर की पढ़ाई करके वो बहुत अच्छे से खेती करेगा. लड़की बहुत कुछ सोचती, लेकिन बताती नहीं.

एक दिन लड़की फूलों वाले कुर्ते की जगह नया कुरता पहनकर आयी और खुश होकर बताया कि उसने ट्यूशन के पैसों से नए सूट सिलवाए हैं और अब उसे वो फूलों वाले कुर्ते नहीं पहनने पड़ेंगे. लड़का नाराज़ हो गया. उसने लड़की से वही कुर्ते पहनकर आने को कहा. उसने लड़की को बताया कि उन कुर्तों की वजह से ही तो सबसे अलग दिखती है. वो उससे ज़िद करने लगा कि कल से वही कुर्ते पहनकर आये. लड़की उसके इस व्यवहार से दंग रह गयी. उसने तो सोचा था कि लड़का तारीफ़ करेगा, लेकिन ये तो उल्टे नाराज़ हो गया.

लड़की बहुत भारी मन से वापस लौटी. वो लड़के को कैसे बताए कि उसके कुर्तों के वो फूल, फूल नहीं थे, पैबंद थे, जो वो कपड़ों के फटने पर की गयी रफू को छुपाने के लिए काढ़ दिया करती थी. वो कैसे बताए कि उसके पिता की लंबी बीमारी और मृत्यु के बाद उसकी माँ पाँच बच्चों को किस-किस तरह से पाल रही थी? वो कैसे बताए कि वो कुर्ते, जिन्हें वो इतने खूबसूरत मान रहा है, अब इतने जर्जर हो चुके हैं कि कभी भी फटकर तार-तार हो सकते हैं. वो कैसे बताए कि उन कुर्तों पर अब इतनी जगह भी नहीं बची कि और फूल काढ़े जा सकें.

लड़की को अचानक ये एहसास हुआ कि वो सिंड्रेला नहीं है. और उसने अपना रास्ता बदल दिया.

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बीमारी और जानकारी

पिछले पांच-छः महीने मैं गले में भयंकर दर्द से पीड़ित रही. वैसे मुझे धूल और प्रदूषण से एलर्जी है और सर्द-गर्म से भी. इससे अक्सर गले में खरास और छाले हो जाते हैं. अगस्त में मैंने एक कॉलेज में adhok असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में पढ़ाना शुरू किया था, उसी बीच घर की सफाई करते-करते धूल से गले में छाले हो गए, जिससे दर्द हुआ और बढ़ता ही गया. खरास और छाले तो अक्सर हो जाते हैं, लेकिन दर्द से लगा कि इन्फेक्शन है. लेकिन एंटीबायोटिक खाने से भी लाभ नहीं हुआ.

तब लगा कि डॉक्टर को दिखाना ही पड़ेगा. एक अनुभवी ENT विशेषज्ञ को दिखाया. उन्होंने सारे लक्षण सुनकर कहा कि एलर्जी ही है, कुछ एंटी एलर्जिक दवाएं लिखीं और मुझे खुले और साफ वातावरण में रहने की हिदायत भी दी. पूरे एक हफ्ते उनकी लिखीं दवाएं खाने से फायदा नहीं हुआ, तो मैं घबरा गयी. मैंने अपनी डॉक्टर सहेली को सब बताया, तो उसने एम्स में दिखाने को कहा.

मुझे ऐसा लगता था जैसे गले में घाव है. कुछ भी खाने-पीने में, यहाँ तक कि सांस लेने में भी दर्द हो रहा था. मुझे गले की परेशानी अक्सर हो जाती है, लेकिन इतना कष्ट पहली बार हुआ. लग रहा था कि गाना-गुनगुनाना तो दूर, मैं अब ठीक से बोल भी नहीं पाऊँगी कभी. थोड़ी देर बात करने पर भी दर्द बढ़ जाता था और उस पर लेक्चर भी देने पड़ रहे थे.

जब एम्स में डॉक्टर को दिखाया, तो उन्होंने बताया कि गले में अल्सर हैं. डॉक्टर ने बताया कि इसका कारण एलर्जी भी हो सकती है और Acid Reflux भी. एलर्जी का तो पता था मुझे लेकिन एसिड रिफ्लक्स का मतलब समझ में नहीं आया. इंटरनेट खंगाला तो पता चला कि यह एक ऐसी स्थिति होती है जब पेट में भोजन को पचाने वाला एसिड किसी कारण से गले तक वापस चला आता है और गले में घाव पैदा कर देता है.

यह सब जानकर मेरा दिमाग घूम गया था. कैसी-कैसी समस्याएं पैदा होती रहती हैं शरीर में और उनके बारे में हम जान तभी पाते हैं, जब हम किसी बीमारी से ग्रस्त होते हैं. अगर मुझे एसिड रिफ्लक्स के बारे में पहले से ही पता होता तो मैं पहले ही एसिडिटी दूर करने वाली दवा खाने लगती. लेकिन हमारी जानकारी की एक सीमा होती है. हम हर चीज़ के बारे में पूरी जानकारी तो नहीं रख सकते ना. 

डॉक्टर ने मुझे एंटी-एसिड और एंटी-एलर्जिक दवाएं दीं, जिन्हें डेढ़ महीने तक खाने के बाद मेरा गला ठीक हुआ. अभी भी पूरी तरह से आराम नहीं है और दवा खानी पड़ जाती है. इस लम्बी बीमारी से एक नयी बीमारी के बारे में पता चला.

