Posted on March 4, 2010 by aradhana
मुझे होली में एक पामेरेनियन पपी उपहार में मिली. मैं उसकी कुछ फोटो अपलोड कर रही हूँ. मैंने उसका नाम कली रखा है. कली बहुत शैतान है. वो या तो खेलती है या फिर सोती रहती है. सोती भी है अजीब-अजीब मुद्राओं में. अभी दो महीने की भी पूरी नहीं हुई है, पर बड़ी अक्ल है उसमें. मेरे बेड पर सोने के लिये चादर खींचती है और मेरे जवाब न देने पर भौंकने लगती है. जब उसे अपनी मम्मी की याद आती है, तो बालकनी में जाकर मुँह ऊपर करके कूँ-कूँ करती है. मैं उसको अभी सुबह-शाम उसकी मम्मी के पास ले जाती हूँ.
कुछ दिन पहले मैं एक पपी को रात में गली से उठाकर ले आयी थी. उसे मैंने एक चाय वाले को दे दिया था. दूसरे दिन जब उससे पूछने गयी, तो उसने कहा कि एक लड़का पपी को ले गया. मैं उसको याद करके इतनी परेशान हुई कि किसी से मेरा दुःख देखा नहीं गया और उन्होंने मुझे ये पपी उपहार में दे दी.
मेरे कुछ मनोवैज्ञानिक दोस्त कहते हैं कि पिल्लों को लेकर तुम्हारी दीवानगी एक मानसिक व्याधि है. वो क्या कहते हैं उसे ओ.सी.डी. (ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर). जिसमें कोई व्यक्ति किसी एक बात के पीछे पड़ जाता है. कुछ लोग सफाई के पीछे इतने पागल हो जाते हैं कि हमेशा अपना हाथ धोते रहते हैं. कुछ लोग किसी और बात के पीछे पड़े रहते हैं. मेरे जैसे लोगों को “मेनेयिक” भी कहा जाता है. तो इसका मतलब यह है कि मुझे “पपी मेनिया” हुआ है. अच्छा शब्द है न.
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Posted on February 23, 2010 by aradhana
एक सुबह,
बांस की पत्ती के कोने पर अटकी
ओस की बूँद
कैद कर ली थी,
आँखों के कैमरे में
आज भी कभी-कभी वो
बंद पलकों में
उतरती है,
… …
एक शाम,
पक्षियों के कलरव को
सुना था बैठकर
छत की मुंडेर पर,
जिसकी धुन
मन में आज तक
जलतरंग सी
बजती है,
… …
एक रात
तुम्हारी तपती हथेलियों का स्पर्श
महसूस किया था
अपने गालों पर,
कानों के नीचे वो छुअन
आज भी
धधकती है,
… …
नहीं सही आज
वो सुबह, वो शाम, वो रात,
वो ओस,वो पंछी,
वो तुम्हारी छुअन
पर उनकी यादें
अब भी, सीने में
करकती है.
(photo by fotosearch.com)
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Posted on February 21, 2010 by aradhana
ना जाने क्यों, जीवन में कभी-कभी कोई दोस्त अचानक से ख़ास बन जाता है. वो दोस्त, जिससे हम रोज़ मिलते हैं, बातें करते हैं, घूमते-फिरते हैं और अपने अनुभव बाँटते हैं, किन्हीं कोमल क्षणों में वो कुछ और ही हो जाता है. वो पहले वाली बात नहीं रहती. दोस्त वही होता है, पर वो दोस्त नहीं रह जाता ….अचानक से रिश्ते का पूरा स्वरूप ही बदल जाता है. या हो सकता है यह फागुनी हवा ही ऐसी होती है…. ना जाने कैसी मादकता होती है इसमें?? हर चीज़ ही बदली-बदली लगती है.