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सम्बन्धों का जुड़ना-टूटना

“जब कोई दवा लंबे समय तक चलती रहती है, तो उसको अचानक बंद करने के परिणाम खतरनाक हो सकते हैं और मरीज़ पहले वाली स्थिति में जा सकता है. लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही दवाओं की खुराक क्रमशः कम करते हुए उन्हें धीरे-धीरे खत्म करना चाहिए. पुराने रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं. उन्हें अचानक से नहीं तोड़ना चाहिए. इससे चोट लग सकती है.” कोई समझा रहा था मुझे. और मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि ये “धीरे-धीरे” वाली अवधि कितनी लंबी होनी चाहिए? एक महीने, दो महीने या एक साल? और तब तक क्या किया जाय? उस रिश्ते को क्या नाम दिया जाय- “इट्स काम्प्लिकेटेड”?

ये ‘इंटरपर्सनल रिलेशंस’ कितना परेशान करते हैं यार. बाऊ अक्सर कहा करते थे कि हमारे देश में लोगों की ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा समाज के रस्मो-रिवाज से उलझने और आपसी सम्बन्धों को सुलझाने में ‘बरबाद’ हो जाता है. इसीलिए हम इतने पिछड़े हुए हैं. क्या पश्चिमी समाज में लोग प्यार नहीं करते? करते ही हैं. लेकिन दो लोगों के आपसी सम्बन्धों के पचड़े में समाज नहीं पड़ता. पता नहीं क्या होता है और क्या नहीं होता? लेकिन अपने यहाँ दो लोगों की रिलेशनशिप उनकी ज़िंदगी पर कोई असर डाले या न डाले, औरों की बदहजमी का कारण ज़रूर बन जाती है. और उसका असर रिलेशनशिप पर ज़रूर पड़ता है. नतीजा- काम्प्लिकेशन…

मैं आजकल इस बात पर विचार कर रही हूँ कि कोई भी प्रेम-सम्बन्ध (वर्तमान भाषा में ‘रिलेशनशिप’) खत्म कैसे किया जाय? क्या प्रेम खत्म होने के बाद हमें अपने साथी के बारे में ज़रा सा भी नहीं सोचना चाहिए. हो सकता है कि एक तरफ़ से प्रेम खत्म हो गया हो, पर दूसरे का क्या? लेकिन एक के मन से प्रेम खत्म हो जाने पर सिर्फ दूसरे का मन रखने के लिए रिश्ते को निभाते जाना भी ठीक है क्या? हम अक्सर कई जोड़ों को ऐसा करते हुए देखते हैं. क्यों?

दरअसल, हमारे समाज में प्रेम-सम्बन्ध ‘जोड़ना’ जितना बड़ा पाप समझा जाता है, उसे ‘तोड़ना’ उससे भी बड़ा पाप. हमें रिश्तों को ‘निभाने’ के बारे में तो सौ बातें सिखाई जाती हैं, लेकिन उन्हें खत्म करने के बारे में नहीं बताया जाता. और कहीं ये प्रेम-सम्बन्ध है, तब तो जन्म-जन्मांतर का नाता मान लिया जाता है. ‘एक हिंदू लड़की सिर्फ एक बार अपना पति/प्रेमी चुनती है’ ये डायलाग बचपन से फिल्मों के माध्यम से हमारे सब-कांशस दिमाग में इस तरह बिठा दिया जाता है कि हम रिश्ता टूटने की कल्पना से ही कांप उठते हैं. अक्सर टीनेजर्स रिश्ते के टूटने पर अपना आत्मविश्वास खो उठते हैं, और कभी-कभी तो बात आत्महत्या तक पहुँच जाती है.

खैर, मैं ये बात नहीं मानती कि प्रेम-सम्बन्ध जन्म-जन्मांतर के लिए होते हैं. ये दो संवेदनशील व्यक्तियों के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है, इस पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है.

मुझे लगता है कि हमें अपने बच्चों, खासकर टीनेजर्स को इस बात के लिए तैयार करना चाहिए कि अगर रिश्ते बनते हैं, तो खत्म भी होते हैं. हमें रिश्ते निभाने चाहिए, लेकिन सिर्फ ‘निभाने के लिए’ नहीं. अगर प्यार होता है, तो कोई भी किसी रिश्ते को नहीं तोड़ सकता, चाहे वो दोस्ती का रिश्ता हो या प्रेम का या कोई और, लेकिन अगर प्यार नहीं बचा है, तो सिर्फ नाम के लिए रिश्ते निभाने की कोई ज़रूरत नहीं. और न ही ये सोचने की ज़रूरत कि यदि रिश्ता टूट गया, तो हम खत्म हो जायेंगे. दुःख, तो हर रिश्ते के टूटने पर होता है, लेकिन उसे इस हद तक नहीं जाना चाहिए कि इंसान अपनी ज़िंदगी ही दाँव पर लगा दे. कोई भी चीज़ ज़िंदगी से ज़्यादा कीमती नहीं. इस विषय में आपके क्या विचार हैं?Image144c

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कितनी सदियाँ, कितने देश

‘प्यार का पंचनामा’ फिल्म देख रही थी. वैसे तो ये फिल्म पूरी तरह लड़कों के दृष्टिकोण से बनी है और लड़कियों को जिस तरह से चित्रित किया गया है, उसे देखकर गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन बहुत हद तक ये फिल्म महानगरों में रहने वाली उच्च-मध्यमवर्गीय नयी पीढ़ी की जीवन-शैली को प्रतिबिंबित करती है. बहुत सोचने पर भी मुझे अपने आस-पास कोई ऐसी लड़की नहीं दिखी, जो फिल्म में दिखाई गयी नए ज़माने की बोल्ड लड़कियों के आस-पास भी ठहर सके.

मैं भी अजीब हूँ. फिल्म के पात्रों को वास्तविक जीवन में ढूँढ़ रही हूँ. लेकिन फ़िल्में कोई हवा में तो बनायी नहीं जातीं. फिल्मकार को कहीं न कहीं से तो पात्रों की प्रेरणा मिली होगी. तो कहाँ होती हैं ऐसी लड़कियाँ? मैं भी दिल्ली में रहती हूँ, मुझे तो नहीं दिखतीं. या हो सकता है कि मैं अब पुरानी पीढ़ी की हो गयी हूँ और मेरे बाद की कई पीढियाँ इस शहर में रहने लगी होंगी या फिर उनकी मेरी जीवन-शैली में इतना अंतर है कि मेरी सोच वहाँ तक नहीं पहुँच सकती.

वैसे तो दिल्ली में आते-जाते लड़कियों को देखती ही हूँ, लेकिन जबसे पढ़ाने जाने लगी हूँ और करीब से देखने का मौका मिल रहा है. इस महानगर में कई-कई शहर बसते हैं और वो भी कई-कई सदियों में. आमतौर पर बाहर के लोग ये समझते हैं कि डी.यू. की लड़कियाँ माडर्न और बोल्ड होती हैं, भकाभक सिगरेट फूँकती हैं और कुछ-कुछ दिनों पर ब्वायफ्रैंड बदलती रहती हैं. हाँ, ऐसी लड़कियाँ भी होती हैं, और आज से नहीं बहुत पहले से रहती हैं. लेकिन यह वर्ग सिर्फ बीस-पच्चीस प्रतिशत लड़कियों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें इस महानगर तथा दूसरे महानगरों से आयी उच्च-मध्यमवर्गीय लड़कियां हैं.

लेकिन इन लड़कियों से अलग बहुत बड़ी संख्या में ऐसी लड़कियाँ हैं, जो अब भी अपनी पढ़ाई के लिए रोज़-रोज़ लड़ाई लड़ती हैं. फर्स्ट इयर की कक्षा में एक लड़की है, जो मेरठ से रोज़ ट्रेन से कॉलेज आती है पढ़ने के लिए. एक है जो जींस के ऊपर कुरता और दुपट्टा डालती है, पूछने पर जवाब मिला, “जींस हमारी च्वाइस है और कुरता-दुपट्टा माँ-पापा की.” कितनी आसानी से रोज़ के संघर्ष से जूझती लड़कियाँ बताती हैं अपने उस संतुलन के बारे में जो उन्होंने बड़ी सफाई से परम्परा और आधुनिकता के बीच आज भी बिठा रखा है. और मज़े की बात है कि ये उस महानगर के अन्दर है जो आधुनिक फैशन का गढ़ माना जाता है. जहाँ की लड़कियों की आधुनिक पोशाकें बाकी देश की लड़कियों के लिए फैशन गढ़ती हैं.

यहीं इस महानगर के बीचों-बीच कुछ गाँव हैं, जहाँ आज भी पुरानी परम्पराएँ जारी हैं. जहाँ के अभिभावक अपनी बेटियों को गर्ल्स कॉलेज में ही पढ़ने भेजते हैं. उन लड़कियों को सीधे कॉलेज जाना और वहाँ से सीधे वापस आना होता है. लड़कों से हँसना-बोलना तो दूर उन्हें देख भी नहीं सकतीं. यहीं ऐसी लड़कियाँ भी हैं जिन्हें सहेलियों के साथ भी सिनेमा जाने की छूट नहीं है. अगर कभी गयीं भी तो परिवार के साथ. आश्चर्यचकित होती हूँ ये सब देखकर कि क्या ये दिल्ली है?

हाँ, ये दिल्ली है, जहाँ एक साथ कई शहर बसते हैं अपने अन्दर कई सदियाँ लिए हुए. यहाँ कुछ इलाके अब भी पिछली सदी में जी रहे हैं, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? इस देश में भी तो कई देश हैं, जो कई सदियों पीछे चल रहे हैं. यहीं पर प्रेमी-प्रेमिका को मौत का फरमान सुनाने वाली पंचायतें भी तो हैं. वे किस सदी में बनी थीं?

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पंखुरियाँ

एक पत्थर पर थोड़ी चोट लगी थी. उस पर मिट्टी जम गयी. बारिश हुयी और कुछ दिन बाद उस मिट्टी में जंगली फूल खिल गए. उन फूलों पर मँडराती हैं पीले रंग की तितलियाँ और गुनगुनाते हैं भवँरे. उन्हें देख मुझे तुम्हारी याद आती है.

तुम्हीं ने तो बताया था सबसे पहली बार कि फूल की पंखुरियाँ पिघला सकती हैं पत्थर का दिल भी.

*** *** ***

वो दिन ‘कुछ अलग’ होते हैं. जब फ्रिज की सारी बोतलों में पानी भरा होता है. मैं पढ़ती रहती हूँ और दोनों टाइम का खाना मेरी टेबल पर सज जाया करता है. कोई प्यार से कहता है, ‘चलो, किताब हटाओ और खाना खा लो.’ रात में पढ़ते-पढ़ते इधर-उधर बिखरी किताबें, सुबह करीने से मेज पर सजी होती हैं.