बहुत दिनों पहले इसी मौसम में कोई पाहुन चुपके से आन बसा था, मेरे मन-आँगन में और गया नहीं… …बस… बस गया यहीं. हमने बहुत सा समय साथ-साथ बिताया था. कभी महसूस ही नहीं हुआ कि हमारे बीच स्त्री-पुरुष का स्वाभाविक आकर्षण भी हो सकता है. हम अक्सर कहते थे कि पता नहीं लोग कैसे ये मानने को तैयार ही नहीं होते कि लड़का-लड़की भी अच्छे दोस्त हो सकते हैं? हम बहुत अच्छे दोस्त थे…बस…अच्छे दोस्त…लेकिन, एक पल में सब बदल गया.
नहीं…ये इतनी शीघ्रता से नहीं हुआ. मैं बहुत ही कैरियर ओरिएन्टेड, प्रैक्टिकल लड़की थी. मैंने अपने कोमल हृदय के चारों ओर एक दीवार बना रखी थी. इस कठोर हृदय की किलेबन्दी को भेद पाना इतना सहज नहीं था. पर…, जाने क्या था, उन पारदर्शी आँखों में कि मन स्वयं ही इतना कोमल हो गया…सब कुछ अनायास होता गया. उनका आना… मन-मस्तिष्क पर छा जाना और…अस्तित्व का एक अभिन्न अंग बन जाना. संभवतः, सायास यह हो भी नहीं सकता था. मानव-मन का स्वभाव ही ऐसा है. कोई पीछे आता है, तो यह दूर भागता है और कोई दूर जाता है, तो उसके पीछे… … तो, वह मनबसिया हो गया… दूर से ही.
फिर क्या था. मैं, वो और कभी…विस्तृत गंगा का रेतीला तट, तो कभी गम्भीर जमुना का सरस्वती घाट… पर सबसे प्रिय था… गंगा-जमुना का संगम. संगम वैसे भी प्रेमी हृदयों के लिये सबसे सुरक्षित स्थान है. सित-असित तरंगों के साथ ही परस्पर एक होते दो प्रेमातुर हृदय… दूर देश से आये अतिथि खग-वृंद को दाना डालते, लहरों की ठंडक को अपने भीतर अनुभव करते, नाव की सैर करते और तट की ठंडी बालू पर नंगे पाँव टहलते…कोई पुराना गीत गुनगुनाते हुए…
कभी जाओ संगम, तो देखना… दो जुड़वा पैरों के निशान ज़रूर मिेलेंगे संगम-तट की रेत पर…
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Posted on February 19, 2010 by aradhana
कुछ दिनों पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी अपने नाम के संबंध में. उसे बहुत लोगों ने पढ़ा और टिप्पणियाँ भी दीं. मैं यहाँ यह बात बताना चाहती हूँ कि उस पोस्ट में एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात छूट गयी थी. मैंने कहा था कि मुझे अपना नाम बहुत अच्छा लगता है, सभी को लगता होगा. पर एक प्रसंग ऐसा है, जहाँ मुझे आराधना शब्द बिल्कुल अच्छा नहीं लगता.
यह प्रसंग है संस्कृत के नाटक “उत्तररामचरितम्” से, जो कि प्रसिद्ध नाटककार भवभूति की रचना है. इसकी कथा रामायण के उत्तरकाण्ड पर आधारित है, जिसके बारे में सभी लोग जानते हैं. नाटक के अनुसार राम की एक बहन हैं-शान्ता, जिनके पति ऋष्यशृंग बारहवर्षीय यज्ञ करवाते हैं. राम की माताएँ उस यज्ञ में हिस्सा लेने जाती हैं, इसी सूचना से नाटक का आरंभ होता है. ऊपर मैंने जिस प्रसंग का उल्लेख किया है, वह नाटक के शुरुआत में ही है. ऋष्यशृंग के आश्रम से अष्टावक्र, वसिष्ठ (जो राम के कुलगुरु थे) और राम की माताओं का संदेश लेकर आते हैं. माताओं ने कहलाया कि राम, सीता का ध्यान रखें क्योंकि वे गर्भवती हैं. वसिष्ठ ने संदेश दिया कि वे प्रजा को सर्वथा प्रसन्न रखें. इसी स्थान पर राम कहते हैं -
“स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि
आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति मे व्यथा.”