नहीं, ये कोई सपना नहीं. ये वो दिन हैं, जब तुम साथ होते हो.

*** *** ***

मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत सुबहें वो होती हैं, जब सुबह-सुबह तुम चाय बनाते हो. मेरे सिर पर हाथ फेरकर और माथा चूमकर मुझे उठाते हो, ‘उठो, चाय पी लो’ मैं घड़ी देखती हूँ. सुबह के दस बज गए होते हैं.

और मुझे पता है कि तुम सात बजे से जाग रहे हो.

*** *** ***

हम रात-दिन की तरह हैं. मैं रात की तरह शांत, ठंडी, डार्क और रहस्यों से भरी हुयी. तुम दिन की तरह प्रकाशवान, पारदर्शी, ओजस्वी और ऐक्टिव. हम अलग-अलग होते हुए भी सुबह और शाम के जरिये मिले हुए हैं. जैसे तुम मुझे सबसे पहले बचपन में मिले थे. खेलते-खेलते मैंने तुम्हें धक्का मारकर गिरा दिया था और तुम्हारा घुटना छिल गया था.

और अभी कुछ दिन पहले तुमने कहा ‘हम अभी साथ हों न हों. बुढ़ापे में साथ-साथ ही रहेंगे.’ तबसे मुझे बुढ़ापे से डर नहीं लगता, बल्कि वो पहले से अधिक रूमानी लगता है.(हाँ, मैं उन पागल लोगों में से हूँ, जिन्हें बुढ़ापा अट्रैक्ट करता है)

मैं बुढ़ापे के आने का इंतज़ार करती हूँ और तबके लिए मैंने कोई इंश्योरेंस पालिसी नहीं ली है.

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कहा जा सकता था, लेकिन…

मैंने कई बार सोचा कि इस घटना के बारे में लिखूँ या ना लिखूँ. जब लिख लिया तो इस कश्मकश में पड़ गयी कि इसे ब्लॉग पर पोस्ट करूँ या नहीं. मैं ऐसा इसलिए सोच रही थी कि इसे सार्वजनिक करने के बाद बहुत से रिश्ते प्रश्नों के दायरे में आ सकते हैं और कुछ लोगों के अजीब से सवालों का जवाब भी देना पड़ सकता है. लेकिन फिर ये सोचा कि ऐसी घटनाओं को सामने आना ही चाहिए, जो अक्सर किसी एक की ज़िंदगी पर बहुत बुरा प्रभाव डालने के बावजूद, परिवार की बदनामी और रिश्ते बिगड़ने के डर से दबा दी जाती हैं. मैं इसे ज्यों का त्यों लिख रही हूँ, हालांकि नाम नहीं दे रही हूँ.

बात उन दिनों की है, जब मेरे बाऊ जी उन्नाव जिले के मगरवारा रेलवे स्टेशन पर पोस्टेड थे. हमलोग रोज़ ट्रेन से मगरवारा से उन्नाव पढ़ने के लिए आते-जाते थे. एक दिन सुबह-सुबह हम घर से निकले तो दरवाजे पर गाँव का एक चचेरा भाई खड़ा था. हमलोग गाँव कम जाते थे, इसलिए उसे पहचान नहीं पाये, लेकिन दीदी पहचान गयी. गाँव से किसी के आने पर हम भाई-बहन बहुत खुश होते थे. उसके आने के कुछ दिन बाद ही होली की छुट्टियाँ हो गयीं, तो हमें अपने कज़िन के साथ वक्त बिताने का मौक़ा मिल गया. मेरी और छोटे भाई की उससे खूब जमती थी. हमारा कोई बड़ा भाई नहीं था, इसलिए एक ‘बड़ा भाई’ मिलने की ज़्यादा खुशी थी. हमने सोचा था कि वह हमसे मिलने इतनी दूर आया है, लेकिन बाद में पता चला था कि वह हाईस्कूल का इम्तहान देने के डर से घर से भागकर आया था. अम्मा ने समझाया कि वह छुट्टियों के बाद घर चला जाय, तो वो मान गया.

हालांकि उसकी कुछ बातें मुझे अच्छी नहीं लगती थीं. मैंने उन दिनों सातवीं का इम्तहान दिया था, लेकिन मेरी ड्राइंग अच्छी होने के कारण कालोनी के हाईस्कूल में पढ़ने वाले लड़के अपनी साइंस की फ़ाइल के चित्र मुझसे बनवाते थे. ऐसे ही एक लड़के ने मुझे फ़ाइल दी, तो मेरे उस कज़िन ने उसका एक-एक पन्ना पलटकर चेक करना शुरू कर दिया. मुझे बहुत बुरा लगा. मैंने सोचा कि मेरा दोस्त क्या सोचेगा ? कि इसका ‘भाई’ जासूसी कर रहा है. मैंने घर वापस आकर अम्मा से शिकायत भी की. पर अम्मा ने समझाया कि ‘जाने दो, बड़ा भाई है. उसे तुम्हारी चिन्ता होती होगी.’ इसके अलावा उसने कई बार कालोनी के लड़कों के साथ मेरे बात करने और खेलने के बारे में भी टोका. मुझे इन बातों पर गुस्सा आता था, लेकिन अम्मा की वजह से मैं कुछ नहीं कहती. कुछ दिन बाद वो वापस गाँव लौट गया.

उसी साल गर्मियों की छुट्टी में गाँव में एक चचेरी बहन की शादी पड़ी. अम्मा घर की देखभाल के लिए रुक गयीं और घर के बाकी सदस्य- मैं, छोटा भाई, दीदी और बाऊ चारों लोग गाँव गए. हमलोग लगभग पाँच साल बाद गाँव गए थे, मैं और मेरा भाई किसी और को तो पहचानते नहीं थे, तो उसी कज़िन से बातें करते थे.

पहले दिन तो सब ठीकठाक था, लेकिन दूसरे दिन से कज़िन ने अजीब सी हरकतें शुरू कर दीं. गाँव का घर बहुत बड़ा था, बिजली तब थी नहीं, तो अधिकतर जगहों पर अँधेरा रहता था. वो जब अँधेरे में मेरे पास से गुजरता तो हाथ छूते हुए निकलता. पहले तो मैंने सोचा कि गलती से हाथ लग गया होगा, लेकिन जब कई बार यही हरकत दोहराई तो मेरा दिमाग ठनका. वैसे भी लड़कियों की सिस्क्थ सेन्स इतनी प्रबल होती है कि उन्हें ‘स्पर्श-स्पर्श’ में अंतर पता चला जाता है. मैंने उससे बचना शुरू कर दिया. मैं या फिर बाऊ के पास बाहर बैठी रहती या दीदी और बुआ लोगों के साथ घर के भीतर.

लेकिन उसने परेशान करने की नयी तरकीब निकाली. उसने एक छोटे भतीजे को भेजकर मुझे हाते में बुलवाया. अब जब सबके सामने आकर कोई कह रहा है कि ‘फलाने चाचा’ बुला रहे हैं और मैं न जाती, तो लोगों को शक होता कि बात क्या है? मेरी समझ में कुछ नहीं आया. मैं गयी तो लेकिन एक छड़ी लेकर. मैं दूर खड़ी हो गयी, और धमकी दी कि ‘अगर आपने मुझे हाथ लगाने की कोशिश की तो मैं खींचकर छड़ी मार दूँगी.’ मेरे पीछे-पीछे भतीजी-भांजियों की फौज भी आ गयी थी, इसलिए उसे कुछ कहने का मौका नहीं मिला.

मैं रात में चाचा की छत पर सोती थी दीदी, बुआ, कुछ भतीजे-भतीजियों और बड़े भईया के साथ. उस दिन मुझे बहुत नींद आ रही थी, तो दीदी से पहले ही मैं छत पर चली गयी. सोचा बड़े भईया तो हैं ही. गाँव में शादी-ब्याह में कई दिन तक गवनई चलती है, तो दीदी और बुआ उसीमें व्यस्त थीं. मुझे पहली ही झपकी आयी थी कि अचानक लगा कि कोई मेरी चादर खींच रहा है. मेरी नींद बहुत कच्ची है. मैं तुरंत उठ गयी, तो देखा सामने वही कज़िन था. मैंने ज़ोर से पूछा “क्या है?” तो वो डर गया और तेजी से नीचे भाग गया. मैंने बगल में देखा कि भतीजे वगैरह तो गहरी नींद में सो रहे थे और भईया नहीं थे. शायद भाभी के पास चले गए थे. मुझे उसके बाद नींद नहीं आयी. मैं उकडूँ बैठी रही, जब तक दीदी और बुआ नहीं आ गयीं.

उस दिन के बाद से मैं बेहद डर गयी. मुझे रात होते ही डर लगने लगता. मैं उस समय सिर्फ बारह साल की थी और एकाकी परिवार में पली-बढ़ी. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था कि ‘भईया ऐसा कर क्यों रहे हैं?’ दीदी मुझे अकेली मिल ही नहीं रही थीं. हर समय उनके साथ या तो बुआ होतीं, या भाभी या कोई बहन. दूसरे दिन मैंने बाऊ से वापस चलने की रट लगा दी. और कुछ तो कह नहीं सकती थी. बस बार-बार यही कह रही थी कि “अम्मा की याद आ रही है” एक-दो बार तो आँसू भी छलछला आये. मुझे सच में अम्मा की बहुत याद आ रही थी. अम्मा सच कहती हैं, ‘जब कोई आदमी ज़्यादा प्यार से बोलने लगे, तो समझो कि कुछ गडबड है. ऐसे लोग लड़कियों को उठा ले जाते हैं और उनसे खूब काम कराते हैं.’ पर ऐसा तो अम्मा ने ‘आदमियों’ के लिए कहा था ‘भाइयों’ के लिए तो नहीं. मेरा मन इससे अधिक कुछ नहीं सोच पा रहा था. मैं उस समय कैसा महसूस कर रही थी, इस समय नहीं बताया जा सकता.