अर्थात् “प्रजा को प्रसन्न रखने के लिये प्रेम, दया, सुख अथवा जानकी को भी छोड़ते हुये मुझे कष्ट नहीं होगा.” जैसा कि मैंने बताया था कि “आराधनम्” का एक अर्थ प्रसन्न करना भी होता है. यहाँ यही अर्थ प्रयुक्त हुआ है. यह तो सभी को पता है कि राम ने प्रजा के ही कहने पर सीता को गृह-निष्कासन दे दिया था. इस प्रसंग में उसी बात का संकेत दिया गया है. यह एक नाटक का अंश है और नाट्यशास्त्रीय दृष्टि से इसे “पताकास्थानक” कहते हैं, अर्थात् भावी घटनाओं की सूचना संकेत द्वारा देना. इसी अंक में आगे राम सीता की गंगा-स्नान की इच्छा पूरी करने के बहाने से लक्ष्मण द्वारा वन में छुड़वा देते हैं.
उपर्युक्त प्रसंग में मुझे ’आराधना’ शब्द इसलिये अच्छा नहीं लगता क्योंकि इसकी आड़ लेकर राम ने सीता के साथ इतना बड़ा अन्याय किया और फिर स्वयं पूरे नाटक में इतना रोये कि यह रचना करुणरस के लिये संस्कृत-साहित्य में प्रसिद्ध हो गयी. ये ”प्रसन्न करना या तुष्टीकरण” शब्द ही ऐसा होता है. इसी तुष्टीकरण की नीति पर चलकर राम ने गर्भवती सीता को घर से निकाल दिया और तब से लेकर इस शब्द ने कितनी सामाजिक उथल-पुथल मचाई है.
मैं सीता के निष्कासन के लिये राम को कभी क्षमा नहीं कर पाउँगी क्योंकि उन्होंने दो ग़लत उदाहरण रखे. पहला, किसी एक को प्रसन्न करने के लिये, दूसरे को कष्ट पहुँचाया जा सकता है. मतलब कि जनता की भलाई से ज्यादा ज़रूरी उसे खुश रखना है. दूसरा, नारी पर अत्याचार करने के लिये कोई भी बहाना चल सकता है.
क्या कोई और रास्ता नहीं हो सकता था या नहीं हो सकता है?
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Posted on February 16, 2010 by aradhana
मेरे जीवन की कुछ घटनाएँ ऐसी हैं, जिन्हें अच्छी या बुरी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, पर उन्होंने मेरे मन पर ऐसी अमिट छोड़ी है कि जब भी याद आती है, तो एक टीस सी उठती है.
मेरी माँ की असमय मृत्यु के बाद दीदी ने मुझे बेटी के जैसे ही पाला-पोसा. वो मुझसे लगभग नौ साल बड़ी हैं और आज भी मुझे बच्ची समझती हैं. आज से दस साल पहले दीदी की शादी हुई और शादी होते ही वो जीजाजी के साथ वलसाड (गुजरात) चली गयीं क्योंकि जीजाजी वहाँ एक कम्पनी में थे. अपनी शादी में उन्होंने लम्बी छुट्टी ली थी, इसलिये ज़ल्दी घर नहीं आ पाये. उसके बाद दीदी की बेटी हुई और जब वह एक साल की हो गयी, तब उन लोगों का घर आना हुआ.
दीदी को देखे बहुत दिन हो गये थे और साथ में जीजाजी से मिलने और बिटिया को दुलारने का लोभ. तो मैं रातोंरात यात्रा करके इलाहाबाद से बनारस पहुँच गयी, अपने एक मित्र के साथ. दीदी को सरप्राइज़ जो देना था. उनकी गाड़ी सुबह सात बजे आनी थी, तो रात भर प्लेटफ़ार्म पर बैठकर सुबह होने का इंतज़ार किया. दीदी ने जब यह सुना तो कह उठी कि तुम ही ऐसा कर सकती हो. मुझे आज भी वो पल नहीं भूलता, जब मैंने बिटिया को गोद में लिया था. वो उस समय एक साल की थी और किसी की गोद में नहीं जाती थी. दीदी ने कहा कि तुम्हारा चेहरा मेरे जैसा है न, तो तुम्हें दूसरी मम्मी समझ रही है.