हमारे गाँव के घर का आहाता बहुत बड़ा था. उसमें उस समय कुछ सब्जियाँ उगाई जाती थीं. उस दिन शाम के समय भाभी के कहने पर मैं हाते से कुछ सब्ज़ी तोड़ने गयी थी कि उसने मुझे रोक लिया. मैं बेहद डर गयी कि अभी तक तो इसकी हरकतें रात में शुरू होती थीं. अब दिन में भी? मैं रो पड़ी. मैंने पूछा, “आप मुझे क्यों परेशान कर रहे हैं?” उसने जवाब दिया, “हम तुम्हें पसंद करते हैं. जो कह रहे हैं वो मानो और किसी से कुछ कहना मत, नहीं तो हम तुमको पूरे गाँव में बदनाम कर देंगे.” मुझे “बदनाम” शब्द का मतलब मालूम था. ऐसी लड़कियाँ जो गंदी होती हैं, उन्हें बदनाम कहा जाता है. मैं और डर गयी और वहाँ से तेजी से भाग आयी.

अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था ये सब. मेरे दिमाग में उसके कहे शब्द गूंज रहे थे. लेकिन करती भी तो क्या? संयोग से रात को गाँव के ही एक नातेदार के यहाँ घरभोज में जाने को मिला. दीदी हमेशा बुआ से बातें किया करती थीं. वो बतियाते हुए ही जा रही थीं कि मैंने उन्हें रोका कि कुछ बात कहनी है. दीदी ज्यों रुकीं, मैंने त्यों रोना शुरू कर दिया. रो-रोकर मैंने सारी बात बतायी और ये भी कहा कि ‘वो मुझे बदनाम कर देगा.’ दीदी भी अवाक् रह गयीं. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई भाई ऐसा कर सकता है. उन्होंने मुझसे कहा, ‘वो उससे और उसकी माँ से बात करेंगी.’

दूसरे दिन दीदी ने मुझसे कहा कि ‘उन्होंने चाची से सारी बात बताई, और कज़िन को भी डाँट पिलाई. लेकिन चाची ने अपने लड़के की गलती नहीं मानी. उन्होंने कहा कि कोई गलतफहमी हुयी होगी.’ चाहे जो भी हुआ हो, उस दिन के बाद से कज़िन ने ऐसी-वैसी कोई हरकत नहीं की. दो दिन के बाद हम वापस घर आ गए. बात आयी-गयी हो गयी. दीदी ने न ये बात अम्मा को बतायी और न बाऊ को. दीदी भी छोटी ही थीं, वो इस बात का निर्णय नहीं ले पाईं कि अम्मा-बाऊ को बताकर बात बढ़ानी चाहिए या नहीं.

लेकिन जब हम किसी सड़ांध को ढककर छिपाना चाहते हैं, तो उसकी दुर्गन्ध फैलती ही है. किसी की एक गलती पर यदि उसे रोक न दिया जाय, या सज़ा न दी जाय, तो वो दूसरी गलती करेगा ही.

इन घटनाओं के चार-पाँच साल बाद बाऊ के रिटायरमेंट के बाद जब हम गाँव शिफ्ट हुए, तो मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए. उस कज़िन से बात करनी चाहिए या नहीं. दिन में लगभग तीन-चार बार उससे सामना होता, लेकिन मैं बात नहीं करती थी. एक दिन भाभी ने मुझसे कहा कि ‘फलाने’ को खाने के लिए बुला दो. मैंने कहा कि मैं उससे बात नहीं करती. भाभी ने जब कई बार मुझसे कारण पूछा तो मैंने पूरी बात बता दी. इसके बाद उन्होंने जो बात बतायी, तो मैं दंग रह गयी. उन्होंने कहा कि “उसने मेरे साथ भी ऐसी हरकत करने की कोशिश की थी. और तो और एक बार अपनी सगी बहन के साथ भी ज़बरदस्ती करने की कोशिश की. इसके बाद उसकी उसके पिताजी ने जमकर पिटाई की.” ये बात सुनकर मेरे पैरों के तले से तो ज़मीन ही निकल गयी. मैं तो उससे सिर्फ दो-तीन साल छोटी थी, लेकिन उसकी छोटी बहन तो बहुत छोटी थी. मैंने कहा, ‘”भाभी, अगर उसको तभी रोक दिया गया होता, जब उसने मेरे साथ बदतमीजी की थी, तो कम से कम उस छोटी लड़की को और आपको तो ये सब न झेलना पड़ता.”

हाँ, ये सच है कि उसे उसी समय रोक देना चाहिए था. उसे सबके सामने शर्मिंदा करना चाहिए था, ‘घर-खानदान की बदनामी’ के डर से डरे बगैर…लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मैं बहुत छोटी थी और दीदी बहुत सीधी. हम साहस ही नहीं कर पाये उसके खिलाफ ‘ज़ोर से’ अपनी बात कहने का. और शायद कहते भी तो दोनों परिवार में झगड़े और मनमुटाव के अतिरिक्त और कुछ न होता.

मुझे ये लगा था कि ये मेरे जीवन की ऐसी घटना है, जिसके बारे में मैं किसी से कभी नहीं कह पाऊँगी. लगता था कि मैं ही ऐसी अभागी हूँ, जिसे ये सब झेलना पड़ा है. लेकिन जब हॉस्टल में और लड़कियों से इस पर खुलकर बातचीत होने लगी, तो पता चला कि लगभग सत्तर प्रतिशत लड़कियाँ बचपन या टीनेज में अपने किसी न किसी नातेदार-रिश्तेदार के द्वारा ‘सेक्सुअल अब्यूज़’ झेल चुकी हैं.