शादी के बाद लड़कियों की ससुराल ही उनका पहला घर होता है. अतः पहले तो वहीं जाना था, पर मैंने सोचा था कि रात भर वहाँ रुककर हम सब घर जायेंगे और खूब मज़े करेंगे. दीदी से ढाई साल बाद मिली थी. बहुत सारी बातें इकट्ठा हो गयी थीं और इन सबसे बढ़कर बाबूजी अपनी बेटी और नतिनी की अधीरता से राह देख रहे थे.
हम शाम तक दीदी की ससुराल पहुँच गये. पर, वहाँ जाकर मेरी सारी योजनाओं पर पानी फिर गया. दीदी की सासू माँ ने कहा कि जब बेटी बच्चा होने के बाद नैहर जाती है, तो बिना साइत (शुभ मुहूर्त) के नहीं जा सकती. इसे वहाँ सुदेवस कहते हैं. अब मैं क्या कर सकती थी? किसको दोष देती? मुझ पर मानो वज्राघात हो गया. मेरी आँखों में उसी समय आँसू आ गये थे, पर मैं किसी के सामने कभी नहीं रोती.
इतनी लाचारी, इतनी विवशता मैंने पहले कभी अनुभव नहीं की थी. मेरे पिताजी बहुत उदार थे. रीति-रिवाजों के बंधन भी नहीं मानते थे. पर, ये दीदी की ससुराल थी. मेरा मन अनेक प्रश्न-प्रतिप्रश्नों में उलझ गया. जिसने मुझे बचपन से पाल-पोसकर बड़ा किया उस पर मेरा कोई अधिकार नहीं रह गया? और उस पिता का क्या, जो अकेले घर में बेटी की प्रतीक्षा कर रहा है? क्या रीति-रिवाजों के बंधन स्नेह-बन्धन से अधिक बड़े होते हैं? कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें समझाया नहीं जा सकता.
मैं एकदम से शान्त हो गयी. दीदी समझ रही थीं कि मुझे बहुत धक्का लगा है यह सुनकर. दूसरे दिन सुबह मैं अपने घर चली आयी और आते ही अपने कमरे में जाकर खूब रोयी.
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Posted on February 12, 2010 by aradhana
मैंने सोचा था कि यह एक-दो जगह की बात है, पर मैं बहुत दुःखी हो चुकी हूँ, हर जगह अपना नाम अनुराधा लिखा पाकर. इसीलिये मुझे यह पोस्ट लिखनी पड़ रही है. मैं सभी ब्लॉगर बंधुओं से अनुरोध करती हूँ कि कृपा करके मेरा सही नाम लिखें. मेरा नाम आराधना है, जो मेरे माता-पिता ने बहुत सोच-समझकर बड़े प्यार से रखा था. यदि इस नाम के उच्चारण में आपको परेशानी हो तो आप मेरा स्वयं का रखा हुआ नाम “मुक्ति” ले सकते हैं, पर मेरा नाम बदलकर अनुराधा मत रखिये.
मेरा नाम आराधना रखे जाने के पीछे भी एक कहानी है. लोग आमतौर पर बेटा होने की मन्नतें माँगते हैं, लेकिन मैं उन गिनी-चुनी भाग्यशाली लड़कियों में से एक हूँ, जिसके पैदा होने के लिये ईश्वर से आराधना की गयी थी. इसीलिये मेरा नाम आराधना रखा गया. बात यह है कि मेरी दीदी अम्मा-बाबूजी की शादी के दस-ग्यारह साल बाद पैदा हुई थीं. तब तक मेरी माँ को उस विशेषण से विभूषित किया जा चुका था, जिसे यहाँ लिखना भी मुझे मुश्किल लग रहा है. माँ ने निःसंतान होने का दुःख वर्षों झेला था. इसलिये उन्हें अपनी बेटी से बहुत लगाव था. पर दीदी के बहुत दिनों बाद भी कोई संतान न होने से माँ बहुत परेशान रहने लगीं. तब उन्होंने कठोर व्रत-उपवास रखने आरंभ किये और ईश्वर से मनाया कि उन्हें अपनी बेटी के साथ खेलने के लिये एक और बेटी ही दे-दे. यानि विकल्प के रूप में मुझे माँगा गया. तब दीदी के पैदा होने के साढ़े आठ साल बाद मैं माँ की गोद में आयी. मेरे माता-पिता दोनों ने मेरे जन्म पर बढ़चढ़कर खुशियाँ मनायी थीं.
मेरे पिताजी संस्कृत के बड़े ज्ञाता थे. इसलिये उन्होंने मेरा नाम “आराधना” रखा, जो कि शुद्ध संस्कृत शब्द “आराधनम्” से बना है. इसकी व्युत्पत्ति है- आ उपसर्ग+राध् धातु+ल्युट् प्रत्यय. और इसके अनेकों अर्थ हैं, जैसे-प्रसन्नता, संतोष, सेवा, पूजा, अर्चना, उपासना, प्रसन्न करने के उपाय, सम्मान करना, आदर करना, पूर्ति, दायित्व, निष्पत्ति आदि. इन अनेकों अर्थों में मेरा नाम जिस तात्पर्य से रखा गया, वह दोहरा है- एक, माँ ने ईश्वर की आराधना करके मुझे माँगा, दूसरा, ईश्वर ने मुझे देकर माँ को संतुष्ट किया या प्रसन्न किया.
मुझे पता है कि यह नाम थोड़ा कठिन है, दूसरी बात अनुराधा नाम अधिक लोकप्रिय है. इसलिये मैंने ब्लॉग लिखने के लिये एक छोटा नाम “मुक्ति” रख लिया. पर मुझे मेरा वास्तविक नाम बहुत प्रिय है.
तो जो नाम इतने गूढ़ अर्थ को द्योतित करता है, उसे आप बदलिये तो मत. मुझे दुःख होता है, क्योंकि यह नाम मुझे इस बात की याद दिलाता रहता है कि मैं विशेष हूँ, क्योंकि मैं अपनी माँ की आराधना और पिता की विद्वत्ता का परिणाम हूँ. यह नाम मेरे उन माता-पिता की निशानी है मेरे साथ, जो अब इस संसार में नहीं हैं.
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Posted on February 9, 2010 by aradhana
ये कोई अच्छी बात थोड़े ही है. अच्छी ख़ासी फगुनहट चल रही थी. मौसम में मस्ती की फ़ुहार थी. थोड़ा-थोड़ा आलस ज़रूर था, लेकिन कुल मिलाकर शिशिर की जड़ता समाप्त होने को थी. ब्लॉग-फाग छाया हुआ था. सब कुछ ठीक था…फिर…क्या ज़रूरत थी ये कजरी-वजरी की बात छेड़ने की?? बहुत खराब बात हुई. जब से कजरी की बात चली, फागुन में बरसात हो गयी.