इसका कारण क्या है, इसके लिए लंबे-चौड़े तर्क दिए जा सकते हैं, शोध किये जा सकते हैं, लेकिन एक बड़ा कारण यह भी है कि ऐसी घटनाएँ बाहर नहीं आ पातीं, इसलिए इस तरह की हरकतें करने वालों की हिम्मत बढ़ती जाती है. उन्हें पता होता है कि एक छोटी लड़की ऐसी घटना का जिक्र किसी से नहीं कर पायेगी. इसलिए वो बड़ी बेशर्मी से लड़कियों और छोटे लड़कों के साथ यौन-दुर्व्यवहार करते हैं. ज़रूरत है कि इस पर खुलकर बात हो. कानूनी कार्रवाई के अतिरिक्त ऐसे लोगों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जाय. उन्हें समाज से बहिष्कृत किया जाय, तो शायद ऐसी घटनाओं पर कुछ हद तक रोक लग पाये.

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मीत के गुण्डा की गुण्डई के किस्से

फेसबुक पर मीत  ने हमको ‘गुण्डा’ नाम दिया है, जो कि हमारे स्वभाव को पूरी तरह चरितार्थ करता है :) मीत कौन हैं? इनसे हमारा परिचय करीब साढ़े तीन साल पहले ब्लॉग लिखते-लिखते हुआ था. इनका एक ब्लॉग हुआ करता था (अब पता नहीं कहाँ गया?)- ‘किससे कहें.’ उस पर ये पुराने फ़िल्मी गीत, ग़ज़लें, गीतकारों और गजलकारों के किस्से और न जाने क्या-क्या छापा करते थे. कुछ पहेलियाँ भी पूछते थे. ऐसी ही किसी पहेली का जवाब सही-सही देने के बाद हमारा इनसे परिचय हो गया. (ये हमने आज तक किसी से नहीं बताया था कि हमको ये बहुत अच्छे लगते थे :)) खैर, मीत हमको ‘गुण्डा’ कहते हैं , तो हम अपनी गुण्डई के कुछ किस्से सुनायेंगे और आपको सुनना पड़ेगा नहीं तो हम कैसे गुण्डा?

(किस्सा नंबर एक)

ये इलाहाबाद की घटना है. मैं अपने एक दोस्त के साथ ‘धूम’ फिल्म देखने गौतम सिनेमाघर गयी. और हमेशा की तरह किनारे (कार्नर नहीं :)) वाली सीट पर बैठी. फिल्म अभी शुरू ही हुयी थी कि पीछे की सीट से एक लड़का उठकर बाहर गया और जाते-जाते मेरे कंधे को छूता गया. पहली बार मैंने सोचा कि हो सकता है कि हाथ गलती से लग गया हो. लेकिन वापस लौटने पर उसने फिर वही हरकत की. मैंने अपनी सीट से खड़े होकर तुरंत उसे टोका, “तुमने हाथ क्यों लगाया?” वो डर तो गया लेकिन अपनी गलती न मानते हुए लड़ने लगा, “गलती से लग गया होगा.” मैंने कहा, “गलती से एक बार हाथ लगता है दुबारा नहीं.” मेरा दोस्त भी उससे झगड़ पड़ा और कहा, ‘माफी माँगो’ इस पर वो लड़का भड़क गया. उसके दोस्त जब खड़े हुए तो पता चला कि वो करीब सात-आठ थे. शायद इसीलिये इतना अकड़ रहे थे. सिनेमाहाल के और लोगों को फिल्म छूटने की चिन्ता हो रही थी. उन्होंने उल्टा मुझे समझाया, “बहनजी, जाने दीजिए” मैंने ज़ोर से चिल्ला के कहा, “शर्म तो आती नहीं आपलोगों को. एक लड़का अँधेरे का फ़ायदा उठाकर बदतमीजी कर रहा है और आपलोग हमसे कह रहे हैं कि हम जाने दें.”

इसी बीच शोर-शराबा सुनकर चौकीदार आ गया. उसने उनलोगों को शांत करके बैठा दिया और मुझसे भी बैठने के लिए कहा. मैं बैठ तो गयी, लेकिन मेरा खून खौल रहा था कि जिस लड़के ने मेरे साथ बदतमीजी की, उसका मैं कुछ नहीं बिगाड़ पायी. मैंने सुना कि वो लड़का किसी से फोन पर बात कर रहा था, जिससे ये लगा कि वो कुछ और गुंडों को अपनी मदद के लिए बुला रहा है. मुझे और गुस्सा आया. मेरे दोस्त ने मेरा मूड और हालात देखते हुए वापस चलने के लिए कहा, तो मैंने मना कर दिया कि “फिल्म देखने आयी हूँ, तो देखकर जाऊँगी. इन कमीनों के कारण मैं भाग नहीं सकती.” और सच में मैं भागती कभी नहीं. हमेशा लड़ती हूँ.

तभी चौकीदार ने मेरे पास आकर कहा, “मैडम, आप आराम से बैठिये. मैनेजर ने गेट बंद करवा दिया है और पुलिस को बुला लिया है.” तब जाकर मेरा गुस्सा कुछ शांत हुआ. ठीक दस मिनट बाद पुलिस आ गयी. उस थाने का एस.एच.ओ. उन दिनों काफी मशहूर था ऐसे बदमाशों को सबक सिखाने के लिए. पुलिस ने दोनों पक्षों को बाहर बुलाया और मुझसे लड़के को पहचानने को कहा. मेरे इशारा करते ही उन्होंने डंडे बरसाने शुरू कर दिए, तो मेरे मुँह से निकला, “आप मार क्यों रहे हैं?” इंस्पेक्टर बोला, “मैडम, आप जानती नहीं. ये लोग ऐसे ही सीधे किये जाते हैं” पुलिस उससे पूछ रही थी कि वो किसे बुला रहा था. तब पता चला कि वो इलाके के किसी जाने-माने गुंडे का छोटा भाई था.

खैर, पुलिस उन बदमाशों को पकड़कर ले गयी. हमलोग पूरी फिल्म देखकर ही वापस लौटे.

(किस्सा नम्बर दो)

अभी इसी दीवाली की बात है. रात के दो बज गये थे, लेकिन नीचे रहनेवाले ‘लोकल्स’ ने पटाखे फोड़-फोड़कर सिर में दर्द कर दिया था. पटाखों की आवाज़ से ज़्यादा उससे उठने वाले धुएँ ने नाक में दम कर दिया था. तीसरे माले पर कमरा होने के कारण सारा धुँआ कमरे में भर गया था. मुझसे जब नहीं सहन हुआ, तो मैं बालकनी में जाकर चिल्लाई, “अब आपलोग पटाखे जलाना बंद कर दें प्लीज़.” नीचे से आवाज़ आयी, “अरे साल भर में एक दिन तो त्यौहार होता है. हम तो छुड़ाएंगे पटाखे. आपको क्या तकलीफ है?” और फिर से पटाखे दगाने लगे. मैंने कहा, “सारा धुँआ ऊपर आ रहा है” उन्होंने सुना नहीं. फिर मैंने कहा कि “आप ये बंद करें, वरना मैं पुलिस को कॉल कर दूँगी.” इस पर एक लड़का ऊपर मुँह करके चिढ़ाने लगा, “क्या कह रही हैं? आवाज़ नहीं आ रही है?”

उसकी इस हरकत से मुझे इतनी ज़ोर की चिढ़ मची कि मैंने मोटर ऑन करके टैप में पाइप फिट कर दिया और पानी से भिगो दिया उन सबको. अब नीचे भगदड़ मची हुयी थी. एक आदमी का ‘इगो’ जाग गया. वो ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ होकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा. बोला ये क्या बेहूदा हरकत है. मैंने चिल्लाकर कहा, “जैसे नीचे से धुँआ ऊपर आ सकता है. वैसे ही पानी भी नीचे जा सकता है.” सभी पटाखे छुड़ाने वाले और उनके पटाखे भीग चुके थे. ऊपर अँधेरा होने के कारण वो लोग ये नहीं देख पाये कि ये हरकत किसने और किस बिल्डिंग से की है? नीचे से आवाजें आ रही थीं…’ये क्या बदतमीजी है’ ‘किस मकान से फेंका गया पानी’ ‘मकान मालिक को बुलाओ और इनको निकलवा दो’

मैं थोड़ी देर तक उनका तमाशा देखती रही. फिर आकर अपने कमरे में सो गयी. वो लोग फिर कहीं से पटाखे ले आये और दुबारा वही काम शुरू कर दिया…लेकिन तब तक कुछ और लोगों ने भी विरोध करना शुरू कर दिया. बड़ी देर तक नीचे चिल्ल पों होती रही और इस सबकी शुरुआत करने वाली मैं गुंडी आराम से बिस्तर पर लेटी हुयी थी. मुझे हँसी आ रही थी कि ये सिरफिरे लोग मेरे कारण अपने पैसे से पटाखे खरीदकर फूँक रहे हैं :)

( किस्सा नंबर तीन)

हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर

हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर

रात के तीन बजे सामने की बिल्डिंग के तीसरे मंजिल वाले का दिल रोमैंटिक हो गया था और उसने फुल वोल्यूम में ‘साँस में तेरे साँस मिली तो मुझे साँस आयी’ गाना बजाना शुरू कर दिया. हमारा मुहल्ला ठहरा सँकरी गलियों वाला. ऐसा लगा जैसे गाना मेरे ही कमरे में बज रहा हो. मेरी आँख खुल गयी. बालकनी में निकली तो देखा कि एक-दो और लड़के देख रहे थे (यहाँ ज्यादातर सिविल की तैयारी करने वाले लड़के हैं, जिनकी पढ़ाई में विघ्न पड़ रहा था) पर समस्या ये कि इस बिल्डिंग से नीचे उतरकर सामने वाली बिल्डिंग में मना कौन करने जाय? वैसे भी सिविल वाले किसी से पंगा नहीं लेते. थोड़ी देर में सब अपने-अपने कमरों में चले गए.

मैंने सोचा कि जाने दो. बेचारा पूरा गाना सुन लेगा तो खुद ही बंद कर देगा. लेकिन पता नहीं सामने वाले को क्या फितूर सवार था कि उसने वही गाना करीब तीन बार रिपीट किया. जब चौथी बार गाना शुरू हो गया तो मेरी गुण्डई जाग गयी. मैंने दीवाली में बालकनी पर रखे पुराने ‘दीये’ उठाये और एक-एक करके सामने वाले के दरवाजे पर निशाना लगाना शुरू किया. सोचा कि बन्दा आजिज आकर दरवाजा खोलेगा तो उससे कहूँगी कि ‘तुमने मुझे डिस्टर्ब किया तो मैं तुम्हें कर रही हूँ.’ लेकिन वो नौबत नहीं आयी. तीसरा दीया फेंकते ही गाना बंद हो गया और दुबारा नहीं बजा :)

(किस्सा खतम पइसा हजम :))

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