जी हाँ, आज सुबह से ही दिल्ली में बारिश हो रही है. आज हम दो-एक काम के लिये बाहर जाने वाले थे. जे.एन.यू. भी जाना था, शोध के काम से, पर सब ठप्प पड़ गया. अब, फागुन में कबीरा-जोगीरा, फाग, चैता गाने वाले ब्लॉगर बन्धु आप ही बतायें. आप इतने फगुनाए हुए लोगों पर एक हमारी कजरी भारी पड़ी कि नहीं. हम पछता रहे हैं. अच्छा-खासा माहौल खराब कर डाला हमने. पर क्या करें? ये शायद मन ही है. कुछ अनमना सा है इन दिनों. थोड़ी तबियत खराब थी, तो बाबूजी की याद आने लग गयी. एक वही थे जो दिन में कम-से-कम दो-तीन बार फ़ोन करके पूछते थे कि “गुड्डू तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?”, “…खाना खाया कि नहीं?”, “…ज़्यादा पढ़ाई मत करना. थोड़ा घूम-वूम लिया करो बाहर, मन बहल जायेगा.” वगैरह-वगैरह…आज सुबह से पड़ी हूँ, खाना भी नहीं बनाया, पर कोई पूछने वाला नहीं…बारिश हो रही है…सुबह से. भीग गया है सब कुछ, बाहर और…अन्दर…
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Posted on February 8, 2010 by aradhana
आजकल ब्लॉगजगत में फागुन आया हुआ है. कुछ लोगों ने तो अपने ब्लॉग पर चेतावनी भी लगा रखी है कि भई संभल के टिप्पणी देना, इस ब्लॉग पर फागुन आया है. पर, मेरा मन इन दिनों एक कजरी पर अटका हुआ है. डॉ. अरविन्द को शायद यह भी फागुन का ही असर लगे और हो भी सकता है.
असल में, कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र ने मुझे कुछ गीत दिये, जिन्हें उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई के साथ शोमा घोष ने अपनी मीठी आवाज़ में गाया है. इन तीन गीतों में मुझे सबसे अधिक अच्छी लगी एक कजरी, जिसे उस्ताद ने “बनारसी कजरी” कहा है. मैंने “मिर्जापुरी कजरी” सुनी है और अक्सर गुनगुनाती भी रहती हूँ. मेरी अम्मा कजरी गाती थीं. मैंने उन्हीं से सीखा था. उनके पास एक डायरी थी, जिसमें बोल और तर्ज़ के साथ बहुत से लोकगीत संकलित थे. मैं सिर्फ़ तेरह साल की थी, जब उनका स्वर्गवास हुआ. इसलिये ज़्यादा कुछ सीख नहीं पायी. मित्र के दिये इन गीतों को सुनकर मैं खो सी गयी.
शोमा घोष के बारे में मैंने बहुत सुना था, पर उन्हें नहीं सुना था. जो कजरी इस संकलन में है, उसके बोल हैं,”मिर्जापुर कईलैं गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कईलैं बलमू.” उस्ताद की शहनाई के साथ इसका प्रभाव अद्भुत है. इसी तर्ज़ पर एक कजरी मुझे याद थी, “रिमझिम पड़इलै फुहार हो, सवनवा आइ गइलै गोरिया” इस गीत का एक अतंरा भी याद है. मिर्जापुरी कजरी जो मुझे आधी आती है, उसके बोल हैं,”पिया मेहंदी मँगाइ दा मोतीझील से, जाई के साईकील से ना…पिया मेहंदी तू मँगाइ दा, छोटी ननदी से पिसाई दा, अपने हाथ से लगाई दा कांटा कील से, जाई के साईकील से ना…” इस कजरी की तर्ज़ सामान्यतः प्रसिद्ध कजरी से अलग है. जो कजरी आमतौर पर अधिक प्रचलित है, “झूला पड़ा कदम की डारी, झूलैं राधा प्यारी रे” इसे थोड़े से अलग तर्ज़ से गाते हैं, तो ऐसे बनता है,”अरे रामा बेला फुलै आधी रात, चमेली बड़े भोरे रे हारी” यही “हारी” और “रे” के अन्तर से तर्ज़ में थोड़ा अंतर आ जाता है. इस प्रकार कजरी विधा की कुल चार तर्ज़ मैंने सुनी हैं. मुझे बस इतना ही पता है. और अधिक जानना चाहती हूँ.
सुधीजन कहेंगे कि ब्लॉगजगत इस समय फागुनमय है और कजरी के पीछे पड़ी हूँ. पर क्या करूँ, गीत सुना, तो स्वयं को रोक नहीं पायी अपने अनुभव बाँटने से.
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Posted on February 7, 2010 by aradhana
जाके बीते ज़माने में आज फिर से
चलो बचपन की यादों को बीन लायें,
भूलकर ज़िंदगी की परेशानियाँ,
चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं.
… … … …
चलो पलटें पुरानी किताबों को आज,
बिछड़े यारों की फोटो को फिर से देखें,
बंद हैं घर के बक्से में बरसों से जो,
उन चिठ्ठियों और कार्डों को फिर से देखें,
अपनी बगिया के फूलों को पानी डालें,
छत पे जाकर कबूतर को दाना खिलाएं,
चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं … …
… … … …
दम घुटता रहा, साँस फूलती रही,
पिछले दरवाजे को कब से खोला नहीं,
रात में आँसू बनकर के बहती है जो,
बात दिल में रही, कभी बोला नहीं,
दिल के दरवाजों को आज फिर खोलकर
ताजी हवा के झोकों में झूम जायें,
चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं … …।
(यह रचना मेरे ब्लॉग फ़ेमिनिस्ट पोएम्स पर पिछले वर्ष प्रकाशित की जा चुकी है.)
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Posted on February 5, 2010 by aradhana

कल रात मैं बिल्कुल नहीं सो पायी. मैं जिस पपी को अपनी गली से उठाकर ले आयी थी. वो हर एक घंटे बाद सू-सू करती थी और फिर कटोरी खटकाती थी, दूध माँगने के लिये. ये भूख भी इतनी कठोर होती है कि बच्चा और कुछ सीखे चाहे न, खाना माँगना ज़रूर सीख जाता है. तो रात भर मैं इस आगंतुक की सेवा-शुश्रूषा में लगी रही. दिन में थोड़ी देर आराम किया. और फिर निकल पड़ी उसकी माँ की खोज में. मैंने आधा मोहल्ला ढूँढ़ डाला, पर उसकी माँ नहीं मिली. कुछ मौसियाँ ज़रूर मिलीं, जिन्होंने उसे सूँघा और फिर मुँह फेर लिया. एक मौसी थोड़ी अच्छे दिल की थी, तो वो अपनी गली के नुक्क्ड़ तक हम दोनों को छोड़ने आयी.
मैं बहुत निराश हुयी. आखिर में एक चाय वाले ने मेरी हालत पर दया करके कहा कि आप इसे यहीं छोड़ दो, हम पाल लेंगे. आपको लग रहा होगा कि ये चाय वाला कहाँ से टपक पड़ा? तो साहब ये मेरी खुशकिस्मती है कि मैं महानगर के ऐसे कोने पर रहती हूँ, जहाँ का माहौल पूरी तरह तो नहीं, लेकिन काफ़ी कुछ कस्बों जैसा है.
मैं उत्तरी दिल्ली के गाँधी विहार नाम के मोहल्ले में रहती हूँ, जो अनेक छोटे-छोटे प्लाटों में बँटा हुआ है. यह पूरा क्षेत्र एक विशेष कारण से बहुत महत्त्वपूर्ण है कि यहाँ सिविल सर्विसेज़ की तैयारी करने वाले काफ़ी संख्या में रहते हैं. इन लोगों के कारण यहाँ हर नुक्कड़ पर चाय-नाश्ते और खाने की दुकानें हैं. गाँधी विहार के पीछे “धीरपुर विलेज ग्रीन प्रोजेक्ट” के नाम पर काफ़ी लम्बा-चौड़ा मैदान छूटा हुआ है, जिसके किनारे सड़क बनी हुई है. इस सड़क और मोहल्ले के बीच में भी दो-तीन चाय की दुकानें हैं. उन्ही में से एक चाय वाले ने मेरी मुश्किल हल कर दी.
आज रात को मैं चैन से सो सकूँगी. पर कहाँ?? मुझे अब उसकी याद आ रही है. मैं अगर ग्राउंड फ़्लोर पर होती तो निश्चित ही पाल लेती उसे. पता नहीं क्यों ? वो अपनी काली-काली आँखों से मुझे बड़ी ध्यान से देखती थी. जितनी देर मैं उसके आस-पास होती…वो आराम से सोती. मेरे इधर-उधर होते ही कूँ-कूँ करने लगती. कल उसने परेशान किया और आज उसकी याद परेशान कर रही है.
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